वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २५६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५७ | | :--- | :--- |
| ततस्त्वधारयद्देवी शार्वं तेजस्त्वपूपुषत्।<br>हुताशनोऽपि भगवान् कामचारी परिभ्रमन्॥ ८<br>पञ्चवर्षसहस्राणि धृतवान् हव्यभुक् ततः।<br>मांसमस्थीनि रुधिरं मेदोऽन्त्ररेतसी त्वचः॥ ९<br>रोमश्मश्र्वक्षिकेशाद्याः सर्वे जाता हिरण्मयाः।<br>हिरण्यरेता लोकेषु तेन गीतश्च पावकः॥ १० | दें। (ऐसा करनेपर) उसके बाद वह देवी शङ्करके तेजको ग्रहणकर उसका पालन-पोषण करने लगी। भगवान् अग्निदेव भी इच्छाके अनुसार विचरण करने लगे। अग्निने उस तेजको पाँच हजार वर्षोंतक धारण किया था। इसलिये अग्निके मांस, हड्डी, रक्त, मेदा, आँत, रेतस्, त्वचा, रोम, दाढ़ी-मूँछ, नेत्र एवं केश आदि सभी सुवर्णमय बन गये। इसीसे संसारमें अग्निको 'हिरण्यरेता' कहा जाने लगा॥ ६-१०॥ | | पञ्चवर्षसहस्राणि कुटिला ज्वलनोपमम्।<br>धारयन्ती तदा गर्भं ब्रह्मणः स्थानमागता॥ ११<br>तां दृष्टवान् पद्मजन्मा संतप्यन्तीं महापगाम्।<br>दृष्ट्वा पप्रच्छ केनायं तव गर्भः समाहितः॥ १२<br>सा चाह शाङ्करं यत्तच्छुक्रं पीतं हि वह्निना।<br>तदशक्तेन तेनाद्य निक्षिप्तं मयि सत्तम॥ १३<br>पञ्चवर्षसहस्राणि धारयन्त्याः पितामह।<br>गर्भस्य वर्तते कालो न पपात च कर्हिचित्॥ १४ | तब अग्निके समान उस गर्भको पाँच हजार वर्षोंतक धारण करती हुई कुटिला ब्रह्माके स्थानपर गयी। कमलजन्मा ब्रह्माने उस महानदीको सन्तप्त होती देखकर पूछा—तुम्हारा यह गर्भ किसके द्वारा स्थापित है? उसने उत्तर दिया—सत्तम! अग्निने पिये हुए शङ्करके उस शुक्रको अपनेमें धारण करनेकी शक्ति न होनेके कारण मुझमें त्याग दिया। पितामह! गर्भ धारण किये हुए मेरा पाँच हजार वर्षका समय बीत गया; परंतु किसी प्रकार यह बाहर नहीं निकल रहा है॥ ११-१४॥ | | तच्छ्रुत्वा भगवानाह गच्छ त्वमुदयं गिरिम्।<br>तत्रास्ति योजनशतं रौद्रं शरवणं महत्॥ १५<br>तत्रैनं क्षिप सुश्रोणि विस्तीर्णे गिरिसानुनि।<br>दशवर्षसहस्रान्ते ततो बालो भविष्यति॥ १६<br>सा श्रुत्वा ब्रह्मणो वाक्यं रूपिणी गिरिमागता।<br>आगत्य गर्भं तत्याज मुखेनैवाद्रिनन्दिनी॥ १७<br>सा तु संत्यज्य तं बालं ब्रह्माणं सहसागमत्।<br>आपोमयी मन्त्रवशात् संजाता कुटिला सती॥ १८ | उसको सुनकर भगवान् ब्रह्माने कहा—तुम उदयाचलपर जाओ। वहाँपर सौ योजनमें फैला हुआ सरपतोंका विशाल घनघोर वन है। अयि सुन्दर कटिवाली! उस विस्तृत पर्वतकी ऊँची चोटीपर इसे छोड़ दो। यह दस हजार वर्षोंके बाद बालक हो जायगा। ब्रह्माकी बात सुननेके बाद वह गिरिनन्दिनी सुन्दरी पर्वतपर गयी एवं मुखसे ही (उसने) गर्भका परित्याग कर दिया। वह उस (जन्म लेनेवाले) बालकको छोड़कर शीघ्र ही ब्रह्माके समीप चली गयी। सती कुटिला मन्त्र (शाप)-के कारण जलरूपमें हो गयी॥ १५-१८॥ | | तेजसा चापि शार्वेण रौक्मं शरवणं महत्।<br>तन्निवासिरताश्चान्ये पादपा मृगपक्षिणः॥ १९<br>ततो दशसु पूर्णेसु शरदशशतेष्वथ।<br>बालार्कदीप्तिः संजातो बालः कमललोचनः॥ २०<br>उत्तानशायी भगवान् दिव्ये शरवणे स्थितः।<br>मुखेऽङ्गुष्ठं समाक्षिप्य रुरोद घनराडिव॥ २१<br>एतस्मिन्नन्तरे देव्यः कृत्तिकाः षट् सुतेजसः।<br>ददृशुः स्वेच्छया यान्त्यो बालं शरवणे स्थितम्॥ २२ | शङ्करके तेजसे वह विशाल सरपतोंका वन सुवर्णमय बन गया। उस वनमें रहनेवाले वृक्ष, मृग एवं पक्षी भी सुवर्णमय हो गये। उसके बाद दस हजार वर्षोंके बीत जानेपर उगते हुए बाल सूर्यके सदृश दीप्तिमान् तथा कमलके समान आँखोंवाला बालक उत्पन्न हुआ। उस दिव्य सरपतके वनमें उत्तान सोये हुए भगवान् कुमार अपने मुखमें अपना अंगूठा डालकर बादलकी ध्वनिके समान अस्पष्ट ध्वनिमें रोने लगे। इसी बीच स्वेच्छासे जाती हुई दिव्य तेजस्विनी छहों कृत्तिकाओंने सरपतके वनमें स्थित उस बालकको देखा॥ १९-२२॥ |