भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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२७२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ५९ ]

उनसठवाँ अध्याय

ऋतध्वजका पातालकेतुपर आक्रमण कर प्रहार करना, अन्धकका गौरीको प्राप्त करनेके लिये प्रयत्न करना

संस्कृतहिन्दी अनुवाद
नारद उवाच<br>योऽसौ मन्त्रयतां प्राप्तो दैत्यानां शरताडितः।<br>स केन वद निर्भिन्नः शरेण दितिजेश्वरः ॥ १नारदने पूछा — आप हमें यह बतलायें कि सलाह करते हुए दैत्योंमेंसे जो वह दैत्य बाणद्वारा बिंध गया था उसे किसने बाणसे विदीर्ण कर दिया था॥ १॥
पुलस्त्य उवाच<br>आसीन्नृपो रघुकुले रिपुजिन्महर्षे<br>तस्यात्मजो गुणगणैकनिधिर्महात्मा।<br>शूरोऽरिसैन्यदमनो बलवान् सुहृत्सु<br>विप्रान्धदीनकृपणेषु समानभावः ॥ २<br>ऋतध्वजो नाम महान् महीयान्<br>स गालवार्थे तुरगाधिरूढः।<br>पातालकेतुं निजघान पृष्ठे<br>बाणेन चन्द्रार्धनिभेन वेगात् ॥ ३पुलस्त्यजी बोले — महर्षे! रघुकुलमें रिपुजित् नामके एक राजा थे। उनके ऋतध्वज नामका एक पुत्र था। वह सभी गुणोंकी निधि, महात्मा, वीर, शत्रुके सेनाओंका नाश करनेवाला, बली, मित्रों, ब्राह्मणों, अन्धों, गरीबों एवं दयापात्र दीनोंमें समान भाव रखनेवाला था। उसने गालवके लिये घोड़ेपर सवार होकर पातालकेतुकी पीठमें अर्धचन्द्रके सदृश बाणसे बड़ी तेजीसे मारा था॥ २-३॥
नारद उवाच<br>किमर्थं गालवस्यासौ साधयामास सत्तमः।<br>येनासौ पत्रिणा दैत्यं निजघान नृपात्मजः ॥ ४नारदने कहा (पूछा) — उस श्रेष्ठ राजपुत्रने जिस कारण बाणसे उस दैत्यको मारा, उससे गालवका कौन-सा कार्य सिद्ध किया?॥ ४॥
पुलस्त्य उवाच<br>पुरा तपस्तप्यति गालवर्षि-<br>र्महाश्रमे स्वे सततं निविष्टः।<br>पातालकेतुस्तपसोऽस्य विघ्नं<br>करोति मौढ्यात् स समाधिभङ्गम्॥ ५<br>न चेष्यतेऽसौ तपसो व्ययं हि<br>शक्तोऽपि कर्तुं त्वथ भस्मसात् तम्।<br>आकाशमीक्ष्याथ स दीर्घमुष्णं<br>मुमोच निःश्वासमनुत्तमं हि ॥ ६<br>ततोऽम्बराद् वाजिवरः पपात<br>बभूव वाणी त्वशरीरिणी च।<br>असौ तुरङ्गो बलवान् क्रमेत<br>अह्ना सहस्राणि तु योजनानाम्॥ ७<br>स तं प्रगृह्याश्ववरं नरेन्द्रं<br>ऋतध्वजं योज्य तदात्तशस्त्रम्।<br>स्थितस्तपस्येव ततो महर्षि-<br>र्दैत्यं समेत्य विशिखैर्नृपजो बिभेद ॥ ८पुलस्त्यजी बोले — पहले समयकी बात है कि गालव अपने आश्रममें तपस्यामें सदा लीन रहा करते थे। दैत्य पातालकेतु मूर्खताके कारण उनकी तपस्यामें बाधा डाला करता और उनकी समाधि (ध्यान)-को भंग किया करता था। वे उसको जलाकर राख कर देनेमें समर्थ होते हुए भी अपनी तपस्या क्षीण नहीं करना चाहते थे; (क्योंकि तपोबलसे दूसरोंका अनिष्ट करनेपर तपस्या क्षीण हो जाती है।) उन्होंने ऊपरकी ओर देखकर लंबा, गर्म निःश्वास छोड़ा। वह सर्वथा अनुपम था। उसके बाद आकाशसे एक सुन्दर घोड़ा गिरा और अशरीरिणी वाणी—आकाशवाणी हुई कि यह बलवान् अश्व एक दिनमें हजारों योजन जा सकता है। शस्त्रसे सजे हुए उस राजा ऋतध्वजको वह घोड़ा सौंपकर वे महर्षि (पुनः) तपस्या करने लगे। उसके बाद राजपुत्रने दैत्यके पास जाकर उसे बाणसे घायल कर दिया॥ ५-८॥
नारद उवाच<br>केनाम्बरतलाद् वाजी निसृष्टो वद सुव्रत।<br>वाक् कस्याऽदेहिनी जाता परं कौतूहलं मम ॥ ९नारदने कहा (पुनः पूछा) — सुव्रत! आप यह बतलायें कि किसने आकाशसे इस अश्वको गिराया था एवं आकाशवाणी किसकी थी? (इस विषयमें) मुझे बड़ी उत्सुकता है॥ ९॥
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