भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 285, कुल 489 में से

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पृष्ठ 285

अध्याय ५९ ] \hfill ऋतध्वजका पातालकेतुपर आक्रमण कर प्रहार करना \hfill २७५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततः स देवीगणमध्यसंस्थितः<br>परिभ्रमन् भाति महाऽसुरेन्द्रः।<br>यथा वने मत्तकरी परिभ्रमन्<br>करेणुमध्ये मदलोलदृष्टिः॥ ३५हो गयीं। उसके बाद देवियोंके बीच घूमता हुआ (वह) दैत्य ऐसा लग रहा था जैसे कि वनमें हथिनियोंके बीच घूमता हुआ मदसे चञ्चल दृष्टिवाला मतवाला हाथी सुशोभित होता है॥ ३२—३५॥
न परिज्ञातवांस्तत्र का तु सा गिरिकन्यका।<br>नात्राश्चर्यं न पश्यन्ति चत्वारोऽमी सदैव हि॥ ३६<br><br>न पश्यतीह जात्यन्धो रागान्धोऽपि न पश्यति।<br>न पश्यति मदोन्मत्तो लोभाक्रान्तो न पश्यति।<br>सोऽपश्यमानो गिरिजां पश्यन्नपि तदान्धकः॥ ३७<br><br>प्रहारं नाददत् तासां युवत्य इति चिन्तयन्।<br>ततो देव्या स दुष्टात्मा शतावर्या निराकृतः॥ ३८<br><br>कुट्टितः प्रवरैः शस्त्रैर्निपपात महीतले।<br>वीक्ष्यान्धकं निपतितं शतरूपा विभावरी॥ ३९<br><br>तस्मात् स्थानादपाक्रम्य गताऽन्तर्धानमम्बिका।<br>पतितं चान्धकं दृष्ट्वा दैत्यदानवयूथपाः॥ ४०<br><br>कुर्वन्तः सुमहाशब्दं प्राद्रवन्त रणार्थिनः।<br>तेषामापततां शब्दं श्रुत्वा तस्थौ गणेश्वरः॥ ४१(पर) वह नहीं समझ रहा था कि उनमें वे गिरिनन्दिनी कौन हैं? इसमें (उसके न समझनेमें) कोई आश्चर्य नहीं है; क्योंकि संसारमें ये चार प्रकारके व्यक्ति सदा ही (ठीक-ठीक) नहीं देख पाते। जन्मका अन्धा नहीं देखता, प्रेममें अन्धा हुआ नहीं देखता, मदोन्मत्त नहीं देखता एवं लोभसे पराभूत भी नहीं देखता है। अतः अन्धक उस समय देखते हुए भी गिरिजाको नहीं देख पा रहा था। उस दानवने उन सभीको युवती समझकर उनपर आघात नहीं किया, फिर तो शतावरीदेवीने (ही) उस दुष्टात्मापर आघात कर दिया। उत्कृष्ट कोटिके शस्त्रोंसे बिंधकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। अन्धकको गिरा हुआ देखकर शतरूपोंवाली विभावरी अम्बिका उस स्थानसे हटकर अन्तर्हित हो गयीं। अन्धकको गिरा हुआ देख दैत्यों एवं दानवोंके सेनापति युद्धके लिये ललकारते हुए दौड़ पड़े। आक्रमण करनेवाले उन (दैत्यों)-के शब्दको सुनकर गणेश्वर खड़े हो गये॥ ३६–४१॥
आदाय वज्रं बलवान् मघवानिव कोपितः।<br>दानवान् समयान् वीरः पराजित्य गणेश्वरः॥ ४२<br><br>समभ्येत्याम्बिकां दृष्ट्वा ववन्दे चरणौ शुभौ।<br>देवी च ता निजा मूर्तीः प्राह गच्छध्वमिच्छया॥ ४३<br><br>विहरध्वं महीपृष्ठे पूज्यमाना नरैरिह।<br>वसतिर्भवतीनां च उद्यानेषु वनेषु च॥ ४४<br><br>वनस्पतिषु वृक्षेषु गच्छध्वं विगतज्वराः।<br>तास्त्वेवमुक्ताः शैलेय्या प्रणिपत्याम्बिकां क्रमात्॥ ४५<br><br>दिक्षु सर्वासु जग्मुस्ताः स्तूयमानाश्च किन्नरैः।<br>अन्धकोऽपि स्मृतिं लब्ध्वा अपश्यनद्रिनन्दिनीम्।<br>स्वबलं निर्जितं दृष्ट्वा ततः पातालमाद्रवत्॥ ४६<br><br>ततो दुरात्मा स तदान्धको मुने<br>पातालमभ्येत्य दिवा न भुङ्क्ते।<br>रात्रौ न शेते मदनेषुताडितो<br>गौरीं स्मरन्कामबलाभिपन्नः॥ ४७क्रुद्ध हुए गणेश्वर इन्द्रके समान वज्र लेकर मयसहित दानवोंको हराकर अम्बिकाके निकट गये और (उन्होंने) उनके शुभ चरणोंमें प्रणाम किया। देवीने भी अपनी उन मूर्तियोंसे कहा—तुम सभी इच्छानुरूप स्थानोंको जाओ और मनुष्योंकी आराधना प्राप्त करती हुई पृथ्वीपर भ्रमण करो। तुम सबका निवास उद्यानों, वनों, वनस्पतियों एवं वृक्षोंमें होगा। अब तुम सभी निश्चिन्त होकर जाओ। पार्वतीके इस प्रकार कहनेपर वे सभी देवियाँ अम्बिकाको प्रणामकर किन्नरोंसे स्तुत होती हुई (दसों) दिशाओंमें चली गयीं। अन्धक भी होशमें आनेके बाद गिरिजाको न देखकर तथा अपनी सेनाको हारी हुई समझकर पातालमें चला गया। मुने! उसके बाद कामबाणसे घायल एवं कामके वेगसे पीड़ित दुष्टात्मा अन्धक पातालमें जाकर गौरीका चिन्तन करता हुआ न दिनमें खाता था और न रातमें सोता था—वह बेचैन-सा हो गया था॥ ४२–४७॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उनसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५९ ॥

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