वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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अध्याय ५८ ] सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध २६५
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| गणा गुहवचः श्रुत्वा अवतीर्य महीतलम्।<br>आरात् पतन्तस्तद्देशं नादं चक्रुर्भयंकरम्॥ ३०<br>तन्निनादो महीं सर्वामापूर्य च नभस्तलम्।<br>विवेशार्णवरन्ध्रेण पातालं दानवालयम्॥ ३१<br>श्रुतः स महिषेणाथ तारकेण च धीमता।<br>विरोचनेन जम्भेन कुजम्भेनासुरेण च॥ ३२<br>ते श्रुत्वा सहसा नादं वज्रपातोपमं दृढम्।<br>किमेतदिति संचिन्त्य तूर्णं जग्मुस्तदान्धकम्॥ ३३ | गुहकी बात सुनकर सभी गण पृथ्वीपर उतर आये। उतरकर उस स्थानपर उन गणोंने एकाएक भयंकर नाद किया। वह भयंकर नाद सारी पृथ्वी एवं गगनमण्डलमें गूँज गया। फिर तो वह समुद्री छिद्रसे दानवोंके निवासस्थान पाताललोक (-तक)-में पहुँच गया। उसके बाद मतिमान् महिष, तारक, विरोचन, जम्भ तथा कुजम्भ आदि असुरोंने उस ध्वनिको सुना। एकाएक वज्रपातके समान उस भयंकर ध्वनिको सुनकर यह क्या है—यह सोचकर वे सभी शीघ्रतासे अन्धकके पास चले गये॥ ३०—३३॥ |
| ते समेत्यान्धकेनैव समं दानवपुङ्गवाः।<br>मन्त्रयामासुरुद्विग्नास्तं शब्दं प्रति नारद॥ ३४<br>मन्त्रयत्सु च दैत्येषु भूतलात् सूकराननः।<br>पातालकेतुर्दैत्येन्द्रः सम्प्राप्तोऽथ रसातलम्॥ ३५<br>स बाणविद्धो व्यथितः कम्पमानो मुहुर्मुहुः।<br>अब्रवीद् वचनं दीनं समभ्येत्यान्धकासुरम्॥ ३६ | नारदजी! वे सभी असुरश्रेष्ठ व्याकुल होकर अन्धकके साथ ही एकत्र होकर उस शब्दके विषयमें परस्पर विचार-विमर्श करने लगे। उन दैत्योंके विचार करते समय सूकर-जैसे मुखवाला दैत्यश्रेष्ठ पातालकेतु धरातलसे रसातलमें आया। बाणसे विद्ध होनेके कारण व्यथित होकर वह बारम्बार काँपता हुआ अन्धकासुरके पास आकर दैन्य वचन बोला—॥ ३४—३६॥ |
| पातालकेतुरुवाच<br>गतोऽहमासं दैत्येन्द्र गालवस्याश्रमं प्रति।<br>तं विध्वंसयितुं यत्नं समारब्धं बलान्मया॥ ३७<br>यावत्सूकररूपेण प्रविशामि तमाश्रमम्।<br>न जाने तं नरं राजन् येन मे प्रहितः शरः॥ ३८<br>शरसंभिन्नजत्रुश्च भयात् तस्य महाजवः।<br>प्रणष्ट आश्रमात् तस्मात् स च मां पृष्ठतोऽन्वगात्॥ ३९<br>तुरङ्गखुरनिर्घोषः श्रूयते परमोऽसुर।<br>तिष्ठ तिष्ठेति वदतस्तस्य शूरस्य पृष्ठतः।<br>तद्भयादस्मि जलधिं सम्प्राप्तो दक्षिणार्णवम्॥ ४० | पातालकेतुने कहा— दैत्येश्वर! मैं गालवके आश्रममें गया था और उसको बलपूर्वक नष्ट करनेका उद्योग करने लगा। राजन्! मैंने सूकरके रूपमें जैसे ही उस आश्रममें प्रवेश किया, वैसे ही पता नहीं, किस मानवने मेरे ऊपर बाण छोड़ दिया। बाणसे हँसलीके टूट जानेपर मैं उसके भयके कारण आश्रमसे तुरंत भागा। पर उसने मेरा पीछा किया। असुर! मेरे पीठ-पीछे आ रहे 'रुको-रुको' कहनेवाले उस वीरके घोड़ेकी टापका महान् शब्द सुनायी पड़ रहा था। उसके भयसे मैं जलनिधि दक्षिण समुद्रमें आ गया॥ ३७—४०॥ |
| यावत्पश्यामि तत्रस्थान् नानावेषाकृतीन् नरान्।<br>केचिद् गर्जन्ति घनवत् प्रतिगर्जन्ति चापरे॥ ४१<br>अन्ये चोचुर्वयं नूनं निघ्नामो महिषासुरम्।<br>तारकं घातयामोऽद्य वदन्त्यन्ये सुतेजसः॥ ४२ | वहाँ मैंने अनेक प्रकारके पहनावे तथा आकृतिवाले मनुष्योंको देखा। उनमें कुछ तो बादलकी भाँति गर्जन कर रहे थे और कुछ दूसरे उसी प्रकारकी प्रतिध्वनि कर रहे थे। दूसरे कह रहे थे कि हम महिषासुरको निश्चय ही मार डालेंगे और अति तेजस्वी दूसरे लोग कह रहे थे कि आज हम तारकको मारेंगे। |
| तच्छ्रुत्वा सुतरां त्रासो मम जातोऽसुरेश्वर।<br>महार्णवं परित्यज्य पतितोऽस्मि भयातुरः॥ ४३<br>धरण्यां विवृतं गर्तं स मामन्वपतद् बली।<br>तद्भयात् सम्परित्यज्य हिरण्यपुरमात्मनः॥ ४४ | असुरेश्वर! उसे सुनकर मुझे बहुत डर हो गया और मैं विशाल समुद्रको छोड़कर भयभीत हो पृथ्वीके नीचे विस्तृत गड्ढे (सुरंग)-के रूपमें बने हुए गुप्त मार्गसे भागा। तब भी उस बलशालीने मेरा पीछा किया। उसके डरसे मैं अपना हिरण्यपुर त्यागकर |