वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| अध्याय १० ] | अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय | ५७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तं शब्दमाकर्ण्य च शम्बरस्य<br>दैत्येश्वरः क्रोधविरक्तदृष्टिः ।<br>आः किं किमेतन्ननु केन युद्धे<br>जितो मयः शम्बरदानवश्च ॥ ४८<br><br>ततोऽब्रुवन् दैत्यभटा दितीशं<br>प्रदह्यते ह्येष हुताशनेन ।<br>रक्षस्व चाभ्येत्य न शक्यतेऽन्यै-<br>र्हुताशनो वारयितुं रणाग्रे ॥ ४९<br><br>इत्थं स दैत्यैरभिनोदितस्तु<br>हिरण्यचक्षुस्तनयो महर्षे ।<br>उद्यम्य वेगात् परिघं हुताशं<br>समाद्रवत् तिष्ठ तिष्ठ ब्रुवन् हि ॥ ५०<br><br>श्रुत्वाऽन्धकस्यापि वचो व्ययात्मा<br>संक्रुद्धचित्तस्त्वरितो हि दैत्यम् ।<br>उत्पाद्य भूम्यां च विनिष्पिपे ष<br>ततोऽन्धकः पावकमाससाद ॥ ५१ | शम्बरके उस शब्दको सुनकर क्रोधसे लाल नेत्रोंवाले दैत्येश्वरने कहा—अरे! यह क्या है? युद्धमें मय और शम्बरको किसने जीता है? इसपर दैत्ययोद्धाओंने अन्धकसे कहा—अग्निदेव इनको जला रहे हैं। आप जाकर उनकी रक्षा करें। आपके अतिरिक्त दूसरा कोई भी अग्निको नहीं रोक सकता। नारदजी! दैत्योंके ऐसा कहनेपर हिरण्याक्षपुत्र शीघ्रतासे परिघ उठाकर ‘ठहरो-ठहरो’—कहता हुआ अग्निकी ओर दौड़ पड़ा। अन्धकके वचनको सुनकर अव्ययात्मा अग्निदेवने अत्यन्त क्रोधसे उस दैत्यको शीघ्र ही उठाकर पृथ्वीपर पटक दिया। उसके बाद अन्धक अग्निके पास पहुँचा॥ ४८—५१॥ |
| समाजघानाथ हुताशनं हि<br>वरायुधेनाथ वराङ्गमध्ये ।<br>समाहतोऽग्निः परिमुच्य शम्बरं<br>तथाऽन्धकं स त्वरितोऽभ्यधावत् ॥ ५२<br><br>तमापतन्तं परिघेण भूयः<br>समाहनन्मूर्ध्नि तदान्धकोऽपि ।<br>स ताडितोऽग्निर्दितिजेश्वरेण<br>भयात् प्रदुद्राव रणाजिराद्धि ॥ ५३<br><br>ततोऽन्धको मारुतचन्द्रभास्करान्<br>साध्यान् सरुद्रांश्विवसून् महोरगान् ।<br>यान् या शरेण स्पृशते पराक्रमी<br>पराङ्मुखांस्तान् कृतवान् रणाजिरात् ॥ ५४<br><br>ततो विजित्यामरसैन्यमुग्रं<br>सैन्द्रं सरुद्रं सयमं ससोमम् ।<br>संपूज्यमानो दनुपुंगवैस्तु<br>तदान्धको भूमिमुपाजगाम ॥ ५५<br><br>आसाद्य भूमिं करदान् नरेन्द्रान्<br>कृत्वा वशे स्थाप्य चराचरं च ।<br>जगत्समग्रं प्रविवेश धीमान्<br>पातालमग्र्यं पुरमश्मकाह्वम् ॥ ५६<br><br>तत्र स्थितस्यापि महासुरस्य<br>गन्धर्वविद्याधरसिद्धसंघाः ।<br>सहाप्सरोभिः परिचारणाय<br>पातालमभ्येत्य समावसन्त ॥ ५७ | उसने श्रेष्ठ अस्त्रके द्वारा अग्निके सिरपर प्रहार किया। इस प्रकार आहत अग्निदेव शम्बरको छोड़कर तत्काल अन्धककी ओर दौड़े। अन्धकने आते हुए अग्निदेवके सिरपर पुनः परिघसे प्रहार किया। अन्धकद्वारा ताडित अग्निदेव भयभीत हो रणक्षेत्रसे भाग गये। उसके बाद पराक्रमी अन्धक वायु, चन्द्र, सूर्य, साध्य, रुद्र, अश्विनीकुमार, वसु और महानागोंमें जिन-जिनको बाणसे स्पर्श करता था, वे सभी युद्धभूमिसे पराङ्मुख हो जाते थे। इस प्रकार इन्द्र, रुद्र, यम, सोमसहित देवताओंकी उग्र सेनाको जीतकर अन्धक श्रेष्ठ दानवोंके द्वारा पूजित होकर पृथ्वीपर आ गया। वहाँ वह बुद्धिमान् दैत्य सभी राजाओंको अपना करद (सामन्त) बना करके तथा समस्त चराचर जगत्को वशमें कर पातालमें स्थित अपने अश्मक नामक उत्तम नगरमें चला गया। वहाँ उस महासुर अन्धककी सेवा करनेके लिये अप्सराओंके साथ सभी प्रमुख गन्धर्व, विद्याधर एवं सिद्धोंके समूह पातालमें आकर निवास करने लगे॥ ५२—५७॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १०॥