भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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पृष्ठ 279

अध्याय ५८ ] सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध [ २६१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स पृष्ठतः प्रेक्ष्य शिखण्डिकेतनं<br>समापतन्तं वरशक्तिपाणिनम्।<br>कैलासमुत्सृज्य हिमाचलं तथा<br>क्रौञ्चं समभ्येत्य गुहां विवेश॥ ८७<br>दैत्यं प्रविष्टं स पिनाकिसूनु-<br>र्जुगोप यत्नाद् भगवान् गुहोऽपि।<br>स्वबन्धुहन्ता भविता कथं त्वहं<br>संचिन्तयन्नेव ततः स्थितोऽभूत् ॥ ८८<br>ततोऽभ्यगात् पुष्करसम्भवस्तु<br>हरो मुरारिस्त्रिदशेश्वरश्च।<br>अभ्येत्य चोचुर्महिषं सशैलं<br>भिन्दस्व शक्त्या कुरु देवकार्यम्॥ ८९पीछे आते देख वह महिषासुर कैलास एवं हिमालयको छोड़कर क्रौञ्चपर्वतपर चला गया और उसकी गुफामें प्रवेश कर गया। महादेवके पुत्र भगवान् गुह (कार्तिकेय) पर्वतकी गुफामें प्रविष्ट हुए दैत्यकी (अब) प्रयत्नपूर्वक रक्षा करने लगे। वे सोचने लगे कि मैं अपने (ममेरे) बन्धुका विनाशकर्ता कैसे होऊँ! वे (कुछ क्षण) स्तब्ध हो गये। उसके बाद ही कमलजन्मा ब्रह्मा, भगवान् शंकर, विष्णु और इन्द्र वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने कहा कि शक्तिके द्वारा पर्वतसहित महिषको विदीर्ण कर दो और देवताओंका कार्य पूरा करो ॥ ८६—८९ ॥
तत् कार्तिकेयः प्रियमेव तथ्यं<br>श्रुत्वा वचः प्राह सुरान् विहस्य।<br>कथं हि मातामहनेप्तृकं वधे<br>स्वभ्रातरं भ्रातृसुतं च मातुः॥ ९०<br>एषा श्रुतिश्चापि पुरातनी किल<br>गायन्ति यां वेदविदो महर्षयः।<br>कृत्वा च यस्या मतमुत्तमायाः<br>स्वर्गं व्रजन्ति त्वतिपापिनोऽपि ॥ ९१<br>गां ब्राह्मणं वृद्धमथाप्तवाक्यं<br>बालं स्वबन्धुं ललनामदुष्टाम्।<br>कृतापराधा अपि नैव वध्या<br>आचार्यमुख्या गुरवस्तथैव ॥ ९२<br>एवं जानन् धर्ममग्र्यं सुरेन्द्रा<br>नाहं हन्यां भ्रातरं मातुलेयम्।<br>यदा दैत्यो निर्गमिष्यद् गुहान्त-<br>स्तदा शक्त्या घातयिष्यामि शत्रुम् ॥ ९३इस प्रिय-तथ्य वचनको सुनकर हँसते हुए कार्तिकेय देवताओंसे बोले—मैं नानाके नाती, माताके भतीजे और अपने ममेरे भाईको कैसे मारूँ? (इस विषयमें) यह (इनको न मारनेकी) प्राचीन श्रुति भी है, जिसे वेदज्ञाता महर्षिगण गाया करते हैं। (इसी प्रकार) गौ, ब्राह्मण, वृद्ध, यथार्थवक्ता, बालक, अपना सम्बन्धी, दोषरहित स्त्री तथा आचार्य आदि गुरुजन अपराध करनेपर भी अवध्य होते हैं। इस उत्तम श्रुतिके अनुसार आचरण करनेवाले महान् पापी भी स्वर्गलोकको जाते हैं। सुरश्रेष्ठो! मैं इस श्रेष्ठ धर्मको जानते हुए (ऐसी दशामें—गुफामें छिपी अवस्थामें) अपने भाईको नहीं मार सकूँगा। जब दैत्य गुहाके भीतरसे बाहर निकलेगा तब मैं शक्तिसे उस (देव-) शत्रुका संहार करूँगा (तब हमें धर्मबाधा नहीं होगी) ॥ ९०—९३ ॥
श्रुत्वा कुमारवचनं भगवान्महर्षे<br>कृत्वा मतिं स्वहृदये गुहमाह शक्रः।<br>मत्तो भवान् न मतिमान् वदसे किमर्थं<br>वाक्यं शृणुष्व हरिणा गदितं हि पूर्वम् ॥ ९४<br>नैकस्यार्थे बहून् हन्यादिति शास्त्रेषु निश्चयः।<br>एकं हन्याद् बहुभ्योऽर्थे न पापी तेन जायते॥ ९५<br>एतच्छ्रुत्वा मया पूर्वं समयस्थेन चाग्रिज।<br>निहतो नमुचिः पूर्वं सोदरोऽपि ममानुजः॥ ९६<br>तस्माद् बहूनामर्थाय सक्रौञ्चं महिषासुरम्।<br>घातयस्व पराक्रम्य शक्त्या पावकदत्तया ॥ ९७महर्षे! कुमारका वचन सुननेके बाद इन्द्रने अपने हृदयमें विचारकर गुहसे कहा—आप मुझसे अधिक मतिमान् नहीं हैं। आप (ऐसा) क्यों बोल रहे हैं। पहले समयमें भगवान् श्रीहरिकी कही हुई बातको सुनिये। शास्त्रोंमें यह निश्चय किया गया है कि एक व्यक्तिकी रक्षाके लिये बहुतोंका संहार नहीं करना चाहिये। परंतु बहुतोंके कल्याणके लिये एकका वध करनेसे मनुष्य पापी नहीं होता। अग्निपुत्र! इस शास्त्रनिर्णयको सुनकर पहले समयमें मैंने मेल रहनेपर भी अपने सहोदर छोटे भाई नमुचिको मार दिया। अतः बहुतोंके कल्याणके लिये तुम क्रौञ्चसहित महिषासुरका संहार अग्निद्वारा दी हुई शक्तिसे बलपूर्वक कर डालो ॥ ९४—९७ ॥
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