वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| २६८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५८ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| गदां छित्त्वा सुतीक्ष्णारं चक्रं महिषमाद्रवत् ।<br>तत उच्चुक्रुशुर्दैत्या हा हतो महिषस्त्विति ॥ ७५<br><br>तच्छ्रुत्वाऽभ्यद्रवद् बाणः प्रासमाविध्य वेगवान् ।<br>जघान चक्रं रक्ताक्षः पञ्चमुष्टिशतेन हि ॥ ७६<br><br>पञ्चबाहुशतेनापि सुचक्राक्षं बबन्ध सः।<br>बलवानपि बाणेन निष्प्रयत्नगतिः कृतः ॥ ७७ | अत्यन्त तीक्ष्ण अरोंसे युक्त वह चक्र गदाको टूक-टूक काट कर महिषके ऊपर चल पड़ा। उसके बाद दैत्यलोग यह कहते हुए जोरसे चिल्ला उठे कि हाय ! महिष मारा गया। उसे सुननेके बाद लाल-लाल आँखोंवाला बाणासुर प्रास लेकर वेगपूर्वक दौड़ा और पाँच सौ मुष्टियोंसे चक्रपर प्रहार किया तथा पाँच सौ बाहुओंसे सुचक्राक्षको बाँध लिया। बलवान् होते हुए भी सुचक्राक्ष बाणासुरके द्वारा प्रयत्नशून्य कर दिया गया॥ ७४-७७॥ |
| सुचक्राक्षं सचक्रं हि बद्धं बाणासुरेण हि ।<br>दृष्ट्वाद्रवद्गदापाणिर्मकराक्षो महाबलः ॥ ७८<br><br>गदया मूर्ध्नि बाणं हि निजघान महाबलः।<br>वेदनार्त्तो मुमोचाथ सुचक्राक्षं महासुरः।<br>स चापि तेन संयुक्तो व्रीडायुक्तो महामनाः ॥ ७९<br><br>स संग्रामं परित्यज्य सालिग्राममुपाययौ ।<br>बाणोऽपि मकराक्षेण ताडितोऽभूत्पराङ्मुखः ॥ ८०<br><br>प्रभज्यत बलं सर्वं दैत्यानां सुरतापस ।<br>ततः स्वबलमीक्ष्यैव प्रभग्नं तारको बली।<br>खड्गोद्यतकरो दैत्यः प्रदुद्राव गणेश्वरान् ॥ ८१ | फिर, बाणासुरके द्वारा सुचक्राक्षको चक्रसहित बँधा हुआ देखकर महाबली मकराक्ष हाथमें गदा लेकर दौड़ा। महाबली मकराक्षने गदासे बाणके मस्तकपर प्रहार किया। उसके बाद कष्टसे दुःखी बाणने सुचक्राक्षको छोड़ दिया और वह मनस्वी उससे छूटकर लज्जित होता हुआ युद्ध छोड़कर सालिग्रामके समीप चला गया। बाण भी मकराक्षसे चोट खाकर युद्धसे मुख मोड़ लिया। नारदजी! दैत्योंकी सारी सेना छिन्न-भिन्न हो गयी। उसके बाद अपनी सेनाको नष्ट हुआ देख बलवान् दैत्य तारक हाथमें तलवार लेकर गणेश्वरोंकी ओर दौड़ा॥ ७८-८१॥ |
| ततस्तु तेनाप्रतिमेन सासिना<br>ते हंसवक्त्रप्रमुखा गणेश्वराः।<br>समातरश्चापि पराजिता रणे<br>स्कन्दं भयार्त्ताः शरणं प्रपेदिरे ॥ ८२<br><br>भग्नान् गणान् वीक्ष्य महेश्वरात्मज-<br>स्तं तारकं सासिनमापतन्तम्।<br>दृष्ट्वैव शक्त्या हृदये बिभेद<br>स भिन्नमर्मा न्यपतत् पृथिव्याम् ॥ ८३<br><br>तस्मिन्हते भ्रातरि भग्नदर्पो<br>भयातुरोऽभून्महिषो महर्षे ।<br>संत्यज्य संग्रामशिरो दुरात्मा<br>जगाम शैलं स हिमाचलाख्यम् ॥ ८४<br><br>बाणेऽपि वीरे निहतेऽथ तारके<br>गते हिमाद्रिं महिषे भयार्त्ते ।<br>भयाद् विवेशोग्रमपां निधानं<br>गणैर्बले वध्यति सापराध ॥ ८५ | उसके बाद खड्ग धारण करनेवाले उस बेजोड़ वीरने उन मातृकाओंसहित हंसवक्त्र आदि गणेश्वरोंको हरा दिया। वे सभी डरकर स्कन्दकी शरणमें गये। महेश्वरके पुत्र कुमारने अपने गणोंको निरुत्साह तथा खड्गधारी तारकासुरको आते हुए देखकर शक्तिके प्रहारसे उसका हृदय विदीर्ण कर डाला। हृदय फट जानेके कारण वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। महर्षे! उस भाईके मर जानेपर महिषासुरका अभिमान चूर हो गया। वह दुष्टात्मा डरसे व्याकुल होकर युद्धभूमिसे भागकर हिमालय पर्वतपर चला गया। वीर तारकके मारे जाने, डरकर महिषके हिमालयपर भाग जाने एवं गणोंद्वारा अपराधी सेनाका संहार किये जानेपर बाण भी डरके कारण अगाध समुद्रमें प्रवेश कर गया॥ ८२-८५॥ |
| हत्वा कुमारो रणमूर्ध्नि तारकं<br>प्रगृह्य शक्तिं महता जवेन।<br>मयूरमारुह्य शिखण्डमण्डितं<br>ययौ निहन्तुं महिषासुरस्य ॥ ८६ | युद्धभूमिमें तारकका संहार कर कुमारने शक्ति उठा ली और वे शिखण्डयुक्त मोरपर चढ़ गये। फिर अत्यन्त शीघ्रतासे महिषासुरको मारने चले। हाथमें श्रेष्ठ शक्ति लिये हुए मयूरध्वज (मोरछापकी पताकावाले) कार्तिकेयको |