वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ५९] ऋतध्वजका पातालकेतुपर आक्रमण कर प्रहार करना २७३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुलस्त्य उवाच<br>विश्वावसुर्नाम महेन्द्रगायनो<br>गन्धर्वराजो बलवान् यशस्वी।<br>निसृष्टवान् भूवलये तुरङ्गं<br>ऋतध्वजस्यैव सुतार्थमाशु॥ १० | पुलस्त्यजी बोले— महेन्द्रका गुणगान करनेवाले बलशाली विश्वावसु नामके यशस्वी गन्धर्वराजने अपनी पुत्रीके लिये ऋतध्वजके हेतु उस समय अश्वको पृथ्वीपर गिराया था॥ १०॥ |
| नारद उवाच<br>कोऽर्थो गन्धर्वराजस्य येनाप्रैषीन्महाजवम्।<br>राज्ञः कुवलयाश्वस्य कोऽर्थो नृपसुतस्य च॥ ११ | नारदने कहा (फिर पूछा)— महान् वेगशाली इस अश्वको भेजनेमें गन्धर्वराजका क्या उद्देश्य था तथा राजपुत्र राजा कुवलयाश्वका इसमें क्या लाभ था? (कृपया इसे भी बतलाइये।)॥ ११॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>विश्वावसोः शीलगुणोपपन्ना<br>आसीत्पुरंध्रीषु वरा त्रिलोके।<br>लावण्यराशिः शशिकान्तितुल्या<br>मदालसा नाम मदालसैव॥ १२<br>तां नन्दने देवरिपुस्तरस्वी<br>संक्रीडतीं रूपवतीं ददर्श।<br>पातालकेतुस्तु जहार तन्वीं<br>तस्यार्थतः सोऽश्ववरः प्रदत्तः॥ १३<br>हत्वा च दैत्यं नृपतेस्तनूजो<br>लब्ध्वा वरोरूमपि संस्थितोऽभूत्।<br>दृष्टो यथा देवपतिर्महेन्द्रः<br>शच्या तथा राजसुतो मृगाक्ष्या॥ १४ | पुलस्त्यजी बोले— विश्वावसुकी मदसे अलसायी-सी मदालसा नामकी एक (भोलीभाली) कन्या थी। वह शील और गुणसे सम्पन्न, त्रिलोककी स्त्रियोंमें उत्तम, सुन्दरताकी खानि और चन्द्रमाकी कान्तिके समान (कोमलकिशोरी) थी। नन्दनवनमें क्रीडा कर रही उस सौन्दर्यशालिनीको देवताओंके शत्रु पातालकेतुने देखा और तुरन्त उसे उठा ले गया। उसीके कारण वह श्रेष्ठ घोड़ा दिया गया था। दैत्यको मारनेके बाद श्रेष्ठ ऊरुवाली स्त्रीको पाकर राजपुत्र निश्चिन्त हो गये। राजपुत्र (उस) मृगनयनीके साथ ऐसे सुशोभित हो रहे थे जैसे शचीके साथ इन्द्र सुशोभित होते हैं॥ १२—१४॥ |
| नारद उवाच<br>एवं निरस्ते महिषे तारके च महासुरे।<br>हिरण्याक्षसुतो धीमान् किमचेष्टत वै पुनः॥ १५ | नारदने पुनः पूछा— इस प्रकार महान् असुर तारक और महिषके निरस्त—समाप्त हो जानेपर हिरण्याक्षके बुद्धिमान् पुत्र (अन्धक)-ने पुनः क्या किया?॥ १५॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>तारकं निहतं दृष्ट्वा महिषं च रणेऽन्धकः।<br>क्रोधं चक्रे सुदुर्बुद्धिर्देवानां देवसैन्यहा॥ १६<br>ततः स्वल्पपरिवारः प्रगृह्य परिघं करे।<br>निर्जगामाथ पातालाद् विचचार च मेदिनीम्॥ १७<br>ततो विचरता तेन मन्दरे चारुकन्दरे।<br>दृष्टा गौरी च गिरिजा सखीमध्ये स्थिता शुभा॥ १८<br>ततोऽभूत् कामबाणार्त्तः सहसैवान्धकोऽसुरः।<br>तां दृष्ट्वा चारुसर्वाङ्गीं गिरिराजसुतां वने॥ १९ | पुलस्त्यजी बोले— तारक और महिष दोनोंको संग्राममें मारे गये देखकर देवसेनाके समूहोंका नाश करनेवाला, महामूर्ख अन्धक देवताओंपर कुपित हो गया। उसके बाद थोड़ी-सी सेनाके साथ वह हाथमें परिघ लेकर पातालसे बाहर निकल आया और पृथ्वीपर विचरण करने लगा। उसके बाद घूमते हुए ही उसने सुन्दर कन्दराओंवाले मन्दर गिरिपर सखियोंके बीचमें गिरिनन्दिनी कल्याणी गौरीको देखा। उस सर्वाङ्गसुन्दरी गिरिराजनन्दिनीको वनमें देखकर अन्धकासुर एकाएक काम-बाणसे पीड़ित हो गया॥ १६—१९॥ |
| अथोवाचासुरो मूढो वचनं मन्मथान्धकः।<br>कस्येयं चारुसर्वाङ्गी वने चरति सुन्दरी॥ २०<br>इयं यदि भवेन्नैव ममान्तःपुरवासिनी।<br>तन्मदीयेन जीवेन क्रियते निष्फलेन किम्॥ २१ | तब कामसे अंधे हुए उस मूर्ख असुर अन्धकने कहा—वनमें भ्रमण कर रही यह सर्वाङ्गसुन्दरी ललना किसकी है? यदि यह मेरे अन्तःपुरमें निवास करनेवाली न हुई तो मेरे इस व्यर्थके जीवनसे क्या लाभ? यदि |