वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २६६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५८ |
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| तवान्तिकमनुप्राप्तः प्रसादं कर्तुमर्हसि।<br>तच्छ्रुत्वा चान्धको वाक्यं प्राह मेघस्वनं वचः॥ ४५ | आपके पास आ गया हूँ। आप मेरे ऊपर अनुग्रह कीजिये। यह बात सुनकर अन्धकने बादलकी गर्जनध्वनिमें यह वचन कहा—॥ ४१–४५॥ | | न भेतव्यं त्वया तस्मात् सत्यं गोप्ताऽस्मि दानव।<br>महिषस्तारकश्चोभौ बाणश्च बलिनां वरः॥ ४६<br>अनाख्यायैव ते वीरास्त्वन्धकं महिषादयः।<br>स्वपरिग्रहसंयुक्ता भूमिं युद्धाय निर्ययुः॥ ४७<br>यत्र ते दारुणाकारा गणाश्चक्रुर्महास्वनम्।<br>तत्र दैत्याः समाजग्मुः सायुधाः सबला मुने॥ ४८<br>दैत्यानापततो दृष्ट्वा कार्तिकेयगणास्ततः।<br>अभ्यद्रवन्त सहसा स चोग्रो मातृमण्डलः॥ ४९ | दानव! तुम्हें उससे डरना नहीं चाहिये। मैं तुम्हारा सच्चा रक्षक हूँ। उसके बाद महिष और तारक—ये दोनों तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ बाण—ये सभी अन्धकसे बिना पूछे ही अपने अनुगामियोंके साथ युद्ध करनेके लिये पृथ्वीपर निकल आये। मुने! जिस स्थानपर भयंकर आकारवाले गण गर्जन कर रहे थे, उसी स्थानपर हथियारोंसे सजे-धजे दल-बलके साथ दैत्य भी आ गये। इसके बाद दैत्योंको आक्रमण करते हुए देखकर कार्तिकेयके गण तथा उग्र मातृकाएँ (उनपर) सहसा टूट पड़ीं॥ ४६–४९॥ | | तेषां पुरस्सरः स्थाणुः प्रगृह्य परिघं बली।<br>निषूदयत् परबलं क्रुद्धो रुद्रः पशूनिव॥ ५०<br>तं निघ्नन्तं महादेवं निरीक्ष्य कलशोदरः।<br>कुठारं पाणिनादाय हन्ति सर्वान् महासुरान्॥ ५१<br>ज्वालामुखो भयंकरः करेणादाय चासुरम्।<br>सरथं सगजं साश्वं विस्तृते वदनेऽक्षिपत्॥ ५२<br>दण्डकश्चापि संक्रुद्धः प्रासपाणिर्महासुरम्।<br>सवाहनं प्रक्षिपति समुत्पाट्य महार्णवे॥ ५३ | उन सबमें सबसे आगे बलशाली स्थाणु भगवान् लोहेकी बनी गदा लेकर क्रोधसे भरकर पशुओंके तुल्य शत्रुओंके सैन्य-बलका संहार करने लगे। असुरोंको मारते हुए महादेवजीको देखकर कलशोदर (भी) हाथमें कुल्हाड़ा लेकर सभी बड़े असुरोंका विनाश करने लगा। भय उत्पन्न कर देनेवाला ज्वालामुख रथ, हाथी और घोड़ोंके साथ असुरोंको हाथसे पकड़-पकड़कर अपने फैलाये हुए मुखमें झोंकने लगा। हाथमें बर्छी लिये हुए दण्डक भी क्रुद्ध होकर महासुरोंको उनके वाहनोंसहित उठाकर समुद्रमें फेंकने लगा॥ ५०–५३॥ | | शङ्कुकर्णश्च मुसली हलेनाकृष्य दानवान्।<br>संचूर्णयति मन्त्रीव राजानं प्रासभृद् वशी॥ ५४<br>खड्गचर्मधरो वीरः पुष्पदन्तो गणेश्वरः।<br>द्विधा त्रिधा च बहुधा चक्रे दैतेयदानवान्॥ ५५<br>पिङ्गलो दण्डमुद्यम्य यत्र यत्र प्रधावति।<br>तत्र तत्र प्रदृश्यन्ते राशयः शावदानवैः॥ ५६<br>सहस्रनयनः शूलं भ्रामयन् वै गणाग्रणीः।<br>निजघानासुरान् वीरः सवाजिसथकुञ्जरान्॥ ५७ | मुसल एवं प्रास लिये हुए जितेन्द्रिय शङ्कुकर्ण दानवोंको हलसे खींच-खींचकर इस प्रकार मटियामेट करने लगा, जैसे मन्त्री (अनाचारी-अविचारी) राजाको नष्ट करता जाता है। तलवार और ढाल धारण करनेवाला गणोंका स्वामी वीर पुष्पदन्त भी दैत्यों एवं दानवोंमें किसीको दो-दो, किसीको तीन-तीन टुकड़ोंमें काट डालता तथा किसी-किसीको तो अनेक खण्डोंमें कर डालता था। पिङ्गल दण्डको उठाकर जहाँ-जहाँ दौड़ता, वहाँ-वहाँ दैत्योंके शवका ढेर दिखलायी पड़ने लगता। गणोंमें श्रेष्ठ वीर सहस्रनयन शूल घुमाते हुए घोड़े, रथ और हाथियोंसहित असुरोंको मार रहा था॥ ५४–५७॥ | | भीमो भीमशिलावर्षैः स पुरस्सरतोऽसुरान्।<br>निजघान यथैवेन्द्रो वज्रवृष्ट्या नगोत्तमान्॥ ५८ | भीम भयङ्कर शिलाओंकी वर्षासे सामने आ रहे असुरोंको इस भाँति मार रहा था, जिस प्रकार इन्द्र वज्रकी वृष्टिसे उत्तम पर्वतोंको ध्वस्त करते हैं। |