वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| ४२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अथोवाच दितीशस्तौ का शक्तिर्युवयोरिह।<br>मयि तिष्ठति दैत्येन्द्रे धर्मसेतुप्रवर्तके॥ ५०<br><br>नरस्तं प्रत्युवाचाथ आवाभ्यां शक्तिरूर्जिता।<br>न कश्चिच्छक्नुयाद् योद्धुं नरनारायणौ युधि॥ ५१ | शोभा देता है। तब दितीश्वर प्रह्लादने उन दोनोंसे कहा—धर्मसेतुके स्थापित करनेवाले मुझ दैत्येन्द्रके रहते यहाँ आपलोग (सामर्थ्य-बलसे) क्या कर सकते हैं? इसपर नरने उन्हें उत्तर दिया—हमने पर्याप्त शक्ति प्राप्त कर ली है। हम नर और नारायण—दोनोंसे कोई भी युद्ध नहीं कर सकता॥ ४८–५१॥ |
| दैत्येश्वरस्ततः क्रुद्धः प्रतिज्ञामारुरोह च।<br>यथा कथंचिज्जेष्यामि नरनारायणौ रणे॥ ५२<br><br>इत्येवमुक्त्वा वचनं महात्मा<br>दितीश्वरः स्थाप्य बलं वनान्ते।<br>वितत्य चापं गुणमाविकृष्य<br>तलध्वनिं घोरतरं चकार॥ ५३<br><br>ततो नरस्त्वाजगवं हि चाप-<br>मानम्य बाणान् सुबहूञ्शिताग्रान्।<br>मुमोच तानप्रतिमैः पृषत्कै-<br>श्छिच्छेद दैत्यस्तपनीयपुङ्खैः॥ ५४<br><br>छिन्नान् समीक्ष्याथ नरः पृषत्कान्<br>दैत्येश्वरेणाप्रतिमेन संख्ये।<br>क्रुद्धः समानम्य महाधनुस्ततो<br>मुमोच चान्यान् विविधान् पृषत्कान्॥ ५५ | इसपर दैत्येश्वरने क्रुद्ध होकर प्रतिज्ञा कर दी कि मैं युद्धमें जिस किसी भी प्रकार आप नर और नारायण दोनोंको जीतूँगा। ऐसी प्रतिज्ञाकर दैत्येश्वर प्रह्लादने वनकी सीमापर अपनी सेना खड़ी कर दी और धनुषको फैलाकर उसपर डोरी चढ़ायी तथा घोरतर करतलध्वनि की—ताल ठोंकी। इसपर नरने भी आजगव धनुषको चढ़ाकर बहुत-से तेज बाण छोड़े। परंतु प्रह्लादने अनेक स्वर्ण-पुंखवाले अप्रतिम बाणोंसे उन बाणोंको काट डाला। फिर नरने युद्धमें अप्रतिम दैत्येश्वरके द्वारा बाणोंको नष्ट हुआ देख क्रुद्ध होकर अपने महान् धनुषको चढ़ाकर पुनः अन्य अनेक तीक्ष्ण बाण छोड़े॥ ५२–५५॥ |
| एकं नरो द्वौ दितिजेश्वरश्च<br>त्रीन् धर्मसूनुश्चतुरो दितीशः।<br>नरस्तु बाणान् प्रमुमोच पञ्च<br>षड् दैत्यनाथो निशितान् पृषत्कान्॥ ५६<br><br>सप्तर्षिमुख्यो द्विचतुश्च दैत्यो<br>नरस्तु षट् त्रीणि च दैत्यमुख्ये।<br>षट्त्रीणि चैकं च दितीश्वरेण<br>मुक्तानि बाणानि नराय विप्र॥ ५७<br><br>एकं च षट् पञ्च नरेण मुक्ता-<br>स्त्वष्टौ शराः सप्त च दानवेन।<br>षट् सप्त चाष्टौ नव षण्नरेण<br>द्विसप्ततिं दैत्यपतिः ससर्ज॥ ५८<br><br>शतं नरस्त्रीणि शतानि दैत्यः<br>षड् धर्मपुत्रो दश दैत्यराजः।<br>ततोऽप्यसंख्येयतरान् हि बाणान्<br>मुमोचतुस्तौ सुभृशं हि कोपात्॥ ५९ | नरके एक बाण छोड़नेपर प्रह्लादने दो बाण छोड़े; नरके तीन बाण छोड़नेपर प्रह्लादने चार बाण छोड़े। इसके बाद पुनः नरने पाँच बाण और फिर दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लादने छः तेज बाण छोड़े। विप्र! नरके सात बाण छोड़नेपर दैत्यने आठ बाण छोड़े। नरके नव बाण छोड़नेपर प्रह्लादने उनपर दस बाण छोड़े। नरके बारह बाण छोड़नेपर दानवने पंद्रह बाण छोड़े। नरके छत्तीस बाण छोड़नेपर दैत्यपतिने बहत्तर बाण चलाये। नरके सौ बाणोंपर दैत्यने तीन सौ बाण चलाये। धर्मपुत्रके छः सौ बाणोंपर दैत्यराजने एक हजार बाण छोड़े। फिर तो उन दोनोंने अत्यन्त क्रोधसे (एक-दूसरेपर) असंख्य बाण छोड़े॥ ५६–५९॥ |
| ततो नरो बाणगणैरसंख्यै-<br>र्वास्तरद्भूमिमथो दिशः खम्।<br>स चापि दैत्यप्रवरः पृषत्कै-<br>श्छिच्छेद वेगात् तपनीयपुङ्खैः॥ ६० | उसके बाद नरने असंख्य बाणोंसे पृथ्वी, आकाश और दिशाओंको ढक दिया। फिर दैत्यप्रवर प्रह्लादने स्वर्णपुंखवाले बाणोंको बड़े वेगसे छोड़कर उनके |