भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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२७६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६०

साठवाँ अध्याय

पुनः तेजःप्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थकी उपलब्धि, शिवका सरस्वतीमें निमग्न होना, मुरासुरका प्रसंग और सनत्कुमारका प्रसंग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नारद उवाच<br>क्व गतः शङ्करो ह्यासीद् येनाम्बा नन्दिना सह।<br>अन्धकं योधयामास एतन्मे वक्तुमर्हसि॥ १नारदने कहा (पूछा)— आप मुझे यह बतलायें कि शङ्कर कहाँ चले गये थे, जिससे नन्दिसहित अम्बिकाने अन्धकसे (स्वयं) युद्ध किया॥ १॥
पुलस्त्य उवाच<br>यदा वर्षसहस्रं तु महामोहे स्थितोऽभवत्।<br>तदाप्रभृति निस्तेजाः क्षीणवीर्यः प्रदृश्यते॥ २<br>स्वमात्मानं निरीक्ष्याथ निस्तेजोऽङ्गं महेश्वरः।<br>तपोऽर्थाय तथा चक्रे मतिं मतिमतां वरः॥ ३<br>स महाव्रतमुत्पाद्य समाश्वास्याम्बिकां विभुः।<br>शैलादिं स्थाप्य गोप्तारं विचचार महीतलम्॥ ४<br>महामुद्रार्पितग्रीवो महाहिकृतकुण्डलः।<br>धारयाणः कटीदेशे महाशङ्खस्य मेखलाम्॥ ५पुलस्त्यजी बोले— वे (शंकरजी) जिस समय एक हजार वर्षतक महामोहमें पड़ गये थे, उस समयसे वे तेजरहित एवं शक्तिहीन-से दिखायी दे रहे थे। मतिमानोंमें श्रेष्ठ महेश्वरने स्वयं अपने अङ्गोंको निस्तेज देखकर तप करनेके लिये निश्चय किया। उन व्यापक शङ्करने महाव्रतका निर्णय करनेके बाद अम्बिकाको धैर्य धारण कराया और वे शैल आदि (नन्दी)-को उनकी रक्षाके लिये नियुक्त कर पृथ्वीपर विचरण करने लगे। उन्होंने गलेमें तन्त्रानुसार महामुद्रा पहन ली। महासर्पोंके कुण्डल एवं कमरमें महाशङ्खकी मेखला धारण कर ली॥ २–५॥
कपालं दक्षिणे हस्ते सव्ये गृह्य कमण्डलुम्।<br>एकाहवासी वृक्षे हि शैलसानुनदीष्वटन्॥ ६<br>स्थानं त्रैलोक्यमास्थाय मूलाहारोऽम्बुभोजनः।<br>वाय्वाहारस्तदा तस्थौ नववर्षशतं क्रमात्॥ ७<br>ततो वीटां मुखे क्षिप्य निरुच्छ्वासोऽभवद् यतिः।<br>विस्तृते हिमवत्पृष्ठे रम्ये समशिलातले॥ ८<br>ततो वीटा विदार्यैव कपालं परमेष्ठिनः।<br>सार्चिष्मती जटामध्यान्निषण्णा धरणीतले॥ ९दाहिने हाथमें कपाल एवं बायें हाथमें कमण्डलु लेकर वे वृक्षोंके नीचे (कभी) पड़े रहते, कभी पहाड़ोंकी चोटियोंपर तथा नदियोंके तटपर चक्कर लगाते रहते। प्रथम (आरम्भमें) मूल-फल खाकर फिर जल पीकर, उसके बाद वायु पीकर (यम-नियमका) व्रत पालन करनेवाले उन्होंने क्रमशः तीनों लोकोंमें नौ सौ वर्ष व्यतीत किये। उसके बाद उन्होंने हिमालयके ऊपर रमणीय तथा समतल पर्वतीय चट्टानपर आसन लगा लिया और अपने मुखमें काष्ठकी बनी गुल्ली डालकर श्वास रोक लिया—कुम्भक प्राणायाम कर लिया। उसके बाद शंकरके कपालको फोड़कर ज्वालामयी वह गुल्ली (उनकी) जटाके बीचसे निकलकर पृथ्वीपर गिर पड़ी॥ ६–९॥
वीटया तु पतन्त्याऽद्रिर्दारितः क्ष्मासमोऽभवत्।<br>जातस्तीर्थवरः पुण्यः केदार इति विश्रुतः॥ १०उस गुल्लीके गिरनेसे पर्वत टूट-फूटकर पृथ्वीके समान (समतल) हो गया और वहाँ केदार नामका प्रसिद्ध तीर्थ बन गया।
ततो हरो वरं प्रादात् केदाराय वृषध्वजः।<br>पुण्यवृद्धिकरं ब्रह्मन् पापघ्नं मोक्षसाधनम्॥ ११ब्रह्मन्! उसके बाद वृषध्वज महादेवने केदारको पुण्यकी वृद्धि करनेवाले एवं पापके विनाश करनेवाले और मोक्षके साधनका वर दिया तथा