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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

अध्याय ५७] कार्त्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका दण्डादिका पाना २५५

पुलस्त्य उवाच
इत्येवमुक्त्वा वरदा सुराणां<br>कृत्वा प्रणामं द्विजपुङ्गवानाम्।<br>विसृज्य भूतानि जगाम देवी<br>खं सिद्धसङ्घैरनुगम्यमाना ॥ ७२<br>इदं पुराणं परमं पवित्रं<br>देव्या जयं मङ्गलदायि पुंसाम्।<br>श्रोतव्यमेतन्नियतैः सदैव<br>रक्षोघ्नमेतद्भगवानुवाच ॥ ७३ ॥पुलस्त्यजी बोले— ऐसा कहनेके बाद देवी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको प्रणाम करके अन्य प्राणियोंको बिदाकर एवं देवोंको वर देकर सिद्धोंके साथ स्वर्गमें चली गयीं। देवीकी यह विजय-कथा परम पवित्र और प्राचीन है, यह पुरुषोंको मङ्गल देनेवाली है, संयतचित्त मनुष्योंको इसे सदा सुननी चाहिये। भगवान्‌ने इसे 'रक्षोघ्न' कहा है ॥ ७२–७३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छप्पनवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५६ ॥


सत्तावनवाँ अध्याय

कार्त्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका सेनापति होना तथा उनका गण, मयूर, शक्ति और दण्डादिका पाना

नारद उवाच
कथं समहिषः क्रौञ्चो भिन्नः स्कन्देन सुव्रत।<br>एतन्मे विस्तराद् ब्रह्मन् कथयस्वामितद्युते ॥ १नारदजीने पूछा— दृढ़तासे व्रतका सुपालन करनेवाले अमित तेजस्वी ब्रह्मन्! आप मुझे विस्तारसे यह बतलाइये कि स्कन्दने महिषके सहित क्रौञ्चको किस प्रकार मारा ? ॥ १ ॥
पुलस्त्य उवाच
शृणुष्व कथयिष्यामि कथां पुण्यां पुरातनीम्।<br>यशोवृद्धिं कुमारस्य कार्त्तिकेयस्य नारद ॥ २<br>यत्तत्पीतं हुताशेन स्कन्नं शुक्रं पिनाकिनः।<br>तेनाक्रान्तोऽभवद् ब्रह्मन् मन्दतेजा हुताशनः ॥ ३<br>ततो जगाम देवानां सकाशममितद्युतिः।<br>तैश्चापि प्रहितस्तूर्णं ब्रह्मलोकं जगाम ह ॥ ४<br>स गच्छन् कुटिलां देवीं ददर्श पथि पावकः।<br>तां दृष्ट्वा प्राह कुटिले तेज एतत्सुदुद्धरम् ॥ ५पुलस्त्यजी बोले— नारद! सुनो, मैं कीर्तिको बढ़ानेवाली कुमार कार्त्तिकेयकी पवित्र प्राचीन कथा कहता हूँ। ब्रह्मन्! अग्निने शङ्करके उस च्युत शुक्रका पान कर लिया था। उससे ग्रस्त होनेके कारण अग्निका तेज फीका हो गया। उसके बाद अत्यन्त तेजस्वी अग्नि देवताओंके निकट गये। फिर उन देवोंके भेजे जानेपर वे शीघ्र ही ब्रह्मलोक चले गये। मार्गमें जाते हुए अग्निने कुटिला नामकी देवीको देखा। उसको देखकर अग्निने कहा—कुटिले! इस तेजको धारण करना कठिन है ॥ २–५ ॥
महेश्वरेण संत्यक्तं निर्दहेद् भुवनान्यपि।<br>तस्मात् प्रतीच्छ पुत्रोऽयं तव धन्यो भविष्यति ॥ ६<br><br>इत्यग्निना सा कुटिला स्मृत्वा स्वमतमुत्तमम्।<br>प्रक्षिपस्वाम्भसि मम प्राह वह्निं महापगा ॥ ७शङ्करके द्वारा त्यागा गया यह तेज समस्त लोकोंको दग्ध कर देगा, अतः तुम इसे ग्रहण कर लो। इससे तुम्हें एक भाग्यशाली पुत्र होगा। अग्निके इस प्रकार कहनेपर अपने उत्तम मनोरथका स्मरणकर महानदी कुटिलाने अग्निसे कहा—इसे मेरे जलमें छोड़

| २५६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५७ | | :--- | :--- |

| ततस्त्वधारयद्देवी शार्वं तेजस्त्वपूपुषत्।<br>हुताशनोऽपि भगवान् कामचारी परिभ्रमन्॥ ८<br>पञ्चवर्षसहस्राणि धृतवान् हव्यभुक् ततः।<br>मांसमस्थीनि रुधिरं मेदोऽन्त्ररेतसी त्वचः॥ ९<br>रोमश्मश्र्वक्षिकेशाद्याः सर्वे जाता हिरण्मयाः।<br>हिरण्यरेता लोकेषु तेन गीतश्च पावकः॥ १० | दें। (ऐसा करनेपर) उसके बाद वह देवी शङ्करके तेजको ग्रहणकर उसका पालन-पोषण करने लगी। भगवान् अग्निदेव भी इच्छाके अनुसार विचरण करने लगे। अग्निने उस तेजको पाँच हजार वर्षोंतक धारण किया था। इसलिये अग्निके मांस, हड्डी, रक्त, मेदा, आँत, रेतस्, त्वचा, रोम, दाढ़ी-मूँछ, नेत्र एवं केश आदि सभी सुवर्णमय बन गये। इसीसे संसारमें अग्निको 'हिरण्यरेता' कहा जाने लगा॥ ६-१०॥ | | पञ्चवर्षसहस्राणि कुटिला ज्वलनोपमम्।<br>धारयन्ती तदा गर्भं ब्रह्मणः स्थानमागता॥ ११<br>तां दृष्टवान् पद्मजन्मा संतप्यन्तीं महापगाम्।<br>दृष्ट्वा पप्रच्छ केनायं तव गर्भः समाहितः॥ १२<br>सा चाह शाङ्करं यत्तच्छुक्रं पीतं हि वह्निना।<br>तदशक्तेन तेनाद्य निक्षिप्तं मयि सत्तम॥ १३<br>पञ्चवर्षसहस्राणि धारयन्त्याः पितामह।<br>गर्भस्य वर्तते कालो न पपात च कर्हिचित्॥ १४ | तब अग्निके समान उस गर्भको पाँच हजार वर्षोंतक धारण करती हुई कुटिला ब्रह्माके स्थानपर गयी। कमलजन्मा ब्रह्माने उस महानदीको सन्तप्त होती देखकर पूछा—तुम्हारा यह गर्भ किसके द्वारा स्थापित है? उसने उत्तर दिया—सत्तम! अग्निने पिये हुए शङ्करके उस शुक्रको अपनेमें धारण करनेकी शक्ति न होनेके कारण मुझमें त्याग दिया। पितामह! गर्भ धारण किये हुए मेरा पाँच हजार वर्षका समय बीत गया; परंतु किसी प्रकार यह बाहर नहीं निकल रहा है॥ ११-१४॥ | | तच्छ्रुत्वा भगवानाह गच्छ त्वमुदयं गिरिम्।<br>तत्रास्ति योजनशतं रौद्रं शरवणं महत्॥ १५<br>तत्रैनं क्षिप सुश्रोणि विस्तीर्णे गिरिसानुनि।<br>दशवर्षसहस्रान्ते ततो बालो भविष्यति॥ १६<br>सा श्रुत्वा ब्रह्मणो वाक्यं रूपिणी गिरिमागता।<br>आगत्य गर्भं तत्याज मुखेनैवाद्रिनन्दिनी॥ १७<br>सा तु संत्यज्य तं बालं ब्रह्माणं सहसागमत्।<br>आपोमयी मन्त्रवशात् संजाता कुटिला सती॥ १८ | उसको सुनकर भगवान् ब्रह्माने कहा—तुम उदयाचलपर जाओ। वहाँपर सौ योजनमें फैला हुआ सरपतोंका विशाल घनघोर वन है। अयि सुन्दर कटिवाली! उस विस्तृत पर्वतकी ऊँची चोटीपर इसे छोड़ दो। यह दस हजार वर्षोंके बाद बालक हो जायगा। ब्रह्माकी बात सुननेके बाद वह गिरिनन्दिनी सुन्दरी पर्वतपर गयी एवं मुखसे ही (उसने) गर्भका परित्याग कर दिया। वह उस (जन्म लेनेवाले) बालकको छोड़कर शीघ्र ही ब्रह्माके समीप चली गयी। सती कुटिला मन्त्र (शाप)-के कारण जलरूपमें हो गयी॥ १५-१८॥ | | तेजसा चापि शार्वेण रौक्मं शरवणं महत्।<br>तन्निवासिरताश्चान्ये पादपा मृगपक्षिणः॥ १९<br>ततो दशसु पूर्णेसु शरदशशतेष्वथ।<br>बालार्कदीप्तिः संजातो बालः कमललोचनः॥ २०<br>उत्तानशायी भगवान् दिव्ये शरवणे स्थितः।<br>मुखेऽङ्गुष्ठं समाक्षिप्य रुरोद घनराडिव॥ २१<br>एतस्मिन्नन्तरे देव्यः कृत्तिकाः षट् सुतेजसः।<br>ददृशुः स्वेच्छया यान्त्यो बालं शरवणे स्थितम्॥ २२ | शङ्करके तेजसे वह विशाल सरपतोंका वन सुवर्णमय बन गया। उस वनमें रहनेवाले वृक्ष, मृग एवं पक्षी भी सुवर्णमय हो गये। उसके बाद दस हजार वर्षोंके बीत जानेपर उगते हुए बाल सूर्यके सदृश दीप्तिमान् तथा कमलके समान आँखोंवाला बालक उत्पन्न हुआ। उस दिव्य सरपतके वनमें उत्तान सोये हुए भगवान् कुमार अपने मुखमें अपना अंगूठा डालकर बादलकी ध्वनिके समान अस्पष्ट ध्वनिमें रोने लगे। इसी बीच स्वेच्छासे जाती हुई दिव्य तेजस्विनी छहों कृत्तिकाओंने सरपतके वनमें स्थित उस बालकको देखा॥ १९-२२॥ |

अध्याय ५७] कार्त्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका दण्डादिका पाना २५७

कृपायुक्ताः समाजग्मुर्यत्र स्कन्दः स्थितोऽभवत्।<br>अहं पूर्वमहं पूर्वं तस्मै स्तन्येऽभिचुक्रुशुः॥ २३<br><br>विवदन्तीः स ता दृष्ट्वा षण्मुखः समजायत।<br>अबीभरंश्च ताः सर्वाः शिशुं स्नेहाच्च कृत्तिकाः ॥ २४<br><br>ध्रियमाणः स ताभिस्तु बालो वृद्धिमगान्ममुने।<br>कार्त्तिकेयेति विख्यातो जातः स बलिनां वरः ॥ २५<br><br>एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मन् पावकं प्राह पद्मजः।<br>कियत्प्रमाणः पुत्रस्ते वर्त्तते साम्प्रतं गुहः ॥ २६ये कृत्तिकाएँ दयापूर्वक वहाँ गयीं जहाँ कुमार स्कन्द थे। उन्हें दूध पिलानेके लिये वे आपसमें 'हम पहले, हम पहले' (पिलायेंगी-) कहकर विवाद करने लगीं। उन्हें आपसमें विवाद करती हुई देखकर वह कुमार षण्मुख (छह मुखवाले) बन गये। फिर तो उन (छहों) कृत्तिकाओंने प्रेमपूर्वक बच्चेका पोषण किया। मुने! उनके द्वारा रक्षित होकर वह शिशु बड़ा हुआ। वह बलवानोंमें श्रेष्ठ कार्त्तिकेय नामसे प्रसिद्ध हुआ। ब्रह्मन्! इसी बीच ब्रह्माने अग्निसे प्रश्न किया कि अग्निदेव! तुम्हारा पुत्र गुह (कार्त्तिकेय) इस समय कितना बड़ा हुआ है? ॥ २३—२६॥
स तद्वचनमाकर्ण्य अजानंस्तं हरात्मजम्।<br>प्रोवाच पुत्रं देवेश न वेद्मि कतमो गुहः ॥ २७<br><br>तं प्राह भगवान् यत्तु तेजः पीतं पुरा त्वया।<br>त्रैयम्बकं त्रिलोकेश जातः शरवणे शिशुः ॥ २८<br><br>श्रुत्वा पितामहवचः पावकस्त्वरितोऽभ्यगात्।<br>वेगिनं मेषमारुह्य कुटिला तं ददर्श ह ॥ २९<br><br>ततः पप्रच्छ कुटिला शीघ्रं क्व व्रजसे कवे।<br>सोऽब्रवीत् पुत्रदृष्ट्यर्थं जातं शरवणे शिशुम् ॥ ३०ब्रह्माके प्रश्नको सुनकर अग्निने शङ्करके उस पुत्रको न जाननेके कारण उत्तरमें कहा—देवेश! मैं पुत्रको नहीं जानता; कौन-सा गुह है? भगवान्‌ने उनसे कहा—त्रिलोकेश! पूर्वकालमें तुमने शङ्करका जो तेज पी लिया था, वह शरवण (सरपतके वन)-में शिशुरूपसे उत्पन्न हुआ है। पितामहका वचन सुननेके बाद अग्निदेव तीव्र गतिवाले बकरेपर चढ़कर शीघ्र (वहाँ) गये। कुटिलाने उन्हें जाते हुए देखा। तब कुटिलाने उनसे पूछा—अग्निदेव! आप कहाँ जा रहे हैं? उन्होंने कहा—कुटिले! शरवणमें उत्पन्न हुए बालक पुत्रको देखने जा रहा हूँ ॥ २७—३०॥
साऽब्रवीत् तनयो मह्यं ममेत्याह च पावकः।<br>विवदन्तौ ददर्शाथ स्वेच्छाचारी जनार्दनः ॥ ३१<br><br>तौ पप्रच्छ किमर्थं वा विवादमिह चक्रथः।<br>तावूचतुः पुत्रहेतो रुद्रशुक्रोद्भवाय हि॥ ३२<br><br>तावुवाच हरिर्देवो गच्छ तं त्रिपुरान्तकम्।<br>स यद् वक्ष्यति देवेशस्तत्कुरुध्वमसंशयम् ॥ ३३<br><br>इत्युक्तौ वासुदेवेन कुटिलाग्नी हरान्तिकम्।<br>समभ्येत्योचतुस्तथ्यं कस्य पुत्रेति नारद ॥ ३४उसने कहा कि 'पुत्र मेरा है' और अग्निने कहा कि 'मेरा है'। स्वेच्छासे विचरण कर रहे जनार्दनने उन दोनोंको परस्पर विवाद करते हुए देखा। उन्होंने उन दोनोंसे पूछा—तुम दोनों आपसमें किसलिये विवाद कर रहे हो। (तो) उन दोनोंने कहा—रुद्रके शुक्रसे उत्पन्न हुए पुत्रके लिये। विष्णुने उन दोनोंसे कहा—तुमलोग त्रिपुरासुरका विनाश करनेवाले शिवके पास जाओ। वे देवेश जो कहें, उसे निस्संदेह करो। (पुलस्त्यजी कहते हैं कि) नारदजी! वासुदेवके इस प्रकार कहनेपर कुटिला एवं अग्नि शङ्करके पास गये और उन्होंने (उनसे) यह गूढ रहस्य पूछा कि पुत्र किसका है? ॥ ३१—३४॥
रुद्रस्तद्वाक्यमाकर्ण्य हर्षनिर्भरमानसः।<br>दिष्ट्या दिष्ट्येति गिरिजां प्रोद्भूतपुलकोऽब्रवीत् ॥ ३५उनके वचनको सुनकर शङ्करका मन हर्षसे भर गया। उन्होंने हर्षगद्गद होकर गिरिजासे कहा—अहो

| २५८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५७ | | :--- | :--- | | ततोऽम्बिका प्राह हरं देव गच्छाम तं शिशुम्।<br>प्रष्टुं समाश्रयेद् यं स तस्य पुत्रो भविष्यति ॥ ३६<br>बाढमित्येव भगवान् समुत्तस्थौ वृषध्वजः।<br>सहोमया कुटिलया पावकेन च धीमता ॥ ३७<br>सम्प्राप्तास्ते शरवणं हराग्निकुटिलाम्बिकाः।<br>ददृशुः शिशुकं तं च कृत्तिकोत्सङ्गशायिनम् ॥ ३८ | भाग्य! अहो भाग्य!! तब अम्बिकाने शङ्करसे कहा—देव! हम सब उस शिशुसे ही पूछने चलें। वह जिसका आश्रय स्वीकार करेगा उसीका पुत्र होगा। ठीक है—ऐसा कहकर वृषध्वज भगवान् शङ्कर पार्वती, कुटिला तथा बुद्धिमान् पावकके साथ चलनेके लिये उठ खड़े हुए। शङ्कर, पार्वती, कुटिला एवं पावक शरवणमें गये। इन लोगोंने कृत्तिकाकी गोदमें लेटे हुए उस बालकको देखा॥ ३५-३८॥ | | ततः स बालकस्तेषां मत्वा चिन्तितमादरात्।<br>योगी चतुर्मूर्तिरभूत् षण्मुखः स शिशुस्त्वपि ॥ ३९<br>कुमारः शङ्करमगाद् विशाखो गौरिमागमत्।<br>कुटिलामगमच्छाखो महासेनोऽग्निमभ्ययात् ॥ ४०<br>ततः प्रीतियुतो रुद्र उमा च कुटिला तथा।<br>पावकश्चापि देवेशः परां मुदमवाप च ॥ ४१<br>ततोऽब्रुवन् कृत्तिकास्ताः षण्मुखः किं हरात्मजः।<br>ता अब्रवीद्धरः प्रीत्या विधिवद् वचनं मुने ॥ ४२ | उसके बाद छः मुखोंवाला वह बालक उन लोगोंको चिन्तित जान करके उनमें आदर रखकर बच्चा होते हुए भी योगीके समान कुमार, विशाख, शाख, महासेन—(इन) चार मूर्तियोंवाला हो गया। कुमार शङ्करके, विशाख गिरिजाके, शाख कुटिलाके और महासेन अग्निके समीप चले गये। फिर तो रुद्र, उमा, कुटिला तथा देवेश्वर अग्नि—ये चारों ही अत्यन्त हर्षित हो गये। उसके बाद उन कृत्तिकाओंने पूछा—क्या षड्वदन शङ्करके पुत्र हैं? मुने! शङ्करने उन सभीसे प्रेमपूर्वक विधिवत् (आगेका) वचन कहा—॥ ३९-४२॥ | | नाम्ना तु कार्त्तिकेयो हि युष्माकं तनयस्त्वसौ।<br>कुटिलायाः कुमारेति पुत्रोऽयं भविताऽव्ययः ॥ ४३<br>स्कन्द इत्येव विख्यातो गौरीपुत्रो भवत्वसौ।<br>गुह इत्येव नाम्ना च ममासौ तनयः स्मृतः ॥ ४४<br>महासेन इति ख्यातो हुताशस्यास्तु पुत्रकः।<br>शारद्वत इति ख्यातः सुतः शरवणस्य च ॥ ४५<br>एवमेष महायोगी पृथिव्यां ख्यातिमेष्यति।<br>षडास्यत्वान्महाबाहुः षण्मुखो नाम गीयते ॥ ४६ | कृत्तिकाओ! 'कार्त्तिकेय' नामसे ये तुम्हारे पुत्र होंगे तथा ये अविनाशी 'कुमार' नामसे कुटिलाके पुत्र होंगे। ये ही 'स्कन्द' नामसे विख्यात गौरीके पुत्र होंगे तथा 'गुह' नामसे मेरे पुत्र होंगे। 'महासेन' नामसे ये अग्निके प्रख्यात पुत्र होंगे तथा 'शारद्वत'—इस नामसे विख्यात ये शरवणके पुत्र होंगे। इस प्रकार ये महायोगी भूमण्डलमें विख्यात होंगे। छः मुखवाले होनेके कारण ये महाबाहु षण्मुख नामसे प्रसिद्ध होंगे॥ ४३-४६॥ | | इत्येवमुक्त्वा भगवान् शूलपाणिः पितामहम्।<br>सस्मार दैवतैः सार्द्धं तेऽथ्याजग्मुस्त्वरान्विताः ॥ ४७<br>प्रणिपत्य च कामारिमुमां च गिरिनन्दिनीम्।<br>दृष्ट्वा हुताशनं प्रीत्या कुटिलां कृत्तिकास्तथा ॥ ४८<br>ददृशुर्बालमत्युग्रं षण्मुखं सूर्यसंनिभम्।<br>मुष्णन्तमिव चक्षूंषि तेजसा स्वेन देवताः ॥ ४९<br>कौतुकाभिवृताः सर्वे एवमूचुः सुरोत्तमाः।<br>देवकार्यं त्वया देव कृतं देव्याऽग्निना तथा ॥ ५० | इस प्रकार कहकर शूलपाणि शङ्करने देवताओंके साथ पितामह ब्रह्माका स्मरण किया। वे सभी सहसा वहाँ आ गये और कामरिपु शङ्कर तथा गिरिनन्दिनी पार्वतीको प्रणामकर एवं अग्निदेव, कुटिला और कृत्तिकाओंको स्नेहपूर्वक देखकर उन देवोंने अतिशय दीप्तिमान् सूर्यके सदृश एवं अपने तेजसे सभीके नेत्रोंको चकाचौंधमें डालनेवाले उस षडानन बालकको देखा। प्रसन्नतासे भरे उन श्रेष्ठ देवोंने कहा—देव! आपने, देवीने एवं अग्निने देवताओंका कार्य सम्पन्न कर दिया॥ ४७-५०॥ |

अध्याय ५७] कार्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका दण्डादिका पाना २५९


तदुत्तिष्ठ व्रजामोऽद्य तीर्थमौजसमव्ययम्।<br>कुरुक्षेत्रे सरस्वत्यामभिषिञ्चाम षण्मुखम्॥ ५१<br>सेनायाः पतिरस्त्वेष देवगन्धर्वकिंनराः।<br>महिषं घातयत्वेष तारकं च सुदारुणम्॥ ५२<br>बाढमित्यब्रवीच्छर्वः समुत्तस्थुः सुरास्ततः।<br>कुमारसहिता जग्मुः कुरुक्षेत्रं महाफलम्॥ ५३<br>तत्रैव देवताः सेन्द्रा रुद्रब्रह्मजनार्दनाः।<br>यत्नमस्याभिषेकार्थं चक्रुर्मुनिगणैः सह॥ ५४तो आप उठें। अब हमलोग अविनाशी औजस तीर्थको चलें। कुरुक्षेत्रमें चलकर सरस्वती (नदी)-में हमलोग षण्मुखका अभिषेक करें। देवो, गन्धर्वो और किन्नरो! ये हमारे सेनापति बनें और महिष तथा भयंकर तारकका संहार करें। शङ्करने कहा—बहुत अच्छा। उसके बाद सभी देवता उठे और कुमारके साथ महान् फलदायी कुरुक्षेत्रमें चले गये। वहीं मुनियोंके साथ इन्द्र, रुद्र, प्रजापति ब्रह्मा, जनार्दन आदि समस्त देवताओंने उस कुमारके अभिषेकका उपाय किया॥ ५१—५४॥
ततोऽम्बुना सप्तसमुद्रवाहिनी<br>  नदीजलेनापि महाफलेन।<br>वरौषधीभिश्च सहस्त्रमूर्तिभि-<br>  स्तदाभ्यषिञ्चन् गुहमच्युताद्याः॥ ५५<br><br>अभिषिञ्चति सेनान्यां कुमारे दिव्यरूपिणि।<br>जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ ५६<br><br>अभिषिक्तं कुमारं च गिरिपुत्री निरीक्ष्य हि।<br>स्नेहादुत्सङ्गं स्कन्दं मूर्ध््न्यजिघ्रन्मुहुर्मुहुः॥ ५७<br><br>जिघ्रती कार्तिकेयस्य अभिषेकार्द्रमाननम्।<br>भात्यद्रिजा यथेन्द्रस्य देवमाताऽदितिः पुरा॥ ५८उसके बाद अच्युत (विष्णु) आदि देवताओंने (सरस्वतीके तथा) सातों समुद्रोंमें मिलकर बहनेवाली नदियोंके महान् फलदायक जलसे एवं सहस्रों प्रकारकी उत्तमोत्तम ओषधियोंसे गुहका (सेनापतिके पदपर) अभिषेक किया। दिव्य रूप धारण करनेवाले सेनापति कुमारके अभिषिक्त हो जानेपर गन्धर्वराज गाने लगे एवं अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। गिरिजाने कुमारको अभिषिक्त देखकर स्नेहसे गोदमें ले लिया और वे बार-बार उनके सिरको सूँघने लगीं। अभिषेकसे आर्द्र हुए कार्तिकेयके मुखको (आशीर्वाद देनेकी प्रक्रियामें) सूँघती हुई पार्वती पूर्वकालमें (आशीर्वाद देती हुई) इन्द्रके मुखको सूँघनेवाली देवमाता अदिति-जैसी सुशोभित हुईं॥ ५५—५८॥
तदाऽभिषिक्तं तनयं दृष्ट्वा शर्वो मुदं ययौ।<br>पावकः कृत्तिकाश्चैव कुटिला च यशस्विनी॥ ५९<br><br>ततोऽभिषिक्तस्य हरः सेनापत्ये गुहस्य तु।<br>प्रमथांश्चतुरः प्रादाच्छक्रतुल्यपराक्रमान्॥ ६०<br><br>घण्टाकर्णं लोहिताक्षं नन्दिसेनं च दारुणम्।<br>चतुर्थं बलिनां मुख्यं ख्यातं कुमुदमालिनम्॥ ६१<br><br>हरदत्तान् गणान् दृष्ट्वा देवाः स्कन्दस्य नारद।<br>प्रददुः प्रमथान् स्वान् स्वान् सर्वे ब्रह्मपुरोगमाः॥ ६२उस समय शङ्कर, पावक, कृत्तिकाएँ एवं यशस्विनी कुटिला (-ये सभी) अपने पुत्रको अभिषिक्त देखकर अत्यन्त हर्षित हुए। उसके बाद शङ्करने सेनापतिके पदपर अभिषिक्त किये गये गुहको इन्द्रके सदृश शक्तिवाले चार प्रमथों—घण्टाकर्ण, लोहिताक्ष, दारुण नन्दिसेन और चौथे बलवानोंमें श्रेष्ठ विख्यात कुमुदमालीको दिया। नारदजी! शङ्करद्वारा दिये गये गणोंको देखकर ब्रह्मा आदि सभी देवताओंने (सेनापति) स्कन्दके लिये अपने-अपने प्रमथोंको (भी) दे दिया॥ ५९—६२॥
स्थाणुं ब्रह्मा गणं प्रादाद् विष्णुः प्रादाद् गणत्रयम्।<br>संक्रमं विक्रमं चैव तृतीयं च पराक्रमम्॥ ६३<br><br>उत्केशं पङ्कजं शक्रो रविर्दण्डकपिङ्गलौ।<br>चन्द्रो मणिं वसुमणिमश्विनौ वत्सनन्दिनौ॥ ६४ब्रह्माने अपने गण स्थाणुको दिया और विष्णुने संक्रम, विक्रम और पराक्रम नामके तीन गणोंको दिया। इन्द्रने उत्केश और पङ्कजको, रविने दण्डक और पिङ्गलको, चन्द्रमाने मणि एवं वसुमणिको, अश्विनीकुमारोंने वत्स और नन्दीको दिया।
२६०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ५७

| ज्योतिर्हुताशनः प्रादाज्ज्वलज्जिह्वं तथापरम्।<br>कुन्दं मुकुन्दं कुसुमं त्रीन् धाताऽनुचरान् ददौ ॥ ६५<br>चक्रानुचक्रौ त्वष्टा च वेधातिस्थिरसुस्थिरौ।<br>पाणित्यजं कालकञ्च प्रादात् पूषा महाबलौ ॥ ६६ | अग्निने ज्योति तथा दूसरे ज्वलज्जिह्वको दिया। धाताने कुन्द, मुकुन्द तथा कुसुम नामके तीन अनुचरोंको दिया। त्वष्टाने चक्र और अनुचक्रको, वेधाने अतिस्थिर और सुस्थिरको एवं पूषाने महाबलशाली पाणित्यज तथा कालकको दिया ॥ ६३-६६ ॥ | | स्वर्णमालं घनाह्वं च हिमवान् प्रमथोत्तमौ।<br>प्रादादेवोच्छ्रितो विन्ध्यस्त्वतिशृङ्गं च पार्षदम् ॥ ६७<br>सुवर्चसं च वरुणः प्रददौ चातिवर्चसम्।<br>संग्रहं विग्रहं चाब्धिर्नागा जयमहाजयौ ॥ ६८<br>उन्मादं शङ्कुकर्णं च पुष्पदन्तं तथाऽम्बिका।<br>घसं चातिघसं वायुः प्रादादनुचरावुभौ ॥ ६९<br>परिघं चटकं भीमं दहतिदहनौ तथा।<br>प्रददावंशुमान् पञ्च प्रमथान् षण्मुखाय हि ॥ ७० | हिमालयने प्रमथोंमें श्रेष्ठ स्वर्णमाल और घनाह्वको तथा ऊँचे विन्ध्याचलने अतिशृङ्ग नामक पार्षदको दिया। वरुणने सुवर्चा एवं अतिवर्चाको, समुद्रने संग्रह तथा विग्रहको एवं नागोंने जय तथा महाजयको दिया। अम्बिकाने उन्माद, शङ्कुकर्ण और पुष्पदन्तको तथा पवनने घस और अतिघस नामके दो अनुचरोंको दिया। अंशुमान्ने षडाननको परिघ, चटक, भीम, दहति तथा दहन नामके पाँच प्रमथोंको दिया ॥ ६७-७० ॥ | | यमः प्रमाथमुन्माथं कालसेनं महामुखम्।<br>तालपत्रं नाडिजङ्घं षडेवानुचरान् ददौ ॥ ७१<br>सुप्रभं च सुकर्माणं ददौ धाता गणेश्वरौ।<br>सुव्रतं सत्यसन्धं च मित्रः प्रादाद् द्विजोत्तम ॥ ७२<br>अनन्तः शङ्कुपीठश्च निकुम्भः कुमुदोऽम्बुजः।<br>एकाक्षः कुनटी चक्षुः किरीटी कलशोदरः ॥ ७३<br>सूचीवक्त्रः कोकनदः प्रहासः प्रियकोऽच्युतः।<br>गणाः पञ्चदशैते हि यक्षैर्दत्ता गुहस्य तु ॥ ७४ | यमराजने प्रमाथ, उन्माथ, कालसेन, महामुख, तालपत्र और नाडिजङ्घ नामके छः अनुचरोंको दिया। द्विजोत्तम! धाताने सुप्रभ और सुकर्मा नामके दो गणेश्वरोंको तथा मित्रने सुव्रत तथा सत्यसन्ध नामके दो अनुचरोंको दिया। यक्षोंने अनन्त, शङ्कुपीठ, निकुम्भ, कुमुद, अम्बुज, एकाक्ष, कुनटी, चक्षु, किरीटी, कलशोदर, सूचीवक्त्र, कोकनद, प्रहास, प्रियक एवं अच्युत—इन पंद्रह गणोंको कार्तिकेयको दे दिया ॥ ७१-७४ ॥ | | कालिन्द्याः कालकन्दश्च नर्मदाया रणोत्कटः।<br>गोदावर्याः सिद्धयात्रस्तमसायाद्रिकम्पकः ॥ ७५<br>सहस्रबाहुः सीताया वञ्जुलायाः सितोदरः।<br>मन्दाकिन्यास्तथा नन्दो विपाशायाः प्रियङ्करः ॥ ७६<br>ऐरावत्याश्चतुर्दंष्ट्रः षोडशाक्षो वितस्तया।<br>मार्जारं कौशिकी प्रादात् क्रथक्रौञ्चौ च गौतमी ॥ ७७<br>बाहुदा शतशीर्षं च वाहा गोनन्दनन्दिकौ।<br>भीमं भीमरथी प्रादाद् वेगारि सरयूर्ददौ ॥ ७८ | कालिन्दीने कालकन्दको, नर्मदाने रणोत्कटको, गोदावरीने सिद्धयात्रको एवं तमसाने अद्रिकम्पकको दिया। सीताने सहस्रबाहुको, वञ्जुलाने सितोदरको, मन्दाकिनीने नन्दको एवं विपाशाने प्रियङ्करको दिया। ऐरावतीने चतुर्दंष्ट्रको, वितस्ताने षोडशाक्षको, कौशिकीने मार्जारको एवं गौतमीने क्रथ और क्रौञ्चको दिया। बाहुदाने शतशीर्षको, वाहाने गोनन्द और नन्दिकको, भीमरथीने भीमको और सरयूने वेगारिको दिया ॥ ७५-७८ ॥ | | अष्टबाहुं ददौ काशी सुबाहुमपि गण्डकी।<br>महानदी चित्रदेवं चित्रा चित्ररथं ददौ ॥ ७९<br>कुहूः कुवलयं प्रादान्मधुवर्णं मधूदका।<br>जम्बूकं धूतपापा च वेणा श्वेताननं ददौ ॥ ८०<br>श्रुतवर्णं च पर्णासा रेवा सागरवेगिनम्।<br>प्रभावार्थं सहं प्रादात् काञ्चना कनकेक्षणम् ॥ ८१<br>गृध्रपत्रं च विमला चारुवक्त्रं मनोहरा।<br>धूतपापा महारावं कर्णा विद्रुमसंनिभम् ॥ ८२ | काशीने अष्टबाहुको, गण्डकीने सुबाहुको, महानदीने चित्रदेवको तथा चित्राने चित्ररथको दिया। कुहूने कुवलयको, मधूदकाने मधुवर्णको, धूतपापाने जम्बूकको और वेणाने श्वेताननको समर्पित किया। पर्णासाने श्रुतवर्णको, रेवाने सागरवेगीको, प्रभावाने अर्थ और सहको एवं काञ्चनाने कनकेक्षणको दिया। विमलाने गृध्रपत्रको, मनोहराने चारुवक्त्रको, धूतपापाने महारावको एवं कर्णाने विद्रुमसंनिभको दिया ॥ ७९-८२ ॥ |

अध्याय ५७ ] कार्त्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका दण्डादिका पाना २६१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सुप्रसादं सुवेणुश्च जिष्णुमोघवती ददौ।<br>यज्ञबाहुं विशाला च सरस्वत्यो ददुर्गणान्॥ ८३<br>कुटिला तनयस्यादाद् दश शक्रबलान् गणान्।<br>करालं सितकेशं च कृष्णकेशं जटाधरम्॥ ८४<br>मेघनादं चतुर्दंष्ट्रं विद्युज्जिह्वं दशाननम्।<br>सोमाप्यायनमेवोग्रं देवयाजिनमेव च॥ ८५<br>हंसास्यं कुण्डजठरं बहुग्रीवं हयाननम्।<br>कूर्मग्रीवं च पञ्चैतान् ददुः पुत्राय कृत्तिकाः॥ ८६सुवेणुने सुप्रसादको और ओघवतीने जिष्णुको प्रदान किया। विशालाने यज्ञबाहुको दिया। इस प्रकार इन सरस्वती आदि नदियोंने अनेक गणोंको दिया। कुटिलाने अपने पुत्र (उन)-को कराल, सितकेश, कृष्णकेश, जटाधर, मेघनाद, चतुर्दंष्ट्र, विद्युज्जिह्व, दशानन, सोमाप्यायन एवं उग्र देवयाजी नामके दस गणोंको दिया। कृत्तिकाओंने अपने पुत्रको हंसास्य, कुण्डजठर, बहुग्रीव, हयानन तथा कूर्मग्रीव—इन पाँच अनुचरोंको प्रदान किया॥ ८३-८६॥
स्थाणुजङ्घं कुम्भवक्त्रं लोहजङ्घं महाहनम्।<br>पिण्डाकारं च पञ्चैतान् ददुः स्कन्दाय चर्षयः॥ ८७<br>नागजिह्वं चन्द्रभासं पाणिकूर्मं शशीक्षकम्।<br>चाषवक्त्रं च जम्बूकं ददौ तीर्थः पृथूदकः॥ ८८<br>चक्रतीर्थं सुचक्राक्षं मकराक्षं गयाशिरः।<br>गणं पञ्चशिखं नाम ददौ कनखलः स्वकम्॥ ८९<br>बन्धुदत्तं वाजिशिरो बाहुशालं च पुष्करम्।<br>सर्वौजसं माहिषकं मानसः पिङ्गलं यथा॥ ९०ऋषियोंने स्कन्दको स्थाणुजङ्घ, कुम्भवक्त्र, लोहजङ्घ, महाहन और पिण्डाकार—इन पाँच अनुचरोंको दिया। पृथूदक तीर्थने नागजिह्व, चन्द्रभास, पाणिकूर्म, शशीक्षक, चाषवक्त्र तथा जम्बूक नामके अनुचरोंको दिया। गयाशिरने चक्रतीर्थ, सुचक्राक्ष तथा मकराक्षको और कनखलने पञ्चशिख नामके अपने गणोंको दिया। वाजिशिरने बन्धुदत्त, पुष्कर और बाहुशालको तथा मानसने सर्वौजस, माहिषक और पिङ्गलको दिया॥ ८७-९०॥
रौद्रमौशनसः प्रादात् ततोऽन्ये मातरो ददुः।<br>वसुदामां सोमतीर्थः प्रभासो नन्दिनीमपि॥ ९१<br>इन्द्रतीर्थं विशोकां च उदपानो घनस्वनाम्।<br>सप्तसारस्वतः प्रादान्मातरश्चतुरोद्भुताः॥ ९२<br>गीतप्रियां माधवीं च तीर्थनेमिं स्मिताननाम्।<br>एकचूडां नागतीर्थः कुरुक्षेत्रं पलासदाम्॥ ९३<br>ब्रह्मयोनिश्चण्डशिलां भद्रकालीं त्रिविष्टपः।<br>चौण्डीं भैण्डीं योगभैण्डीं प्रादाच्चरणपावनः॥ ९४औशनसने रुद्रको प्रदान किया तथा अन्योंने मातृकाओंको दिया। सोमतीर्थने वसुदामाको और प्रभासने नन्दिनीको तथा उदपानने इन्द्रतीर्थ, विशोका और घनस्वनाको अर्पित किया। सप्तसारस्वतने गीतप्रिया, माधवी, तीर्थनेमि एवं स्मितानना नामकी चार अद्भुत मातृकाओंको प्रदान किया। नागतीर्थने एकचूडा, कुरुक्षेत्र और पलासदाको दिया। ब्रह्मयोनिने चण्डशिलाको, त्रिविष्टपने भद्रकालीको तथा चरणपावनने चौण्डी, भैण्डी तथा योगभैण्डीको दिया॥ ९१-९४॥
सोपानीयां मही प्रादाच्छालिकां मनसो ह्रदः।<br>शतघण्टां शतानन्दां तथोलूखलमेखलाम्॥ ९५<br>पद्मावतीं माधवीं च ददौ बदरिकाश्रमः।<br>सुषमामेकचूड़ां च देवीं धमधमां तथा॥ ९६<br>उत्क्राथनीं वेदमित्रां केदारो मातरो ददौ।<br>सुनक्षत्रां कद्रुलां च सुप्रभातां सुमङ्गलाम्॥ ९७<br>देवमित्रां चित्रसेनां ददौ रुद्रमहालयः।<br>कोटरामूर्ध्ववेणीं च श्रीमतीं बहुपुत्रिकाम्॥ ९८<br>पलितां कमलाक्षीं च प्रयागो मातरो ददौ।<br>सूपलां मधुकुम्भां च ख्यातिं दहदहां पराम्॥ ९९<br>प्रादात् खटकटां चान्यां सर्वपापविमोचनः।<br>संतानिकां विकलिकां क्रमश्चत्वरवासिनीम्॥ १००महीने सोपानीयाको, मानसह्नदने शालिकाको एवं बदरिकाश्रमने शतघण्टा, शतानन्दा, उलूखलमेखला, पद्मावती और माधवीको प्रदान किया। केदारतीर्थने सुषमा, एकचूडा, धमधमादेवी, उत्क्राथनी तथा वेदमित्रा नामक मातृकाओंको दिया। रुद्रमहालयने सुनक्षत्रा, कद्रूला, सुप्रभाता, सुमङ्गला, देवमित्रा और चित्रसेनाको दिया। प्रयागने कोटरा, ऊर्ध्ववेणी, श्रीमती, बहुपुत्रिका, पलिता तथा कमलाक्षी नामकी मातृकाओंको अर्पित किया। सर्वपापविमोचनने सूपला, मधुकुम्भा, ख्याति, दहदहा, परा और खटकटाको समर्पित किया। क्रमने सन्तानिका, विकलिका और चत्वरवासिनीको प्रदान किया॥ ९५-१००॥

५९- ऋतध्वजका पातालकेतुपर आक्रमण कर प्रहार करना, अन्धकका गौरीको प्राप्त करनेके लिये प्रयत्न करना

२६२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ५८

| जलेश्वरीं कुक्कुटिकां सुदामां लोहमेखलाम्।<br>वपुष्मत्युल्मुकाक्षी च कोकनामा महाशनी।<br>रौद्रा कर्कटिका तुण्डा श्वेततीर्थो ददौ त्विमाः॥ १०१<br>एतानि भूतानि गणांश्च मातरो<br>दृष्ट्वा महात्मा विनतातनूजः।<br>ददौ मयूरं स्वसुतं महाजवं<br>तथारुणस्ताम्रचूडं च पुत्रम्॥ १०२<br>शक्तिं हुताशोऽद्रिसुता च वस्त्रं<br>दण्डं गुरुःसा कुटिला कमण्डलुम्।<br>मालां हरिः शूलधरः पताकां<br>कण्ठे च हारं मघवानुरस्तः॥ १०३<br>गणैर्वृतो मातृभिरन्वयातो<br>मयूरसंस्थो वरशक्तिपाणिः।<br>सैन्याधिपत्ये स कृतो भवेन<br>रराज सूर्येव महावपुष्मान्॥ १०४ | श्वेततीर्थने तो जलेश्वरी, कुक्कुटिका, सुदामा, लोहमेखला, वपुष्मती, उल्मुकाक्षी, कोकनामा, महाशनी, रौद्रा, कर्कटिका और तुण्डा—इन अनुचरियोंको दिया। इन भूतों, गणों और मातृकाओंको देखकर विनता-पुत्र महात्मा गरुड़ने अपने पुत्र महावेगशाली मयूरको समर्पित किया और अरुणने अपने पुत्र ताम्रचूडको प्रदान कर दिया। अग्निने शक्ति, पार्वती ने वस्त्र, बृहस्पतिने दण्ड, उस कुटिलाने कमण्डलु, विष्णुने माला, शङ्करने पताका तथा इन्द्रने अपने हृदयका हार कार्तिकेयके कण्ठमें अर्पित कर दिया। गणोंसे युक्त, मातृकाओंसे अनुसरित, मयूरपर बैठे एवं श्रेष्ठ शक्तिको हाथमें लिये हुए महाशरीरधारी वे कुमार (कार्तिकेय) शङ्करके द्वारा सैन्याधिपतिके पदपर अभिषिक्त होकर (और उपहार पाकर) सूर्यके समान प्रकाशित होने लगे॥ १०१-१०४॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्तावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५७॥


अट्टावनवाँ अध्याय

सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, तारक-विजयके लिये प्रस्थान, पातालकेतुका वृत्तान्त, तारक महिषासुर-वध तथा सुचक्राक्षको वर

| पुलस्त्य उवाच<br>सेनापत्येऽभिषिक्तस्तु कुमारो दैवतैरथ।<br>प्रणिपत्य भवं भक्त्या गिरिजां पावकं शुचिम्॥ १<br><br>षट् कृत्तिकाश्च शिरसा प्रणम्य कुटिलामपि।<br>ब्रह्माणं च नमस्कृत्य इदं वचनमब्रवीत्॥ २ | पुलस्त्यजी बोले— जब शङ्कर एवं देवताओंने देवताओंके सेनापतिके पदपर कुमार कार्तिकेयका अभिषेक किया तब उक्त पदपर अभिषिक्त कुमारने भक्तिपूर्वक शङ्कर, पार्वती और पवित्र अग्निको प्रणाम किया। उसके बाद छः कृत्तिकाओं एवं कुटिलाको भी सिर झुकाकर प्रणाम करके ब्रह्माको नमस्कार कर यह वचन कहा॥ १-२॥ | | कुमार उवाच<br>नमोऽस्तु भवतां देवा ओं नमोऽस्तु तपोधनाः।<br>युष्मत्प्रसादाज्जेष्यामि शत्रू महिषतारकौ॥ ३ | कुमारने कहा— देवताओ! आपलोगोंको नमस्कार है। तपोधनो! आपलोगोंको ओंकारके साथ नमस्कार ('ॐ नमः') है। आपलोगोंकी अनुकम्पासे मैं महिष एवं तारक दोनों शत्रुओंपर विजय प्राप्त करूँगा। |

अध्याय ५८ ] सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध [ २६३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शिशुरस्मि न जानामि वक्तुं किंचन देवताः।<br>दीयतां ब्रह्मणा सार्द्धमनुज्ञा मम साम्प्रतम्॥ ४<br>इत्येवमुक्ते वचने कुमारेण महात्मना।<br>मुखं निरीक्षन्ति सुराः सर्वे विगतसाध्वसाः॥ ५<br>शङ्करोऽपि सुतस्नेहात् समुत्थाय प्रजापतिम्।<br>आदाय दक्षिणे पाणौ स्कन्दान्तिकमुपागतम्॥ ६<br>अथोमा प्राह तनयं पुत्र एहोहि शत्रुहन्।<br>वन्दस्व चरणौ दिव्यौ विष्णोर्लोकनमस्कृतौ॥ ७देवताओ! मैं शिशु हूँ, मैं कुछ भी बोलना नहीं जानता। ब्रह्माके सहित आपलोग इस समय मुझे अनुमति दें। महात्मा कुमारके इस प्रकार कहनेपर सभी देवता निडर होकर उनका मुख देखने लगे। भगवान् शङ्कर पुत्रके स्नेहवश उठे और ब्रह्माको अपने दाहिने हाथसे पकड़कर स्कन्दके समीप ले आये। उसके बाद उमाने पुत्रसे कहा—शत्रुको मारनेवाले! आओ! आओ! संसारसे वन्दित विष्णुके दिव्य चरणोंको प्रणाम करो॥ ३-७॥
ततो विहस्याह गुहः कोऽयं मातर्वदस्व माम्।<br>यस्यादरात् प्रणामोऽयं क्रियते मद्विधैर्जनैः॥ ८<br><br>तं माता प्राह वचनं कृते कर्मणि पद्मभूः।<br>वक्ष्यते तव योऽयं हि महात्मा गरुडध्वजः॥ ९<br><br>केवलं त्विह मां देवस्त्वत्पिता प्राह शङ्करः।<br>नान्यः परतोऽस्माद्धि वयमन्ये च देहिनः॥ १०<br><br>पार्वत्या गदिते स्कन्दः प्रणिपत्य जनार्दनम्।<br>तस्थौ कृताञ्जलिपुटस्त्वाज्ञां प्रार्थयतेऽच्युतात्॥ ११<br><br>कृताञ्जलिपुटं स्कन्दं भगवान् भूतभावनः।<br>कृत्वा स्वस्त्ययनं देवो ह्यनुज्ञां प्रददौ ततः॥ १२उसके बाद कार्तिकेयने हँसकर कहा—हे माता! मुझे स्पष्ट बतलाओ कि ये कौन हैं, जिन्हें हमारे-जैसे (अन्य) व्यक्ति भी प्रेमपूर्वक प्रणाम करते हैं? माताने उनसे कहा—ये महात्मा गरुडध्वज कौन हैं, यह तुम्हें कार्य कर लेनेपर ब्रह्मा ही बतलायेंगे। तुम्हारे पिता शङ्करदेवने मुझसे केवल यही बतलाया कि इनसे बढ़कर हमलोग या अन्य कोई शरीरधारी नहीं है। पार्वतीके स्पष्टतः कहनेपर कार्तिकेयने जनार्दनको प्रणाम किया एवं दोनों हाथोंको जोड़कर वे खड़े हो गये और भगवान् अच्युतसे आज्ञा माँगने लगे। लोकस्रष्टा भगवान् विष्णुने हाथ जोड़े हुए स्कन्दका स्वस्त्ययन कर उन्हें आज्ञा दी॥ ८-१२॥
नारद उवाच<br>यत्तत् स्वस्त्ययनं पुण्यं कृतवान् गरुडध्वजः।<br>शिखिध्वजाय विप्रर्षे तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ १३नारदने कहा— विप्रर्षे! गरुडध्वज विष्णुने मयूरध्वज कार्तिकेयके लिये जिस पवित्र स्वस्त्ययनका पाठ किया, उसे आप मुझसे कहें॥ १३॥
पुलस्त्य उवाच<br>शृणु स्वस्त्ययनं पुण्यं यत्प्राह भगवान् हरिः।<br>स्कन्दस्य विजयार्थाय महिषस्य वधाय च॥ १४<br><br>स्वस्ति ते कुरुतां ब्रह्मा पद्मयोनी रजोगुणः।<br>स्वस्ति चक्राङ्कितकरो विष्णुस्ते विदधात्वजः॥ १५<br><br>स्वस्ति ते शङ्करो भक्त्या सपत्नीको वृषध्वजः।<br>पावकः स्वस्ति तुभ्यं च करोतु शिखिवाहन॥ १६<br><br>दिवाकरः स्वस्ति करोतु तुभ्यं<br>सोमः सभौमः सबुधो गुरुश्च।<br>काव्यः सदा स्वस्ति करोतु तुभ्यं<br>शनैश्वरः स्वस्त्ययनं करोतु॥ १७पुलस्त्यजी बोले— (नारदजी!) स्कन्दकी विजय एवं महिषके वधके लिये भगवान् विष्णुद्वारा कहे गये मङ्गलमय स्वस्तिवाचन—स्वस्त्ययनको सुनिये। (विष्णुने जो स्वस्त्ययन-पाठ किया, वह इस प्रकार है—) रजोगुणसे सम्पन्न कमलयोनि ब्रह्मा तुम्हारा कल्याण करें। हाथमें चक्र धारण करनेवाले अजन्मा विष्णु तुम्हारा मङ्गल करें। पत्नीसहित वृषध्वज शङ्कर प्रेमपूर्वक तुम्हारा मङ्गल करें। मयूरवाहन! अग्निदेव तुम्हारा कल्याण करें। सूर्य तुम्हारा मङ्गल करें, भौमसहित सोम तथा बुधसहित बृहस्पति तुम्हारा मङ्गल करें। शुक्र सदैव तुम्हारा मङ्गल करें तथा शनैश्चर तुम्हारा मङ्गल करें॥ १४-१७॥

| २६४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५८ | | :--- | :--- |

| मरीचिरत्रिः पुलहः पुलस्त्यः क्रतुर्वसिष्ठो भृगुरङ्गिराश्च।<br>मृकण्डुजस्ते कुरुतां हि स्वस्ति स्वस्ति सदा सप्त महर्षयश्च ॥ १८<br>विश्वेऽश्विनौ साध्यमरुद्गणाग्रयो दिवाकराः शूलधरा महेश्वराः।<br>यक्षाः पिशाचा वसवोऽथ किन्नरास्तेस्वस्ति कुर्वन्त सदोद्यतास्त्वमी ॥ १९<br>नागाः सुपर्णाः सरितः सरांसि तीर्थानि पुण्यायतनाः समुद्राः।<br>महाबला भूतगणा गणेन्द्रास्ते स्वस्ति कुर्वन्तु सदा समुद्यताः ॥ २०<br>स्वस्ति द्विपादिकेभ्यस्ते चतुष्पादेभ्य एव च।<br>स्वस्ति ते बहुपादेभ्यस्त्वपादेभ्योऽप्यनामयम् ॥ २१ | मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, क्रतु, वसिष्ठ, भृगु, अङ्गिरा, मार्कण्डेय—ये ऋषि तुम्हारा मङ्गल करें। सप्तर्षिगण तुम्हारा सदा मङ्गल करें। विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, साध्य, मरुद्गण, अग्नि, सूर्य, शूलधर, महेश्वर, यक्ष, पिशाच, वसु और किन्नर—ये सब तत्परतासे सदा तुम्हारा मङ्गल करें। नाग, पक्षी, नदियाँ, सरोवर, तीर्थ, पवित्र देवस्थान, समुद्र, महाबलशाली भूतगण तथा विनायकगण सदा तत्पर होकर तुम्हारा मङ्गल करें। दो पैरवालों एवं चार पैरवालोंसे तुम्हारा मङ्गल हो। बहुत पैरवालोंद्वारा तुम्हारा मङ्गल हो एवं बिना पैरवालोंसे तुम्हारी स्वस्थता बनी रहे—तुम नीरोग बने रहो॥ १८-२१॥ | | प्राचीं दिग् रक्षतां वज्री दक्षिणां दण्डनायकः।<br>पाशी प्रतीचीं रक्षतु लक्ष्मांशः पातु चोत्तराम् ॥ २२<br><br>वह्निर्दक्षिणपूर्वां च कुबेरो दक्षिणापराम्।<br>प्रतीचीमुत्तरां वायुः शिवः पूर्वोत्तराम्पि ॥ २३<br><br>उपरिष्टाद् ध्रुवः पातु अधस्ताच्च धराधरः।<br>मुसली लाङ्गली चक्री धनुष्मानन्तरेषु च ॥ २४<br><br>वाराहोऽम्बुनिधौ पातु दुर्गे पातु नृकेसरी।<br>सामवेदध्वनिः श्रीमान् सर्वतः पातु माधवः ॥ २५ | वज्र धारण करनेवाले (इन्द्र) पूर्व दिशाकी, दण्डनायक (यम) दक्षिण दिशाकी, पाशधारी (वरुण) पश्चिम दिशाकी तथा चन्द्रमा उत्तर दिशाकी रक्षा करें। अग्नि अग्नि (पूर्व-दक्षिण)-कोणकी, कुबेर नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम)-कोणकी, वायुदेव वायव्य (पश्चिम-उत्तर)-कोणकी और शिव ईशान (उत्तर-पूर्व)-कोणकी (रक्षा करें)। ऊपरकी ओर ध्रुव, नीचेकी ओर पृथ्वीको धारण करनेवाले शेषनाग एवं बीचके स्थानोंमें मुसल, हल, चक्र तथा धनुष धारण करनेवाले भगवान् विष्णु रक्षा करें। समुद्रमें वाराह, दुर्गम स्थानमें नरसिंह तथा सभी ओरसे सामवेदके ध्वनि-रूप श्रीमान् श्रीलक्ष्मीकान्त माधव तुम्हारी रक्षा करें॥ २२-२५॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>एवं कृतस्वस्त्ययनो गुहः शक्तिधरोऽग्रणीः।<br>प्रणिपत्य सुरान् सर्वान् समुत्पतत भूतलात् ॥ २६<br>तमन्वेव गणाः सर्वे दत्ता ये मुदितैः सुरैः।<br>अनुजग्मुः कुमारं ते कामरूपा विहङ्गमाः ॥ २७<br>मातरश्च तथा सर्वाः समुत्पेतुर्नभस्तलम्।<br>समं स्कन्देन बलिना हन्तुकामा महासुरान् ॥ २८<br>ततः सुदीर्घमध्वानं गत्वा स्कन्दोऽब्रवीद् गणान्।<br>भूम्यां तूर्णं महावीर्याः कुरुध्वमवतारणम् ॥ २९ | पुलस्त्यजी बोले— इस प्रकार स्वस्त्ययन सम्पन्न हो जानेपर शक्ति धारण करनेवाले सेनापति कार्तिकेयजी सभी देवताओंको प्रणामकर भूतलसे आकाशकी ओर उड़ चले। प्रसन्न होकर देवताओंने जिन गणोंको गुहके लिये दिया था, उन इच्छानुकूल रूप धारण करनेवाले सभी गणोंने पक्षीका रूप धारण कर कुमारका अनुगमन किया। सभी माताएँ भी पराक्रमी स्कन्दके साथ महान् असुरोंके वधके लिये आकाशमें उड़ चलीं। उसके बाद बहुत दूर जानेपर स्कन्दने गणोंसे कहा—महापराक्रमियो! तुमलोग शीघ्र ही पृथ्वीपर उतर जाओ॥ २६-२९॥ |

अध्याय ५८ ] सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध २६५


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
गणा गुहवचः श्रुत्वा अवतीर्य महीतलम्।<br>आरात् पतन्तस्तद्देशं नादं चक्रुर्भयंकरम्॥ ३०<br>तन्निनादो महीं सर्वामापूर्य च नभस्तलम्।<br>विवेशार्णवरन्ध्रेण पातालं दानवालयम्॥ ३१<br>श्रुतः स महिषेणाथ तारकेण च धीमता।<br>विरोचनेन जम्भेन कुजम्भेनासुरेण च॥ ३२<br>ते श्रुत्वा सहसा नादं वज्रपातोपमं दृढम्।<br>किमेतदिति संचिन्त्य तूर्णं जग्मुस्तदान्धकम्॥ ३३गुहकी बात सुनकर सभी गण पृथ्वीपर उतर आये। उतरकर उस स्थानपर उन गणोंने एकाएक भयंकर नाद किया। वह भयंकर नाद सारी पृथ्वी एवं गगनमण्डलमें गूँज गया। फिर तो वह समुद्री छिद्रसे दानवोंके निवासस्थान पाताललोक (-तक)-में पहुँच गया। उसके बाद मतिमान् महिष, तारक, विरोचन, जम्भ तथा कुजम्भ आदि असुरोंने उस ध्वनिको सुना। एकाएक वज्रपातके समान उस भयंकर ध्वनिको सुनकर यह क्या है—यह सोचकर वे सभी शीघ्रतासे अन्धकके पास चले गये॥ ३०—३३॥
ते समेत्यान्धकेनैव समं दानवपुङ्गवाः।<br>मन्त्रयामासुरुद्विग्नास्तं शब्दं प्रति नारद॥ ३४<br>मन्त्रयत्सु च दैत्येषु भूतलात् सूकराननः।<br>पातालकेतुर्दैत्येन्द्रः सम्प्राप्तोऽथ रसातलम्॥ ३५<br>स बाणविद्धो व्यथितः कम्पमानो मुहुर्मुहुः।<br>अब्रवीद् वचनं दीनं समभ्येत्यान्धकासुरम्॥ ३६नारदजी! वे सभी असुरश्रेष्ठ व्याकुल होकर अन्धकके साथ ही एकत्र होकर उस शब्दके विषयमें परस्पर विचार-विमर्श करने लगे। उन दैत्योंके विचार करते समय सूकर-जैसे मुखवाला दैत्यश्रेष्ठ पातालकेतु धरातलसे रसातलमें आया। बाणसे विद्ध होनेके कारण व्यथित होकर वह बारम्बार काँपता हुआ अन्धकासुरके पास आकर दैन्य वचन बोला—॥ ३४—३६॥
पातालकेतुरुवाच<br>गतोऽहमासं दैत्येन्द्र गालवस्याश्रमं प्रति।<br>तं विध्वंसयितुं यत्नं समारब्धं बलान्मया॥ ३७<br>यावत्सूकररूपेण प्रविशामि तमाश्रमम्।<br>न जाने तं नरं राजन् येन मे प्रहितः शरः॥ ३८<br>शरसंभिन्नजत्रुश्च भयात् तस्य महाजवः।<br>प्रणष्ट आश्रमात् तस्मात् स च मां पृष्ठतोऽन्वगात्॥ ३९<br>तुरङ्गखुरनिर्घोषः श्रूयते परमोऽसुर।<br>तिष्ठ तिष्ठेति वदतस्तस्य शूरस्य पृष्ठतः।<br>तद्भयादस्मि जलधिं सम्प्राप्तो दक्षिणार्णवम्॥ ४०पातालकेतुने कहा— दैत्येश्वर! मैं गालवके आश्रममें गया था और उसको बलपूर्वक नष्ट करनेका उद्योग करने लगा। राजन्! मैंने सूकरके रूपमें जैसे ही उस आश्रममें प्रवेश किया, वैसे ही पता नहीं, किस मानवने मेरे ऊपर बाण छोड़ दिया। बाणसे हँसलीके टूट जानेपर मैं उसके भयके कारण आश्रमसे तुरंत भागा। पर उसने मेरा पीछा किया। असुर! मेरे पीठ-पीछे आ रहे 'रुको-रुको' कहनेवाले उस वीरके घोड़ेकी टापका महान् शब्द सुनायी पड़ रहा था। उसके भयसे मैं जलनिधि दक्षिण समुद्रमें आ गया॥ ३७—४०॥
यावत्पश्यामि तत्रस्थान् नानावेषाकृतीन् नरान्।<br>केचिद् गर्जन्ति घनवत् प्रतिगर्जन्ति चापरे॥ ४१<br>अन्ये चोचुर्वयं नूनं निघ्नामो महिषासुरम्।<br>तारकं घातयामोऽद्य वदन्त्यन्ये सुतेजसः॥ ४२वहाँ मैंने अनेक प्रकारके पहनावे तथा आकृतिवाले मनुष्योंको देखा। उनमें कुछ तो बादलकी भाँति गर्जन कर रहे थे और कुछ दूसरे उसी प्रकारकी प्रतिध्वनि कर रहे थे। दूसरे कह रहे थे कि हम महिषासुरको निश्चय ही मार डालेंगे और अति तेजस्वी दूसरे लोग कह रहे थे कि आज हम तारकको मारेंगे।
तच्छ्रुत्वा सुतरां त्रासो मम जातोऽसुरेश्वर।<br>महार्णवं परित्यज्य पतितोऽस्मि भयातुरः॥ ४३<br>धरण्यां विवृतं गर्तं स मामन्वपतद् बली।<br>तद्भयात् सम्परित्यज्य हिरण्यपुरमात्मनः॥ ४४असुरेश्वर! उसे सुनकर मुझे बहुत डर हो गया और मैं विशाल समुद्रको छोड़कर भयभीत हो पृथ्वीके नीचे विस्तृत गड्ढे (सुरंग)-के रूपमें बने हुए गुप्त मार्गसे भागा। तब भी उस बलशालीने मेरा पीछा किया। उसके डरसे मैं अपना हिरण्यपुर त्यागकर

६०- पुनः तेजःप्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थ-की उपलब्धि, शिवका सरस्वतीमें निमग्न होना, मुरासुरका प्रसङ्ग और सनत्कुमारका प्रसङ्ग

२६६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ५८

| तवान्तिकमनुप्राप्तः प्रसादं कर्तुमर्हसि।<br>तच्छ्रुत्वा चान्धको वाक्यं प्राह मेघस्वनं वचः॥ ४५ | आपके पास आ गया हूँ। आप मेरे ऊपर अनुग्रह कीजिये। यह बात सुनकर अन्धकने बादलकी गर्जनध्वनिमें यह वचन कहा—॥ ४१–४५॥ | | न भेतव्यं त्वया तस्मात् सत्यं गोप्ताऽस्मि दानव।<br>महिषस्तारकश्चोभौ बाणश्च बलिनां वरः॥ ४६<br>अनाख्यायैव ते वीरास्त्वन्धकं महिषादयः।<br>स्वपरिग्रहसंयुक्ता भूमिं युद्धाय निर्ययुः॥ ४७<br>यत्र ते दारुणाकारा गणाश्चक्रुर्महास्वनम्।<br>तत्र दैत्याः समाजग्मुः सायुधाः सबला मुने॥ ४८<br>दैत्यानापततो दृष्ट्वा कार्तिकेयगणास्ततः।<br>अभ्यद्रवन्त सहसा स चोग्रो मातृमण्डलः॥ ४९ | दानव! तुम्हें उससे डरना नहीं चाहिये। मैं तुम्हारा सच्चा रक्षक हूँ। उसके बाद महिष और तारक—ये दोनों तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ बाण—ये सभी अन्धकसे बिना पूछे ही अपने अनुगामियोंके साथ युद्ध करनेके लिये पृथ्वीपर निकल आये। मुने! जिस स्थानपर भयंकर आकारवाले गण गर्जन कर रहे थे, उसी स्थानपर हथियारोंसे सजे-धजे दल-बलके साथ दैत्य भी आ गये। इसके बाद दैत्योंको आक्रमण करते हुए देखकर कार्तिकेयके गण तथा उग्र मातृकाएँ (उनपर) सहसा टूट पड़ीं॥ ४६–४९॥ | | तेषां पुरस्सरः स्थाणुः प्रगृह्य परिघं बली।<br>निषूदयत् परबलं क्रुद्धो रुद्रः पशूनिव॥ ५०<br>तं निघ्नन्तं महादेवं निरीक्ष्य कलशोदरः।<br>कुठारं पाणिनादाय हन्ति सर्वान् महासुरान्॥ ५१<br>ज्वालामुखो भयंकरः करेणादाय चासुरम्।<br>सरथं सगजं साश्वं विस्तृते वदनेऽक्षिपत्॥ ५२<br>दण्डकश्चापि संक्रुद्धः प्रासपाणिर्महासुरम्।<br>सवाहनं प्रक्षिपति समुत्पाट्य महार्णवे॥ ५३ | उन सबमें सबसे आगे बलशाली स्थाणु भगवान् लोहेकी बनी गदा लेकर क्रोधसे भरकर पशुओंके तुल्य शत्रुओंके सैन्य-बलका संहार करने लगे। असुरोंको मारते हुए महादेवजीको देखकर कलशोदर (भी) हाथमें कुल्हाड़ा लेकर सभी बड़े असुरोंका विनाश करने लगा। भय उत्पन्न कर देनेवाला ज्वालामुख रथ, हाथी और घोड़ोंके साथ असुरोंको हाथसे पकड़-पकड़कर अपने फैलाये हुए मुखमें झोंकने लगा। हाथमें बर्छी लिये हुए दण्डक भी क्रुद्ध होकर महासुरोंको उनके वाहनोंसहित उठाकर समुद्रमें फेंकने लगा॥ ५०–५३॥ | | शङ्कुकर्णश्च मुसली हलेनाकृष्य दानवान्।<br>संचूर्णयति मन्त्रीव राजानं प्रासभृद् वशी॥ ५४<br>खड्गचर्मधरो वीरः पुष्पदन्तो गणेश्वरः।<br>द्विधा त्रिधा च बहुधा चक्रे दैतेयदानवान्॥ ५५<br>पिङ्गलो दण्डमुद्यम्य यत्र यत्र प्रधावति।<br>तत्र तत्र प्रदृश्यन्ते राशयः शावदानवैः॥ ५६<br>सहस्रनयनः शूलं भ्रामयन् वै गणाग्रणीः।<br>निजघानासुरान् वीरः सवाजिसथकुञ्जरान्॥ ५७ | मुसल एवं प्रास लिये हुए जितेन्द्रिय शङ्कुकर्ण दानवोंको हलसे खींच-खींचकर इस प्रकार मटियामेट करने लगा, जैसे मन्त्री (अनाचारी-अविचारी) राजाको नष्ट करता जाता है। तलवार और ढाल धारण करनेवाला गणोंका स्वामी वीर पुष्पदन्त भी दैत्यों एवं दानवोंमें किसीको दो-दो, किसीको तीन-तीन टुकड़ोंमें काट डालता तथा किसी-किसीको तो अनेक खण्डोंमें कर डालता था। पिङ्गल दण्डको उठाकर जहाँ-जहाँ दौड़ता, वहाँ-वहाँ दैत्योंके शवका ढेर दिखलायी पड़ने लगता। गणोंमें श्रेष्ठ वीर सहस्रनयन शूल घुमाते हुए घोड़े, रथ और हाथियोंसहित असुरोंको मार रहा था॥ ५४–५७॥ | | भीमो भीमशिलावर्षैः स पुरस्सरतोऽसुरान्।<br>निजघान यथैवेन्द्रो वज्रवृष्ट्या नगोत्तमान्॥ ५८ | भीम भयङ्कर शिलाओंकी वर्षासे सामने आ रहे असुरोंको इस भाँति मार रहा था, जिस प्रकार इन्द्र वज्रकी वृष्टिसे उत्तम पर्वतोंको ध्वस्त करते हैं। |

अध्याय ५८ ] सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध २६७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रौद्रः शकटचक्राक्षो गणः पञ्चशिखो बली।<br>भ्रामयन् मुद्गरं वेगान्निजघ्नान् बलाद् रिपून्॥ ५९<br><br>गिरिभेदी तलेनैव सारोहं कुञ्जरं रणे।<br>भस्म चक्रे महावेगो रथं च रथिना सह॥ ६०<br><br>नाडीजङ्घोऽङ्घ्रिपातैश्च मुष्टिभिर्जानुनाऽसुरान्।<br>कीलाभिर्वज्रतुल्याभिर्जघान बलवान् मुने॥ ६१भयङ्कर शकटचक्राक्ष और बलवान् पञ्चशिख नामक गण तेजीसे मुद्गर घुमाते हुए बलपूर्वक शत्रुओंका संहार कर रहे थे। प्रबल वेगवान् गिरिभेदी युद्धमें थप्पड़ोंके भीषण आघातसे ही सवारके साथ हाथीको एवं रथीके सहित रथको चूर्ण-विचूर्ण करने लगा। मुने! बलवान् नाडीजङ्घ पैरों, मुक्कों, घुटनों एवं वज्रके समान कोहनियोंके प्रहारसे असुरोंको मारने लगा॥ ५८—६१॥
कूर्मग्रीवो ग्रीवयैव शिरसा चरणेन च।<br>लुण्ठनेन तथा दैत्यान् निजघान सवाहनान्॥ ६२<br><br>पिण्डारकस्तु तुण्डेन शृङ्गाभ्यां च कलिप्रिय।<br>विदारयति संग्रामे दानवान् समरोद्धतान्॥ ६३<br><br>ततस्तत्सैन्यमतुलं वध्यमानं गणेश्वरैः।<br>प्रदुद्रावाथ महिषस्तारकश्च गणाग्रणीः॥ ६४<br><br>ते हन्यमानाः प्रमथा दानवाभ्यां वरायुधैः।<br>परिवार्य समन्तात् ते युयुधुः कुपितास्तदा॥ ६५कूर्मग्रीव ग्रीवा, सिर एवं पैरोंके प्रहारोंसे तथा धक्का देकर वाहनोंके साथ दैत्योंको मारने लगा। नारदजी! पिण्डारक अपने मुख तथा दोनों सींगोंसे गर्वीले दानवोंको छिन्न-भिन्न करने लगा। इसके बाद गणेश्वरोंद्वारा उस असीम सेनाके दलोंको मारा जाता देख गणनायक महिष एवं तारक दौड़े। उन दोनों दानवोंद्वारा उत्तम-से-उत्तम आयुधोंसे संहारे जा रहे वे सभी प्रमथगण अधिक क्रुद्ध होकर चारों ओरसे घेरकर युद्ध करने लगे॥ ६२—६५॥
हंसास्यः पट्टिशेनाथ जघान महिषासुरम्।<br>षोडशाक्षस्त्रिशूलेन शतशीर्षो वरासिना॥ ६६<br><br>श्रुतायुधस्तु गदया विशोको मुसलेन तु।<br>बन्धुदत्तस्तु शूलेन मूर्ध्नि दैत्यमताडयत्॥ ६७<br><br>तथान्यैः पार्षदैर्युद्धे शूलशक्त्युष्टिपट्टिशैः।<br>नाकम्पत् ताड्यमानोऽपि मैनाक इव पर्वतः॥ ६८<br><br>तारको भद्रकाल्या च तथोलूखलया रणे।<br>वध्यते चैकचूड़ाया दार्यते परमायुधैः॥ ६९हंसास्य पट्टिशसे, षोडशाक्ष त्रिशूलसे और शतशीर्ष श्रेष्ठ तलवारसे महिषासुरको मारने लगा। श्रुतायुधने गदासे, विशोकने मुसलसे तथा बन्धुदत्तने शूलसे उस दैत्यके मस्तकपर मारा। वैसे ही अन्य पार्षदोंद्वारा शूल, शक्ति, ऋष्टि एवं पट्टिशोंसे मार खाते रहनेपर भी वह मैनाकपर्वतके समान तनिक भी विकम्पित नहीं हुआ। रणमें भद्रकाली, उलूखला एवं एकचूड़ाने श्रेष्ठ आयुधोंसे तारकके ऊपर प्रहार किया॥ ६६—६९॥
तौ ताड्यमानौ प्रमथैर्मातृभिश्च महासुरौ।<br>न क्षोभं जग्मतुर्वीरौ क्षोभयन्तौ गणानपि॥ ७०<br><br>महिषो गदया तूर्णं प्रहारैः प्रमथानथ।<br>पराजित्य पराधावत् कुमारं प्रति सायुधः॥ ७१<br><br>तमापतन्तं महिषं सुचक्राक्षो निरीक्ष्य हि।<br>चक्रमुद्यम्य संक्रुद्धो रुरोध दनुनन्दनम्॥ ७२<br><br>गदाचक्राङ्कितकरौ गणासुरमहारथौ।<br>अयुध्येतां तदा ब्रह्मन् लघु चित्रं च सुष्ठु च॥ ७३वे दोनों महान् असुर प्रमथों और मातृशक्तियोंसे मारे जाते हुए होनेपर भी (स्वयं) अक्षुब्ध रहकर गणोंको क्षुब्ध कर रहे थे। उसके बाद आयुधसहित महिषासुर गदाकी बार-बार मारसे प्रमथोंको शीघ्र पराजितकर कुमारकी ओर झपटा। उस महिषको झपटते देखकर अत्यन्त क्रुद्ध हुए सुचक्राक्षने चक्र उठाकर (उस) दनुनन्दनको (बीचमें ही) रोक दिया। ब्रह्मन्! हाथोंमें गदा और चक्र धारण किये हुए असुर और गण दोनों महारथी उस समय आपसमें कभी तेज, कभी अद्भुत, कभी निपुण (इस प्रकार विविध प्रकारकी) लड़ाई करने लगे॥ ७०—७३॥
गदां मुमोच महिषः समाविध्य गणाय तु।<br>सुचक्राक्षो निजं चक्रममुत्ससर्जासुरं प्रति॥ ७४महिषने गदा घुमाकर सुचक्राक्षके ऊपर मारा और सुचक्राक्षने अपने चक्रको उस असुरकी ओर चलाया।
२६८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ५८
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गदां छित्त्वा सुतीक्ष्णारं चक्रं महिषमाद्रवत् ।<br>तत उच्चुक्रुशुर्दैत्या हा हतो महिषस्त्विति ॥ ७५<br><br>तच्छ्रुत्वाऽभ्यद्रवद् बाणः प्रासमाविध्य वेगवान् ।<br>जघान चक्रं रक्ताक्षः पञ्चमुष्टिशतेन हि ॥ ७६<br><br>पञ्चबाहुशतेनापि सुचक्राक्षं बबन्ध सः।<br>बलवानपि बाणेन निष्प्रयत्नगतिः कृतः ॥ ७७अत्यन्त तीक्ष्ण अरोंसे युक्त वह चक्र गदाको टूक-टूक काट कर महिषके ऊपर चल पड़ा। उसके बाद दैत्यलोग यह कहते हुए जोरसे चिल्ला उठे कि हाय ! महिष मारा गया। उसे सुननेके बाद लाल-लाल आँखोंवाला बाणासुर प्रास लेकर वेगपूर्वक दौड़ा और पाँच सौ मुष्टियोंसे चक्रपर प्रहार किया तथा पाँच सौ बाहुओंसे सुचक्राक्षको बाँध लिया। बलवान् होते हुए भी सुचक्राक्ष बाणासुरके द्वारा प्रयत्नशून्य कर दिया गया॥ ७४-७७॥
सुचक्राक्षं सचक्रं हि बद्धं बाणासुरेण हि ।<br>दृष्ट्वाद्रवद्गदापाणिर्मकराक्षो महाबलः ॥ ७८<br><br>गदया मूर्ध्नि बाणं हि निजघान महाबलः।<br>वेदनार्त्तो मुमोचाथ सुचक्राक्षं महासुरः।<br>स चापि तेन संयुक्तो व्रीडायुक्तो महामनाः ॥ ७९<br><br>स संग्रामं परित्यज्य सालिग्राममुपाययौ ।<br>बाणोऽपि मकराक्षेण ताडितोऽभूत्पराङ्मुखः ॥ ८०<br><br>प्रभज्यत बलं सर्वं दैत्यानां सुरतापस ।<br>ततः स्वबलमीक्ष्यैव प्रभग्नं तारको बली।<br>खड्गोद्यतकरो दैत्यः प्रदुद्राव गणेश्वरान् ॥ ८१फिर, बाणासुरके द्वारा सुचक्राक्षको चक्रसहित बँधा हुआ देखकर महाबली मकराक्ष हाथमें गदा लेकर दौड़ा। महाबली मकराक्षने गदासे बाणके मस्तकपर प्रहार किया। उसके बाद कष्टसे दुःखी बाणने सुचक्राक्षको छोड़ दिया और वह मनस्वी उससे छूटकर लज्जित होता हुआ युद्ध छोड़कर सालिग्रामके समीप चला गया। बाण भी मकराक्षसे चोट खाकर युद्धसे मुख मोड़ लिया। नारदजी! दैत्योंकी सारी सेना छिन्न-भिन्न हो गयी। उसके बाद अपनी सेनाको नष्ट हुआ देख बलवान् दैत्य तारक हाथमें तलवार लेकर गणेश्वरोंकी ओर दौड़ा॥ ७८-८१॥
ततस्तु तेनाप्रतिमेन सासिना<br>ते हंसवक्त्रप्रमुखा गणेश्वराः।<br>समातरश्चापि पराजिता रणे<br>स्कन्दं भयार्त्ताः शरणं प्रपेदिरे ॥ ८२<br><br>भग्नान् गणान् वीक्ष्य महेश्वरात्मज-<br>स्तं तारकं सासिनमापतन्तम्।<br>दृष्ट्वैव शक्त्या हृदये बिभेद<br>स भिन्नमर्मा न्यपतत् पृथिव्याम् ॥ ८३<br><br>तस्मिन्हते भ्रातरि भग्नदर्पो<br>भयातुरोऽभून्महिषो महर्षे ।<br>संत्यज्य संग्रामशिरो दुरात्मा<br>जगाम शैलं स हिमाचलाख्यम् ॥ ८४<br><br>बाणेऽपि वीरे निहतेऽथ तारके<br>गते हिमाद्रिं महिषे भयार्त्ते ।<br>भयाद् विवेशोग्रमपां निधानं<br>गणैर्बले वध्यति सापराध ॥ ८५उसके बाद खड्ग धारण करनेवाले उस बेजोड़ वीरने उन मातृकाओंसहित हंसवक्त्र आदि गणेश्वरोंको हरा दिया। वे सभी डरकर स्कन्दकी शरणमें गये। महेश्वरके पुत्र कुमारने अपने गणोंको निरुत्साह तथा खड्गधारी तारकासुरको आते हुए देखकर शक्तिके प्रहारसे उसका हृदय विदीर्ण कर डाला। हृदय फट जानेके कारण वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। महर्षे! उस भाईके मर जानेपर महिषासुरका अभिमान चूर हो गया। वह दुष्टात्मा डरसे व्याकुल होकर युद्धभूमिसे भागकर हिमालय पर्वतपर चला गया। वीर तारकके मारे जाने, डरकर महिषके हिमालयपर भाग जाने एवं गणोंद्वारा अपराधी सेनाका संहार किये जानेपर बाण भी डरके कारण अगाध समुद्रमें प्रवेश कर गया॥ ८२-८५॥
हत्वा कुमारो रणमूर्ध्नि तारकं<br>प्रगृह्य शक्तिं महता जवेन।<br>मयूरमारुह्य शिखण्डमण्डितं<br>ययौ निहन्तुं महिषासुरस्य ॥ ८६युद्धभूमिमें तारकका संहार कर कुमारने शक्ति उठा ली और वे शिखण्डयुक्त मोरपर चढ़ गये। फिर अत्यन्त शीघ्रतासे महिषासुरको मारने चले। हाथमें श्रेष्ठ शक्ति लिये हुए मयूरध्वज (मोरछापकी पताकावाले) कार्तिकेयको

अध्याय ५८ ] सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध [ २६१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स पृष्ठतः प्रेक्ष्य शिखण्डिकेतनं<br>समापतन्तं वरशक्तिपाणिनम्।<br>कैलासमुत्सृज्य हिमाचलं तथा<br>क्रौञ्चं समभ्येत्य गुहां विवेश॥ ८७<br>दैत्यं प्रविष्टं स पिनाकिसूनु-<br>र्जुगोप यत्नाद् भगवान् गुहोऽपि।<br>स्वबन्धुहन्ता भविता कथं त्वहं<br>संचिन्तयन्नेव ततः स्थितोऽभूत् ॥ ८८<br>ततोऽभ्यगात् पुष्करसम्भवस्तु<br>हरो मुरारिस्त्रिदशेश्वरश्च।<br>अभ्येत्य चोचुर्महिषं सशैलं<br>भिन्दस्व शक्त्या कुरु देवकार्यम्॥ ८९पीछे आते देख वह महिषासुर कैलास एवं हिमालयको छोड़कर क्रौञ्चपर्वतपर चला गया और उसकी गुफामें प्रवेश कर गया। महादेवके पुत्र भगवान् गुह (कार्तिकेय) पर्वतकी गुफामें प्रविष्ट हुए दैत्यकी (अब) प्रयत्नपूर्वक रक्षा करने लगे। वे सोचने लगे कि मैं अपने (ममेरे) बन्धुका विनाशकर्ता कैसे होऊँ! वे (कुछ क्षण) स्तब्ध हो गये। उसके बाद ही कमलजन्मा ब्रह्मा, भगवान् शंकर, विष्णु और इन्द्र वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने कहा कि शक्तिके द्वारा पर्वतसहित महिषको विदीर्ण कर दो और देवताओंका कार्य पूरा करो ॥ ८६—८९ ॥
तत् कार्तिकेयः प्रियमेव तथ्यं<br>श्रुत्वा वचः प्राह सुरान् विहस्य।<br>कथं हि मातामहनेप्तृकं वधे<br>स्वभ्रातरं भ्रातृसुतं च मातुः॥ ९०<br>एषा श्रुतिश्चापि पुरातनी किल<br>गायन्ति यां वेदविदो महर्षयः।<br>कृत्वा च यस्या मतमुत्तमायाः<br>स्वर्गं व्रजन्ति त्वतिपापिनोऽपि ॥ ९१<br>गां ब्राह्मणं वृद्धमथाप्तवाक्यं<br>बालं स्वबन्धुं ललनामदुष्टाम्।<br>कृतापराधा अपि नैव वध्या<br>आचार्यमुख्या गुरवस्तथैव ॥ ९२<br>एवं जानन् धर्ममग्र्यं सुरेन्द्रा<br>नाहं हन्यां भ्रातरं मातुलेयम्।<br>यदा दैत्यो निर्गमिष्यद् गुहान्त-<br>स्तदा शक्त्या घातयिष्यामि शत्रुम् ॥ ९३इस प्रिय-तथ्य वचनको सुनकर हँसते हुए कार्तिकेय देवताओंसे बोले—मैं नानाके नाती, माताके भतीजे और अपने ममेरे भाईको कैसे मारूँ? (इस विषयमें) यह (इनको न मारनेकी) प्राचीन श्रुति भी है, जिसे वेदज्ञाता महर्षिगण गाया करते हैं। (इसी प्रकार) गौ, ब्राह्मण, वृद्ध, यथार्थवक्ता, बालक, अपना सम्बन्धी, दोषरहित स्त्री तथा आचार्य आदि गुरुजन अपराध करनेपर भी अवध्य होते हैं। इस उत्तम श्रुतिके अनुसार आचरण करनेवाले महान् पापी भी स्वर्गलोकको जाते हैं। सुरश्रेष्ठो! मैं इस श्रेष्ठ धर्मको जानते हुए (ऐसी दशामें—गुफामें छिपी अवस्थामें) अपने भाईको नहीं मार सकूँगा। जब दैत्य गुहाके भीतरसे बाहर निकलेगा तब मैं शक्तिसे उस (देव-) शत्रुका संहार करूँगा (तब हमें धर्मबाधा नहीं होगी) ॥ ९०—९३ ॥
श्रुत्वा कुमारवचनं भगवान्महर्षे<br>कृत्वा मतिं स्वहृदये गुहमाह शक्रः।<br>मत्तो भवान् न मतिमान् वदसे किमर्थं<br>वाक्यं शृणुष्व हरिणा गदितं हि पूर्वम् ॥ ९४<br>नैकस्यार्थे बहून् हन्यादिति शास्त्रेषु निश्चयः।<br>एकं हन्याद् बहुभ्योऽर्थे न पापी तेन जायते॥ ९५<br>एतच्छ्रुत्वा मया पूर्वं समयस्थेन चाग्रिज।<br>निहतो नमुचिः पूर्वं सोदरोऽपि ममानुजः॥ ९६<br>तस्माद् बहूनामर्थाय सक्रौञ्चं महिषासुरम्।<br>घातयस्व पराक्रम्य शक्त्या पावकदत्तया ॥ ९७महर्षे! कुमारका वचन सुननेके बाद इन्द्रने अपने हृदयमें विचारकर गुहसे कहा—आप मुझसे अधिक मतिमान् नहीं हैं। आप (ऐसा) क्यों बोल रहे हैं। पहले समयमें भगवान् श्रीहरिकी कही हुई बातको सुनिये। शास्त्रोंमें यह निश्चय किया गया है कि एक व्यक्तिकी रक्षाके लिये बहुतोंका संहार नहीं करना चाहिये। परंतु बहुतोंके कल्याणके लिये एकका वध करनेसे मनुष्य पापी नहीं होता। अग्निपुत्र! इस शास्त्रनिर्णयको सुनकर पहले समयमें मैंने मेल रहनेपर भी अपने सहोदर छोटे भाई नमुचिको मार दिया। अतः बहुतोंके कल्याणके लिये तुम क्रौञ्चसहित महिषासुरका संहार अग्निद्वारा दी हुई शक्तिसे बलपूर्वक कर डालो ॥ ९४—९७ ॥
श्रीवामनपुराण[ अध्याय ५८
२७०
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुरन्दरवचः श्रुत्वा क्रोधादारक्तलोचनः।<br>कुमारः प्राह वचनं कम्पमानः शतक्रतुम्॥ ९८<br>मूढ किं ते बलं बाह्वोः शारीरं चापि वृत्रहन्।<br>येनाधिक्षिपसे मां त्वं ध्रुवं न मतिमानसि॥ ९९<br>तमुवाच सहस्त्राक्षस्त्वत्तोऽहं बलवान् गुह।<br>तं गुहः प्राह एहोहि युद्ध्यस्व बलवान् यदि॥ १००<br>शक्रः प्राहाथ बलवान् ज्ञायते कृत्तिकासुत।<br>प्रदक्षिणं शीघ्रतरं यः कुर्यात् क्रौञ्चमेव हि॥ १०१इन्द्रकी बात सुनकर कुमारकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। आवेशमें काँपते हुए कुमारने इन्द्रसे कहा—मूढ़ वृत्रारि ! तुम्हारी बाहुओं और शरीरमें कितनी शक्ति है, जिसके बलपर तुम मेरे ऊपर (मतिमन्द कहकर ) आक्षेप कर रहे हो। तुम निश्चय ही बुद्धिमान् नहीं हो। हजार आँखोंवाले इन्द्रने उनसे कहा—गुह ! मैं तुमसे शक्तिशाली हूँ। गुहने इन्द्रसे कहा—यदि तुम शक्तिशाली हो तो आओ, युद्ध कर देख लो। तब इन्द्रने कहा—कृत्तिकानन्दन ! हम दोनोंमें जो पहले क्रौञ्च-पर्वतकी प्रदक्षिणा कर सकेगा वही शक्तिशाली समझा जायगा॥ ९८—१०१॥
श्रुत्वा तद्वचनं स्कन्दो मयूरं प्रज्झय वेगवान्।<br>प्रदक्षिणं पादचारी कर्तुं तूर्णतरोऽभ्यगात्॥ १०२<br>शक्रोऽवतीर्य नागेन्द्रात् पादेनाथ प्रदक्षिणम्।<br>कृत्वा तस्थौ गुहोऽभ्येत्य मूढं किं संस्थितो भवान्॥ १०३<br>तमिन्द्रः प्राह कौटिल्यं मया पूर्वं प्रदक्षिणः।<br>कृतोऽस्य न त्वया पूर्वं कुमारः शक्रमब्रवीत्॥ १०४<br>मया पूर्वं मया पूर्वं विवदन्तो परस्परम्।<br>प्राप्योचतुर्महेशाय ब्रह्मणे माधवाय च॥ १०५उस बातको सुनकर स्कन्द अपने वाहन मयूरको छोड़कर पैदल प्रदक्षिणा करनेके लिये शीघ्रतासे चल पड़े। इन्द्र भी गजराजसे उतरकर पैदल ही प्रदक्षिणाकर वहाँ आ गये। स्कन्दने उनके पास जाकर कहा—मूढ़ ! क्यों बैठे हो? इन्द्रने उन कौटिल्य (कुटिलाके पुत्र स्कन्द)-से कहा—मैंने तुमसे पहले ही इसकी प्रदक्षिणा कर ली है। कुमारने इन्द्रसे कहा—तुमने पहले नहीं की है। 'मैंने पहले की है, मैंने पहले की है।' इस प्रकार परस्पर विवाद करते हुए उन दोनोंने शंकर, ब्रह्मा एवं विष्णुके पास जाकर कहा॥ १०२-१०५॥
अथोवाच हरिः स्कन्दं प्रष्टुमर्हसि पर्वतम्।<br>योऽयं वक्ष्यति पूर्वं स भविष्यति महाबलः॥ १०६<br>तन्माधववचः श्रुत्वा क्रौञ्चमभ्येत्य पावकः।<br>पप्रच्छाद्रिमिदं केन कृतं पूर्वं प्रदक्षिणम्॥ १०७<br>इत्येवमुक्तः क्रौञ्चस्तु प्राह पूर्वं महामतिः।<br>चकार गोत्रभित् पश्चात्त्वया कृतमथो गुह॥ १०८<br>एवं ब्रुवन्तं क्रौञ्चं स क्रोधात्प्रस्फुरिताधरः।<br>बिभेद शक्त्या कौटिल्यो महिषेण समं तदा॥ १०९इसके बाद विष्णुने स्कन्दसे कहा कि तुम पर्वतसे पूछ सकते हो। वह जिसे पहले आया हुआ बतलायेगा, वही महाशक्तिशाली मान्य होगा। माधवकी उन बातोंको सुनकर अग्निनन्दने क्रौञ्चपर्वतके पास जाकर उससे यह पूछा कि प्रदक्षिणा पहले किसने की है? इस बातको सुनकर चतुर क्रौञ्चने कहा—कार्तिकेय ! पहले इन्द्रने प्रदक्षिणा की; इसके बाद तुमने की है। इस प्रकार कहनेवाले क्रौञ्चको क्रोधसे ओठ काँपते हुए उस कुटिलानन्दन कुमारने शक्तिकी मारसे महिषासुरके साथ ही विदीर्ण कर दिया॥ १०६-१०९॥
तस्मिन् हतेऽथ तनये बलवान्<br> सुनाभो वेगेन भूमिधरपार्थिवजस्तथागात्।<br>ब्रह्मेन्द्ररुद्रमरुदश्विवसुप्रधाना<br> जग्मुर्दिवं महिषमीक्ष्य हतं गुहेन॥ ११०<br>स्वमातुलं वीक्ष्य बली कुमारः<br> शक्तिं समुत्पाट्य निहन्तुकामः।<br>निवारितश्चक्रधरेण वेगा-<br> दालिङ्ग्य दोर्भ्यां गुरुरित्युदीर्य॥ १११उस पुत्रके मार दिये जानेपर पर्वतराजपुत्र बलवान् सुनाभ शीघ्र ही वहाँ आ गये। ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, वायु, अश्विनीकुमार, वसु आदि देवता गुह (कार्तिकेय)-के द्वारा महिषको मारा गया देखकर स्वर्ग चले गये। अपने मामाको देखनेके बाद बलवान् कुमारने शक्ति लेकर (उन्हें) मारना चाहा। परंतु विष्णुने शीघ्रतासे उन्हें बाहुओंसे आलिङ्गित करते हुए 'ये गुरु हैं' ऐसा कहकर
अध्याय ५८ ]सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध२७१
संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
सुनाभमभ्येत्य हिमाचलस्तु<br>प्रगृह्य हस्तेऽन्यत एव नीतवान्।<br>हरिः कुमारं सशिखण्डिनं नय-<br>द्वेगाद्दिवं पन्नगशत्रुपुत्रः॥ ११२<br>ततो गुहः प्राह हरिं सुरेशं<br>मोहेन नष्टो भगवन् विवेकः।<br>भ्राता मया मातुलजो निरस्त-<br>स्तस्मात् करिष्ये स्वशरीरशोषम्॥ ११३रोक दिया। हिमालय सुनाभके निकट आये और उनका हाथ पकड़कर दूसरी ओर ले गये तथा गरुडवाहन विष्णु मयूरसहित कुमारको जल्दीसे स्वर्गमें लिये चले गये। इसके बाद गुहने सुरेश्वर हरिसे कहा—भगवन्! मोहसे मेरी विचार-शक्ति नष्ट हो गयी और मैंने अपने ममेरे भाईका संहार कर दिया है। अतः (प्रायश्चित्तमें) मैं अपने शरीरको सुखा डालूँगा॥ ११०—११३॥
तं प्राह विष्णुर्व्रज तीर्थवर्यं<br>पृथूदकं पापतरोः कुठारम्।<br>स्नात्वौघवत्यां हरमीक्ष्य भक्त्या<br>भविष्यसे सूर्यसमप्रभावः॥ ११४<br>इत्येवमुक्तो हरिणा कुमार-<br>स्त्वभ्येत्य तीर्थं प्रसमीक्ष्य शम्भुम्।<br>स्नात्वार्च्य देवान् स रविप्रकाशो<br>जगाम शैलं सदनं हरस्य॥ ११५विष्णुने उनसे कहा—कुमार! तुम पापरूपी वृक्षके लिये कुठारस्वरूप श्रेष्ठ तीर्थ पृथूदकमें जाओ। वहाँ ओघवतीके जलमें स्नानकर भक्तिपूर्वक महादेवका दर्शन करनेसे तुम (निष्पाप होकर) सूर्यके समान कान्तियुक्त हो जाओगे। हरिके इस प्रकार कहनेपर कुमार (पृथूदक) तीर्थमें गये और उन्होंने महादेवका दर्शन किया। स्नान करनेके बाद देवताओंकी पूजा करके वे सूर्यके समान तेजस्वी होकर महादेवके निवासस्थल पर्वतपर चले गये।
सुचक्रनेत्रोऽपि महाश्रमे तप-<br>श्चचार शैले पवनाशनस्तु।<br>आराधयानो वृषभध्वजं तदा<br>हरोऽस्य तुष्टो वरदो बभूव॥ ११६<br>देवात् स वव्रे वरमायुधार्थे<br>चक्रं तथा वै रिपुबाहुषण्डम्।<br>छिन्द्याद्यथा त्वप्रतिमं करेण<br>बाणस्य तन्मे भगवान् ददातु॥ ११७सुचक्रनेत्र भी केवल वायु पीकर पर्वतके महान् आश्रममें शंकरकी आराधना करता हुआ तपस्या करने लगा। तब प्रसन्न होकर शंकरने उसे वर देनेका वचन दिया। उसने अस्त्र-प्राप्तिके हेतु वर माँगा—हे भगवन्! शत्रुकी भुजाओंको काटनेवाला ऐसा अनुपम चक्र मुझे दें, जिससे मैं हाथसे ही बाणासुरकी भुजाओंको काट सकूँ॥ ११४—११७॥
तमाह शम्भुर्व्रज दत्तमेतद्<br>वरं हि चक्रस्य तवायुधस्य।<br>बाणस्य तद्बाहुबलं प्रवृद्धं<br>संछेत्स्यते नात्र विचारणाऽस्ति॥ ११८<br>वरे प्रदत्ते त्रिपुरान्तकेन<br>गणेश्वरः स्कन्दमुपाजगाम।<br>निपत्य पादौ प्रतिवन्द्य हृष्टो<br>निवेदयामास हरप्रसादम्॥ ११९महादेवजीने उससे कहा—जाओ! तुमने चक्रके निमित्त जो वर माँगा, उसे मैंने दे दिया। यह बाणासुरके अत्यन्त बढ़े हुए बाहुबलको निःसन्देह काट डालेगा। त्रिपुरको मारनेवाले महेश्वरके वर देनेपर गणेश्वर (सुचक्रनेत्र) स्कन्दके निकट गया और (उसने) उनके चरणोंमें गिरकर वन्दना की। उसके बाद उनसे प्रसन्नतापूर्वक महादेवकी कृपाका वर्णन किया॥ ११८-११९॥
एवं तवोक्तं महिषासुरस्य<br>वधं त्रिनेत्रात्मजशक्तिभेदात्।<br>क्रौञ्चस्य मृत्युः शरणागतार्थं<br>पापापहं पुण्यविवर्धनं च॥ १२०इस प्रकार मैंने (पुलस्त्यने) तुमसे शंकरके पुत्रके द्वारा शक्तिसे महिषासुरके संहार किये जानेका वर्णन किया। शरणागतके हेतु क्रौञ्चकी मृत्यु हुई। यह आख्यान पापका विनाश एवं पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है॥ १२०॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अठावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५८॥

६१- पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र-शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन, सनत्कुमार-ब्रह्माका प्रसङ्ग, चतुर्मूर्तिका वर्णन और मुरु-वध

२७२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ५९ ]

उनसठवाँ अध्याय

ऋतध्वजका पातालकेतुपर आक्रमण कर प्रहार करना, अन्धकका गौरीको प्राप्त करनेके लिये प्रयत्न करना

संस्कृतहिन्दी अनुवाद
नारद उवाच<br>योऽसौ मन्त्रयतां प्राप्तो दैत्यानां शरताडितः।<br>स केन वद निर्भिन्नः शरेण दितिजेश्वरः ॥ १नारदने पूछा — आप हमें यह बतलायें कि सलाह करते हुए दैत्योंमेंसे जो वह दैत्य बाणद्वारा बिंध गया था उसे किसने बाणसे विदीर्ण कर दिया था॥ १॥
पुलस्त्य उवाच<br>आसीन्नृपो रघुकुले रिपुजिन्महर्षे<br>तस्यात्मजो गुणगणैकनिधिर्महात्मा।<br>शूरोऽरिसैन्यदमनो बलवान् सुहृत्सु<br>विप्रान्धदीनकृपणेषु समानभावः ॥ २<br>ऋतध्वजो नाम महान् महीयान्<br>स गालवार्थे तुरगाधिरूढः।<br>पातालकेतुं निजघान पृष्ठे<br>बाणेन चन्द्रार्धनिभेन वेगात् ॥ ३पुलस्त्यजी बोले — महर्षे! रघुकुलमें रिपुजित् नामके एक राजा थे। उनके ऋतध्वज नामका एक पुत्र था। वह सभी गुणोंकी निधि, महात्मा, वीर, शत्रुके सेनाओंका नाश करनेवाला, बली, मित्रों, ब्राह्मणों, अन्धों, गरीबों एवं दयापात्र दीनोंमें समान भाव रखनेवाला था। उसने गालवके लिये घोड़ेपर सवार होकर पातालकेतुकी पीठमें अर्धचन्द्रके सदृश बाणसे बड़ी तेजीसे मारा था॥ २-३॥
नारद उवाच<br>किमर्थं गालवस्यासौ साधयामास सत्तमः।<br>येनासौ पत्रिणा दैत्यं निजघान नृपात्मजः ॥ ४नारदने कहा (पूछा) — उस श्रेष्ठ राजपुत्रने जिस कारण बाणसे उस दैत्यको मारा, उससे गालवका कौन-सा कार्य सिद्ध किया?॥ ४॥
पुलस्त्य उवाच<br>पुरा तपस्तप्यति गालवर्षि-<br>र्महाश्रमे स्वे सततं निविष्टः।<br>पातालकेतुस्तपसोऽस्य विघ्नं<br>करोति मौढ्यात् स समाधिभङ्गम्॥ ५<br>न चेष्यतेऽसौ तपसो व्ययं हि<br>शक्तोऽपि कर्तुं त्वथ भस्मसात् तम्।<br>आकाशमीक्ष्याथ स दीर्घमुष्णं<br>मुमोच निःश्वासमनुत्तमं हि ॥ ६<br>ततोऽम्बराद् वाजिवरः पपात<br>बभूव वाणी त्वशरीरिणी च।<br>असौ तुरङ्गो बलवान् क्रमेत<br>अह्ना सहस्राणि तु योजनानाम्॥ ७<br>स तं प्रगृह्याश्ववरं नरेन्द्रं<br>ऋतध्वजं योज्य तदात्तशस्त्रम्।<br>स्थितस्तपस्येव ततो महर्षि-<br>र्दैत्यं समेत्य विशिखैर्नृपजो बिभेद ॥ ८पुलस्त्यजी बोले — पहले समयकी बात है कि गालव अपने आश्रममें तपस्यामें सदा लीन रहा करते थे। दैत्य पातालकेतु मूर्खताके कारण उनकी तपस्यामें बाधा डाला करता और उनकी समाधि (ध्यान)-को भंग किया करता था। वे उसको जलाकर राख कर देनेमें समर्थ होते हुए भी अपनी तपस्या क्षीण नहीं करना चाहते थे; (क्योंकि तपोबलसे दूसरोंका अनिष्ट करनेपर तपस्या क्षीण हो जाती है।) उन्होंने ऊपरकी ओर देखकर लंबा, गर्म निःश्वास छोड़ा। वह सर्वथा अनुपम था। उसके बाद आकाशसे एक सुन्दर घोड़ा गिरा और अशरीरिणी वाणी—आकाशवाणी हुई कि यह बलवान् अश्व एक दिनमें हजारों योजन जा सकता है। शस्त्रसे सजे हुए उस राजा ऋतध्वजको वह घोड़ा सौंपकर वे महर्षि (पुनः) तपस्या करने लगे। उसके बाद राजपुत्रने दैत्यके पास जाकर उसे बाणसे घायल कर दिया॥ ५-८॥
नारद उवाच<br>केनाम्बरतलाद् वाजी निसृष्टो वद सुव्रत।<br>वाक् कस्याऽदेहिनी जाता परं कौतूहलं मम ॥ ९नारदने कहा (पुनः पूछा) — सुव्रत! आप यह बतलायें कि किसने आकाशसे इस अश्वको गिराया था एवं आकाशवाणी किसकी थी? (इस विषयमें) मुझे बड़ी उत्सुकता है॥ ९॥

अध्याय ५९] ऋतध्वजका पातालकेतुपर आक्रमण कर प्रहार करना २७३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुलस्त्य उवाच<br>विश्वावसुर्नाम महेन्द्रगायनो<br>गन्धर्वराजो बलवान् यशस्वी।<br>निसृष्टवान् भूवलये तुरङ्गं<br>ऋतध्वजस्यैव सुतार्थमाशु॥ १०पुलस्त्यजी बोले— महेन्द्रका गुणगान करनेवाले बलशाली विश्वावसु नामके यशस्वी गन्धर्वराजने अपनी पुत्रीके लिये ऋतध्वजके हेतु उस समय अश्वको पृथ्वीपर गिराया था॥ १०॥
नारद उवाच<br>कोऽर्थो गन्धर्वराजस्य येनाप्रैषीन्महाजवम्।<br>राज्ञः कुवलयाश्वस्य कोऽर्थो नृपसुतस्य च॥ ११नारदने कहा (फिर पूछा)— महान् वेगशाली इस अश्वको भेजनेमें गन्धर्वराजका क्या उद्देश्य था तथा राजपुत्र राजा कुवलयाश्वका इसमें क्या लाभ था? (कृपया इसे भी बतलाइये।)॥ ११॥
पुलस्त्य उवाच<br>विश्वावसोः शीलगुणोपपन्ना<br>आसीत्पुरंध्रीषु वरा त्रिलोके।<br>लावण्यराशिः शशिकान्तितुल्या<br>मदालसा नाम मदालसैव॥ १२<br>तां नन्दने देवरिपुस्तरस्वी<br>संक्रीडतीं रूपवतीं ददर्श।<br>पातालकेतुस्तु जहार तन्वीं<br>तस्यार्थतः सोऽश्ववरः प्रदत्तः॥ १३<br>हत्वा च दैत्यं नृपतेस्तनूजो<br>लब्ध्वा वरोरूमपि संस्थितोऽभूत्।<br>दृष्टो यथा देवपतिर्महेन्द्रः<br>शच्या तथा राजसुतो मृगाक्ष्या॥ १४पुलस्त्यजी बोले— विश्वावसुकी मदसे अलसायी-सी मदालसा नामकी एक (भोलीभाली) कन्या थी। वह शील और गुणसे सम्पन्न, त्रिलोककी स्त्रियोंमें उत्तम, सुन्दरताकी खानि और चन्द्रमाकी कान्तिके समान (कोमलकिशोरी) थी। नन्दनवनमें क्रीडा कर रही उस सौन्दर्यशालिनीको देवताओंके शत्रु पातालकेतुने देखा और तुरन्त उसे उठा ले गया। उसीके कारण वह श्रेष्ठ घोड़ा दिया गया था। दैत्यको मारनेके बाद श्रेष्ठ ऊरुवाली स्त्रीको पाकर राजपुत्र निश्चिन्त हो गये। राजपुत्र (उस) मृगनयनीके साथ ऐसे सुशोभित हो रहे थे जैसे शचीके साथ इन्द्र सुशोभित होते हैं॥ १२—१४॥
नारद उवाच<br>एवं निरस्ते महिषे तारके च महासुरे।<br>हिरण्याक्षसुतो धीमान् किमचेष्टत वै पुनः॥ १५नारदने पुनः पूछा— इस प्रकार महान् असुर तारक और महिषके निरस्त—समाप्त हो जानेपर हिरण्याक्षके बुद्धिमान् पुत्र (अन्धक)-ने पुनः क्या किया?॥ १५॥
पुलस्त्य उवाच<br>तारकं निहतं दृष्ट्वा महिषं च रणेऽन्धकः।<br>क्रोधं चक्रे सुदुर्बुद्धिर्देवानां देवसैन्यहा॥ १६<br>ततः स्वल्पपरिवारः प्रगृह्य परिघं करे।<br>निर्जगामाथ पातालाद् विचचार च मेदिनीम्॥ १७<br>ततो विचरता तेन मन्दरे चारुकन्दरे।<br>दृष्टा गौरी च गिरिजा सखीमध्ये स्थिता शुभा॥ १८<br>ततोऽभूत् कामबाणार्त्तः सहसैवान्धकोऽसुरः।<br>तां दृष्ट्वा चारुसर्वाङ्गीं गिरिराजसुतां वने॥ १९पुलस्त्यजी बोले— तारक और महिष दोनोंको संग्राममें मारे गये देखकर देवसेनाके समूहोंका नाश करनेवाला, महामूर्ख अन्धक देवताओंपर कुपित हो गया। उसके बाद थोड़ी-सी सेनाके साथ वह हाथमें परिघ लेकर पातालसे बाहर निकल आया और पृथ्वीपर विचरण करने लगा। उसके बाद घूमते हुए ही उसने सुन्दर कन्दराओंवाले मन्दर गिरिपर सखियोंके बीचमें गिरिनन्दिनी कल्याणी गौरीको देखा। उस सर्वाङ्गसुन्दरी गिरिराजनन्दिनीको वनमें देखकर अन्धकासुर एकाएक काम-बाणसे पीड़ित हो गया॥ १६—१९॥
अथोवाचासुरो मूढो वचनं मन्मथान्धकः।<br>कस्येयं चारुसर्वाङ्गी वने चरति सुन्दरी॥ २०<br>इयं यदि भवेन्नैव ममान्तःपुरवासिनी।<br>तन्मदीयेन जीवेन क्रियते निष्फलेन किम्॥ २१तब कामसे अंधे हुए उस मूर्ख असुर अन्धकने कहा—वनमें भ्रमण कर रही यह सर्वाङ्गसुन्दरी ललना किसकी है? यदि यह मेरे अन्तःपुरमें निवास करनेवाली न हुई तो मेरे इस व्यर्थके जीवनसे क्या लाभ? यदि

| २७४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५१ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यदस्यास्तनुमध्याया न परिष्वङ्गवानहम्।<br>अतो धिङ् मां रूपेण किं स्थिरेण प्रयोजनम्॥ २२<br><br>स मे बन्धुः स सचिवः स भ्राता साम्परायिकः।<br>यो मामसितकेशां तां योजयेन्मृगलोचनाम्॥ २३इस कृशोदरी सुन्दरी ललनाका आलिङ्गन मुझे प्राप्त न हुआ तो मुझे धिक्कार है! मेरी इस स्थायी सुन्दरतासे क्या लाभ? मेरा वही बन्धु, वही सचिव, वही भ्राता तथा वही संकटकालका साथी है जो इस काले केशवाली मृगनयनी सुन्दरीको मुझसे मिला दे॥ २०—२३॥
इत्थं वदति दैत्येन्द्रे प्रह्लादो बुद्धिसागरः।<br>पिधाय कर्णौ हस्ताभ्यां शिरःकम्पं वचोऽब्रवीत्॥ २४<br><br>मा मैवं वद दैत्येन्द्र जगतो जननी त्वियम्।<br>लोकनाथस्य भार्येयं शङ्करस्य त्रिशूलिनः॥ २५<br><br>मा कुरुष्व सुदुर्बुद्धिं सद्यः कुलविनाशिनीम्।<br>भवतः परदारेयं मा निमज्ज रसातले॥ २६<br><br>सत्सु कुत्सितमेवं हि असत्स्वपि हि कुत्सितम्।<br>शत्रवस्ते प्रकुर्वन्तु परदारावगाहनम्॥ २७दैत्यराजके इस प्रकार कहनेपर महाबुद्धिमान् प्रह्लाद दोनों हाथोंसे दोनों कानोंको ढँककर सिर हिलाते हुए बोले—दैत्येन्द्र! इस प्रकार मत कहो। ये तो संसारकी जननी और लोकस्वामी, त्रिशूलधारी शङ्करकी पत्नी हैं। तुम कुलका सद्यः विनाश करनेवाली ऐसी दुर्बुद्धि मत करो। तुम्हारे लिये ये परस्त्री हैं। अतः रसातलमें मत गिरो; क्योंकि (ऐसा दुष्कर्म) सज्जनोंमें तो अत्यन्त निन्दित है ही, असत् पुरुषोंमें भी निन्दित है। ऐसा दुष्कर्म—परदारा-अभिगमन तुम्हारे शत्रु करें (जिससे उनका विनाश हो जाय)॥ २४—२७॥
किंचित् त्वया न श्रुतं दैत्यनाथ<br>गीतं श्लोकं गाधिना पार्थिवेन।<br>दृष्ट्वा सैन्यं विप्रधेनुप्रसक्तं<br>तथ्यं पथ्यं सर्वलोके हितं च॥ २८<br><br>वरं प्राणास्त्याज्या न च पिशुनवादेष्वभिरति-<br>र्वरं मौनं कार्यं न च वचनमुक्तं यदनृतम्।<br>वरं क्लीबैर्भाव्यं न च परकलत्राभिगमनं<br>वरं भिक्षार्थित्वं न च परधनास्वादमसकृत्॥ २९दैत्येश! ब्राह्मणकी गौपर प्रसक्त सेनाको देखकर गाधिराजने समस्त जगत्के लिये कल्याणकारी, सत्य एवं उचित जो श्लोक कहा है क्या उसे आपने नहीं सुना है? (उन्होंने कहा है—) प्राणोंका छोड़ देना अच्छा है, परंतु चुगलखोरोंकी बातमें दिलचस्पी लेना उचित नहीं। मौन रहना अच्छा है, किंतु असत्य बोलना ठीक नहीं। नपुंसक होकर रहना ठीक है, परंतु परस्त्रीगमन उचित नहीं। भीख माँगना अच्छा है, किंतु बार-बार दूसरेके धनका उपभोग करना उचित नहीं।
स प्रह्लादवचः श्रुत्वा क्रोधान्धो मदनार्दितः।<br>इयं सा शत्रुजननीत्येवमुक्त्वा प्रदुद्रुवे॥ ३०<br><br>ततोऽन्वधावन् दैतेया यन्त्रमुक्ता इवोपलाः।<br>तान् रुरोध बलान्नन्दी वज्रोद्यतकरोऽव्ययः॥ ३१प्रह्लादका वचन सुननेके बाद काम-पीड़ित अन्धक क्रोधसे अंधा होकर 'यह वही शत्रु की जननी है'—यह कहते हुए दौड़ पड़ा। उसके बाद दूसरे और दानव भी यन्त्रसे छूटे हुए पत्थरकी गोलीके समान उसके पीछे दौड़ चले। परंतु अव्यय नन्दीने हाथमें वज्र उठाकर बलपूर्वक उन सबको रोक दिया॥ २८—३१॥
मयतारपुरोगास्ते वारिता द्रावितास्तथा।<br>कुलिशेनाहतास्तूर्णं जग्मुर्भीता दिशो दश॥ ३२<br><br>तानर्दितान् रणे दृष्ट्वा नन्दिनाऽन्धकदानवः।<br>परिघेण समाहत्य पातयामास नन्दिनम्॥ ३३<br><br>शैलादिं पतितं दृष्ट्वा धावमानं तथान्धकम्।<br>शतरूपाऽभवद् गौरी भयात् तस्य दुरात्मनः॥ ३४वज्रकी मारसे रोक दिये गये और भगाये जाते हुए वे मय एवं तारक आदि सभी दैत्य डरकर दसों दिशाओंमें भाग गये। संग्राममें अन्धकासुरने उन सभीको नन्दीद्वारा पीड़ित देखकर नन्दीको परिघसे मारकर गिरा दिया। नन्दीको गिरा हुआ और अन्धकको दौड़कर आते हुए देखकर गौरी उस दुष्टात्माके भयसे सैकड़ों रूपवाली