वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ११ ग्यारहवाँ अध्याय सुकेशीकी कथा, मगधारण्यमें ऋषियोंसे प्रश्न करना, ऋषियोंका धर्मोपदेश, देवादिके धर्म, भुवनकोश एवं इक्कीस नरकोंका वर्णन नारद उवाच यदेतद् भवता प्रोक्तं सुकेशिनगरोऽम्बरात् । पातितो भुवि सूर्येण तत्कदा कुत्र कुत्र च ॥ १ सुकेशीति च कश्चासौ केन दत्तं पुरोऽस्य च । किमर्थं पातितो भूयामाकाशाद् भास्करेण हि ॥ २ पुलस्त्य उवाच शृणुष्वावहितो भूत्वा कथामेतां पुरातनीम् । यथोक्तवान् स्वयम्भूर्मा कथ्यमानां मयाऽनघ ॥ ३ आसीन्निशाचरपतिर्विद्युत्केशीति विश्रुतः । तस्य पुत्रो गुणज्येष्ठः सुकेशिरभवत्ततः ॥ ४ तस्य तुष्टस्तथेशानः पुरमाकाशचारिणम् । प्रादादजेयत्वमपि शत्रुभिश्चाप्यवध्यताम् ॥ ५ स चापि शंकरात् प्राप्य वरं गगनगं पुरम् । रेमे निशाचरैः सार्द्धं सदा धर्मपथि स्थितः ॥ ६ स कदाचिद् गतोऽरण्यं मागधं राक्षसेश्वरः । तत्राश्रमांस्तु ददृशे ऋषीणां भावितात्मनाम् ॥ ७ महर्षीन् स तदा दृष्ट्वा प्रणिपत्याभिवाद्य च । प्रत्युवाच ऋषीन् सर्वान् कृतासनपरिग्रहः ॥ ८ सुकेशिरुवाच प्रष्टुमिच्छामि भवतः संशयोऽयं हृदि स्थितः । कथयन्तु भवन्तो मे न चैवाज्ञापयाम्यहम् ॥ ९ किंस्विच्छ्रेयः परे लोके किमु चेह द्विजोत्तमाः । केन पूज्यस्तथा सत्सु केनासौ सुखमेधते ॥ १० पुलस्त्य उवाच इत्थं सुकेशिवचनं निशम्य परमर्षयः । प्रोचुर्विमृश्य श्रेयोऽर्थमिह लोके परत्र च ॥ ११ ऋषय ऊचुः श्रूयतां कथयिष्यामस्तव राक्षसपुंगव । यद्धि श्रेयो भवेद् वीर इह चामुत्र चाव्ययम् ॥ १२ नारदजीने (पुलस्त्यजीसे) पूछा- आपने जो यह कहा है कि सूर्यने सुकेशीके नगरको आकाशसे पृथ्वीपर गिरा दिया था तो यह घटना कब और कहाँ हुई थी? सुकेशी नामका वह कौन व्यक्ति था? उसे वह नगर किसने दिया था और भगवान् सूर्यने उसे आकाशसे पृथ्वीपर क्यों गिरा दिया ? ॥ १-२॥ पुलस्त्यजी बोले- निष्पाप नारदजी ! यह कथा बहुत पुरानी है; आप इसे सावधानीसे सुनिये। ब्रह्माजीने जैसे यह कथा मुझे सुनायी थी, वैसे ही इसे मैं आपको सुना रहा हूँ। पहले विद्युत्केशी नामसे प्रसिद्ध राक्षसोंका एक राजा था। उसका पुत्र सुकेशी गुणोंमें उससे भी बढ़कर था। उसपर प्रसन्न होकर शिवजीने उसे एक आकाशचारी नगर और शत्रुओंसे अजेय एवं अवध्य होनेका वर भी दिया। वह शंकरसे आकाशचारी श्रेष्ठ नगर पाकर राक्षसोंके साथ सदा धर्मपथपर रहते हुए विचरने लगा। एक समय मगधारण्यमें जाकर उस राक्षसराजने वहाँ ध्यान-परायण ऋषियोंके आश्रमोंको देखा। उस समय महर्षियोंको देखकर अभिवादन और प्रणाम किया। फिर एक जगह बैठकर उसने समस्त ऋषियोंसे कहा- ॥ ३-८॥ सुकेशि बोला - मैं आपलोगोंको आदेश नहीं दे रहा हूँ; बल्कि मेरे हृदयमें एक संदेह है, उसे मैं आपसे पूछना चाहता हूँ। आप मुझको उसे बतलाइये। द्विजोत्तमो! इस लोक और परलोकमें कल्याणकारी क्या है? मनुष्य सज्जनोंमें कैसे पूज्य होता है और उसे सुखकी प्राप्ति कैसे होती है ? ॥ ९-१० ॥ पुलस्त्यजी बोले- सुकेशीके इस प्रकारके वचनको सुनकर श्रेष्ठ ऋषियोंने विचारकर उससे इस लोक और परलोकमें कल्याणकारी बातें कहीं ॥ ११ ॥ ऋषिगण बोले- वीर राक्षस-श्रेष्ठ ! इस लोक और परलोकमें जो अक्षय श्रेयस्कर वस्तु है, उसे हम तुमसे