वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ५८ ] | सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध | २७१ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
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| सुनाभमभ्येत्य हिमाचलस्तु<br>प्रगृह्य हस्तेऽन्यत एव नीतवान्।<br>हरिः कुमारं सशिखण्डिनं नय-<br>द्वेगाद्दिवं पन्नगशत्रुपुत्रः॥ ११२<br>ततो गुहः प्राह हरिं सुरेशं<br>मोहेन नष्टो भगवन् विवेकः।<br>भ्राता मया मातुलजो निरस्त-<br>स्तस्मात् करिष्ये स्वशरीरशोषम्॥ ११३ | रोक दिया। हिमालय सुनाभके निकट आये और उनका हाथ पकड़कर दूसरी ओर ले गये तथा गरुडवाहन विष्णु मयूरसहित कुमारको जल्दीसे स्वर्गमें लिये चले गये। इसके बाद गुहने सुरेश्वर हरिसे कहा—भगवन्! मोहसे मेरी विचार-शक्ति नष्ट हो गयी और मैंने अपने ममेरे भाईका संहार कर दिया है। अतः (प्रायश्चित्तमें) मैं अपने शरीरको सुखा डालूँगा॥ ११०—११३॥ |
| तं प्राह विष्णुर्व्रज तीर्थवर्यं<br>पृथूदकं पापतरोः कुठारम्।<br>स्नात्वौघवत्यां हरमीक्ष्य भक्त्या<br>भविष्यसे सूर्यसमप्रभावः॥ ११४<br>इत्येवमुक्तो हरिणा कुमार-<br>स्त्वभ्येत्य तीर्थं प्रसमीक्ष्य शम्भुम्।<br>स्नात्वार्च्य देवान् स रविप्रकाशो<br>जगाम शैलं सदनं हरस्य॥ ११५ | विष्णुने उनसे कहा—कुमार! तुम पापरूपी वृक्षके लिये कुठारस्वरूप श्रेष्ठ तीर्थ पृथूदकमें जाओ। वहाँ ओघवतीके जलमें स्नानकर भक्तिपूर्वक महादेवका दर्शन करनेसे तुम (निष्पाप होकर) सूर्यके समान कान्तियुक्त हो जाओगे। हरिके इस प्रकार कहनेपर कुमार (पृथूदक) तीर्थमें गये और उन्होंने महादेवका दर्शन किया। स्नान करनेके बाद देवताओंकी पूजा करके वे सूर्यके समान तेजस्वी होकर महादेवके निवासस्थल पर्वतपर चले गये। |
| सुचक्रनेत्रोऽपि महाश्रमे तप-<br>श्चचार शैले पवनाशनस्तु।<br>आराधयानो वृषभध्वजं तदा<br>हरोऽस्य तुष्टो वरदो बभूव॥ ११६<br>देवात् स वव्रे वरमायुधार्थे<br>चक्रं तथा वै रिपुबाहुषण्डम्।<br>छिन्द्याद्यथा त्वप्रतिमं करेण<br>बाणस्य तन्मे भगवान् ददातु॥ ११७ | सुचक्रनेत्र भी केवल वायु पीकर पर्वतके महान् आश्रममें शंकरकी आराधना करता हुआ तपस्या करने लगा। तब प्रसन्न होकर शंकरने उसे वर देनेका वचन दिया। उसने अस्त्र-प्राप्तिके हेतु वर माँगा—हे भगवन्! शत्रुकी भुजाओंको काटनेवाला ऐसा अनुपम चक्र मुझे दें, जिससे मैं हाथसे ही बाणासुरकी भुजाओंको काट सकूँ॥ ११४—११७॥ |
| तमाह शम्भुर्व्रज दत्तमेतद्<br>वरं हि चक्रस्य तवायुधस्य।<br>बाणस्य तद्बाहुबलं प्रवृद्धं<br>संछेत्स्यते नात्र विचारणाऽस्ति॥ ११८<br>वरे प्रदत्ते त्रिपुरान्तकेन<br>गणेश्वरः स्कन्दमुपाजगाम।<br>निपत्य पादौ प्रतिवन्द्य हृष्टो<br>निवेदयामास हरप्रसादम्॥ ११९ | महादेवजीने उससे कहा—जाओ! तुमने चक्रके निमित्त जो वर माँगा, उसे मैंने दे दिया। यह बाणासुरके अत्यन्त बढ़े हुए बाहुबलको निःसन्देह काट डालेगा। त्रिपुरको मारनेवाले महेश्वरके वर देनेपर गणेश्वर (सुचक्रनेत्र) स्कन्दके निकट गया और (उसने) उनके चरणोंमें गिरकर वन्दना की। उसके बाद उनसे प्रसन्नतापूर्वक महादेवकी कृपाका वर्णन किया॥ ११८-११९॥ |
| एवं तवोक्तं महिषासुरस्य<br>वधं त्रिनेत्रात्मजशक्तिभेदात्।<br>क्रौञ्चस्य मृत्युः शरणागतार्थं<br>पापापहं पुण्यविवर्धनं च॥ १२० | इस प्रकार मैंने (पुलस्त्यने) तुमसे शंकरके पुत्रके द्वारा शक्तिसे महिषासुरके संहार किये जानेका वर्णन किया। शरणागतके हेतु क्रौञ्चकी मृत्यु हुई। यह आख्यान पापका विनाश एवं पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है॥ १२०॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अठावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५८॥