भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 277, कुल 489 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 277

अध्याय ५८ ] सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध २६७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रौद्रः शकटचक्राक्षो गणः पञ्चशिखो बली।<br>भ्रामयन् मुद्गरं वेगान्निजघ्नान् बलाद् रिपून्॥ ५९<br><br>गिरिभेदी तलेनैव सारोहं कुञ्जरं रणे।<br>भस्म चक्रे महावेगो रथं च रथिना सह॥ ६०<br><br>नाडीजङ्घोऽङ्घ्रिपातैश्च मुष्टिभिर्जानुनाऽसुरान्।<br>कीलाभिर्वज्रतुल्याभिर्जघान बलवान् मुने॥ ६१भयङ्कर शकटचक्राक्ष और बलवान् पञ्चशिख नामक गण तेजीसे मुद्गर घुमाते हुए बलपूर्वक शत्रुओंका संहार कर रहे थे। प्रबल वेगवान् गिरिभेदी युद्धमें थप्पड़ोंके भीषण आघातसे ही सवारके साथ हाथीको एवं रथीके सहित रथको चूर्ण-विचूर्ण करने लगा। मुने! बलवान् नाडीजङ्घ पैरों, मुक्कों, घुटनों एवं वज्रके समान कोहनियोंके प्रहारसे असुरोंको मारने लगा॥ ५८—६१॥
कूर्मग्रीवो ग्रीवयैव शिरसा चरणेन च।<br>लुण्ठनेन तथा दैत्यान् निजघान सवाहनान्॥ ६२<br><br>पिण्डारकस्तु तुण्डेन शृङ्गाभ्यां च कलिप्रिय।<br>विदारयति संग्रामे दानवान् समरोद्धतान्॥ ६३<br><br>ततस्तत्सैन्यमतुलं वध्यमानं गणेश्वरैः।<br>प्रदुद्रावाथ महिषस्तारकश्च गणाग्रणीः॥ ६४<br><br>ते हन्यमानाः प्रमथा दानवाभ्यां वरायुधैः।<br>परिवार्य समन्तात् ते युयुधुः कुपितास्तदा॥ ६५कूर्मग्रीव ग्रीवा, सिर एवं पैरोंके प्रहारोंसे तथा धक्का देकर वाहनोंके साथ दैत्योंको मारने लगा। नारदजी! पिण्डारक अपने मुख तथा दोनों सींगोंसे गर्वीले दानवोंको छिन्न-भिन्न करने लगा। इसके बाद गणेश्वरोंद्वारा उस असीम सेनाके दलोंको मारा जाता देख गणनायक महिष एवं तारक दौड़े। उन दोनों दानवोंद्वारा उत्तम-से-उत्तम आयुधोंसे संहारे जा रहे वे सभी प्रमथगण अधिक क्रुद्ध होकर चारों ओरसे घेरकर युद्ध करने लगे॥ ६२—६५॥
हंसास्यः पट्टिशेनाथ जघान महिषासुरम्।<br>षोडशाक्षस्त्रिशूलेन शतशीर्षो वरासिना॥ ६६<br><br>श्रुतायुधस्तु गदया विशोको मुसलेन तु।<br>बन्धुदत्तस्तु शूलेन मूर्ध्नि दैत्यमताडयत्॥ ६७<br><br>तथान्यैः पार्षदैर्युद्धे शूलशक्त्युष्टिपट्टिशैः।<br>नाकम्पत् ताड्यमानोऽपि मैनाक इव पर्वतः॥ ६८<br><br>तारको भद्रकाल्या च तथोलूखलया रणे।<br>वध्यते चैकचूड़ाया दार्यते परमायुधैः॥ ६९हंसास्य पट्टिशसे, षोडशाक्ष त्रिशूलसे और शतशीर्ष श्रेष्ठ तलवारसे महिषासुरको मारने लगा। श्रुतायुधने गदासे, विशोकने मुसलसे तथा बन्धुदत्तने शूलसे उस दैत्यके मस्तकपर मारा। वैसे ही अन्य पार्षदोंद्वारा शूल, शक्ति, ऋष्टि एवं पट्टिशोंसे मार खाते रहनेपर भी वह मैनाकपर्वतके समान तनिक भी विकम्पित नहीं हुआ। रणमें भद्रकाली, उलूखला एवं एकचूड़ाने श्रेष्ठ आयुधोंसे तारकके ऊपर प्रहार किया॥ ६६—६९॥
तौ ताड्यमानौ प्रमथैर्मातृभिश्च महासुरौ।<br>न क्षोभं जग्मतुर्वीरौ क्षोभयन्तौ गणानपि॥ ७०<br><br>महिषो गदया तूर्णं प्रहारैः प्रमथानथ।<br>पराजित्य पराधावत् कुमारं प्रति सायुधः॥ ७१<br><br>तमापतन्तं महिषं सुचक्राक्षो निरीक्ष्य हि।<br>चक्रमुद्यम्य संक्रुद्धो रुरोध दनुनन्दनम्॥ ७२<br><br>गदाचक्राङ्कितकरौ गणासुरमहारथौ।<br>अयुध्येतां तदा ब्रह्मन् लघु चित्रं च सुष्ठु च॥ ७३वे दोनों महान् असुर प्रमथों और मातृशक्तियोंसे मारे जाते हुए होनेपर भी (स्वयं) अक्षुब्ध रहकर गणोंको क्षुब्ध कर रहे थे। उसके बाद आयुधसहित महिषासुर गदाकी बार-बार मारसे प्रमथोंको शीघ्र पराजितकर कुमारकी ओर झपटा। उस महिषको झपटते देखकर अत्यन्त क्रुद्ध हुए सुचक्राक्षने चक्र उठाकर (उस) दनुनन्दनको (बीचमें ही) रोक दिया। ब्रह्मन्! हाथोंमें गदा और चक्र धारण किये हुए असुर और गण दोनों महारथी उस समय आपसमें कभी तेज, कभी अद्भुत, कभी निपुण (इस प्रकार विविध प्रकारकी) लड़ाई करने लगे॥ ७०—७३॥
गदां मुमोच महिषः समाविध्य गणाय तु।<br>सुचक्राक्षो निजं चक्रममुत्ससर्जासुरं प्रति॥ ७४महिषने गदा घुमाकर सुचक्राक्षके ऊपर मारा और सुचक्राक्षने अपने चक्रको उस असुरकी ओर चलाया।