वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५८ |
|---|---|
| २७० |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुरन्दरवचः श्रुत्वा क्रोधादारक्तलोचनः।<br>कुमारः प्राह वचनं कम्पमानः शतक्रतुम्॥ ९८<br>मूढ किं ते बलं बाह्वोः शारीरं चापि वृत्रहन्।<br>येनाधिक्षिपसे मां त्वं ध्रुवं न मतिमानसि॥ ९९<br>तमुवाच सहस्त्राक्षस्त्वत्तोऽहं बलवान् गुह।<br>तं गुहः प्राह एहोहि युद्ध्यस्व बलवान् यदि॥ १००<br>शक्रः प्राहाथ बलवान् ज्ञायते कृत्तिकासुत।<br>प्रदक्षिणं शीघ्रतरं यः कुर्यात् क्रौञ्चमेव हि॥ १०१ | इन्द्रकी बात सुनकर कुमारकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। आवेशमें काँपते हुए कुमारने इन्द्रसे कहा—मूढ़ वृत्रारि ! तुम्हारी बाहुओं और शरीरमें कितनी शक्ति है, जिसके बलपर तुम मेरे ऊपर (मतिमन्द कहकर ) आक्षेप कर रहे हो। तुम निश्चय ही बुद्धिमान् नहीं हो। हजार आँखोंवाले इन्द्रने उनसे कहा—गुह ! मैं तुमसे शक्तिशाली हूँ। गुहने इन्द्रसे कहा—यदि तुम शक्तिशाली हो तो आओ, युद्ध कर देख लो। तब इन्द्रने कहा—कृत्तिकानन्दन ! हम दोनोंमें जो पहले क्रौञ्च-पर्वतकी प्रदक्षिणा कर सकेगा वही शक्तिशाली समझा जायगा॥ ९८—१०१॥ |
| श्रुत्वा तद्वचनं स्कन्दो मयूरं प्रज्झय वेगवान्।<br>प्रदक्षिणं पादचारी कर्तुं तूर्णतरोऽभ्यगात्॥ १०२<br>शक्रोऽवतीर्य नागेन्द्रात् पादेनाथ प्रदक्षिणम्।<br>कृत्वा तस्थौ गुहोऽभ्येत्य मूढं किं संस्थितो भवान्॥ १०३<br>तमिन्द्रः प्राह कौटिल्यं मया पूर्वं प्रदक्षिणः।<br>कृतोऽस्य न त्वया पूर्वं कुमारः शक्रमब्रवीत्॥ १०४<br>मया पूर्वं मया पूर्वं विवदन्तो परस्परम्।<br>प्राप्योचतुर्महेशाय ब्रह्मणे माधवाय च॥ १०५ | उस बातको सुनकर स्कन्द अपने वाहन मयूरको छोड़कर पैदल प्रदक्षिणा करनेके लिये शीघ्रतासे चल पड़े। इन्द्र भी गजराजसे उतरकर पैदल ही प्रदक्षिणाकर वहाँ आ गये। स्कन्दने उनके पास जाकर कहा—मूढ़ ! क्यों बैठे हो? इन्द्रने उन कौटिल्य (कुटिलाके पुत्र स्कन्द)-से कहा—मैंने तुमसे पहले ही इसकी प्रदक्षिणा कर ली है। कुमारने इन्द्रसे कहा—तुमने पहले नहीं की है। 'मैंने पहले की है, मैंने पहले की है।' इस प्रकार परस्पर विवाद करते हुए उन दोनोंने शंकर, ब्रह्मा एवं विष्णुके पास जाकर कहा॥ १०२-१०५॥ |
| अथोवाच हरिः स्कन्दं प्रष्टुमर्हसि पर्वतम्।<br>योऽयं वक्ष्यति पूर्वं स भविष्यति महाबलः॥ १०६<br>तन्माधववचः श्रुत्वा क्रौञ्चमभ्येत्य पावकः।<br>पप्रच्छाद्रिमिदं केन कृतं पूर्वं प्रदक्षिणम्॥ १०७<br>इत्येवमुक्तः क्रौञ्चस्तु प्राह पूर्वं महामतिः।<br>चकार गोत्रभित् पश्चात्त्वया कृतमथो गुह॥ १०८<br>एवं ब्रुवन्तं क्रौञ्चं स क्रोधात्प्रस्फुरिताधरः।<br>बिभेद शक्त्या कौटिल्यो महिषेण समं तदा॥ १०९ | इसके बाद विष्णुने स्कन्दसे कहा कि तुम पर्वतसे पूछ सकते हो। वह जिसे पहले आया हुआ बतलायेगा, वही महाशक्तिशाली मान्य होगा। माधवकी उन बातोंको सुनकर अग्निनन्दने क्रौञ्चपर्वतके पास जाकर उससे यह पूछा कि प्रदक्षिणा पहले किसने की है? इस बातको सुनकर चतुर क्रौञ्चने कहा—कार्तिकेय ! पहले इन्द्रने प्रदक्षिणा की; इसके बाद तुमने की है। इस प्रकार कहनेवाले क्रौञ्चको क्रोधसे ओठ काँपते हुए उस कुटिलानन्दन कुमारने शक्तिकी मारसे महिषासुरके साथ ही विदीर्ण कर दिया॥ १०६-१०९॥ |
| तस्मिन् हतेऽथ तनये बलवान्<br> सुनाभो वेगेन भूमिधरपार्थिवजस्तथागात्।<br>ब्रह्मेन्द्ररुद्रमरुदश्विवसुप्रधाना<br> जग्मुर्दिवं महिषमीक्ष्य हतं गुहेन॥ ११०<br>स्वमातुलं वीक्ष्य बली कुमारः<br> शक्तिं समुत्पाट्य निहन्तुकामः।<br>निवारितश्चक्रधरेण वेगा-<br> दालिङ्ग्य दोर्भ्यां गुरुरित्युदीर्य॥ १११ | उस पुत्रके मार दिये जानेपर पर्वतराजपुत्र बलवान् सुनाभ शीघ्र ही वहाँ आ गये। ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, वायु, अश्विनीकुमार, वसु आदि देवता गुह (कार्तिकेय)-के द्वारा महिषको मारा गया देखकर स्वर्ग चले गये। अपने मामाको देखनेके बाद बलवान् कुमारने शक्ति लेकर (उन्हें) मारना चाहा। परंतु विष्णुने शीघ्रतासे उन्हें बाहुओंसे आलिङ्गित करते हुए 'ये गुरु हैं' ऐसा कहकर |