वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ५७] कार्त्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका दण्डादिका पाना २५५
| पुलस्त्य उवाच | |
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| इत्येवमुक्त्वा वरदा सुराणां<br>कृत्वा प्रणामं द्विजपुङ्गवानाम्।<br>विसृज्य भूतानि जगाम देवी<br>खं सिद्धसङ्घैरनुगम्यमाना ॥ ७२<br>इदं पुराणं परमं पवित्रं<br>देव्या जयं मङ्गलदायि पुंसाम्।<br>श्रोतव्यमेतन्नियतैः सदैव<br>रक्षोघ्नमेतद्भगवानुवाच ॥ ७३ ॥ | पुलस्त्यजी बोले— ऐसा कहनेके बाद देवी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको प्रणाम करके अन्य प्राणियोंको बिदाकर एवं देवोंको वर देकर सिद्धोंके साथ स्वर्गमें चली गयीं। देवीकी यह विजय-कथा परम पवित्र और प्राचीन है, यह पुरुषोंको मङ्गल देनेवाली है, संयतचित्त मनुष्योंको इसे सदा सुननी चाहिये। भगवान्ने इसे 'रक्षोघ्न' कहा है ॥ ७२–७३ ॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छप्पनवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५६ ॥
सत्तावनवाँ अध्याय
कार्त्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका सेनापति होना तथा उनका गण, मयूर, शक्ति और दण्डादिका पाना
| नारद उवाच | |
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| कथं समहिषः क्रौञ्चो भिन्नः स्कन्देन सुव्रत।<br>एतन्मे विस्तराद् ब्रह्मन् कथयस्वामितद्युते ॥ १ | नारदजीने पूछा— दृढ़तासे व्रतका सुपालन करनेवाले अमित तेजस्वी ब्रह्मन्! आप मुझे विस्तारसे यह बतलाइये कि स्कन्दने महिषके सहित क्रौञ्चको किस प्रकार मारा ? ॥ १ ॥ |
| पुलस्त्य उवाच | |
| शृणुष्व कथयिष्यामि कथां पुण्यां पुरातनीम्।<br>यशोवृद्धिं कुमारस्य कार्त्तिकेयस्य नारद ॥ २<br>यत्तत्पीतं हुताशेन स्कन्नं शुक्रं पिनाकिनः।<br>तेनाक्रान्तोऽभवद् ब्रह्मन् मन्दतेजा हुताशनः ॥ ३<br>ततो जगाम देवानां सकाशममितद्युतिः।<br>तैश्चापि प्रहितस्तूर्णं ब्रह्मलोकं जगाम ह ॥ ४<br>स गच्छन् कुटिलां देवीं ददर्श पथि पावकः।<br>तां दृष्ट्वा प्राह कुटिले तेज एतत्सुदुद्धरम् ॥ ५ | पुलस्त्यजी बोले— नारद! सुनो, मैं कीर्तिको बढ़ानेवाली कुमार कार्त्तिकेयकी पवित्र प्राचीन कथा कहता हूँ। ब्रह्मन्! अग्निने शङ्करके उस च्युत शुक्रका पान कर लिया था। उससे ग्रस्त होनेके कारण अग्निका तेज फीका हो गया। उसके बाद अत्यन्त तेजस्वी अग्नि देवताओंके निकट गये। फिर उन देवोंके भेजे जानेपर वे शीघ्र ही ब्रह्मलोक चले गये। मार्गमें जाते हुए अग्निने कुटिला नामकी देवीको देखा। उसको देखकर अग्निने कहा—कुटिले! इस तेजको धारण करना कठिन है ॥ २–५ ॥ |
| महेश्वरेण संत्यक्तं निर्दहेद् भुवनान्यपि।<br>तस्मात् प्रतीच्छ पुत्रोऽयं तव धन्यो भविष्यति ॥ ६<br><br>इत्यग्निना सा कुटिला स्मृत्वा स्वमतमुत्तमम्।<br>प्रक्षिपस्वाम्भसि मम प्राह वह्निं महापगा ॥ ७ | शङ्करके द्वारा त्यागा गया यह तेज समस्त लोकोंको दग्ध कर देगा, अतः तुम इसे ग्रहण कर लो। इससे तुम्हें एक भाग्यशाली पुत्र होगा। अग्निके इस प्रकार कहनेपर अपने उत्तम मनोरथका स्मरणकर महानदी कुटिलाने अग्निसे कहा—इसे मेरे जलमें छोड़ |