भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 489 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 255

अध्याय ५५ ] देवीद्वारा नमुचिका वध; असुरसैन्यसहित चण्ड-मुण्डका विनाश २४५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुलस्त्य उवाच<br>एवमुक्तो विभावर्या बलवान् धूम्रलोचनः।<br>समभ्यधावत् त्वरितो गदामादाय वीर्यवान्॥ ४६<br>तमापतन्तं सगदं हुंकारेणैव कौशिकी।<br>सबलं भस्मसाच्चक्रे शुष्कमग्निरिवेन्धनम्॥ ४७<br>ततो हाहाकृतमभूज्जगत्स्यस्मिंश्चराचरे।<br>सबलं भस्मसानीतं कौशिक्या वीक्ष्य दानवम्॥ ४८पुलस्त्यजी बोले— विभावरी (देवी)-के इस प्रकार कहनेपर बलवान् एवं पराक्रमी धूम्रलोचन गदा लेकर झट दौड़ पड़ा। कौशिकीने गदा लेकर आ रहे उस असुरको, साथ ही उसकी सेनाको भी हुंकारसे ही ऐसे भस्म कर दिया जैसे आग सूखी लकड़ीको जला देती है। कौशिकीद्वारा सेनाके साथ बलवान् दानवको भस्म किये जाते देखकर सारे संसारमें हाहाकार मच गया॥ ४६–४८॥
तच्च शुम्भोऽपि शुश्राव महच्छब्दमुदीरितम्।<br>अथादिदेश बलिनौ चण्डमुण्डौ महासुरौ॥ ४९<br>रुरुं च बलिनां श्रेष्ठं तथा जग्मुर्मुदान्विताः।<br>तेषां च सैन्यमतुलं गजाश्वरथसंकुलम्॥ ५०<br>समाजगाम सहसा यत्रास्ते कोशसम्भवा।<br>तदायान्तं रिपुबलं दृष्ट्वा कोटिशतावरम्॥ ५१<br>सिंहोऽद्रवद् धुतसटः पाटयन् दानवान् रणे।<br>कांश्चित् करप्रहारेण कांश्चिदास्येन लीलया॥ ५२<br>नखैः कांश्चिदाक्रम्य उरसा प्रममाथ च।<br>ते वध्यमानाः सिंहेन गिरिकन्दरवासिना॥ ५३<br>भूतैश्च देव्यनुचरैश्चण्डमुण्डौ समाश्रयन्।<br>तावार्त्तं स्वबलं दृष्ट्वा कोपप्रस्फुरिताधरौ॥ ५४शुम्भने भी (हाहाकारका) वह महान् शब्द सुना। उसके बाद उसने चण्ड एवं मुण्ड नामके दोनों महान् एवं बलवान् असुरों तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ रुरुको आदेश दिया और वे प्रसन्नतापूर्वक (युद्धके लिये) चल पड़े। हाथियों और रथोंसे भरी उनकी बड़ी सेना शीघ्र ही वहाँ पहुँच गयी, जहाँ कौशिकी खड़ी थीं। उस समय शत्रु की सैकड़ों सेनाओंको आते देखकर सिंह युद्धमें अपनी गर्दनके बालोंको फटकारने लगा तथा खेल-खेलमें—बिना किसी परिश्रमके ही दानवोंको पछाड़-पछाड़कर मारने लगा। उसने कुछको पंजोंके थपेड़ोंसे, कुछको मुखसे, कुछको तेज नखोंसे एवं कुछको अपनी छातीके धक्के देकर भयत्रस्त कर दिया। फिर तो पर्वतकी गुफामें रहनेवाले सिंहसे एवं देवीके अनुगत भूतोंसे मारे जा रहे वे सभी दानव (भागकर) चण्ड-मुण्डकी शरणमें चले गये। चण्ड और मुण्ड अपनी सेनाको घबरायी एवं दुखी हुई देखकर कुपित हो गये और अपने ओठ फड़फड़ाने लगे॥ ४९–५४॥
समाद्रवेतां दुर्गां वै पतङ्गाविव पावकम्।<br>तावापतन्तौ रौद्रौ वै दृष्ट्वा क्रोधपरिप्लुता॥ ५५<br>त्रिशाखां भृकुटीं वक्त्रे चकार परमेश्वरी।<br>भ्रुकुटीकुटिलाद् देव्या ललाटफलकाद्द्रुतम्।<br>काली करालवदना निःसृता योगिनी शुभा॥ ५६<br>खट्वाङ्गमादाय करेण रौद्र-<br>मसिञ्च कालाञ्जनकोशमुग्रम्।<br>संशुष्कगात्रा रुधिराप्लुताङ्गी<br>नरेन्द्रमूर्ध्नां स्रजमुद्वहन्ती॥ ५७अग्निकी ओर उड़कर जानेवाले (जलकर मरनेवाले) पतंगोंके समान वे दोनों दैत्य देवीकी ओर दौड़े। उन दोनों भयङ्कर दानवोंको सामने आते हुए देखकर देवी अत्यन्त क्रुद्ध हो गयीं। परमेश्वरीने मुखके ऊपर तीन रेखाओंवाली भृकुटि चढ़ायी। देवीके टेढ़ी भौंहोंसे युक्त भालस्थलसे शीघ्र ही विकराल मुखवाली, (भक्तोंके लिये) मङ्गलदायिनी योगिनी काली निकल आयीं। उनके हाथमें भयङ्कर खट्वाङ्ग (नामक) हथियार तथा काले अञ्जनके समान तरकससे युक्त भयङ्कर तलवार थी। उनका शरीर कंकाल और खूनसे सना हुआ था तथा उनके गलेमें राजाओंके कटे हुए सिरोंकी बनी हुई