भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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अध्याय ५७] कार्त्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका दण्डादिका पाना २५७

कृपायुक्ताः समाजग्मुर्यत्र स्कन्दः स्थितोऽभवत्।<br>अहं पूर्वमहं पूर्वं तस्मै स्तन्येऽभिचुक्रुशुः॥ २३<br><br>विवदन्तीः स ता दृष्ट्वा षण्मुखः समजायत।<br>अबीभरंश्च ताः सर्वाः शिशुं स्नेहाच्च कृत्तिकाः ॥ २४<br><br>ध्रियमाणः स ताभिस्तु बालो वृद्धिमगान्ममुने।<br>कार्त्तिकेयेति विख्यातो जातः स बलिनां वरः ॥ २५<br><br>एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मन् पावकं प्राह पद्मजः।<br>कियत्प्रमाणः पुत्रस्ते वर्त्तते साम्प्रतं गुहः ॥ २६ये कृत्तिकाएँ दयापूर्वक वहाँ गयीं जहाँ कुमार स्कन्द थे। उन्हें दूध पिलानेके लिये वे आपसमें 'हम पहले, हम पहले' (पिलायेंगी-) कहकर विवाद करने लगीं। उन्हें आपसमें विवाद करती हुई देखकर वह कुमार षण्मुख (छह मुखवाले) बन गये। फिर तो उन (छहों) कृत्तिकाओंने प्रेमपूर्वक बच्चेका पोषण किया। मुने! उनके द्वारा रक्षित होकर वह शिशु बड़ा हुआ। वह बलवानोंमें श्रेष्ठ कार्त्तिकेय नामसे प्रसिद्ध हुआ। ब्रह्मन्! इसी बीच ब्रह्माने अग्निसे प्रश्न किया कि अग्निदेव! तुम्हारा पुत्र गुह (कार्त्तिकेय) इस समय कितना बड़ा हुआ है? ॥ २३—२६॥
स तद्वचनमाकर्ण्य अजानंस्तं हरात्मजम्।<br>प्रोवाच पुत्रं देवेश न वेद्मि कतमो गुहः ॥ २७<br><br>तं प्राह भगवान् यत्तु तेजः पीतं पुरा त्वया।<br>त्रैयम्बकं त्रिलोकेश जातः शरवणे शिशुः ॥ २८<br><br>श्रुत्वा पितामहवचः पावकस्त्वरितोऽभ्यगात्।<br>वेगिनं मेषमारुह्य कुटिला तं ददर्श ह ॥ २९<br><br>ततः पप्रच्छ कुटिला शीघ्रं क्व व्रजसे कवे।<br>सोऽब्रवीत् पुत्रदृष्ट्यर्थं जातं शरवणे शिशुम् ॥ ३०ब्रह्माके प्रश्नको सुनकर अग्निने शङ्करके उस पुत्रको न जाननेके कारण उत्तरमें कहा—देवेश! मैं पुत्रको नहीं जानता; कौन-सा गुह है? भगवान्‌ने उनसे कहा—त्रिलोकेश! पूर्वकालमें तुमने शङ्करका जो तेज पी लिया था, वह शरवण (सरपतके वन)-में शिशुरूपसे उत्पन्न हुआ है। पितामहका वचन सुननेके बाद अग्निदेव तीव्र गतिवाले बकरेपर चढ़कर शीघ्र (वहाँ) गये। कुटिलाने उन्हें जाते हुए देखा। तब कुटिलाने उनसे पूछा—अग्निदेव! आप कहाँ जा रहे हैं? उन्होंने कहा—कुटिले! शरवणमें उत्पन्न हुए बालक पुत्रको देखने जा रहा हूँ ॥ २७—३०॥
साऽब्रवीत् तनयो मह्यं ममेत्याह च पावकः।<br>विवदन्तौ ददर्शाथ स्वेच्छाचारी जनार्दनः ॥ ३१<br><br>तौ पप्रच्छ किमर्थं वा विवादमिह चक्रथः।<br>तावूचतुः पुत्रहेतो रुद्रशुक्रोद्भवाय हि॥ ३२<br><br>तावुवाच हरिर्देवो गच्छ तं त्रिपुरान्तकम्।<br>स यद् वक्ष्यति देवेशस्तत्कुरुध्वमसंशयम् ॥ ३३<br><br>इत्युक्तौ वासुदेवेन कुटिलाग्नी हरान्तिकम्।<br>समभ्येत्योचतुस्तथ्यं कस्य पुत्रेति नारद ॥ ३४उसने कहा कि 'पुत्र मेरा है' और अग्निने कहा कि 'मेरा है'। स्वेच्छासे विचरण कर रहे जनार्दनने उन दोनोंको परस्पर विवाद करते हुए देखा। उन्होंने उन दोनोंसे पूछा—तुम दोनों आपसमें किसलिये विवाद कर रहे हो। (तो) उन दोनोंने कहा—रुद्रके शुक्रसे उत्पन्न हुए पुत्रके लिये। विष्णुने उन दोनोंसे कहा—तुमलोग त्रिपुरासुरका विनाश करनेवाले शिवके पास जाओ। वे देवेश जो कहें, उसे निस्संदेह करो। (पुलस्त्यजी कहते हैं कि) नारदजी! वासुदेवके इस प्रकार कहनेपर कुटिला एवं अग्नि शङ्करके पास गये और उन्होंने (उनसे) यह गूढ रहस्य पूछा कि पुत्र किसका है? ॥ ३१—३४॥
रुद्रस्तद्वाक्यमाकर्ण्य हर्षनिर्भरमानसः।<br>दिष्ट्या दिष्ट्येति गिरिजां प्रोद्भूतपुलकोऽब्रवीत् ॥ ३५उनके वचनको सुनकर शङ्करका मन हर्षसे भर गया। उन्होंने हर्षगद्गद होकर गिरिजासे कहा—अहो
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