वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय ७ ] उर्वशीकी उत्पत्ति-कथा, प्रह्लाद-प्रसंग-नर-नारायणसे संवाद एवं युद्धोपक्रम ४१ च्यवन उवाच (प्रह्लादके वचनको सुनकर) च्यवनजीने कहा - पृथिव्यां नैमिषं तीर्थमन्तरिक्षे च पुष्करम्। महाबाहो ! पृथ्वीमें नैमिषारण्यतीर्थ, अन्तरिक्षमें पुष्कर, चक्रतीर्थं महाबाहो रसातले विदुः ॥ ३७ और पातालमें चक्रतीर्थ प्रसिद्ध हैं ॥ ३७ ॥ पुलस्त्य उवाच पुलस्त्यजीने कहा - महामुने ! भार्गवकी इसी श्रुत्वा तद्भार्गववचो दैत्यराजो महामुने। बातको सुनकर दैत्यराज प्रह्लादने नैमिषतीर्थमें जानेके नैमिषं गन्तुकामस्तु दानवानिदमब्रवीत् ॥ ३८ लिये इच्छा प्रकट की और दानवोंसे यह बात कही ॥ ३८ ॥ प्रह्लाद उवाच प्रह्लाद बोले-उठो, हम सभी नैमिष- उत्तिष्ठध्वं गमिष्यामः स्नातुं तीर्थं हि नैमिषम् । तीर्थमें स्नान करने जायँगे तथा वहाँ पीताम्बरधारी एवं कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् अच्युत (विष्णु)-के द्रक्ष्यामः पुण्डरीकाक्षं पीतवाससमच्युतम् ॥ ३९ दर्शन करेंगे ॥ ३९ ॥ पुलस्त्य उवाच पुलस्त्यजीने कहा - दैत्यराज प्रह्लादके ऐसा कहनेपर इत्युक्ता दानवेन्द्रेण सर्वे ते दैत्यदानवाः। वे सभी दैत्य और दानव रसातलसे बाहर निकले एवं चक्रुरुद्योगमतुलं निर्जग्मुश्च रसातलात् ॥ ४० अतुलनीय उद्योगमें लग गये। उन महाबलवान् ते समभ्येत्य दैतेया दानवाश्च महाबलाः। दितिपुत्रों एवं दानवोंने नैमिषारण्यमें आकर आनन्दपूर्वक स्नान किया। इसके बाद श्रीमान् दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लाद मृगया नैमिषारण्यमागत्य स्नानं चक्रुर्मुदान्विताः ॥ ४१ (आखेट या शिकार)-के लिये वनमें घूमने लगे। ततो दितीश्वरः श्रीमान् मृगव्यां स चचार ह। वहाँ घूमते हुए उन्होंने पवित्र एवं निर्मल जलवाली सरस्वती नदीको देखा। वहीं समीप ही बाणोंसे चरन् सरस्वतीं पुण्यां ददर्श विमलोदकाम् ॥ ४२ खचाखच बिंधे बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले एक शाल तस्यादूरे महाशाखं शालवृक्षं शरैश्चितम् । वृक्षको देखा। वे सभी बाण एक-दूसरेके मुखसे लगे ददर्श बाणानपरान् मुखे लग्नान् परस्परम् ॥ ४३ हुए थे ॥ ४०-४३ ॥ ततस्तानद्भुताकारान् बाणान् नागोपवीतकान् । तब उन अद्भुत आकारवाले नागोपवीत (साँपोंसे दृष्ट्वाऽतुलं तदा चक्रे क्रोधं दैत्येश्वरः किल ॥ ४४ लिपटे) बाणोंको देखकर दैत्येश्वरको बड़ा क्रोध हुआ। स ददर्श ततो दूरात्कृष्णाजिनधरौ मुनी। फिर उन्होंने दूरसे ही काले मृगचर्मको धारण किये हुए बड़ी-बड़ी जटाओंवाले तथा तपस्यामें लगे दो मुनियोंको समुन्नतजटाभारौ तपस्यासक्तमानसौ ॥ ४५ देखा। उन दोनोंके बगलमें सुलक्षण शार्ङ्ग और आजगव तयोश्च पार्श्वयोर्दिव्ये धनुषी लक्षणान्विते । नामक दो दिव्य धनुष एवं दो अक्षय तथा बड़े-बड़े शार्ङ्गमाजगवं चैव अक्षय्यौ च महेषुधी ॥ ४६ तरकस वर्तमान थे। उन दोनोंको इस प्रकार देखकर तौ दृष्ट्वाऽमन्यत तदा दाम्भिकाविति दानवः। दानवराज प्रह्लादने उन्हें दम्भसे युक्त समझा। फिर ततः प्रोवाच वचनं तावुभौ पुरुषोत्तमौ ॥ ४७ उन्होंने उन दोनों श्रेष्ठ पुरुषोंसे कहा - ॥ ४४-४७ ॥ किं भवद्भ्यां समारब्धं दम्भं धर्मविनाशनम् । आप दोनों यह धर्मविनाशक दम्भपूर्ण कार्य क्यों क्व तपः क्व जटाभारः क्व चेमौ प्रवरायुधौ ॥ ४८ कर रहे हैं ? कहाँ तो आपकी यह तपस्या और जटाभार, कहाँ ये दोनों श्रेष्ठ अस्त्र ? इसपर नरने उनसे कहा - अथोवाच नरो दैत्यं का ते चिन्ता दितीश्वर । दैत्येश्वर ! तुम उसकी चिन्ता क्यों कर रहे हो ? सामर्थ्य सामर्थ्ये सति यः कुर्यात् तत्संपद्येत तस्य हि ॥ ४९ रहनेपर कोई भी व्यक्ति जो कर्म करता है, उसे वही
| ४२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अथोवाच दितीशस्तौ का शक्तिर्युवयोरिह।<br>मयि तिष्ठति दैत्येन्द्रे धर्मसेतुप्रवर्तके॥ ५०<br><br>नरस्तं प्रत्युवाचाथ आवाभ्यां शक्तिरूर्जिता।<br>न कश्चिच्छक्नुयाद् योद्धुं नरनारायणौ युधि॥ ५१ | शोभा देता है। तब दितीश्वर प्रह्लादने उन दोनोंसे कहा—धर्मसेतुके स्थापित करनेवाले मुझ दैत्येन्द्रके रहते यहाँ आपलोग (सामर्थ्य-बलसे) क्या कर सकते हैं? इसपर नरने उन्हें उत्तर दिया—हमने पर्याप्त शक्ति प्राप्त कर ली है। हम नर और नारायण—दोनोंसे कोई भी युद्ध नहीं कर सकता॥ ४८–५१॥ |
| दैत्येश्वरस्ततः क्रुद्धः प्रतिज्ञामारुरोह च।<br>यथा कथंचिज्जेष्यामि नरनारायणौ रणे॥ ५२<br><br>इत्येवमुक्त्वा वचनं महात्मा<br>दितीश्वरः स्थाप्य बलं वनान्ते।<br>वितत्य चापं गुणमाविकृष्य<br>तलध्वनिं घोरतरं चकार॥ ५३<br><br>ततो नरस्त्वाजगवं हि चाप-<br>मानम्य बाणान् सुबहूञ्शिताग्रान्।<br>मुमोच तानप्रतिमैः पृषत्कै-<br>श्छिच्छेद दैत्यस्तपनीयपुङ्खैः॥ ५४<br><br>छिन्नान् समीक्ष्याथ नरः पृषत्कान्<br>दैत्येश्वरेणाप्रतिमेन संख्ये।<br>क्रुद्धः समानम्य महाधनुस्ततो<br>मुमोच चान्यान् विविधान् पृषत्कान्॥ ५५ | इसपर दैत्येश्वरने क्रुद्ध होकर प्रतिज्ञा कर दी कि मैं युद्धमें जिस किसी भी प्रकार आप नर और नारायण दोनोंको जीतूँगा। ऐसी प्रतिज्ञाकर दैत्येश्वर प्रह्लादने वनकी सीमापर अपनी सेना खड़ी कर दी और धनुषको फैलाकर उसपर डोरी चढ़ायी तथा घोरतर करतलध्वनि की—ताल ठोंकी। इसपर नरने भी आजगव धनुषको चढ़ाकर बहुत-से तेज बाण छोड़े। परंतु प्रह्लादने अनेक स्वर्ण-पुंखवाले अप्रतिम बाणोंसे उन बाणोंको काट डाला। फिर नरने युद्धमें अप्रतिम दैत्येश्वरके द्वारा बाणोंको नष्ट हुआ देख क्रुद्ध होकर अपने महान् धनुषको चढ़ाकर पुनः अन्य अनेक तीक्ष्ण बाण छोड़े॥ ५२–५५॥ |
| एकं नरो द्वौ दितिजेश्वरश्च<br>त्रीन् धर्मसूनुश्चतुरो दितीशः।<br>नरस्तु बाणान् प्रमुमोच पञ्च<br>षड् दैत्यनाथो निशितान् पृषत्कान्॥ ५६<br><br>सप्तर्षिमुख्यो द्विचतुश्च दैत्यो<br>नरस्तु षट् त्रीणि च दैत्यमुख्ये।<br>षट्त्रीणि चैकं च दितीश्वरेण<br>मुक्तानि बाणानि नराय विप्र॥ ५७<br><br>एकं च षट् पञ्च नरेण मुक्ता-<br>स्त्वष्टौ शराः सप्त च दानवेन।<br>षट् सप्त चाष्टौ नव षण्नरेण<br>द्विसप्ततिं दैत्यपतिः ससर्ज॥ ५८<br><br>शतं नरस्त्रीणि शतानि दैत्यः<br>षड् धर्मपुत्रो दश दैत्यराजः।<br>ततोऽप्यसंख्येयतरान् हि बाणान्<br>मुमोचतुस्तौ सुभृशं हि कोपात्॥ ५९ | नरके एक बाण छोड़नेपर प्रह्लादने दो बाण छोड़े; नरके तीन बाण छोड़नेपर प्रह्लादने चार बाण छोड़े। इसके बाद पुनः नरने पाँच बाण और फिर दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लादने छः तेज बाण छोड़े। विप्र! नरके सात बाण छोड़नेपर दैत्यने आठ बाण छोड़े। नरके नव बाण छोड़नेपर प्रह्लादने उनपर दस बाण छोड़े। नरके बारह बाण छोड़नेपर दानवने पंद्रह बाण छोड़े। नरके छत्तीस बाण छोड़नेपर दैत्यपतिने बहत्तर बाण चलाये। नरके सौ बाणोंपर दैत्यने तीन सौ बाण चलाये। धर्मपुत्रके छः सौ बाणोंपर दैत्यराजने एक हजार बाण छोड़े। फिर तो उन दोनोंने अत्यन्त क्रोधसे (एक-दूसरेपर) असंख्य बाण छोड़े॥ ५६–५९॥ |
| ततो नरो बाणगणैरसंख्यै-<br>र्वास्तरद्भूमिमथो दिशः खम्।<br>स चापि दैत्यप्रवरः पृषत्कै-<br>श्छिच्छेद वेगात् तपनीयपुङ्खैः॥ ६० | उसके बाद नरने असंख्य बाणोंसे पृथ्वी, आकाश और दिशाओंको ढक दिया। फिर दैत्यप्रवर प्रह्लादने स्वर्णपुंखवाले बाणोंको बड़े वेगसे छोड़कर उनके |
१०- अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय
| अध्याय ८ ] | प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय | ४३ |
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| ततः पतत्त्रिभिर्वीरौ सुभृशं नरदानवौ।<br>युद्धे वरास्त्रैर्युध्येतां घोररूपैः परस्परम्॥ ६१<br>ततस्तु दैत्येन वरास्त्रपाणिना<br>चापे नियुक्तं तु पितामहास्त्रम्।<br>माहेश्वरास्त्रं पुरुषोत्तमेन<br>समं समाहत्य निपेततुस्तौ॥ ६२<br>ब्रह्मास्त्रे तु प्रशमिते प्रह्रादः क्रोधमूर्च्छितः।<br>गदां प्रगृह्य तरसा प्रचस्कन्द रथोत्तमात्॥ ६३<br>गदापाणिं समायान्तं दैत्यं नारायणस्तदा।<br>दृष्ट्वाऽथ पृष्ठतश्चक्रे नरं योद्धुमनाः स्वयम्॥ ६४<br>ततो दितीशः सगदः समाद्रवत्<br>सशार्ङ्गपाणिं तपसां निधानम्।<br>ख्यातं पुराणर्षिमुदारविक्रमं<br>नारायणं नारद लोकपालम्॥ ६५ | बाणोंको काट दिया। तब नर और दानव दोनों वीर बाणों तथा भयंकर श्रेष्ठ अस्त्रोंसे परस्पर युद्ध करने लगे। इसके बाद दैत्यने हाथमें ब्रह्मास्त्र लेकर उस धनुषपर नियोजित कर चला दिया एवं उन पुरुषोत्तमने भी माहेश्वरास्त्रका प्रयोग कर दिया। वे दोनों अस्त्र परस्पर एक-दूसरेसे टक्कर खाकर गिर गये। ब्रह्मास्त्रके व्यर्थ होनेपर क्रोधसे मूर्च्छित हुए प्रह्लाद वेगसे गदा लेकर उत्तम रथसे कूद पड़े॥ ६०—६३॥<br>ऋषि नारायणने उस समय दैत्यको हाथमें गदा लिये अपनी ओर आते देखकर स्वयं युद्ध करनेकी इच्छासे नरको पीछे हटा दिया। नारदजी! तब प्रह्लादजी गदा लेकर तपोनिधान, शार्ङ्गधनुषको धारण करनेवाले, प्रसिद्ध पुरातन ऋषि, महापराक्रमशाली, लोकपति नारायणकी ओर दौड़ पड़े॥ ६४-६५॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७॥
आठवाँ अध्याय
प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय
| पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजी बोले— प्रह्लादने जब हाथमें शार्ङ्गधनुष |
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| शार्ङ्गपाणिनमायान्तं दृष्ट्वाऽग्रे दानवेश्वरः।<br>परिभ्राम्य गदां वेगान्मूर्ध्नि साध्यमताडयत्॥ १<br>ताडितस्याथ गदया धर्मपुत्रस्य नारद।<br>नेत्राभ्यामपतद् वारि वह्निवर्सनिभं भुवि॥ २<br>मूर्ध्नि नारायणस्यापि सा गदा दानवार्पिता।<br>जगाम शतधा ब्रह्मञ्शैलशृङ्गे यथाऽशनिः॥ ३<br>ततो निवृत्य दैत्येन्द्रः समास्थाय रथं द्रुतम्।<br>आदाय कार्मुकं वीरस्तूणाद् बाणं समाददे॥ ४<br>आनम्य चापं वेगेन गार्द्धपत्राञ्शिलीमुखान्।<br>मुमोच साध्याय तदा क्रोधान्धकारिताननः॥ ५<br><br>तानापतत एवाशु बाणांश्चन्द्रार्द्धसन्निभान्।<br>चिच्छेद बाणैरपरैर्निर्बिभेद च दानवम्॥ ६ | लिये भगवान् नारायणको सामनेसे आते देखा तो अपनी गदा घुमाकर वेगसे उनके सिरपर प्रहार कर दिया। नारदजी! गदासे प्रताडित होनेपर नारायणके नेत्रोंसे आगके स्फुलिंगके समान आँसू पृथ्वीपर गिरने लगे। ब्रह्मन्! पर्वतकी चोटीपर गिरकर जैसे वज्र टूट जाता है, उसी प्रकार दानवद्वारा नारायणके सिरपर चलायी गयी वह गदा भी सैकड़ों टुकड़े हो गयी। उसके बाद शीघ्रतापूर्वक लौटकर वीर दैत्येन्द्रने रथपर आरूढ हो धनुष लेकर अपनी तरकससे बाण निकाल लिया॥ १—४॥<br>फिर क्रोधान्ध प्रह्लादने शीघ्रतासे धनुषको चढ़ाकर गृध्रके पंखवाले अनेक बाणोंको नारायणकी ओर चलाया। नारायणने भी बड़ी शीघ्रतासे अपनी ओर आ रहे उन अर्धचन्द्र-तुल्य बाणोंको अपने बाणोंसे काट डाला और कुछ दूसरे बाणोंसे प्रह्लादको विद्ध कर दिया। |
| ४४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ततो नारायणं दैत्यो दैत्यं नारायणः शरैः।<br>आविध्येतां तदाऽन्योन्यं मर्मभिद्भिरजिह्मगैः॥ ७<br><br>ततोऽम्बरे संनिपातो देवानांमभवन्मुने।<br>दिदृक्षूणां तदा युद्धं लघु चित्रं च सुष्ठु च॥ ८ | तब दैत्यने नारायणको और नारायणने दैत्यको—एक-दूसरेको—मर्मभेदी एवं सीधे चलनेवाले बाणोंसे वेध दिया। मुने! उस समय शीघ्रतापूर्वक हो रहे इस कौशलयुक्त विचित्र एवं सुन्दर युद्धको देखनेकी इच्छावाले देवताओंका समूह आकाशमें एकत्र हो गया॥ ५-८॥ |
| ततः सुराणां दुन्दुभ्यस्त्ववाद्यन्त महास्वनाः।<br>पुष्पवर्षमनौपम्यं मुमुचुः साध्यदैत्ययोः॥ ९<br><br>ततः पश्यत्सु देवेषु गगनस्थेषु तावुभौ।<br>अयुध्येतां महेष्वासौ प्रेक्षकप्रीतिवर्द्धनम्॥ १०<br><br>बबन्धतुस्तदाकाशं तावुभौ शरवृष्टिभिः।<br>दिशश्च विदिशश्चैव छादयेतां शरोत्करैः॥ ११<br><br>ततो नारायणश्चापं समाकृष्य महामुने।<br>बिभेद मार्गणैस्तीक्ष्णैः प्रह्लादं सर्वमर्मसु॥ १२<br><br>तथा दैत्येश्वरः क्रुद्धश्चापमानम्य वेगवान्।<br>बिभेद हृदये बाह्वोर्वदने च नरोत्तमम्॥ १३ | उसके बाद बड़े जोरसे बजनेवाले नगाड़ोंको बजाकर देवताओंने भगवान् नारायणके और दैत्यके ऊपर अनुपमरूपमें पुष्पोंकी वर्षा की। फिर उन दोनों धनुर्धारियोंने आकाशमें स्थित देवताओंके सामने दर्शकोंको आनन्द देनेवाला (दिलचस्प) अनूठा युद्ध किया। उस समय उन दोनोंने बाणोंकी वृष्टिसे आकाशको मानो बाँध दिया और बाणवृष्टिसे दिशाओं एवं विदिशाओंको ढक दिया। महामुनि नारदजी! तब नारायणने धनुषको खींचकर तेज बाणोंसे प्रह्लादके सभी मर्मस्थलोंमें प्रहार किया और फुर्तीवाले दैत्येश्वरने क्रोधपूर्वक धनुषको चढ़ाकर नरोत्तमके हृदय, दोनों भुजाओं और मुँहको भी (बाणोंसे) बेध दिया॥ ९-१३॥ |
| ततोऽस्यतो दैत्यपतेः कार्मुकं मुष्टिबन्धनात्।<br>चिच्छेदैकेन बाणेन चन्द्रार्धाकारवर्चसा॥ १४<br><br>अपास्यत धनुश्छिन्नं चापमादाय चापरम्।<br>अधिज्यं लाघवात् कृत्वा ववर्ष निशिताञ्शरान्॥ १५<br><br>तानप्यस्य शरान् साध्यश्छित्त्वा बाणैरवारयत्।<br>कार्मुकं च क्षुरप्रेण चिच्छेद पुरुषोत्तमः॥ १६<br><br>छिन्नं छिन्नं धनुर्दैत्यस्त्वन्यदन्यत्समाददे।<br>समादत्ते तदा साध्यो मुने चिच्छेद लाघवात्॥ १७ | उसके बाद नारायणने बाण चला रहे प्रह्लादके धनुषके मुष्टिबन्धको अर्धचन्द्रके आकारवाले एक तेजस्वी बाणसे काट दिया। प्रह्लादने भी कटे धनुषको झट फेंककर दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और शीघ्र ही उसकी प्रत्यञ्चा (डोरी) चढ़ाकर तेज बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी। पर उसके उन शरोंको भी नारायणने बाणोंसे काटकर निवारित कर दिया और उन पुरुषोत्तमने तीक्ष्ण बाणसे उसके धनुषको भी काट डाला। नारदजी! एक धनुषके छिन्न होनेपर दैत्यराजने बारम्बार दूसरा धनुष ग्रहण किया, किंतु नारायणने लिये हुए उन-उन धनुषोंको भी तुरंत काटकर गिरा दिया॥ १४-१७॥ |
| संछिन्नेष्वथ चापेषु जग्राह दितिजेश्वरः।<br>परिघं दारुणं दीर्घं सर्वलोहमयं दृढम्॥ १८<br><br>परिगृह्याथ परिघं भ्रामयामास दानवः।<br>भ्राम्यमाणं स चिच्छेद नाराचेन महामुनिः॥ १९<br><br>छिन्ने तु परिघे श्रीमान् प्रह्लादो दानवेश्वरः।<br>मुद्गरं भ्राम्य वेगेन प्रचिक्षेप नराग्रजे॥ २०<br><br>तमापतन्तं बलवान् मार्गणैर्दशभिर्मुने।<br>चिच्छेद दशधा साध्यः स छिन्नो न्यपतद् भुवि॥ २१ | फिर धनुषोंके कट जानेपर दैत्यपति प्रह्लादने एक भयंकर, मजबूत और लौह (फौलाद)-से बने 'परिघ' नामक अस्त्रको उठा लिया। उसे लेकर वे दानव (प्रह्लाद) चारों ओर घुमाने लगे। उस घुमाये जाते हुए परिघको भी महामुनि नारायणने बाणसे काट दिया। उसके कट जानेपर श्रीमान् दनुजेश्वर प्रह्लादने पुनः एक मुद्गरको वेगसे घुमाकर उसे नारायणके ऊपर फेंका। नारदजी! उस आते हुए मुद्गरको भी बलवान् नारायणने दस बाणोंसे दस भागोंमें काट दिया; वह नष्ट होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ १८-२१॥ |
अध्याय ८] प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय ४५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मुद्गरे वितथे जाते प्रासमाविध्य वेगवान्।<br>प्रचिक्षेप नराग्र्याय तं च चिच्छेद धर्मजः॥ २२<br>प्रासे छिन्ने ततो दैत्यः शक्तिमादाय चिक्षिपे।<br>तां च चिच्छेद बलवान् क्षुरप्रेण महातपाः॥ २३<br>छिन्नेषु तेषु शस्त्रेषु दानवोऽन्यन्महद्धनुः।<br>समादाय ततो बाणैरवतस्तार नारद॥ २४<br>ततो नारायणो देवो दैत्यनाथं जगद्गुरुः।<br>नाराचेन जघानाथ हृदये सुरतापसः॥ २५ | प्रह्लादने मुद्गरके विफल हो जानेपर 'प्राश' नामक अस्त्र लेकर बड़े जोरसे नरके बड़े भाई नारायणके ऊपर चला दिया; पर उन्होंने उसे भी काट डाला। प्राशके नष्ट हो जानेपर दैत्यने तेज 'शक्ति' फेंकी, पर बलवान् महातपा नारायणने उसे भी अपने क्षुरप्रके द्वारा काट डाला। नारदजी! उन सभी अस्त्रोंके नष्ट हो जानेपर प्रह्लाद दूसरे विशाल धनुषको लेकर बाणोंकी वर्षा करने लगे। तब परम तपस्वी जगद्गुरु नारायणदेवने प्रह्लादके हृदयमें नाराचसे प्रहार किया॥ २२—२५॥ |
| संभिन्नहृदयो ब्रह्मन् देवेनाद्भुतकर्मणा।<br>निपपात रथोपस्थे तमपोवाह सारथिः॥ २६<br><br>स संज्ञां सुचिरेणैव प्रतिलभ्य दितीश्वरः।<br>सुदृढं चापमादाय भूयो योद्धुमुपागतः॥ २७<br><br>तमागतं संनिरीक्ष्य प्रत्युवाच नराग्रजः।<br>गच्छ दैत्येन्द्र योत्स्यामः प्रातस्त्वाहिकमाचर॥ २८<br><br>एवमुक्तो दितीशस्तु साध्येनाद्भुतकर्मणा।<br>जगाम नैमिषारण्यं क्रियां चक्रे तदाह्निकम्॥ २९ | नारदजी! अद्भुत पराक्रमी नारायणके प्रहारसे प्रह्लादका हृदय बिंध गया, फलतः वे बेहोश होकर रथके पिछले भागमें गिर पड़े। यह देखकर सारथी उन्हें वहाँसे हटाकर दूर ले गया। बहुत देरके बाद जब उन्हें चेतना प्राप्त हुई—होश आया, तब वे पुनः सुदृढ़ धनुष लेकर नर-नारायणसे युद्ध करनेके लिये संग्रामभूमिमें आ गये। उन्हें आया देख नारायणने कहा—दैत्येन्द्र! अब हम कल प्रातः युद्ध करेंगे; तुम भी जाओ, इस समय अपना नित्य कर्म करो। अद्भुत पराक्रमी श्रीमन्नारायणके ऐसा कहनेपर प्रह्लाद नैमिषारण्य चले गये और वहाँ अपने नित्य कर्म सम्पन्न किये॥ २६—२९॥ |
| एवं युध्यति देवे च प्रह्लादो ह्यसुरो मुने।<br>रात्रौ चिन्तयते युद्धे कथं जेष्यामि दाम्भिकम्॥ ३०<br><br>एवं नारायणेनाऽसौ सहायुध्यत नारद।<br>दिव्यं वर्षसहस्रं तु दैत्यो देवं न चायजत्॥ ३१<br><br>ततो वर्षसहस्रान्ते ह्यजिते पुरुषोत्तमे।<br>पीतवाससमभ्येत्य दानवो वाक्यमब्रवीत्॥ ३२<br><br>किमर्थं देवदेवेश साध्यं नारायणं हरिम्।<br>विजेतुं नाद्य शक्नोमि एतन्मे कारणं वद॥ ३३ | नारदजी! इस प्रकार भगवान् नारायण एवं दानवेन्द्र प्रह्लाद—दोनोंमें युद्ध चलता रहा। रात्रिमें प्रह्लाद यह विचार किया करते थे कि मैं युद्धमें इन दम्भ करनेवाले ऋषिको कैसे जीतूँगा? नारदजी! इस प्रकार प्रह्लादने भगवान् नारायणके साथ एक हजार दिव्य वर्षोंतक युद्ध किया, परंतु वे उन्हें (नारायणको) जीत न पाये। फिर हजार दिव्य वर्षोंके बीत जानेपर भी पुरुषोत्तम नारायणको न जीत सकनेपर प्रह्लादने वैकुण्ठमें जाकर पीतवस्त्रधारी भगवान् विष्णुसे कहा—देवेश! मैं (सरलतासे) साध्य नारायणको आजतक क्यों न जीत पाया, आप मुझे इसका कारण बतलायें॥ ३०—३३॥ |
| पीतवासा उवाच<br><br>दुर्जयोऽसौ महाबाहुस्त्वया प्रह्लाद धर्मजः।<br>साध्यो विप्रवरो धीमान् मृधे देवासुरैरपि॥ ३४ | इसपर पीतवस्त्रधारी भगवान् विष्णु बोले—<br><br>प्रह्लाद! महाबाहु धर्मपुत्र नारायण तुम्हारे द्वारा दुर्जेय हैं। वे ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ ऋषि परम ज्ञानी हैं। वे सभी देवताओं एवं असुरोंसे भी युद्धमें नहीं जीते जा सकते॥ ३४॥ |
४६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८ प्रह्लाद उवाच यद्यसौ दुर्जयो देव मया साध्यो रणाजिरे। तत्कथं यत्प्रतिज्ञातं तदसत्यं भविष्यति ॥ ३५ हीनप्रतिज्ञो देवेश कथं जीवेत मादृशः । तस्मात्तवाग्रतो विष्णो करिष्ये कायशोधनम् ॥ ३६ पुलस्त्य उवाच इत्येवमुक्त्वा वचनं देवाग्रे दानवेश्वरः । शिरःस्नातस्तदा तस्थौ गृणन् ब्रह्म सनातनम् ॥ ३७ ततो दैत्यपतिं विष्णुः पीतवासाऽब्रवीद्वचः। गच्छ जेष्यसि भक्त्या तं न युद्धेन कथंचन ॥ ३८ प्रह्लाद उवाच मया जितं देवदेव त्रैलोक्यमपि सुव्रत । जितोऽयं त्वत्प्रसादेन शक्रः किमुत धर्मजः ॥ ३९ असौ यद्यजयो देव त्रैलोक्येनापि सुव्रतः । न स्थातुं त्वत्प्रसादेन शक्यं किमु करोम्यज ॥ ४० पीतवासा उवाच सोऽहं दानवशार्दूल लोकानां हितकाम्यया । धर्मं प्रवर्त्तयितुं तपश्चर्यां समास्थितः ॥ ४१ तस्माद्यदिच्छसि जयं तमाराधय दानव । तं पराजेष्यसे भक्त्या तस्माच्छुश्रूष धर्मजम् ॥ ४२ पुलस्त्य उवाच इत्युक्तः पीतवासेन दानवेन्द्रो महात्मना । अब्रवीद्वचनं हृष्टः समाहूयाऽन्धकं मुने ॥ ४३ प्रह्लाद उवाच दैत्याश्च दानवाश्चैव परिपाल्यास्त्वयान्धक । मयोत्सृष्टमिदं राज्यं प्रतीच्छस्व महाभुज ॥ ४४ इत्येवमुक्तो जग्राह राज्यं हैरण्यलोचनिः । प्रह्लादोऽपि तदाऽगच्छत् पुण्यं बदरिकाश्रमम् ॥ ४५ दृष्ट्वा नारायणं देवं नरं च दितिजेश्वरः । कृताञ्जलिपुटो भूत्वा ववन्दे चरणौ तयोः ॥ ४६ तमुवाच महातेजा वाक्यं नारायणोऽव्ययः । किमर्थं प्रणतोऽसीह मामजित्वा महासुर ॥ ४७ प्रह्लादने कहा - देव ! यदि वे साध्यदेव (नारायण) युद्धभूमिमें मुझसे जीते नहीं जा सकते हैं तो मैंने जो प्रतिज्ञा की है, उसका क्या होगा ? वह तो मिथ्या हो जायगी। देवेश ! मुझ-जैसा व्यक्ति हीनप्रतिज्ञ होकर कैसे जीवित रह सकेगा? इसलिये हे विष्णु ! अब मैं आपके सामने अपने शरीरकी शुद्धि करूँगा ॥ ३५-३६ ॥ पुलस्त्यजी बोले - भगवान्से ऐसा कहकर दानवेश्वर प्रह्लाद सिरसे पैरतक स्नानकर वहाँ बैठ गये और 'ब्रह्मगायत्री' का जप करने लगे। उसके बाद पीताम्बरधारी विष्णुने प्रह्लादसे कहा - हाँ, तुम जाओ, तुम उन्हें भक्तिसे जीत सकोगे, युद्धसे कथमपि नहीं ॥ ३७-३८ ॥ प्रह्लादजी बोले- देवाधिदेव ! सुव्रत ! आपकी कृपासे मैंने तीनों लोकों तथा इन्द्रको भी जीत लिया है; इन धर्मपुत्रकी बात ही क्या है? हे अज ! यदि ये सद्व्रती त्रिलोकीसे भी अजेय हैं तथा आपके प्रसादसे भी मैं उनके सामने नहीं ठहर सकता तो फिर मैं क्या करूँ ? ॥ ३९-४० ॥ (इसपर) भगवान् विष्णु बोले - दानवश्रेष्ठ ! वस्तुतः नारायणरूपमें वहाँ मैं ही हूँ। मैं ही जगत्की भलाईकी इच्छासे धर्मप्रवर्तनके लिये उस रूपमें तप कर रहा हूँ। इसलिये प्रह्लाद ! यदि तुम विजय चाहते हो तो मेरे उस रूपकी आराधना करो। तुम नारायणको भक्तिद्वारा ही पराजित कर सकोगे। इसलिये धर्मपुत्र नारायणकी आराधना करो-इसी अर्थमें वे सुसाध्य हैं ॥ ४१-४२ ॥ पुलस्त्यजी बोले - मुने ! भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर प्रह्लाद प्रसन्न हो गये। उन्होंने फिर अन्धकको बुलाकर इस प्रकार कहा ॥ ४३ ॥ प्रह्लादजी बोले - अन्धक ! तुम दैत्यों और दानवोंका प्रतिपालन करो। महाबाहो ! मैं यह राज्य छोड़ रहा हूँ। इसे तुम ग्रहण करो। इस प्रकार कहनेपर जब हिरण्याक्षके पुत्रने राज्यको स्वीकार कर लिया, तब प्रह्लाद पवित्र बदरिकाश्रम चले गये। वहाँ उन्होंने भगवान् नारायण तथा नरको देखकर हाथ जोड़कर उनके चरणोंमें प्रणाम किया। महातेजस्वी भगवान् नारायणने उनसे कहा - महासुर ! मुझे बिना जीते ही अब तुम क्यों प्रणाम कर रहे हो ? ॥ ४४-४७ ॥
अध्याय ८ ] प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय ४७ प्रह्लाद उवाच कस्त्वां जेतुं प्रभो शक्तः कस्वतः पुरुषोऽधिकः । त्वं हि नारायणोऽनन्तः पीतवासा जनार्दनः ॥ ४८ त्वं देवः पुण्डरीकाक्षस्त्वं विष्णुः शार्ङ्गचापधृक् । त्वमव्ययो महेशानः शाश्वतः पुरुषोत्तमः ॥ ४९ त्वां योगिनश्चिन्तयन्ति चार्चयन्ति मनीषिणः । जपन्ति स्नातकास्त्वां च यजन्ति त्वां च याज्ञिकाः ॥ ५० त्वमच्युतो हृषीकेशश्चक्रपाणिर्धराधरः । महामीनो हयशिरास्त्वमेव वरकच्छपः ॥ ५१ हिरण्याक्षरिपुः श्रीमान् भगवनान्थ सूकरः । मत्पितुर्नाशनकरो भवानपि नृकेसरी ॥ ५२ ब्रह्मा त्रिनेत्रोऽमरराड् हुताशः प्रेताधिपो नीरपतिः समीरः । सूर्यो मृगाङ्कोऽचलजङ्गमाद्यो भगवान् विभो नाथ खगेन्द्रकेतो ॥ ५३ त्वं पृथ्वी ज्योतिराकाशं जलं भूत्वा सहस्रशः । त्वया व्याप्तं जगत्सर्वं कस्त्वां जेष्यति माधव ॥ ५४ भक्त्या यदि हृषीकेश तोषमेषि जगद्गुरो । नान्यथा त्वं प्रशक्योऽसि जेतुं सर्वगताव्यय ॥ ५५ भगवानुवाच परितुष्टोऽस्मि ते दैत्य स्तवेनानेन सुव्रत । भक्त्या त्वनन्यया चाहं त्वया दैत्य पराजितः ॥ ५६ पराजितश्च पुरुषो दैत्य दण्डं प्रयच्छति । दण्डार्थं ते प्रदास्यामि वरं वृणु यमिच्छसि ॥ ५७ प्रह्लाद उवाच नारायणं वरं याचे यं त्वं मे दातुमर्हसि । तन्मे पापं लयं यातु शारीरं मानसं तथा ॥ ५८ वाचिकं च जगन्नाथ यत्त्वया सह युध्यतः । नरेण यद्यप्यभवद् वरमेतत्प्रयच्छ मे ॥ ५९ नारायण उवाच एवं भवतु दैत्येन्द्र पापं ते यातु संक्षयम् । द्वितीयं प्रार्थय वरं तं ददामि तवासुर ॥ ६० प्रह्लाद उवाच या या जायेत मे बुद्धिः सा सा विष्णो त्वदाश्रिता । देवार्चने च निरता त्वच्चित्ता त्वत्परायणा ॥ ६१ प्रह्लाद बोले- प्रभो ! आपको भला कौन जीत सकता है ? आपसे बढ़कर कौन हो सकता है ? आप ही अनन्त नारायण पीताम्बरधारी जनार्दन हैं। आप ही कमलनयन शार्ङ्गधनुषधारी विष्णु हैं। आप अव्यय, महेश्वर तथा शाश्वत परम पुरुषोत्तम हैं। योगिजन आपका ही ध्यान करते हैं। विद्वान् पुरुष आपकी ही पूजा करते हैं। वेदज्ञ आपके नामका जप करते हैं तथा याज्ञिकजन आपका यजन करते हैं। आप ही अच्युत, हृषीकेश, चक्रपाणि, धराधर, महामत्स्य, हयग्रीव तथा श्रेष्ठ कच्छप (कूर्म) अवतारी हैं ॥ ४८-५१ ॥ आप हिरण्याक्ष दैत्यका वध करनेवाले ऐश्वर्य- युक्त और भगवान् आदि वाराह हैं। आप ही मेरे पिताको मारनेवाले भगवान् नृसिंह हैं। आप ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण और वायु हैं। हे स्वामिन् ! हे खगेन्द्रकेतु (गरुड़ध्वज) ! आप सूर्य, चन्द्र तथा स्थावर और जंगमके आदि हैं। पृथ्वी, अग्नि, आकाश और जल आप ही हैं। सहस्रों रूपोंसे आपने समस्त जगत्को व्याप्त किया है। माधव ! आपको कौन जीत सकेगा ? जगद्गुरो ! हृषीकेश ! आप भक्तिसे ही संतुष्ट हो सकते हैं। हे सर्वगत ! हे अविनाशिन् ! आप दूसरे किसी भी अन्य प्रकारसे नहीं जीते जा सकते ॥ ५२-५५ ॥ श्रीभगवान् बोले- सुव्रत ! दैत्य ! तुम्हारी इस स्तुतिसे मैं अत्यन्त संतुष्ट हूँ। दैत्य ! अनन्य भक्तिसे तुमने मुझे जीत लिया है। प्रह्लाद ! पराजित पुरुष विजेताको दण्ड (-के रूपमें कुछ) देता है। परंतु मैं तुम्हारे दण्डके बदले तुम्हें वर दूँगा; तुम इच्छित वर माँगो ॥ ५६-५७ ॥ प्रह्लादजी बोले- हे नारायण ! मैं आपसे वर माँग रहा हूँ; आप उसे देनेकी कृपा करें। हे जगन्नाथ ! आपके तथा नरके साथ युद्ध करनेमें मेरे शरीर, मन और वाणीसे जो भी पाप (अपकर्म) हुआ हो वह सब नष्ट हो जाय। आप मुझे यही वर दें ॥ ५८-५९ ॥ नारायणने कहा- दैत्येन्द्र ! ऐसा ही होगा। तुम्हारा पाप नष्ट हो जाय। अब प्रह्लाद ! तुम दूसरा एक वर और माँग लो, मैं उसे भी तुम्हें दूँगा ॥ ६० ॥ प्रह्लादजी बोले- हे भगवन् ! मेरी जो भी बुद्धि हो, वह आपसे ही सम्बद्ध हो, वह देवपूजामें लगी रहे। मेरी बुद्धि, आपका ही ध्यान करे और आपके चिन्तनमें लगी रहे ॥ ६१ ॥
११- सुकेशीकी कथा, मगधारण्यमें ऋषियोंसे प्रश्न करना, ऋषियोंका धर्मोपदेश, देवादिके धर्म, भुवनकोश एवं इक्कीस नरकोंका वर्णन
४८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८ नारायण उवाच एवं भविष्यत्यसुर वरमन्यं यमिच्छसि। तं वृणीष्व महाबाहो प्रदास्याम्यविचारयन् ॥ ६२ प्रह्लाद उवाच सर्वमेव मया लब्धं त्वत्प्रसादादधोक्षज। त्वत्पादपङ्कजाभ्यां हि ख्यातिरस्तु सदा मम ॥ ६३ नारायण उवाच एवमस्त्वपरं चास्तु नित्यमेवाक्षयोऽव्ययः । अजरश्चामरश्चापि मत्प्रसादाद् भविष्यसि ॥ ६४ गच्छस्व दैत्यशार्दूल स्वमावासं क्रियारतः। न कर्मबन्धो भवतो मच्चित्तस्य भविष्यति ॥ ६५ प्रशासयदसून दैत्यान् राज्यं पालय शाश्वतम् । स्वजातिसदृशं दैत्य कुरु धर्ममनुत्तमम् ॥ ६६ पुलस्त्य उवाच इत्युक्तो लोकनाथेन प्रह्लादो देवमब्रवीत् । कथं राज्यं समादास्ये परित्यक्तं जगद्गुरो ॥ ६७ तमुवाच जगत्स्वामी गच्छ त्वं निजमाश्रयम् । हितोपदेष्टा दैत्यानां दानवानां तथा भव ॥ ६८ नारायणेनैवमुक्तः स तदा दैत्यनायकः । प्रणिपत्य विभुं तुष्टो जगाम नगरं निजम् ॥ ६९ दृष्टः सभाजितश्चापि दानवैरन्धकेन च। निमन्त्रितश्च राज्याय न प्रत्यैच्छत्स नारद ॥ ७० राज्यं परित्यज्य महाऽसुरेन्द्रो नियोजयन् सत्पथि दानवेन्द्रान् । ध्यायन् स्मरन् केशवमप्रमेयं तस्थौ तदा योगविशुद्धदेहः ॥ ७१ एवं पुरा नारद दानवेन्द्रो नारायणेनोत्तमपूरुषेण । पराजितश्चापि विमुच्य राज्यं तस्थौ मनो धातरि सन्निवेश्य ॥ ७२ नारायणने कहा— प्रह्लाद ! ऐसा ही होगा। पर हे महाबाहो ! तुम एक और अन्य वर भी, जो तुम चाहो, माँगो। मैं बिना विचारे ही—बिना देय-अदेयका विचार किये ही—वह भी तुम्हें दूँगा ॥ ६२ ॥ प्रह्लादने कहा— अधोक्षज ! आपके अनुग्रहसे मुझे सब कुछ प्राप्त हो गया। आपके चरणकमलोंसे मैं सदा लगा रहूँ और ऐसी ही मेरी प्रसिद्धि भी हो अर्थात् मैं आपके भक्तके रूपमें ही चर्चित होऊँ ॥ ६३ ॥ नारायणने कहा— ऐसा ही होगा। इसके अतिरिक्त मेरे प्रसादसे तुम अक्षय, अविनाशी, अजर और अमर होगे। दैत्यश्रेष्ठ ! अब तुम अपने घर जाओ और सदा (धर्म) कार्यमें रत रहो। मुझमें मन लगाये रखनेसे तुम्हें कर्मबन्धन नहीं होगा। इन दैत्योंपर शासन करते हुए तुम शाश्वत (सदा बने रहनेवाले) राज्यका पालन करो। दैत्य ! अपनी जातिके अनुकूल श्रेष्ठ धर्मोका अनुष्ठान करो ॥ ६४–६६ ॥ पुलस्त्यजी बोले— लोकनाथके ऐसा कहनेपर प्रह्लादने भगवान्से कहा—जगद्गुरो ! अब मैं छोड़े हुए राज्यको कैसे ग्रहण करूँ? इसपर भगवान्ने उनसे कहा—तुम अपने घर जाओ तथा दैत्यों एवं दानवोंको कल्याणकारी बातोंका उपदेश करो। नारायणके ऐसा कहनेपर वे दैत्यनायक (प्रह्लाद) परमेश्वरको प्रणाम कर प्रसन्नतापूर्वक अपने नगर निवास-स्थानको चले गये। नारदजी! अन्धक तथा दानवोंने प्रह्लादको देखा एवं उनका सम्मान किया और उन्हें राज्य स्वीकार करनेके लिये अनुरोधित किया; किंतु उन्होंने राज्य स्वीकार नहीं किया। दैत्येश्वर प्रह्लाद राज्यको छोड़ अपने उपदेशोंसे दानव-श्रेष्ठोंको शुभ मार्गमें नियोजित तथा भगवान् नारायणका ध्यान और स्मरण करते हुए योगके द्वारा शुद्ध शरीर होकर विराजित हुए। नारदजी ! इस प्रकार पहले पुरुषोत्तम नारायणद्वारा पराजित दानवेन्द्र प्रह्लाद राज्य छोड़कर भगवान् नारायणके ध्यानमें लीन होकर शान्त एवं सुस्थिर हुए थे ॥ ६७-७२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८ ॥
अध्याय ९ ] अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन [ ४९
नवाँ अध्याय
अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नारद उवाच<br>नेत्रहीनः कथं राज्ये प्रह्लादेनान्धको मुने।<br>अभिषिक्तो जानताऽपि राजधर्मं सनातनम्॥ १ | **नारदजीने कहा—**मुने! प्रह्लादजी सनातन राजधर्मको भलीभाँति जानते थे। ऐसी दशामें उन्होंने नेत्रहीन अन्धकको राजगद्दीपर कैसे बैठाया ? ॥ १ ॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>लब्धचक्षुरसौ भूयो हिरण्याक्षेऽपि जीवति।<br>ततोऽभिषिक्तो दैत्येन प्रह्लादेन निजे पदे॥ २ | **पुलस्त्यजी बोले—**हिरण्याक्षके जीवनकालमें ही अन्धकको पुनः दृष्टि प्राप्त हो गयी थी, अतः दैत्यवर्य प्रह्लादने उसे अपने पदपर अभिषिक्त किया था ॥ २ ॥ |
| नारद उवाच<br>राज्येऽन्धकोऽभिषिक्तस्तु किमाचरत सुव्रत।<br>देवादिभिः सह कथं समास्ते तद् वदस्व मे॥ ३ | **नारदजीने पूछा—**सुव्रत! मुझे यह बतलाइये कि अन्धकने राज्यपर अभिषिक्त होनेपर क्या-क्या किया तथा वह देवताओं आदिके साथ कैसा व्यवहार करता था ॥ ३ ॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>राज्येऽभिषिक्तो दैत्येन्द्रो हिरण्याक्षसुतोऽन्धकः।<br>तपसाराध्य देवेशं शूलपाणिं त्रिलोचनम्॥ ४<br><br>अजेयत्वमवध्यत्वं सुरसिद्धर्षिपन्नगैः।<br>अदाह्यत्वं हुताशेन अक्लेद्यत्वं जलेन च॥ ५<br><br>एवं स वरलब्धस्तु दैत्यो राज्यमपालयत्।<br>शुक्रं पुरोहितं कृत्वा समध्यास्ते ततोऽन्धकः॥ ६<br><br>ततश्चक्रे समुद्योगं देवानामान्धकोऽसुरः।<br>आक्रम्य वसुधां सर्वां मनुजेन्द्रान् पराजयत्॥ ७ | **पुलस्त्यजी बोले—**हिरण्याक्षके पुत्र दैत्यराज अन्धकने राज्य प्राप्त करके तपस्याद्वारा शूलपाणि भगवान् शंकरकी आराधना की और उनसे देवता, सिद्ध, ऋषि एवं नागोंद्वारा नहीं जीते जाने और नहीं मारे जानेका वर प्राप्त कर लिया। इसी प्रकार वह अग्निके द्वारा न जलने, जलसे न भीगने आदिका भी वरदान प्राप्त कर राज्यका संचालन कर रहा था। उसने शुक्राचार्यको अपना पुरोहित बना लिया था। फिर अन्धकासुरने देवताओंको जीतनेका उपक्रम (आरम्भ) किया और उन्हें जीतकर सम्पूर्ण पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया—सभी श्रेष्ठ राजाओंको परास्त कर दिया॥ ४—७॥ |
| पराजित्य महीपालान् सहायार्थे नियोज्य च।<br>तैः समं मेरुशिखरं जगामाद्भुतदर्शनम्॥ ८<br><br>शक्रोऽपि सुरसैन्यानि समुद्योज्य महागजम्।<br>समारुह्यामरावत्यां गुप्तिं कृत्वा विनिर्ययौ॥ ९<br><br>शक्रस्यानु तथैवान्ये लोकपाला महौजसः।<br>आरुह्य वाहनं स्वं स्वं सायुधा निर्ययुर्बहिः॥ १०<br><br>देवसेनाऽपि च समं शक्रेणाद्भुतकर्मणा।<br>निर्जगामातिवेगेन गजवाजिरथादिभिः॥ ११ | उसने सभी राजाओंको पराजित कर उन्हें (सामन्त बनाकर) अपनी सहायतामें नियुक्त कर दिया। फिर उनके साथ वह सुमेरुगिरि पर्वतको देखनेके लिये उसके अद्भुत शिखरपर गया। इधर इन्द्र भी देवसेनाको तैयारकर और अमरावतीमें सुरक्षाकी व्यवस्था कर अपने ऐरावत हाथीपर सवार होकर युद्धके लिये बाहर निकले। इसी प्रकार दूसरे तेजस्वी लोकपालगण भी अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर तथा अपने अस्त्र लेकर इन्द्रके पीछे-पीछे चल पड़े। हाथी, घोड़े, रथ आदिसे युक्त देवसेना भी बड़े अद्भुत पराक्रमी इन्द्रके साथ तेजीसे |
| ५० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अग्रतो द्वादशादित्याः पृष्ठतश्च त्रिलोचनाः ।<br>मध्येऽष्टौ वसवो विश्वे साध्याश्चिमरुतां गणाः ।<br>यक्षविद्याधराद्याश्च स्वं स्वं वाहनमास्थिताः ॥ १२ | निकल पड़ी। सेनाके आगे-आगे बारहोंने आदित्य और उनके पृष्ठभागमें ग्यारह रुद्रगण थे। उसके मध्यमें आठों वसु, तेरहों विश्वेदेव, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, यक्ष, विद्याधर आदि अपने-अपने वाहनपर सवार होकर चल रहे थे॥ ८—१२॥ |
| नारद उवाच<br>रुद्रादीनां वदस्वेह वाहनानि च सर्वशः ।<br>एकैकस्यापि धर्मज्ञ परं कौतूहलं मम ॥ १३ | नारदजीने पूछा— धर्मज्ञ! रुद्र आदिके वाहनोंका एक-एक कर पूरी तरह वर्णन कीजिये। इस विषयमें मुझे बड़ी उत्सुकता हो रही है॥ १३॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>शृणुष्व कथयिष्यामि सर्वेषामपि नारद ।<br>वाहनानि समासेन एकैकस्यानुपूर्वशः ॥ १४<br>रुद्रहस्ततलोत्पन्नो महावीर्यो महाजवः ।<br>श्वेतवर्णो गजपतिर्देवराजस्य वाहनम् ॥ १५<br>रुद्रोरुसंभवो भीमः कृष्णवर्णो मनोजवः ।<br>पौण्ड्रको नाम महिषो धर्मराजस्य नारद ॥ १६<br>रुद्रकर्णमलोद्भूतः श्यामो जलधिसंज्ञकः ।<br>शिशुमारो दिव्यगतिः वाहनं वरुणस्य च ॥ १७<br>रौद्रः शकटचक्राक्षः शैलाकारो नरोत्तमः ।<br>अम्बिकापादसंभूतो वाहनं धनदस्य तु ॥ १८ | पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! सुनिये; मैं एक-एक करके क्रमशः सभी देवताओंके वाहनोंका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ। रुद्रके करतलसे उत्पन्न अति पराक्रमवाला, अति तीव्रगतिवाला, श्वेतवर्णका ऐरावत हाथी देवराज (इन्द्र)-का वाहन है। हे नारद! रुद्रके ऊरुसे उत्पन्न भयंकर कृष्णवर्णवाला एवं मनके सदृश गतिमान् पौण्ड्रक नामक महिष धर्मराजका वाहन है। रुद्रके कर्ण-मलसे उत्पन्न श्यामवर्णवाला दिव्यगतिशील जलधि नामक शिशुमार (सूँस) वरुणका वाहन है। अम्बिकाके चरणोंसे उत्पन्न गाड़ीके चक्केके समान भयंकर आँखवाला, पर्वताकार नरोत्तम कुबेरका वाहन है॥ १४-१८॥ |
| एकादशानां रुद्राणां वाहनानि महामुने ।<br>गन्धर्वाश्च महावीर्या भुजगेन्द्राश्च दारुणाः ।<br>श्वेतानि सौरभेयाणि वृषाण्युग्रजवानि च ॥ १९<br>रथं चन्द्रमसश्चार्द्धसहस्रं हंसवाहनम् ।<br>हरयो रथवाहाश्च आदित्या मुनिसत्तम ॥ २०<br>कुञ्जरस्थाश्च वसवो यक्षाश्च नरवाहनाः ।<br>किन्नरा भुजगारूढा हयारूढौ तथाश्विनौ ॥ २१<br>सारङ्गाधिष्ठिता ब्रह्मन् मरुतो घोरदर्शनाः ।<br>शुकारूढाश्च कवयो गन्धर्वाश्च पदातिनः ॥ २२ | हे महामुने! एकादश रुद्रोंके वाहन महापराक्रमशाली गन्धर्वगण, भयंकर सर्पराजगण तथा सुरभिके अंशसे उत्पन्न तीव्रगतिवाले सफेद बैल हैं। मुनिश्रेष्ठ! चन्द्रमाके रथको खींचनेवाले आधे हजार (पाँच सौ) हंस हैं। आदित्योंके रथके वाहन घोड़े हैं। वसुओंके वाहन हाथी, यक्षोंके वाहन नर, किन्नरोंके वाहन सर्प एवं अश्विनीकुमारोंके वाहन घोड़े हैं। ब्रह्मन्! भयंकर दीखनेवाले मरुद्गणोंके वाहन हरिण हैं, भृगुओंके वाहन शुक हैं और गन्धर्वलोग पैदल ही चलते हैं॥ १९—२२॥ |
| आरुह्य वाहनान्येवं स्वानि स्वान्यमरोत्तमाः ।<br>संनह्य निर्ययुर्हृष्टा युद्धाय सुमहौजसः ॥ २३ | इस प्रकार बड़े तेजस्वी श्रेष्ठ देवगण अपने-अपने वाहनोंपर आरूढ़ एवं संनद्ध (तैयार) होकर प्रसन्नतापूर्वक युद्धके लिये निकल पड़े॥ २३॥ |
| नारद उवाच<br>गदितानि सुरादीनां वाहनानि त्वया मुने ।<br>दैत्यानां वाहनान्येवं यथावद् वक्तुमर्हसि ॥ २४ | नारदने कहा— मुने! आपने देवादिकोंके वाहनोंका वर्णन किया; इसी प्रकार अब असुरोंके वाहनोंका भी यथावत् वर्णन करें॥ २४॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>शृणुष्व दानवादीनां वाहनानि द्विजोत्तम ।<br>कथयिष्यामि तत्त्वेन यथावच्छ्रोतुमर्हसि ॥ २५ | पुलस्त्यजी बोले— द्विजोत्तम! (अब) दानवोंके वाहनको सुनो। मैं तत्त्वतः उनका ठीक-ठीक वर्णन करता हूँ। अन्धकका अलौकिक रथ कृष्णवर्णके श्रेष्ठ |
अध्याय ९ ] अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन ५१ अन्धकस्य रथो दिव्यो युक्तः परमवाजिभिः । कृष्णवर्णैः सहस्रारस्त्रिनल्वपरिमाणवान् ॥ २६ प्रह्लादस्य रथो दिव्यश्चन्द्रवर्णैर्हयोत्तमैः । उह्यमानस्तथाष्टाभिः श्वेतरुक्ममयः शुभः ॥ २७ विरोचनस्य च गजः कुजम्भस्य तुरंगमः । जम्भस्य तु रथो दिव्यो हयैः काञ्चनसंनिभैः ॥ २८ शङ्कुकर्णस्य तुरगो हयग्रीवस्य कुञ्जरः । रथो मयस्य विख्यातो दुन्दुभेश्च महोरगः । शम्बरस्य विमानोऽभूदयःशङ्कोर्मृगाधिपः ॥ २९ बलवृत्रौ च बलिनौ गदामुसलधारिणौ । पद्भ्यां दैवतसैन्यानि अभिद्रवितुमुद्यतौ ॥ ३० ततो रणोऽभूत् तुमुलः संकुलोऽतिभयंकरः । रजसा संवृतो लोको पिङ्गवर्णेन नारद ॥ ३१ नाज्ञासीच्च पिता पुत्रं न पुत्रः पितरं तथा । स्वानेवान्ये निजघ्नुर्वै परानन्ये च सुव्रत ॥ ३२ अभिद्रुतो महावेगो रथोपरि रथस्तदा । गजो मत्तगजेन्द्रं च सादी सादिनमभ्यगात् ॥ ३३ पदातिरपि संक्रुद्धः पदातिनमथोल्बणम् । परस्परं तु प्रत्यघ्ननन्योन्यजयकाङ्क्षिणः ॥ ३४ ततस्तु संकुले तस्मिन् युद्धे दैवासुरे मुने । प्रावर्तत नदी घोरा शमयन्ती रणाद्रजः ॥ ३५ शोणितोदा रथावर्त्ता योधसंघट्टवाहिनी । गजकुम्भमहाकूर्मा शरमीना दुरत्यया ॥ ३६ तीक्ष्णाग्रप्रासमकरा महासिग्राहवाहिनी । अन्त्रशैवालसंकीर्णा पताकाफेनमालिनी ॥ ३७ गृध्रकङ्कमहाहंसा श्येनचक्राह्वमण्डिता । वनवायसकादम्बा गोमायुश्वापदाकुला ॥ ३८ पिशाचमुनिसंकीर्णा दुस्तरा प्राकृतैर्जनैः । रथप्लवैः संतरन्तः शूरास्तां प्रजगाहिरे ॥ ३९ आगुल्फादवमज्जन्तः सूदयन्तः परस्परम् । समुत्तरन्तो वेगेन योधा जयधनेप्सवः ॥ ४० अश्वोंसे परिचालित होता था। वह हजार अरों- पहियेकी नाभि और नेमिके बीचकी लकड़ियोंसे युक्त बारह सौ हाथोंका परिमाणवाला था। प्रह्लादका दिव्य रथ सुन्दर एवं सुवर्ण-रजत-मण्डित था। उसमें चन्द्रवर्णवाले आठ उत्तम घोड़े जुते हुए थे। विरोचनका वाहन हाथी था एवं कुजम्भ घोड़ेपर सवार था। जम्भका दिव्य रथ स्वर्णवर्णके घोड़ोंसे युक्त था ॥ २५-२८॥ इसी प्रकार शंकुकर्णका वाहन घोड़ा, हयग्रीवका हाथी और मय दानवका वाहन दिव्य रथ था। दुन्दुभिका वाहन विशाल नाग था। शम्बर विमानपर चढ़ा हुआ था तथा अयःशंकु सिंहपर सवार था। गदा और मुसलधारी बलवान् बल और वृत्र पैदल थे; पर देवताओंकी सेनापर चढ़ाई करनेके लिये उद्यत थे। फिर अति भयङ्कर घमासान युद्ध प्रारम्भ हो गया। नारदजी! समस्त लोक पीली धूलसे ढक गया, जिससे पिता पुत्रको और पुत्र पिताको भी परस्पर एक-दूसरेको पहचान नहीं पाते थे। सुव्रत ! कुछ लोग अपने ही पक्षके लोगोंको तथा कुछ लोग विरोधी पक्षके लोगोंको मारने लगे ॥ २९-३२॥ उस युद्धमें रथके ऊपर रथ और हाथीके ऊपर हाथी टूट पड़े तथा घुड़सवार घुड़सवारोंकी ओर वेगसे आक्रमण करने लगे। इसी प्रकार पादचारी (पैदल) सैनिक क्रुद्ध होकर अन्य बलशाली पैदलोंपर चढ़ बैठे। इस प्रकार एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे सभी परस्पर प्रहार करने लगे। मुने! उसके बाद देवताओं और असुरोंके उस घोर संग्राममें युद्धसे उत्पन्न धूलिको शान्त करती हुई रक्तरूपी जलधारावाली एवं रथरूपी भँवरवाली और योद्धाओंके समूहको बहा ले जानेवाली एवं गजकुम्भरूपी महान् कूर्म तथा शररूपी मीनसे युक्त बड़ी भारी नदी बह चली ॥ ३३-३६ ॥ उस नदीमें तेज धारवाले प्रास (एक प्रकारका अस्त्र) ही मकर थे, बड़ी-बड़ी तलवारें ही ग्राह थीं, उसमें आँतें ही शैवाल, पताका ही फेन, गृध्र एवं कङ्क पक्षी महाशंख, बाज ही चक्रवाक और जंगली कौवे ही मानो कलहंस थे। वह नदी शृगालरूपी हिंस्र एवं पिशाचरूपी मुनियोंसे संकीर्ण थी और साधारण मनुष्योंसे दुस्तर थी। जयरूप धनकी इच्छावाले शूर योद्धा लोग घुटनोंतक डूबते और एक-दूसरेको मारते हुए रथरूपी नौकाओंद्वारा उस नदीको वेगसे पार कर रहे थे ॥ ३७-४० ॥
१२- सुकेशीका नरक देनेवाले कर्मोंके सम्बन्धमें प्रश्न, ऋषियोंका उत्तर और नरकोंका वर्णन
५२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ९ ततस्तु रौद्रे सुरदैत्यसादने वह युद्ध डरपोकोंके लिये भयावना, देवों एवं महाहवे भीरुभयंकरेऽथ। दैत्योंका संहार करनेवाला तथा वस्तुतः अत्यन्त भयंकर रक्षांसि यक्षाश्च सुसंप्रहृष्टाः था। उसमें यक्ष और राक्षस लोग अत्यन्त आनन्दित पिशाचयूथास्त्वभिरेमिरे च॥४१ हो रहे थे। पिशाचोंका समूह भी प्रसन्न था। वे पिबन्त्यसृग्गाढतरं भटाना- वीरोंके गाढ़े रुधिरका पान करते थे तथा (उनके मालिङ्ग्य मांसानि च भक्षयन्ति। शवोंका) आलिंगन कर मांसका भक्षण करते थे। वसां विल्लुम्पन्ति च विस्फुरन्ति पक्षी चर्बीको नोचते और उछलते थे एवं एक- गर्जन्त्यथान्योन्यमथो वयांसि ॥ ४२ दूसरेके प्रति गर्जन करते थे। सियारिनें 'फेत्कार' मुञ्चन्ति फेत्काररवाञ्शिवाश्च शब्द कर रही थीं, भूमिपर पड़े हुए वेदनासे दुःखी क्रन्दन्ति योधा भुवि वेदनात्र्ताः। योद्धा कराह रहे थे। कुछ लोग शस्त्रसे आहत शस्त्रप्रतप्ता निपतन्ति चान्ये होकर गिर रहे थे। युद्धभूमि मरघटके समान हो युद्धं श्मशानप्रतिमं बभूव ॥ ४३ गयी थी। सियारिनोंके भयंकर शब्दसे युक्त देवासुर- तस्मिञ्शिवाघोररवे प्रवृत्ते संग्राम ऐसा लगता था, मानो युद्धमें निपुण योद्धा सुरासुराणां सुभयंकरे ह। लोग शस्त्ररूपी पाशा लेकर अपने प्राणोंकी बाजी युद्धं बभौ प्राणपणोपविद्धं द्वन्द्वेऽतिशस्त्राक्षगतो दुरोदरः ॥ ४४ लगाते हुए जुआ खेल रहे हैं॥ ४१-४४॥ हिरण्यचक्षुस्तनयो रणेऽन्धको हिरण्याक्षका पुत्र अन्धक हजारों घोड़ोंसे रथे स्थितो वाजसहस्रयोजिते। युक्त रथपर आरूढ़ होकर मतवाले हाथीकी पीठपर मत्तेभपृष्ठस्थितमुग्रतेजसं स्थित महातेजस्वी देवराज इन्द्रके साथ जा भिड़ा। समेयिवान् देवपतिं शतक्रतुम् ॥ ४५ समापतन्तं महिषाधिरूढं इधर आठ घोड़ोंसे युक्त रथपर आरूढ़ अस्त्र यमं प्रतीच्छद् बलवान् दितीशः। उठाये बलवान् दैत्यराज प्रह्लादने महिषपर सवार प्रह्लादनामा तुरगाष्टयुक्तं यमराजका सामना किया। नारदजी! उधर विरोचन रथं समास्थाय समुद्यतास्त्रः ॥ ४६ वरुणदेवसे युद्ध करनेके लिये आगे बढ़ा तथा विरोचनश्चापि जलेश्वरं त्वगा- जम्भ बलशाली कुबेरकी ओर चला। शम्बर ज्जम्भस्त्वथागाद् धनदं बलाढ्यम्। वायुदेवताके सामने जा खड़ा हुआ एवं मय अग्निके वायुं समभ्येत्य च शम्बरोऽथ साथ युद्ध करने लगा। हयग्रीव आदि अन्यान्य मयो हुताशं युयुधे मुनीन्द्र ॥ ४७ अन्ये हयग्रीवमुखा महाबला महाबलवान् दैत्य तथा दानव अग्नि, सूर्य, अष्ट दितेस्तनूजा दनुपुङ्गवाश्च। वसुओं तथा शेषनाग आदि देवताओंके साथ द्वन्द्वयुद्ध सुरान् हुताशार्कवसूरगेश्वरान् करने लगे ॥ ४५-४८ ॥ द्वन्द्वं समासाद्य महाबलान्विताः ॥ ४८ गर्जन्त्यथान्योन्यमुपेत्य युद्धे वे एक-दूसरेके साथ युद्ध करते हुए भीषण चापानि कर्षन्त्यतिवेगिताश्च। गर्जन कर रहे थे। वे वेगपूर्वक धनुष चढ़ा करके मुञ्चन्ति नाराचगणान् सहस्रश हजारों बाणोंकी झड़ी लगाकर कहने लगे-अरे! आगच्छ हे तिष्ठसि किं ब्रुवन्तः ॥ ४९ आओ, आओ, रुक क्यों गये। तेज बाणोंकी वर्षा शरैस्तु तीक्ष्णैरतितापयन्तः शस्त्रैरमोघैरभिताडयन्तः । करते हुए तथा अमोघ शस्त्रोंसे प्रहार करते हुए
अध्याय १० ] अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय ५३
| मन्दाकिनीवेगनिभां वहन्तीं<br>प्रवर्तयन्तो भयदां नदीं च ॥ ५०<br>त्रैलोक्यमाकांक्षिभिरुग्रवेगैः<br>सुरासुरैर्नारद संप्रयुद्धे।<br>पिशाचरक्षोगणपुष्टिवर्धनी-<br>मुत्तर्तुमिच्छद्भिरसृग्नदी बभौ ॥ ५१<br>वाद्यन्ति तूर्याणि सुरासुराणां<br>पश्यन्ति खस्था मुनिसिद्धसंघाः।<br>नयन्ति तानप्सरसां गणाग्र्या<br>हता रणे येऽभिमुखास्तु शूराः ॥ ५२ | उन लोगोंने गङ्गाके समान तीव्र वेगसे प्रवाहित होनेवाली, (किंतु) भयंकर नदीको प्रवर्तित कर दिया। नारदजी! उस युद्धमें तीनों लोकोंको चाहनेवाले उग्रवेगशाली देवता एवं असुरगण पिशाचों एवं राक्षसोंकी पुष्टि बढ़ानेवाली शोणित-सरिताको पार करनेकी इच्छा कर रहे थे। उस समय देवता और दानवोंके बाजे बज रहे थे। आकाशमें स्थित मुनियों और सिद्धोंके समूह उस युद्धको देख रहे थे। जो वीर उस युद्धमें सम्मुख मारे गये थे, उन्हें अप्सराएँ सीधे स्वर्गमें लिये चली जा रही थीं॥ ४९–५२॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें नवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९ ॥
दसवाँ अध्याय
अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय
| पुलस्त्य उवाच<br>ततः प्रवृत्ते संग्रामे भीरूणां भयवर्धने।<br>सहस्त्राक्षो महाचापमादाय व्यसृजच्छरान् ॥ १<br>अन्धकोऽपि महावेगं धनुराकृष्य भास्वरम्।<br>पुरंदराय चिक्षेप शरान् बर्हिणवाससः ॥ २<br>तावन्योन्यं सुतीक्ष्णाग्रैः शरैः संनतपर्वभिः।<br>रुक्मपुङ्खैर्महावेगैराजघ्नतुरुभावपि ॥ ३<br>ततः क्रुद्धः शतमखः कुलिशं भ्राम्य पाणिना।<br>चिक्षेप दैत्यराजाय तं ददर्श तथान्धकः ॥ ४<br>आजघान च बाणौघैरस्त्रैः शस्त्रैः स नारद।<br>तान् भस्मसात्तदा चक्रे नगानिव हुताशनः ॥ ५ | पुलस्त्यजी बोले— तत्पश्चात् भीरुओंके लिये भय बढ़ानेवाला समर आरम्भ हो गया। हजार नेत्रोंवाले इन्द्र अपने विशाल धनुषको लेकर बाणोंकी वर्षा करने लगे। अन्धक भी अपने दीप्तिमान् धनुषको लेकर बड़े वेगसे मयूरपंख लगे बाणोंको इन्द्रपर छोड़ने लगा। वे दोनों एक-दूसरेको झुके हुए पर्वोंवाले स्वर्णपंखयुक्त तथा महावेगवान् तीक्ष्ण बाणोंसे आहत कर दिये। फिर इन्द्रने क्रुद्ध होकर वज्रको अपने हाथसे घुमाकर उसे अन्धकके ऊपर फेंका। नारदजी! अंधकने उसे आते देखा। उसने बाणों, अस्त्रों और शस्त्रोंसे उसपर प्रहार किया; पर अग्नि जिस प्रकार वनों, पर्वतों (या वृक्षों)-को भस्म कर देती है, उसी प्रकार उस वज्रने उन सभी अस्त्रोंको भस्म कर डाला॥ १–५॥ |
| ततोऽतिवेगिनं वज्रं दृष्ट्वा बलवतां वरः।<br>समाप्लुत्य रथात्तस्थौ भुवि बाहुसहायवान् ॥ ६<br>रथं सारथिना सार्धं साश्वध्वजसकूबरम्।<br>भस्म कृत्वाथ कुलिशमन्धकं समुपाययौ ॥ ७<br>तमापतन्तं वेगेन मुष्टिनाहत्य भूतले।<br>पातयामास बलवाञ्जगर्ज च तदाऽन्धकः ॥ ८ | तब बलवानोंमें श्रेष्ठ अन्धक अति वेगवान् वज्रको आते देखकर रथसे कूदकर बाहुबलका आश्रय लेकर पृथ्वीपर खड़ा हो गया। वह वज्र, सारथि, अश्व, ध्वजा एवं कूबरके साथ रथको भस्मकर इन्द्रके पास पहुँच गया। उस (वज्र)-को वेगपूर्वक आते देख बलवान् अन्धकने मुष्टिसे मारकर उसे भूमिपर गिरा दिया और गर्जन करने लगा॥ ६–८॥ |
५४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १० तं गर्जमानं वीक्ष्याथ वासवः सायकैर्दृढम् । ववर्ष तान् वारयन् स समभ्यायाच्छतक्रतुम् ॥ ९ आजघान त लेनेभं कुम्भमध्ये पदा करे। जानुना च समाहत्य विषाणं प्रभभञ्ज च ॥ १० वाममुष्ट्या तथा पार्श्वं समाहत्यान्धकस्त्वरन् । गजेन्द्रं पातयामास प्रहारैर्जर्जरीकृतम् ॥ ११ गजेन्द्रात् पतमानाच्च अवप्लुत्य शतक्रतुः । पाणिना वज्रमादाय प्रविवेशामरावतीम् ॥ १२ पराङ्मुखे सहस्त्राक्षे तद् दैवतबलं महत् । पातयामास दैत्येन्द्रः पादमुष्टितलादिभिः ॥ १३ ततो वैवस्वतो दण्डं परिभ्राम्य द्विजोत्तम । समभ्यधावत् प्रह्लादं हन्तुकामः सुरोत्तमः ॥ १४ तमापतन्तं बाणौघैर्ववर्ष रविनन्दनम् । हिरण्यकशिपोः पुत्रश्चापमानम्य वेगवान् ॥ १५ तां बाणवृष्टिमतुलां दण्डेनाहत्य भास्करिः। शातयित्वा प्रचिक्षेप दण्डं लोकभयंकरम् ॥ १६ स वायुपथमास्थाय धर्मराजकरे स्थितः । जज्वाल कालाग्निनिभो यद्वद् दग्धुं जगत्त्रयम् ॥ १७ जाज्वल्यमानमायान्तं दण्डं दृष्ट्वा दितेः सुताः । प्राक्रोशन्ति हतः कष्टं प्रह्लादोऽयं यमेन हि ॥ १८ तमाक्रन्दितमाकर्ण्य हिरण्याक्षसुतोऽन्धकः । प्रोवाच मा भैष्ट मयि स्थिते कोऽयं सुराधमः ॥ १९ इत्येवमुक्त्वा वचनं वेगेनाभिससार च। जग्राह पाणिना दण्डं हसन् सव्येन नारद ॥ २० तमादाय ततो वेगाद् भ्रामयामास चान्धकः। जगर्ज च महानादं यथा प्रावृषि तोयदः ॥ २१ प्रह्लादं रक्षितं दृष्ट्वा दण्डाद् दैत्येश्वरेण हि । साधुवादं ददुर्हष्टा दैत्यदानवयूथपाः ॥ २२ भ्रामयन्तं महादण्डं दृष्ट्वा भानुसुतो मुने। दुःसहं दुर्धरं मत्वा अन्तर्धानमगाद् यमः ॥ २३ अन्तर्हिते धर्मराजे प्रह्लादोऽपि महामुने । दारयामास बलवान् देवसैन्यं समन्ततः ॥ २४ वरुणः शिशुमारस्थो बद्ध्वा पाशैर्महासुरान् । गदया दारयामास तमभ्यगाद् विरोचनः ॥ २५ उसे इस प्रकार गरजते देखकर इन्द्रने उसके ऊपर जोरोंसे बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी। अन्धक भी उनको निवारित करते हुए इन्द्रके पास पहुँच गया। उसने अपने हाथसे ऐरावत हाथीके सिरपर एवं अपने पैरसे सूँड़पर प्रहार कर और घुटनोंसे दाँतोंपर प्रहार कर उन्हें तोड़ डाला। फिर अन्धकने बायीं मुट्ठीसे ऐरावतकी कमरपर शीघ्रतापूर्वक चोट मारकर उसे जर्जर कर गिरा दिया। इन्द्र भी हाथीसे नीचे गिरे जा रहे थे। वे झटसे कूदकर एवं हाथमें वज्र लेकर अमरावतीमें प्रविष्ट हो गये ॥ ९-१२॥ इन्द्रके रणसे विमुख हो जानेपर अन्धकने उस विशाल देव-सेनाको पैर, मुट्ठी एवं थप्पड़ों आदिसे मारकर गिरा दिया। नारदजी ! इसके बाद देवश्रेष्ठ यमराज अपना दण्ड घुमाते हुए प्रह्लादको मारनेकी इच्छासे दौड़ पड़े। यमराजको अपनी ओर आते देख प्रह्लादने भी अपने धनुषको चढ़ाकर फुर्तीसे बाण-समूहोंकी झड़ी लगा दी। यमराजने अपने दण्डके प्रहारसे उस अतुलनीय बाण-वृष्टिको व्यर्थ कर लोकभयकारी दण्ड चला दिया ॥ १३-१६॥ धर्मराजके हाथमें स्थित वह दण्ड हवामें ऊपर घूम रहा था। वह ऐसा लगता था मानो तीनों लोकोंको जलानेके लिये कालाग्नि प्रज्वलित हो रही हो। उस प्रज्वलित दण्डको अपनी ओर आते देखकर दैत्यलोग चिल्लाने लगे- हाय ! हाय ! यमराजने प्रह्लादको मार दिया। उस आक्रन्दनको सुनकर हिरण्याक्षके पुत्र अन्धकने कहा- डरो मत। मेरे रहते ये यमराज क्या वस्तु हैं? नारदजी! ऐसा कहकर वह वेगसे दौड़ पड़ा और हँसते हुए उस दण्डको बायें हाथसे पकड़ लिया ॥ १७-२० ॥ फिर अन्धक उसे लेकर घुमाने लगा और साथ ही वर्षाकालिक मेघके तुल्य वह महानाद करते हुए गर्जन करने लगा। अन्धकके द्वारा यम-दण्डसे प्रह्लादको सुरक्षित देखकर दैत्यों एवं दानवोंके सेनानायक प्रसन्न होकर उसे धन्यवाद देने लगे। मुने! अपने महादण्डको अन्धकद्वारा घुमाते देख सूर्यनय यम दैत्यको दुःसह और दुर्धर समझकर अन्तर्धान हो गये। महामुने! धर्मराजके अन्तर्हित होनेपर अब बली प्रह्लाद भी सभी ओरसे देवसेनाको नष्ट करने लगे ॥ २१-२४॥ वरुणदेव सूँसपर स्थित थे। वे प्रबल असुरोंको अपने पाशोंसे बाँधकर गदाद्वारा विदीर्ण करने लगे। इसपर विरोचनने उनका सामना किया।
अध्याय १०] अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय ५५ तोमरैर्वज्रसंस्पर्शैः शक्तिभिर्मार्गणैरपि। उसने वज्रतुल्य तोमर, शक्ति, बाण, मुद्गर और कणपों* जलेशं ताडयामास मुद्गरैः कणपैरपि ॥ २६ (भल्लों)-से वरुणदेवपर प्रहार किया। इसपर वरुणने उसके निकट जाकर गदासे मारकर उन्हें पृथ्वीपर गिरा ततस्तं गदयाभ्येत्य पातयित्वा धरातले। दिया। फिर दौड़कर उन्होंने पाशोंसे उसके मतवाले अभिद्रुत्य बबन्धाथ पाशैर्मत्तगजं बली ॥ २७ हाथीको बाँध लिया। पर अन्धकने तुरन्त ही उन पाशोंके सैकड़ों टुकड़े कर दिये। नारदजी! इतना ही तान् पाशशतधा चक्रे वेगाच्च दनुजेश्वरः। नहीं, उसने वरुणके निकट जाकर उनकी कमर भी वरुणं च समभ्येत्य मध्ये जग्राह नारद ॥ २८ पकड़ ली ॥ २५-२८ ॥ ततो दन्ती च शृङ्गाभ्यां प्रचिक्षेप तदाऽव्ययः। उस हाथीने भी अपने प्रबल दाँतोंसे वरुणको ममर्द च तथा पद्भ्यां सवाहं सलिलेश्वरम् ॥ २९ उठाकर फेंक दिया। साथ ही वह वाहनसहित वरुणको तं मर्द्यमानं वीक्ष्याथ शशाङ्कः शिशिरांशुमान्। अपने पैरोंसे कुचलने लगा। यह देख शीतकिरण अभ्येत्य ताडयामास मार्गणैः कायदारणैः ॥ ३० चन्द्रमाने हाथीके पास पहुँचकर अपने तेज नुकीले स ताड्यमानः शिशिरांशुबाणै- बाणोंसे उसके शरीरको विदीर्ण कर दिया। चन्द्रमाके रवाप पीडां परमां गजेन्द्रः। बाणोंसे विद्ध होनेपर अन्धकके हाथीको अत्यधिक दुष्टश्च वेगात् पयसामधीशं पीड़ा हुई। वह अपने पैरोंसे वरुणको तेजीसे बार-बार मुहुर्मुहुः पादतर्लैममर्द ॥ ३१ कुचलने लगा। नारदजी! वरुणदेवने भी हाथीके दोनों स मृद्यमानो वरुणो गजेन्द्रं पैरोंको दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया एवं अपने हाथों तथा पद्भ्यां सुगाढं जगृहे महर्षे। पैरोंसे भूमिको स्पर्श करते हुए मस्तक उठाकर बलपूर्वक पादेषु भूमिं करयोः स्पृशंश्च अङ्गुलियोंसे उस हाथीकी पूँछ पकड़ ली और सर्पराज मूर्द्धानमुल्लाल्य बलान्महात्मा ॥ ३२ वासुकिसे विरोचनको बाँधकर उसे हाथी और पिलवानके गृह्याङ्गुलीभिंश्च गजस्य पुच्छं सहित उठाकर आकाशमें फेंक दिया ॥ २९-३३॥ कृत्वेह बन्धं भुजगेश्वरेण। वरुणद्वारा फेंका गया विरोचन आकाशसे हाथीसहित उत्पाट्य चिक्षेप विरोचनं हि पृथ्वीपर इस प्रकार आ गिरा, जैसे सूर्यद्वारा पहले सकुञ्जरं खे सनियन्तृवाहम् ॥ ३३ सुकेशी दैत्यका नगर अट्टालिकाओं, यन्त्रों, अर्गलाओं क्षिप्तो जलेशेन विरोचनस्तु एवं महलोंके सहित पृथ्वीपर गिराया गया था। उसके सकुञ्जरो भूमितले पपात। बाद वरुण गदा और पाश लेकर दैत्यको मारनेके लिये साट्टं सन्यन्त्रार्गलहर्म्यभूमिं दौड़े। अब दैत्यलोग मेघ-गर्जन-जैसे जोर-जोरसे रोने पुरं सुकेशेरिव भास्करेण ॥ ३४ लगे-हाय! हाय! राक्षस-सेनाके रक्षक वीर विरोचन ततो जलेशः सगदः सपाशः वरुणद्वारा मारे जा रहे हैं। हे प्रह्लाद! हे जम्भ! हे समभ्यधावद् दितिजं निहन्तुम्। कुजम्भ! तुम सभी अन्धकके साथ आकर (उन्हें) ततः समाक्रन्दमनुत्तमं हि बचाओ। हाय! बलवान् वरुण दैत्यवीर विरोचनको मुक्तं तु दैत्यैर्घनरावतुल्यम् ॥ ३५ वाहनसहित चूर्ण करते हुए उन्हें पाशमें बाँधकर गदासे हा हा हतोऽसौ वरुणेन वीरो इस प्रकार मार रहे हैं, जैसे अश्वमेध यज्ञमें इन्द्र पशुको विरोचनो दानवसैन्यपालः। प्रह्लाद हे जम्भकुजम्भकाद्या रक्षध्वमभ्येत्य सहान्धकेन ॥ ३६ अहो महात्मा बलवाञ्जलेशः संचूर्णयन् दैत्यभटं सवाहम्। पाशेन बद्ध्वा गदया निहन्ति यथा पशुं वाजिमखे महेन्द्रः ॥ ३७ *कणप अस्त्रका वर्णन महाभारत तथा दशकुमारचरितमें आया है।
द्वीपकी स्थिति और उनमें स्थित पर्वत तथा नदियोंका वर्णन
५६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १० श्रुत्वाथ शब्दं दितिजैः समीरितं जम्भप्रधाना दितिजेश्वरास्ततः । समभ्यधावंस्त्वरिता जलेश्वरं यथा पतङ्गा ज्वलितं हुताशनम् ॥ ३८ तानागतान् वै प्रसमीक्ष्य देवः प्राह्लादिमुत्सृज्य वितत्य पाशम् । गदां समुद्भाव्य जलेश्वरस्तु दुद्राव ताञ्जम्भमुखानरातीन् ॥ ३९ जम्भं च पाशेन तथा निहत्य तारं तलेनाशनिसंनिभेन । पादेन वृत्रं तरसा कुजम्भं निपातयामास बलं च मुष्ट्या ॥ ४० तेनार्दिता देववरेण दैत्याः संप्राद्रवन् दिक्षु विमुक्तशस्त्राः । ततोऽन्धकः स त्वरितोऽभ्युपेयाद् रणाय योद्धुं जलनायकेन ॥ ४१ तमापतन्तं गदया जघान पाशेन बद्ध्वा वरुणो सुरेशम् । तं पाशमाविध्य गदां प्रगृह्य चिक्षेप दैत्यः स जलेश्वराय ॥ ४२ तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य पाशं गदां च दाक्षायणिनन्दनस्तु । विवेश वेगात् पयसां निधानं ततोऽन्धको देवबलं ममर्द ॥ ४३ ततो हुताशः सुरशत्रुसैन्यं ददाह रोषात् पवनावधूतः । तमभ्ययाद् दानवविश्वकर्मा मयो महाबाहुरुदग्रवीर्यः ॥ ४४ तमापतन्तं सह शम्बरेण समीक्ष्य वह्निः पवनेन सार्धम् । शक्त्या मयं शम्बरमेत्य कण्ठे सन्ताड्य जग्राह बलान्महर्षे ॥ ४५ शक्त्या स कायावरणे विदारिते संभिन्नदेहो न्यपतत् पृथिव्याम् । मयः प्रजज्वाल च शम्बरोऽपि कण्ठावलग्ने ज्वलने प्रदीप्ते ॥ ४६ स दह्यमानो दितिजोऽग्निनाथ सुविस्वरं घोरतरं रुराव । सिंहाभिपन्नो विपिने यथैव मत्तो गजः क्रन्दति वेदनार्त्तः ॥ ४७ मारते हैं। दैत्योंके रुदनको सुनकर जम्भ आदि प्रमुख दैत्यगण वरुणकी ओर शीघ्रतासे ऐसे दौड़े जैसे पतङ्ग प्रज्वलित अग्निकी ओर दौड़ते हैं ॥ ३४-३८॥ उन दैत्योंको आया देख वरुण प्रह्लाद-पुत्र (विरोचन)-को छोड़ करके पाश फैलाकर और गदा घुमाकर उन जम्भप्रभृति शत्रुओंकी ओर दौड़े। उन्होंने जम्भको पाशसे, तार-दैत्यको वज्र-तुल्य करतलके प्रहारसे, वृत्रासुरको पैरोंसे, कुजम्भको अपने वेगसे और बल नामक असुरको मुक्केसे मारकर गिरा दिया। देवप्रवर ! वरुणद्वारा मर्दित दैत्य अपने अस्त्र- शस्त्रोंको छोड़कर दसों दिशाओंमें भागने लगे। उसके बाद अन्धक वरुणदेवके साथ युद्ध करनेके लिये बड़ी तेजीसे उनके पास पहुँचा। अपनी ओर आते देख वरुणने उस दैत्यनायक अन्धकको अपने पाशसे बाँधकर गदासे मारा, किंतु दैत्यने उस पाश और गदाको छीनकर वरुणपर ही फेंक दिया ॥ ३९-४२॥ उस पाश और गदाको अपनी ओर आते देखकर दाक्षायणीके पुत्र वरुण शीघ्रतासे समुद्रमें पैठ गये। तब अन्धक देवसेनाका मर्दन करने लगा। उसके बाद पवनद्वारा प्रज्वलित अग्निदेव क्रोधपूर्वक असुरोंकी सेनाको दग्ध करने लगे। तब दानवोंका 'विश्वकर्मा' (शिल्पिराज) प्रचण्ड प्रतापी महाबाहु मय उनके सामने आया। नारदजी ! शम्बरके साथ उसे आते देख अग्निदेवने वायुदेवताके साथ शक्तिके प्रहारसे मय और शम्बरके कण्ठमें चोट पहुँचाकर उन दोनोंको ही जोरसे पकड़ लिया। शक्तिसे कवचके फट जानेपर छिन्न-भिन्न शरीरवाला मय पृथ्वीपर गिर पड़ा और शम्बरासुर कण्ठमें प्रदीप्त अग्निके लग जानेसे दग्ध होने लगा। अग्निद्वारा जलते दैत्यने उस समय मुक्त कण्ठसे इस प्रकार रोदन किया, जैसे वनमें सिंहसे आक्रान्त मतवाला हाथी वेदनासे दुःखी होकर करुण चिग्घाड़ करता है ॥ ४३-४७॥
| अध्याय १० ] | अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय | ५७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तं शब्दमाकर्ण्य च शम्बरस्य<br>दैत्येश्वरः क्रोधविरक्तदृष्टिः ।<br>आः किं किमेतन्ननु केन युद्धे<br>जितो मयः शम्बरदानवश्च ॥ ४८<br><br>ततोऽब्रुवन् दैत्यभटा दितीशं<br>प्रदह्यते ह्येष हुताशनेन ।<br>रक्षस्व चाभ्येत्य न शक्यतेऽन्यै-<br>र्हुताशनो वारयितुं रणाग्रे ॥ ४९<br><br>इत्थं स दैत्यैरभिनोदितस्तु<br>हिरण्यचक्षुस्तनयो महर्षे ।<br>उद्यम्य वेगात् परिघं हुताशं<br>समाद्रवत् तिष्ठ तिष्ठ ब्रुवन् हि ॥ ५०<br><br>श्रुत्वाऽन्धकस्यापि वचो व्ययात्मा<br>संक्रुद्धचित्तस्त्वरितो हि दैत्यम् ।<br>उत्पाद्य भूम्यां च विनिष्पिपे ष<br>ततोऽन्धकः पावकमाससाद ॥ ५१ | शम्बरके उस शब्दको सुनकर क्रोधसे लाल नेत्रोंवाले दैत्येश्वरने कहा—अरे! यह क्या है? युद्धमें मय और शम्बरको किसने जीता है? इसपर दैत्ययोद्धाओंने अन्धकसे कहा—अग्निदेव इनको जला रहे हैं। आप जाकर उनकी रक्षा करें। आपके अतिरिक्त दूसरा कोई भी अग्निको नहीं रोक सकता। नारदजी! दैत्योंके ऐसा कहनेपर हिरण्याक्षपुत्र शीघ्रतासे परिघ उठाकर ‘ठहरो-ठहरो’—कहता हुआ अग्निकी ओर दौड़ पड़ा। अन्धकके वचनको सुनकर अव्ययात्मा अग्निदेवने अत्यन्त क्रोधसे उस दैत्यको शीघ्र ही उठाकर पृथ्वीपर पटक दिया। उसके बाद अन्धक अग्निके पास पहुँचा॥ ४८—५१॥ |
| समाजघानाथ हुताशनं हि<br>वरायुधेनाथ वराङ्गमध्ये ।<br>समाहतोऽग्निः परिमुच्य शम्बरं<br>तथाऽन्धकं स त्वरितोऽभ्यधावत् ॥ ५२<br><br>तमापतन्तं परिघेण भूयः<br>समाहनन्मूर्ध्नि तदान्धकोऽपि ।<br>स ताडितोऽग्निर्दितिजेश्वरेण<br>भयात् प्रदुद्राव रणाजिराद्धि ॥ ५३<br><br>ततोऽन्धको मारुतचन्द्रभास्करान्<br>साध्यान् सरुद्रांश्विवसून् महोरगान् ।<br>यान् या शरेण स्पृशते पराक्रमी<br>पराङ्मुखांस्तान् कृतवान् रणाजिरात् ॥ ५४<br><br>ततो विजित्यामरसैन्यमुग्रं<br>सैन्द्रं सरुद्रं सयमं ससोमम् ।<br>संपूज्यमानो दनुपुंगवैस्तु<br>तदान्धको भूमिमुपाजगाम ॥ ५५<br><br>आसाद्य भूमिं करदान् नरेन्द्रान्<br>कृत्वा वशे स्थाप्य चराचरं च ।<br>जगत्समग्रं प्रविवेश धीमान्<br>पातालमग्र्यं पुरमश्मकाह्वम् ॥ ५६<br><br>तत्र स्थितस्यापि महासुरस्य<br>गन्धर्वविद्याधरसिद्धसंघाः ।<br>सहाप्सरोभिः परिचारणाय<br>पातालमभ्येत्य समावसन्त ॥ ५७ | उसने श्रेष्ठ अस्त्रके द्वारा अग्निके सिरपर प्रहार किया। इस प्रकार आहत अग्निदेव शम्बरको छोड़कर तत्काल अन्धककी ओर दौड़े। अन्धकने आते हुए अग्निदेवके सिरपर पुनः परिघसे प्रहार किया। अन्धकद्वारा ताडित अग्निदेव भयभीत हो रणक्षेत्रसे भाग गये। उसके बाद पराक्रमी अन्धक वायु, चन्द्र, सूर्य, साध्य, रुद्र, अश्विनीकुमार, वसु और महानागोंमें जिन-जिनको बाणसे स्पर्श करता था, वे सभी युद्धभूमिसे पराङ्मुख हो जाते थे। इस प्रकार इन्द्र, रुद्र, यम, सोमसहित देवताओंकी उग्र सेनाको जीतकर अन्धक श्रेष्ठ दानवोंके द्वारा पूजित होकर पृथ्वीपर आ गया। वहाँ वह बुद्धिमान् दैत्य सभी राजाओंको अपना करद (सामन्त) बना करके तथा समस्त चराचर जगत्को वशमें कर पातालमें स्थित अपने अश्मक नामक उत्तम नगरमें चला गया। वहाँ उस महासुर अन्धककी सेवा करनेके लिये अप्सराओंके साथ सभी प्रमुख गन्धर्व, विद्याधर एवं सिद्धोंके समूह पातालमें आकर निवास करने लगे॥ ५२—५७॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १०॥
५८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ११ ग्यारहवाँ अध्याय सुकेशीकी कथा, मगधारण्यमें ऋषियोंसे प्रश्न करना, ऋषियोंका धर्मोपदेश, देवादिके धर्म, भुवनकोश एवं इक्कीस नरकोंका वर्णन नारद उवाच यदेतद् भवता प्रोक्तं सुकेशिनगरोऽम्बरात् । पातितो भुवि सूर्येण तत्कदा कुत्र कुत्र च ॥ १ सुकेशीति च कश्चासौ केन दत्तं पुरोऽस्य च । किमर्थं पातितो भूयामाकाशाद् भास्करेण हि ॥ २ पुलस्त्य उवाच शृणुष्वावहितो भूत्वा कथामेतां पुरातनीम् । यथोक्तवान् स्वयम्भूर्मा कथ्यमानां मयाऽनघ ॥ ३ आसीन्निशाचरपतिर्विद्युत्केशीति विश्रुतः । तस्य पुत्रो गुणज्येष्ठः सुकेशिरभवत्ततः ॥ ४ तस्य तुष्टस्तथेशानः पुरमाकाशचारिणम् । प्रादादजेयत्वमपि शत्रुभिश्चाप्यवध्यताम् ॥ ५ स चापि शंकरात् प्राप्य वरं गगनगं पुरम् । रेमे निशाचरैः सार्द्धं सदा धर्मपथि स्थितः ॥ ६ स कदाचिद् गतोऽरण्यं मागधं राक्षसेश्वरः । तत्राश्रमांस्तु ददृशे ऋषीणां भावितात्मनाम् ॥ ७ महर्षीन् स तदा दृष्ट्वा प्रणिपत्याभिवाद्य च । प्रत्युवाच ऋषीन् सर्वान् कृतासनपरिग्रहः ॥ ८ सुकेशिरुवाच प्रष्टुमिच्छामि भवतः संशयोऽयं हृदि स्थितः । कथयन्तु भवन्तो मे न चैवाज्ञापयाम्यहम् ॥ ९ किंस्विच्छ्रेयः परे लोके किमु चेह द्विजोत्तमाः । केन पूज्यस्तथा सत्सु केनासौ सुखमेधते ॥ १० पुलस्त्य उवाच इत्थं सुकेशिवचनं निशम्य परमर्षयः । प्रोचुर्विमृश्य श्रेयोऽर्थमिह लोके परत्र च ॥ ११ ऋषय ऊचुः श्रूयतां कथयिष्यामस्तव राक्षसपुंगव । यद्धि श्रेयो भवेद् वीर इह चामुत्र चाव्ययम् ॥ १२ नारदजीने (पुलस्त्यजीसे) पूछा- आपने जो यह कहा है कि सूर्यने सुकेशीके नगरको आकाशसे पृथ्वीपर गिरा दिया था तो यह घटना कब और कहाँ हुई थी? सुकेशी नामका वह कौन व्यक्ति था? उसे वह नगर किसने दिया था और भगवान् सूर्यने उसे आकाशसे पृथ्वीपर क्यों गिरा दिया ? ॥ १-२॥ पुलस्त्यजी बोले- निष्पाप नारदजी ! यह कथा बहुत पुरानी है; आप इसे सावधानीसे सुनिये। ब्रह्माजीने जैसे यह कथा मुझे सुनायी थी, वैसे ही इसे मैं आपको सुना रहा हूँ। पहले विद्युत्केशी नामसे प्रसिद्ध राक्षसोंका एक राजा था। उसका पुत्र सुकेशी गुणोंमें उससे भी बढ़कर था। उसपर प्रसन्न होकर शिवजीने उसे एक आकाशचारी नगर और शत्रुओंसे अजेय एवं अवध्य होनेका वर भी दिया। वह शंकरसे आकाशचारी श्रेष्ठ नगर पाकर राक्षसोंके साथ सदा धर्मपथपर रहते हुए विचरने लगा। एक समय मगधारण्यमें जाकर उस राक्षसराजने वहाँ ध्यान-परायण ऋषियोंके आश्रमोंको देखा। उस समय महर्षियोंको देखकर अभिवादन और प्रणाम किया। फिर एक जगह बैठकर उसने समस्त ऋषियोंसे कहा- ॥ ३-८॥ सुकेशि बोला - मैं आपलोगोंको आदेश नहीं दे रहा हूँ; बल्कि मेरे हृदयमें एक संदेह है, उसे मैं आपसे पूछना चाहता हूँ। आप मुझको उसे बतलाइये। द्विजोत्तमो! इस लोक और परलोकमें कल्याणकारी क्या है? मनुष्य सज्जनोंमें कैसे पूज्य होता है और उसे सुखकी प्राप्ति कैसे होती है ? ॥ ९-१० ॥ पुलस्त्यजी बोले- सुकेशीके इस प्रकारके वचनको सुनकर श्रेष्ठ ऋषियोंने विचारकर उससे इस लोक और परलोकमें कल्याणकारी बातें कहीं ॥ ११ ॥ ऋषिगण बोले- वीर राक्षस-श्रेष्ठ ! इस लोक और परलोकमें जो अक्षय श्रेयस्कर वस्तु है, उसे हम तुमसे
| अध्याय ११] सुकेशीकी कथा, ऋषियोंका धर्मोपदेश, देवादिके धर्म एवं इक्कीस नरकोंका वर्णन | ५९ |
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| श्रेयो धर्मः परे लोके इह च क्षणदाचर।<br>तस्मिन् समाश्रितः सत्सु पूज्यस्तेन सुखी भवेत्॥ १३ | कहते हैं, उसे सुनो। निशाचर! इस लोक और परलोकमें धर्म ही कल्याणकारी है। उसमें स्थित रहकर व्यक्ति सज्जनोंमें आदरणीय एवं सुखी होता है॥ १२-१३॥ | | सुकेशिरुवाच<br>किं लक्षणो भवेद् धर्मः किमाचरणसत्क्रियः।<br>यमाश्रित्य न सीदन्ति देवादद्यास्तु तदुच्यताम्॥ १४ | सुकेशि बोला— धर्मका लक्षण (परिचय) क्या है? उसमें कौन-से आचरण एवं सत्कर्म होते हैं, जिनका आश्रय लेकर देवादि कभी दुःखी नहीं होते। आप उसका वर्णन करें॥ १४॥ | | ऋषय ऊचुः<br>देवानां परमो धर्मः सदा यज्ञादिकाः क्रियाः।<br>स्वाध्यायवेदवेत्तृत्वं विष्णुपूजारतिः स्मृता॥ १५<br>दैत्यानां बाहुशालित्वं मात्सर्यं युद्धसत्क्रिया।<br>वेदनं नीतिशास्त्राणां हरभक्तिरुदाहृता॥ १६<br>सिद्धानामुदितो धर्मो योगयुक्तिरनुत्तमा।<br>स्वाध्यायं ब्रह्मविज्ञानं भक्तिर्द्वाभ्यामपि स्थिरा॥ १७<br>उत्कृष्टोपासनं ज्ञेयं नृत्यवाद्येषु वेदिता।<br>सरस्वत्यां स्थिरा भक्तिर्गान्धर्वो धर्म उच्यते॥ १८ | ऋषियोंने कहा— सदा यज्ञादि कार्य, स्वाध्याय, वेदज्ञान और विष्णुपूजामें रति—ये देवताओंके शाश्वत परम धर्म हैं। बाहुबल, ईर्ष्याभाव, युद्धकार्य, नीतिशास्त्रका ज्ञान और हर-भक्ति—ये दैत्योंके धर्म कहे गये हैं। श्रेष्ठ योगसाधन, वेदाध्ययन, ब्रह्मविज्ञान तथा विष्णु और शिव—इन दोनोंमें अचल भक्ति—ये सब सिद्धोंके धर्म कहे गये हैं। ऊँची उपासना, नृत्य और वाद्यका ज्ञान तथा सरस्वतीके प्रति निश्चल भक्ति—ये गन्धर्वोंके धर्म कहे जाते हैं॥ १५-१८॥ | | विद्याधरत्वमतुलं विज्ञानं पौरुषे मतिः।<br>विद्याधराणां धर्मोऽयं भवान्यां भक्तिरेव च॥ १९<br>गन्धर्वविद्यावेदित्वं भक्तिर्भानौ तथा स्थिरा।<br>कौशल्यं सर्वशिल्पानां धर्मः किम्पुरुषः स्मृतः॥ २०<br>ब्रह्मचर्यममानित्वं योगाभ्यासरतिर्दृढा।<br>सर्वत्र कामचारित्वं धर्मोऽयं पैतृकः स्मृतः॥ २१<br>ब्रह्मचर्यं यताशित्वं जप्यं ज्ञानं च राक्षस।<br>नियमाद्धर्मवेदित्वमार्षो धर्मः प्रचक्ष्यते॥ २२<br>स्वाध्यायं ब्रह्मचर्यं च दानं यजनमेव च।<br>अकार्पण्यमनायासं दया हिंसा क्षमा दमः॥ २३<br>जितेन्द्रियत्वं शौचं च माङ्गल्यं भक्तिरच्युते।<br>शंकरे भास्करे देव्यां धर्मोऽयं मानवः स्मृतः॥ २४ | अद्भुत विद्याका धारण करना, विज्ञान, पुरुषार्थकी बुद्धि और भवानीके प्रति भक्ति—ये विद्याधरोंके धर्म हैं। गन्धर्वविद्याका ज्ञान, सूर्यके प्रति अटल भक्ति और सभी शिल्प-कलाओंमें कुशलता—ये किम्पुरुषोंके धर्म माने जाते हैं। ब्रह्मचर्य, अमानित्व (अभिमानसे बचना) योगाभ्यासमें दृढ़ प्रीति एवं सर्वत्र इच्छानुसार भ्रमण—ये पितरोंके धर्म कहलाते हैं। राक्षस! ब्रह्मचर्य, नियताहार, जप, आत्मज्ञान और नियमानुसार धर्मज्ञान—ये ऋषियोंके धर्म कहे जाते हैं। स्वाध्याय, ब्रह्मचर्य, दान, यज्ञ, उदारता, विश्रान्ति, दया, अहिंसा, क्षमा, दम, जितेन्द्रियता, शौच, माङ्गल्य तथा विष्णु, शिव, सूर्य और दुर्गादेवीमें भक्ति—ये मानवोंके (सामान्य) धर्म हैं॥ १९-२४॥ | | धनाधिपत्यं भोगानि स्वाध्यायं शंकरार्चनम्।<br>अहंकारमशौण्डीयं धर्मोऽयं गुह्यकेष्विति॥ २५<br>परदारावमर्शित्वं पारक्येऽर्थे च लोलता।<br>स्वाध्यायं त्र्यम्बके भक्तिर्धर्मोऽयं राक्षसः स्मृतः॥ २६<br>अविवेकंमथाज्ञानं शौचहानिरसत्यता।<br>पिशाचानामयं धर्मः सदा चामिषगृध्नता॥ २७<br>योनयो द्वादशैवैतास्तासु धर्माश्च राक्षस।<br>ब्रह्मणा कथिताः पुण्या द्वादशैव गतिप्रदाः॥ २८ | धनका स्वामित्व, भोग, स्वाध्याय, शिवजीकी पूजा, अहंकार और सौम्यता—ये गुह्योंके धर्म हैं। परस्त्रीगमन, दूसरेके धनमें लोलुपता, वेदाध्ययन और शिवभक्ति—ये राक्षसोंके धर्म कहे गये हैं। अविवेक, अज्ञान, अपवित्रता, असत्यता एवं सदा मांस-भक्षणकी प्रवृत्ति—ये पिशाचोंके धर्म हैं। राक्षस! ये ही बारह योनियाँ हैं। पितामह ब्रह्माने उनके ये बारह गति देनेवाले धर्म कहे हैं॥ २५-२८॥ |
१४- दशाङ्ग-धर्म, आश्रम-धर्म और सदाचार-स्वरूपका वर्णन
६० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ११ सुकेशिरुवाच सुकेशिने कहा- आपलोगोंने जो शाश्वत एवं भवद्भिरुक्ता ये धर्माः शाश्वता द्वादशाव्ययाः । अव्यय बारह धर्म बताये हैं, उनमें मनुष्योंके धर्मोंको तत्र ये मानवा धर्मास्तान् भूयो वक्तुमर्हथ ॥ २९ एक बार पुनः कहनेकी कृपा करें ॥ २९ ॥ ऋषय ऊचुः ऋषियोंने कहा - निशाचर ! पृथ्वीके सात द्वीपोंमें शृणुष्व मनुजादीनां धर्मोऽस्तु क्षणदाचर । निवास करनेवाले मनुष्य आदिके धर्मोंको सुनो। यह ये वसन्ति महीपृष्ठे नरा द्वीपेषु सप्तसु ॥ ३० पृथ्वी पचास करोड़ योजन विस्तारवाली है और यह योजनानां प्रमाणेन पञ्चाशत्कोटिरायता । नदीमें नावके समान जलपर स्थित है। सज्जनश्रेष्ठ ! जलोपरि महीयं हि नौरिवास्ते सरिज्जले ॥ ३१ उसके ऊपर देवेश ब्रह्माने कर्णिकाके आकारवाले अत्यन्त तस्योपरि च देवेशो ब्रह्मा शैलेन्द्रमुत्तमम् । कर्णिकाकारमत्युच्चं स्थापयामास सत्तम ॥ ३२ ऊँचे सुमेरुगिरिको स्थापित किया है। फिर उसपर ब्रह्माने तस्येमां निर्ममे पुण्यां प्रजां देवश्चतुर्दिशम् । चारों दिशाओंमें पवित्र प्रजाका निर्माण किया और द्वीप- स्थानानि द्वीपसंज्ञानि कृतवांश्च प्रजापतिः ॥ ३३ नामवाले अनेक स्थानोंकी भी रचना की है ॥ ३०-३३॥ तत्र मध्ये च कृतवाञ्जम्बूद्वीपमिति श्रुतम् । उनके मध्यमें उन्होंने जम्बूद्वीपकी रचना की। तल्लक्षं योजनानां च प्रमाणेन निगद्यते ॥ ३४ इसका प्रमाण एक लक्ष योजनका कहा जाता है। उसके ततो जलनिधी रौदो बाह्यतो द्विगुणः स्थितः । बाहर दुगुना परिमाणमें लवण-समुद्र है तथा उसके बाद तस्यापि द्विगुणः प्लक्षो बाह्यतः संप्रतिष्ठितः ॥ ३५ उसका दुगुना प्लक्षद्वीप है। उसके बाहर दुगुने प्रमाणवाला ततस्त्विक्षुरसोदश्च बाह्यतो बलयाकृतिः । वलयाकार इक्षुरस-सागर है। इस महोदधिका दुगुना द्विगुणः शाल्मलिद्वीपो द्विगुणोऽस्य महोदधेः ॥ ३६ शाल्मलिद्वीप है। उसके बाहर उससे दुगुना सुरासागर है सुरोदो द्विगुणस्तस्य तस्माच्च द्विगुणः कुशः । तथा उससे दुगुना कुशद्वीप है। कुशद्वीपसे दुगुना घृतोदो द्विगुणश्चैव कुशद्वीपात् प्रकीर्तितः ॥ ३७ घृतसागर है ॥ ३४-३७ ॥ घृतोदाद् द्विगुणः प्रोक्तः क्रौञ्चद्वीपो निशाचर । निशाचर ! घृतसागरसे दुगुना क्रौंचद्वीप कहा गया ततोऽपि द्विगुणः प्रोक्तः समुद्रो दधिसंज्ञितः ॥ ३८ है तथा उससे दुगुना दधिसमुद्र है। दधिसागरसे दुगुना समुद्राद् द्विगुणः शाकः शाकाद् दुग्धाब्धिरुत्तमः । शाकद्वीप है और शाकद्वीपसे द्विगुण उत्तम क्षीरसागर है द्विगुणः संस्थितो यत्र शेषपर्यङ्कगो हरिः । जिसमें शेषशय्यापर सोये श्रीहरि स्थित हैं। ये सभी एते च द्विगुणाः सर्वे परस्परमपि स्थिताः ॥ ३९ परस्पर एक-दूसरेसे द्विगुण प्रमाणमें स्थित हैं। राक्षसेन्द्र ! चत्वारिंशदिमाः कोट्यो लक्षाश्च नवतिः स्मृताः । जम्बूद्वीपसे लेकर क्षीरसागरके अन्ततकका विस्तार योजनानां राक्षसेन्द्र पञ्च चातिसुविस्तृताः । चालीस करोड़ नब्बे लाख पाँच योजन है ॥ ३८-४० ॥ जम्बूद्वीपात् समारभ्य यावत्क्षीराब्धिरन्ततः ॥ ४० तस्माच्च पुष्करद्वीपः स्वादूदस्तदनन्तरम् । राक्षस ! उसके बाद पुष्करद्वीप एवं तदनन्तर कोट्यश्चतस्रो लक्षाणां द्विपञ्चाशच्च राक्षस ॥ ४१ स्वादु जलका समुद्र है। पुष्करद्वीपका परिमाण चार करोड़ बावन लाख योजन है। उसके चारों ओर उतने पुष्करद्वीपमानोऽयं तावदेव तथोदधिः । ही परिमाणका समुद्र है। उसके चारों ओर लाख लक्षखण्डकटाहेन समन्तादभिपूरितम् ॥ ४२ योजनका अण्डकटाह है। इस प्रकार वे सातों द्वीप एवं द्विपास्त्विमे सप्त पृथग्धर्माः पृथक्क्रियाः । भिन्न धर्मों और क्रियावाले हैं। निशाचर ! हम उनका गदिष्यामस्तव वयं शृणुष्व त्वं निशाचर ॥ ४३ ॥ वर्णन करते हैं। तुम उसे सुनो। वीर ! प्लक्षसे शाकतकके प्लक्षदिषु नरा वीर ये वसन्ति सनातनाः । द्वीपोंमें जो सनातन (नित्य) पुरुष निवास करते हैं, शाकान्तेषु न तेष्वस्ति युगावस्था कथंचन ॥ ४४ उनमें किसी प्रकारकी युग-व्यवस्था नहीं है।