वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २७४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यदस्यास्तनुमध्याया न परिष्वङ्गवानहम्।<br>अतो धिङ् मां रूपेण किं स्थिरेण प्रयोजनम्॥ २२<br><br>स मे बन्धुः स सचिवः स भ्राता साम्परायिकः।<br>यो मामसितकेशां तां योजयेन्मृगलोचनाम्॥ २३ | इस कृशोदरी सुन्दरी ललनाका आलिङ्गन मुझे प्राप्त न हुआ तो मुझे धिक्कार है! मेरी इस स्थायी सुन्दरतासे क्या लाभ? मेरा वही बन्धु, वही सचिव, वही भ्राता तथा वही संकटकालका साथी है जो इस काले केशवाली मृगनयनी सुन्दरीको मुझसे मिला दे॥ २०—२३॥ |
| इत्थं वदति दैत्येन्द्रे प्रह्लादो बुद्धिसागरः।<br>पिधाय कर्णौ हस्ताभ्यां शिरःकम्पं वचोऽब्रवीत्॥ २४<br><br>मा मैवं वद दैत्येन्द्र जगतो जननी त्वियम्।<br>लोकनाथस्य भार्येयं शङ्करस्य त्रिशूलिनः॥ २५<br><br>मा कुरुष्व सुदुर्बुद्धिं सद्यः कुलविनाशिनीम्।<br>भवतः परदारेयं मा निमज्ज रसातले॥ २६<br><br>सत्सु कुत्सितमेवं हि असत्स्वपि हि कुत्सितम्।<br>शत्रवस्ते प्रकुर्वन्तु परदारावगाहनम्॥ २७ | दैत्यराजके इस प्रकार कहनेपर महाबुद्धिमान् प्रह्लाद दोनों हाथोंसे दोनों कानोंको ढँककर सिर हिलाते हुए बोले—दैत्येन्द्र! इस प्रकार मत कहो। ये तो संसारकी जननी और लोकस्वामी, त्रिशूलधारी शङ्करकी पत्नी हैं। तुम कुलका सद्यः विनाश करनेवाली ऐसी दुर्बुद्धि मत करो। तुम्हारे लिये ये परस्त्री हैं। अतः रसातलमें मत गिरो; क्योंकि (ऐसा दुष्कर्म) सज्जनोंमें तो अत्यन्त निन्दित है ही, असत् पुरुषोंमें भी निन्दित है। ऐसा दुष्कर्म—परदारा-अभिगमन तुम्हारे शत्रु करें (जिससे उनका विनाश हो जाय)॥ २४—२७॥ |
| किंचित् त्वया न श्रुतं दैत्यनाथ<br>गीतं श्लोकं गाधिना पार्थिवेन।<br>दृष्ट्वा सैन्यं विप्रधेनुप्रसक्तं<br>तथ्यं पथ्यं सर्वलोके हितं च॥ २८<br><br>वरं प्राणास्त्याज्या न च पिशुनवादेष्वभिरति-<br>र्वरं मौनं कार्यं न च वचनमुक्तं यदनृतम्।<br>वरं क्लीबैर्भाव्यं न च परकलत्राभिगमनं<br>वरं भिक्षार्थित्वं न च परधनास्वादमसकृत्॥ २९ | दैत्येश! ब्राह्मणकी गौपर प्रसक्त सेनाको देखकर गाधिराजने समस्त जगत्के लिये कल्याणकारी, सत्य एवं उचित जो श्लोक कहा है क्या उसे आपने नहीं सुना है? (उन्होंने कहा है—) प्राणोंका छोड़ देना अच्छा है, परंतु चुगलखोरोंकी बातमें दिलचस्पी लेना उचित नहीं। मौन रहना अच्छा है, किंतु असत्य बोलना ठीक नहीं। नपुंसक होकर रहना ठीक है, परंतु परस्त्रीगमन उचित नहीं। भीख माँगना अच्छा है, किंतु बार-बार दूसरेके धनका उपभोग करना उचित नहीं। |
| स प्रह्लादवचः श्रुत्वा क्रोधान्धो मदनार्दितः।<br>इयं सा शत्रुजननीत्येवमुक्त्वा प्रदुद्रुवे॥ ३०<br><br>ततोऽन्वधावन् दैतेया यन्त्रमुक्ता इवोपलाः।<br>तान् रुरोध बलान्नन्दी वज्रोद्यतकरोऽव्ययः॥ ३१ | प्रह्लादका वचन सुननेके बाद काम-पीड़ित अन्धक क्रोधसे अंधा होकर 'यह वही शत्रु की जननी है'—यह कहते हुए दौड़ पड़ा। उसके बाद दूसरे और दानव भी यन्त्रसे छूटे हुए पत्थरकी गोलीके समान उसके पीछे दौड़ चले। परंतु अव्यय नन्दीने हाथमें वज्र उठाकर बलपूर्वक उन सबको रोक दिया॥ २८—३१॥ |
| मयतारपुरोगास्ते वारिता द्रावितास्तथा।<br>कुलिशेनाहतास्तूर्णं जग्मुर्भीता दिशो दश॥ ३२<br><br>तानर्दितान् रणे दृष्ट्वा नन्दिनाऽन्धकदानवः।<br>परिघेण समाहत्य पातयामास नन्दिनम्॥ ३३<br><br>शैलादिं पतितं दृष्ट्वा धावमानं तथान्धकम्।<br>शतरूपाऽभवद् गौरी भयात् तस्य दुरात्मनः॥ ३४ | वज्रकी मारसे रोक दिये गये और भगाये जाते हुए वे मय एवं तारक आदि सभी दैत्य डरकर दसों दिशाओंमें भाग गये। संग्राममें अन्धकासुरने उन सभीको नन्दीद्वारा पीड़ित देखकर नन्दीको परिघसे मारकर गिरा दिया। नन्दीको गिरा हुआ और अन्धकको दौड़कर आते हुए देखकर गौरी उस दुष्टात्माके भयसे सैकड़ों रूपवाली |