वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७ ] उर्वशीकी उत्पत्ति-कथा, प्रह्लाद-प्रसंग-नर-नारायणसे संवाद एवं युद्धोपक्रम ४१ च्यवन उवाच (प्रह्लादके वचनको सुनकर) च्यवनजीने कहा - पृथिव्यां नैमिषं तीर्थमन्तरिक्षे च पुष्करम्। महाबाहो ! पृथ्वीमें नैमिषारण्यतीर्थ, अन्तरिक्षमें पुष्कर, चक्रतीर्थं महाबाहो रसातले विदुः ॥ ३७ और पातालमें चक्रतीर्थ प्रसिद्ध हैं ॥ ३७ ॥ पुलस्त्य उवाच पुलस्त्यजीने कहा - महामुने ! भार्गवकी इसी श्रुत्वा तद्भार्गववचो दैत्यराजो महामुने। बातको सुनकर दैत्यराज प्रह्लादने नैमिषतीर्थमें जानेके नैमिषं गन्तुकामस्तु दानवानिदमब्रवीत् ॥ ३८ लिये इच्छा प्रकट की और दानवोंसे यह बात कही ॥ ३८ ॥ प्रह्लाद उवाच प्रह्लाद बोले-उठो, हम सभी नैमिष- उत्तिष्ठध्वं गमिष्यामः स्नातुं तीर्थं हि नैमिषम् । तीर्थमें स्नान करने जायँगे तथा वहाँ पीताम्बरधारी एवं कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् अच्युत (विष्णु)-के द्रक्ष्यामः पुण्डरीकाक्षं पीतवाससमच्युतम् ॥ ३९ दर्शन करेंगे ॥ ३९ ॥ पुलस्त्य उवाच पुलस्त्यजीने कहा - दैत्यराज प्रह्लादके ऐसा कहनेपर इत्युक्ता दानवेन्द्रेण सर्वे ते दैत्यदानवाः। वे सभी दैत्य और दानव रसातलसे बाहर निकले एवं चक्रुरुद्योगमतुलं निर्जग्मुश्च रसातलात् ॥ ४० अतुलनीय उद्योगमें लग गये। उन महाबलवान् ते समभ्येत्य दैतेया दानवाश्च महाबलाः। दितिपुत्रों एवं दानवोंने नैमिषारण्यमें आकर आनन्दपूर्वक स्नान किया। इसके बाद श्रीमान् दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लाद मृगया नैमिषारण्यमागत्य स्नानं चक्रुर्मुदान्विताः ॥ ४१ (आखेट या शिकार)-के लिये वनमें घूमने लगे। ततो दितीश्वरः श्रीमान् मृगव्यां स चचार ह। वहाँ घूमते हुए उन्होंने पवित्र एवं निर्मल जलवाली सरस्वती नदीको देखा। वहीं समीप ही बाणोंसे चरन् सरस्वतीं पुण्यां ददर्श विमलोदकाम् ॥ ४२ खचाखच बिंधे बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले एक शाल तस्यादूरे महाशाखं शालवृक्षं शरैश्चितम् । वृक्षको देखा। वे सभी बाण एक-दूसरेके मुखसे लगे ददर्श बाणानपरान् मुखे लग्नान् परस्परम् ॥ ४३ हुए थे ॥ ४०-४३ ॥ ततस्तानद्भुताकारान् बाणान् नागोपवीतकान् । तब उन अद्भुत आकारवाले नागोपवीत (साँपोंसे दृष्ट्वाऽतुलं तदा चक्रे क्रोधं दैत्येश्वरः किल ॥ ४४ लिपटे) बाणोंको देखकर दैत्येश्वरको बड़ा क्रोध हुआ। स ददर्श ततो दूरात्कृष्णाजिनधरौ मुनी। फिर उन्होंने दूरसे ही काले मृगचर्मको धारण किये हुए बड़ी-बड़ी जटाओंवाले तथा तपस्यामें लगे दो मुनियोंको समुन्नतजटाभारौ तपस्यासक्तमानसौ ॥ ४५ देखा। उन दोनोंके बगलमें सुलक्षण शार्ङ्ग और आजगव तयोश्च पार्श्वयोर्दिव्ये धनुषी लक्षणान्विते । नामक दो दिव्य धनुष एवं दो अक्षय तथा बड़े-बड़े शार्ङ्गमाजगवं चैव अक्षय्यौ च महेषुधी ॥ ४६ तरकस वर्तमान थे। उन दोनोंको इस प्रकार देखकर तौ दृष्ट्वाऽमन्यत तदा दाम्भिकाविति दानवः। दानवराज प्रह्लादने उन्हें दम्भसे युक्त समझा। फिर ततः प्रोवाच वचनं तावुभौ पुरुषोत्तमौ ॥ ४७ उन्होंने उन दोनों श्रेष्ठ पुरुषोंसे कहा - ॥ ४४-४७ ॥ किं भवद्भ्यां समारब्धं दम्भं धर्मविनाशनम् । आप दोनों यह धर्मविनाशक दम्भपूर्ण कार्य क्यों क्व तपः क्व जटाभारः क्व चेमौ प्रवरायुधौ ॥ ४८ कर रहे हैं ? कहाँ तो आपकी यह तपस्या और जटाभार, कहाँ ये दोनों श्रेष्ठ अस्त्र ? इसपर नरने उनसे कहा - अथोवाच नरो दैत्यं का ते चिन्ता दितीश्वर । दैत्येश्वर ! तुम उसकी चिन्ता क्यों कर रहे हो ? सामर्थ्य सामर्थ्ये सति यः कुर्यात् तत्संपद्येत तस्य हि ॥ ४९ रहनेपर कोई भी व्यक्ति जो कर्म करता है, उसे वही