वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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२४६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५५ ---|---
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कांश्चित् खड्गेन चिच्छेद खट्वाङ्गेन परान् रणे।<br>न्यषूदयद् भृशं क्रुद्धा सरथाश्वगजान् रिपून्॥ ५८ | मुण्डमाला थी। उन्होंने बहुत अधिक क्रुद्ध होकर युद्धमें कुछको तलवारके घाट उतार दिया और हाथी, रथ एवं घोड़ोंसे युक्त कुछ अन्य असुर-शत्रुओंको खट्वाङ्गसे मार डाला॥ ५५-५८॥ |
| चर्माङ्कुशं मुद्गरं च सधनुष्कं सघण्टिकम्।<br>कुञ्जरं सह यन्त्रेण प्रचिक्षेप मुखेऽम्बिका॥ ५९<br>सचक्रकूबररथं ससारथितुरङ्गमम्।<br>समं योधेन वदने क्षिप्य चर्वयतेऽम्बिका॥ ६०<br>एकं जग्राह केशेषु ग्रीवायामपरं तथा।<br>पादेनाक्रम्य चैवान्यं प्रेषयामास मृत्यवे॥ ६१<br>ततस्तु तद् बलं देव्या भक्षितं सबलाधिपम्।<br>रुरुर्दृष्ट्वा प्रदुद्राव तं चण्डी ददृशे स्वयम्॥ ६२<br>आजघानाथ शिरसि खट्वाङ्गेन महासुरम्।<br>स पपात हतो भूम्यां छिन्नमूल इव द्रुमः॥ ६३ | अम्बिकादेवी चर्म, अङ्कुश, मुद्गर, धनुष, घंटियों और यन्त्रके साथ हाथियोंको अपने मुखमें झोंकने लगीं और चक्र तथा सारथी, घोड़े और योद्धाके साथ कूबरसे युक्त रथको अपने मुखमें डालकर वे चबाने लगीं। फिर उन्होंने किसीको सिरके केश पकड़कर, किसीको गला पकड़कर और अन्य किसीको पैरोंसे रौंद-रौंदकर मृत्युके समीप पहुँचा दिया। उसके बाद सेनापतिके साथ उस सेनाको देवीद्वारा भक्षण किया जाता हुआ देखकर रुरु दौड़ पड़ा। चण्डीने स्वयं उसे देखा और खट्वाङ्गसे उस महान् असुरके सिरपर आघात कर दिया। वह मरकर जड़से कटे हुए वृक्षके समान पृथ्वीपर (धड़ामसे) गिर पड़ा॥ ५९-६३॥ |
| ततस्तं पतितं दृष्ट्वा पशोरिव विभावरी।<br>कोशमुत्कर्तयामास कर्णादिचरणान्तिकम्॥ ६४<br>सा च कोशं समादाय बबन्ध विमला जटाः।<br>एका न बन्धमगमत् तामुत्पाट्याक्षिपद् भुवि॥ ६५<br>सा जाता सुतरां रौद्री तैलाभ्यक्तशिरोरुहा।<br>कृष्णार्धमर्धशुक्लं च धारयन्ती स्वकं वपुः॥ ६६<br>साऽब्रवीद् वरमेकं तु मारयामि महासुरम्।<br>तस्या नाम तदा चक्रे चण्डमारीति विश्रुतम्॥ ६७ | देवीने उसे जमीनपर गिरा हुआ देखकर पशुके समान उसके कानसे पैरतकका कोश काट दिया—उसकी चमड़ी उधेड़ ली। उस कोश (चमड़ी)-को लेकर उन्होंने अपनी निर्मल जटाओंको बाँध लिया। उनमें एक जटा नहीं बाँधी गयी। उसे उखाड़कर उन्होंने जमीनपर फेंक दिया। वह जटा एक भयावनी देवी हो गयी। उसके सिरके बाल तेलसे सिक्त (सने) थे एवं वह आधा काला तथा आधा सफेद वर्णका शरीर धारण किये हुए थी। उसने कहा—मैं एक श्रेष्ठ महान् असुरको मारूँगी। तब देवीने उसका चण्डमारी—यह प्रसिद्ध नाम रख दिया॥ ६४—६७॥ |
| प्राह गच्छस्व शुभगे चण्डमुण्डविहानय।<br>स्वयं हि मारयिष्यामि तावानेतुं त्वमर्हसि॥ ६८<br>श्रुत्वैवं वचनं देव्याः साऽभ्यद्रवत तावुभौ।<br>प्रदुद्रुवतुर्भयात्तौ दिशमाश्रित्य दक्षिणाम्॥ ६९<br>ततस्तावपि वेगेन प्राधावत् त्यक्तवाससौ।<br>साऽधिरुह्य महावेगं रासभं गरुडोपमम्॥ ७०<br>यतो गतौ च तौ दैत्यौ तत्रैवानुययौ शिवा।<br>सा ददर्श तदा पौण्ड्रं महिषं वै यमस्य च॥ ७१ | देवीने कहा—शुभगे! तुम जाओ और चण्ड-मुण्डको यहाँ पकड़ लाओ! उन्हें पकड़ लानेमें तुम समर्थ हो। मैं स्वयं उन्हें मारूँगी। इस प्रकार देवीके उस कथनको सुनकर वह उन दोनोंकी ओर दौड़ पड़ी। वे दोनों भयसे दुःखी होकर दक्षिण दिशाकी ओर भाग गये। तब चण्डमारी गरुड़के समान वेगवान् गदहेपर सवार होकर वेगसे भगनेके कारण वस्त्रहीन हुए उन दोनोंके पीछे दौड़ पड़ी। (फिर तो) जहाँ-जहाँ चण्ड और मुण्ड दोनों दैत्य गये, वहाँ-वहाँ उनके पीछे शिवा भी पहुँचती गयीं। उस समय उन्होंने यमराजके पौण्ड्र नामक महिषको देखा॥ ६८-७१॥ |