भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ११] सुकेशीकी कथा, ऋषियोंका धर्मोपदेश, देवादिके धर्म एवं इक्कीस नरकोंका वर्णन५९

| श्रेयो धर्मः परे लोके इह च क्षणदाचर।<br>तस्मिन् समाश्रितः सत्सु पूज्यस्तेन सुखी भवेत्॥ १३ | कहते हैं, उसे सुनो। निशाचर! इस लोक और परलोकमें धर्म ही कल्याणकारी है। उसमें स्थित रहकर व्यक्ति सज्जनोंमें आदरणीय एवं सुखी होता है॥ १२-१३॥ | | सुकेशिरुवाच<br>किं लक्षणो भवेद् धर्मः किमाचरणसत्क्रियः।<br>यमाश्रित्य न सीदन्ति देवादद्यास्तु तदुच्यताम्॥ १४ | सुकेशि बोला— धर्मका लक्षण (परिचय) क्या है? उसमें कौन-से आचरण एवं सत्कर्म होते हैं, जिनका आश्रय लेकर देवादि कभी दुःखी नहीं होते। आप उसका वर्णन करें॥ १४॥ | | ऋषय ऊचुः<br>देवानां परमो धर्मः सदा यज्ञादिकाः क्रियाः।<br>स्वाध्यायवेदवेत्तृत्वं विष्णुपूजारतिः स्मृता॥ १५<br>दैत्यानां बाहुशालित्वं मात्सर्यं युद्धसत्क्रिया।<br>वेदनं नीतिशास्त्राणां हरभक्तिरुदाहृता॥ १६<br>सिद्धानामुदितो धर्मो योगयुक्तिरनुत्तमा।<br>स्वाध्यायं ब्रह्मविज्ञानं भक्तिर्द्वाभ्यामपि स्थिरा॥ १७<br>उत्कृष्टोपासनं ज्ञेयं नृत्यवाद्येषु वेदिता।<br>सरस्वत्यां स्थिरा भक्तिर्गा‌न्धर्वो धर्म उच्यते॥ १८ | ऋषियोंने कहा— सदा यज्ञादि कार्य, स्वाध्याय, वेदज्ञान और विष्णुपूजामें रति—ये देवताओंके शाश्वत परम धर्म हैं। बाहुबल, ईर्ष्याभाव, युद्धकार्य, नीतिशास्त्रका ज्ञान और हर-भक्ति—ये दैत्योंके धर्म कहे गये हैं। श्रेष्ठ योगसाधन, वेदाध्ययन, ब्रह्मविज्ञान तथा विष्णु और शिव—इन दोनोंमें अचल भक्ति—ये सब सिद्धोंके धर्म कहे गये हैं। ऊँची उपासना, नृत्य और वाद्यका ज्ञान तथा सरस्वतीके प्रति निश्चल भक्ति—ये गन्धर्वोंके धर्म कहे जाते हैं॥ १५-१८॥ | | विद्याधरत्वमतुलं विज्ञानं पौरुषे मतिः।<br>विद्याधराणां धर्मोऽयं भवान्यां भक्तिरेव च॥ १९<br>गन्धर्वविद्यावेदित्वं भक्तिर्भानौ तथा स्थिरा।<br>कौशल्यं सर्वशिल्पानां धर्मः किम्पुरुषः स्मृतः॥ २०<br>ब्रह्मचर्यममानित्वं योगाभ्यासरतिर्दृढा।<br>सर्वत्र कामचारित्वं धर्मोऽयं पैतृकः स्मृतः॥ २१<br>ब्रह्मचर्यं यताशित्वं जप्यं ज्ञानं च राक्षस।<br>नियमाद्धर्मवेदित्वमार्षो धर्मः प्रचक्ष्यते॥ २२<br>स्वाध्यायं ब्रह्मचर्यं च दानं यजनमेव च।<br>अकार्पण्यमनायासं दया हिंसा क्षमा दमः॥ २३<br>जितेन्द्रियत्वं शौचं च माङ्गल्यं भक्तिरच्युते।<br>शंकरे भास्करे देव्यां धर्मोऽयं मानवः स्मृतः॥ २४ | अद्भुत विद्याका धारण करना, विज्ञान, पुरुषार्थकी बुद्धि और भवानीके प्रति भक्ति—ये विद्याधरोंके धर्म हैं। गन्धर्वविद्याका ज्ञान, सूर्यके प्रति अटल भक्ति और सभी शिल्प-कलाओंमें कुशलता—ये किम्पुरुषोंके धर्म माने जाते हैं। ब्रह्मचर्य, अमानित्व (अभिमानसे बचना) योगाभ्यासमें दृढ़ प्रीति एवं सर्वत्र इच्छानुसार भ्रमण—ये पितरोंके धर्म कहलाते हैं। राक्षस! ब्रह्मचर्य, नियताहार, जप, आत्मज्ञान और नियमानुसार धर्मज्ञान—ये ऋषियोंके धर्म कहे जाते हैं। स्वाध्याय, ब्रह्मचर्य, दान, यज्ञ, उदारता, विश्रान्ति, दया, अहिंसा, क्षमा, दम, जितेन्द्रियता, शौच, माङ्गल्य तथा विष्णु, शिव, सूर्य और दुर्गादेवीमें भक्ति—ये मानवोंके (सामान्य) धर्म हैं॥ १९-२४॥ | | धनाधिपत्यं भोगानि स्वाध्यायं शंकरार्चनम्।<br>अहंकारमशौण्डीयं धर्मोऽयं गुह्यकेष्विति॥ २५<br>परदारावमर्शित्वं पारक्येऽर्थे च लोलता।<br>स्वाध्यायं त्र्यम्बके भक्तिर्धर्मोऽयं राक्षसः स्मृतः॥ २६<br>अविवेकंमथाज्ञानं शौचहानिरसत्यता।<br>पिशाचानामयं धर्मः सदा चामिषगृध्नता॥ २७<br>योनयो द्वादशैवैतास्तासु धर्माश्च राक्षस।<br>ब्रह्मणा कथिताः पुण्या द्वादशैव गतिप्रदाः॥ २८ | धनका स्वामित्व, भोग, स्वाध्याय, शिवजीकी पूजा, अहंकार और सौम्यता—ये गुह्योंके धर्म हैं। परस्त्रीगमन, दूसरेके धनमें लोलुपता, वेदाध्ययन और शिवभक्ति—ये राक्षसोंके धर्म कहे गये हैं। अविवेक, अज्ञान, अपवित्रता, असत्यता एवं सदा मांस-भक्षणकी प्रवृत्ति—ये पिशाचोंके धर्म हैं। राक्षस! ये ही बारह योनियाँ हैं। पितामह ब्रह्माने उनके ये बारह गति देनेवाले धर्म कहे हैं॥ २५-२८॥ |