भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ५५ ]देवीद्वारा नमुचिका वध; असुरसैन्यसहित चण्ड-मुण्डका विनाश२४३
शुम्भनिशुम्भावूचतुः
अहं शुम्भ इति ख्यातो दनोः पुत्रस्तथौरसः।<br>निशुम्भोऽयं मम भ्राता कनीयान् शत्रुपूगहा॥ २०<br><br>अनेन बहुशो देवाः सेन्द्ररुद्रदिवाकराः।<br>समेत्य निर्जिता वीरा येऽन्ये च बलवत्तराः॥ २१<br><br>तदुच्यतां कया दैत्यो निहतो महिषासुरः।<br>यावत्तां घातयिष्यावः स्वसैन्यपरिवारितौ॥ २२<br><br>इत्थं तयोस्तु वदतोर्नर्मदायास्तटे मुने।<br>जलवासाद् विनिष्क्रान्तौ चण्डमुण्डौ च दानवौ॥ २३शुम्भ और निशुम्भने कहा—(पहले शुम्भ बोला—) मैं दनुका औरस पुत्र हूँ और शुम्भ नामसे प्रसिद्ध हूँ। यह मेरा छोटा भाई है। इसका नाम निशुम्भ है। यह शत्रुसमूहका विनाश करनेवाला (वीर) है। इसने इन्द्र, रुद्र, दिवाकर आदि देवताओं तथा अन्य अनेक अत्यन्त बलशाली वीरोंको भी (बहुत बार चढ़ाई करके) पराजित कर दिया है। अब तुम बतलाओ कि किस देवीने दैत्य महिषासुरको मार दिया है? हम दोनों अपनी सेनाओंको साथ लेकर उस देवीका विनाश करेंगे। मुने! नर्मदाके किनारे इस प्रकार दोनोंके बात करते समय चण्ड और मुण्ड नामके दोनों दानव जलसे बाहर निकल आये॥ २०–२३॥
ततोऽभ्येत्यासुरश्रेष्ठौ रक्तबीजं समाश्रितौ।<br>ऊचतुर्वचनं श्लक्ष्णं कोऽयं तव पुरस्सरः॥ २४<br><br>स चोभौ प्राह दैत्योऽसौ शुम्भो नाम सुरार्दनः।<br>कनीयानस्य च भ्राता द्वितीयो हि निशुम्भकः॥ २५<br><br>एतावाश्रित्य तां दुष्टां महिषघ्नीं न संशयः।<br>अहं विवाहयिष्यामि रत्नभूतां जगत्त्रये॥ २६उसके बाद असुरश्रेष्ठ उन दोनोंने रक्तबीजके निकट जाकर मधुर शब्दोंमें पूछा—तुम्हारे सामने यह कौन खड़ा है? उसने उन दोनोंसे कहा—यह देवताओंको कष्ट देनेवाला शुम्भ नामका दैत्य है एवं यह दूसरा इसका छोटा भाई निशुम्भ है। मैं निश्चय ही इन दोनोंकी सहायतासे उस तीनों लोकोंमें रत्नस्वरूपा, (पर) दुष्टासे विवाह करूँगा, जिसने महिषासुरका विनाश किया है॥ २४–२६॥
चण्ड उवाच<br>न सम्यगुक्तं भवता रत्नार्होऽसि न साम्प्रतम्।<br>यः प्रभुः स्यात्स रत्नार्हस्तस्माच्छुम्भाय योज्यताम्॥ २७<br>तदाचचक्षे शुम्भाय निशुम्भाय च कौशिकीम्।<br>भूयोऽपि तद्विधां जातां कौशिकीं रूपशालिनीम्॥ २८<br>ततः शुम्भो निजं दूतं सुग्रीवं नाम दानवम्।<br>दैत्यं च प्रेषयामास सकाशं विन्ध्यवासिनीम्॥ २९<br>स गत्वा तद्वचः श्रुत्वा देव्यागत्य महासुरः।<br>निशुम्भशुम्भावाहेदं मन्युनाभिपरिप्लुतः॥ ३०**चण्डने कहा—**आपका कहना उचित नहीं है; (क्योंकि) आप अभी उस रत्नके योग्य नहीं हैं। राजा ही रत्नके योग्य होता है। अतः शुम्भके लिये ही यह संयोग बैठाइये। उसके बाद उन्होंने शुम्भ और निशुम्भसे उस प्रकार सम्पन्न स्वरूपवाली कौशिकीका वर्णन किया। तब शुम्भने अपने दूत सुग्रीव नामके दानवको विन्ध्यवासिनीके समीप भेजा। वह महान् असुर सुग्रीव वहाँ गया एवं देवीकी बात सुनकर क्रोधसे तिलमिला उठा। फिर उसने आकर निशुम्भ और शुम्भसे कहा॥ २७–३०॥
सुग्रीव उवाच<br>युवयोर्वचनाद् देवीं प्रदेष्टुं दैत्यनायकौ।<br>गतवानहमद्यैव तामहं वाक्यमब्रुवम्॥ ३१<br>यथा शुम्भोऽतिविख्यातः ककुद्मी दानवेष्वपि।<br>स त्वां प्राह महाभागे प्रभुरस्मि जगत्त्रये॥ ३२<br>यानि स्वर्गे महीपृष्ठे पाताले चापि सुन्दरि।<br>रत्नानि सन्ति तावन्ति मम वेश्मनि नित्यशः॥ ३३<br>त्वमुक्ता चण्डमुण्डाभ्यां रत्नभूता कृशोदरि।<br>तस्माद् भजस्व मां वा त्वं निशुम्भं वा ममानुजम्॥ ३४**सुग्रीवने कहा—**दैत्यनायको! आपलोगोंके कथनके अनुसार देवीसे (संवाद) कहनेके लिये मैं गया था। मैंने आज ही जाकर उससे कहा कि भाग्यशालिनि! सुप्रसिद्ध दानवश्रेष्ठ शुम्भने तुमसे कहा है कि मैं तीनों लोकोंका समर्थ स्वामी हूँ। सुन्दरि! स्वर्ग, पृथ्वी एवं पातालके सारे रत्न मेरे घरमें सदा भरे रहते हैं। कृशोदरि! चण्ड और मुण्डने तुम्हें रत्नस्वरूपा बतलाया है। अतः तुम मेरा या मेरे छोटे भाई निशुम्भका वरण करो॥ ३१–३४॥