वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ११ सुकेशिरुवाच सुकेशिने कहा- आपलोगोंने जो शाश्वत एवं भवद्भिरुक्ता ये धर्माः शाश्वता द्वादशाव्ययाः । अव्यय बारह धर्म बताये हैं, उनमें मनुष्योंके धर्मोंको तत्र ये मानवा धर्मास्तान् भूयो वक्तुमर्हथ ॥ २९ एक बार पुनः कहनेकी कृपा करें ॥ २९ ॥ ऋषय ऊचुः ऋषियोंने कहा - निशाचर ! पृथ्वीके सात द्वीपोंमें शृणुष्व मनुजादीनां धर्मोऽस्तु क्षणदाचर । निवास करनेवाले मनुष्य आदिके धर्मोंको सुनो। यह ये वसन्ति महीपृष्ठे नरा द्वीपेषु सप्तसु ॥ ३० पृथ्वी पचास करोड़ योजन विस्तारवाली है और यह योजनानां प्रमाणेन पञ्चाशत्कोटिरायता । नदीमें नावके समान जलपर स्थित है। सज्जनश्रेष्ठ ! जलोपरि महीयं हि नौरिवास्ते सरिज्जले ॥ ३१ उसके ऊपर देवेश ब्रह्माने कर्णिकाके आकारवाले अत्यन्त तस्योपरि च देवेशो ब्रह्मा शैलेन्द्रमुत्तमम् । कर्णिकाकारमत्युच्चं स्थापयामास सत्तम ॥ ३२ ऊँचे सुमेरुगिरिको स्थापित किया है। फिर उसपर ब्रह्माने तस्येमां निर्ममे पुण्यां प्रजां देवश्चतुर्दिशम् । चारों दिशाओंमें पवित्र प्रजाका निर्माण किया और द्वीप- स्थानानि द्वीपसंज्ञानि कृतवांश्च प्रजापतिः ॥ ३३ नामवाले अनेक स्थानोंकी भी रचना की है ॥ ३०-३३॥ तत्र मध्ये च कृतवाञ्जम्बूद्वीपमिति श्रुतम् । उनके मध्यमें उन्होंने जम्बूद्वीपकी रचना की। तल्लक्षं योजनानां च प्रमाणेन निगद्यते ॥ ३४ इसका प्रमाण एक लक्ष योजनका कहा जाता है। उसके ततो जलनिधी रौदो बाह्यतो द्विगुणः स्थितः । बाहर दुगुना परिमाणमें लवण-समुद्र है तथा उसके बाद तस्यापि द्विगुणः प्लक्षो बाह्यतः संप्रतिष्ठितः ॥ ३५ उसका दुगुना प्लक्षद्वीप है। उसके बाहर दुगुने प्रमाणवाला ततस्त्विक्षुरसोदश्च बाह्यतो बलयाकृतिः । वलयाकार इक्षुरस-सागर है। इस महोदधिका दुगुना द्विगुणः शाल्मलिद्वीपो द्विगुणोऽस्य महोदधेः ॥ ३६ शाल्मलिद्वीप है। उसके बाहर उससे दुगुना सुरासागर है सुरोदो द्विगुणस्तस्य तस्माच्च द्विगुणः कुशः । तथा उससे दुगुना कुशद्वीप है। कुशद्वीपसे दुगुना घृतोदो द्विगुणश्चैव कुशद्वीपात् प्रकीर्तितः ॥ ३७ घृतसागर है ॥ ३४-३७ ॥ घृतोदाद् द्विगुणः प्रोक्तः क्रौञ्चद्वीपो निशाचर । निशाचर ! घृतसागरसे दुगुना क्रौंचद्वीप कहा गया ततोऽपि द्विगुणः प्रोक्तः समुद्रो दधिसंज्ञितः ॥ ३८ है तथा उससे दुगुना दधिसमुद्र है। दधिसागरसे दुगुना समुद्राद् द्विगुणः शाकः शाकाद् दुग्धाब्धिरुत्तमः । शाकद्वीप है और शाकद्वीपसे द्विगुण उत्तम क्षीरसागर है द्विगुणः संस्थितो यत्र शेषपर्यङ्कगो हरिः । जिसमें शेषशय्यापर सोये श्रीहरि स्थित हैं। ये सभी एते च द्विगुणाः सर्वे परस्परमपि स्थिताः ॥ ३९ परस्पर एक-दूसरेसे द्विगुण प्रमाणमें स्थित हैं। राक्षसेन्द्र ! चत्वारिंशदिमाः कोट्यो लक्षाश्च नवतिः स्मृताः । जम्बूद्वीपसे लेकर क्षीरसागरके अन्ततकका विस्तार योजनानां राक्षसेन्द्र पञ्च चातिसुविस्तृताः । चालीस करोड़ नब्बे लाख पाँच योजन है ॥ ३८-४० ॥ जम्बूद्वीपात् समारभ्य यावत्क्षीराब्धिरन्ततः ॥ ४० तस्माच्च पुष्करद्वीपः स्वादूदस्तदनन्तरम् । राक्षस ! उसके बाद पुष्करद्वीप एवं तदनन्तर कोट्यश्चतस्रो लक्षाणां द्विपञ्चाशच्च राक्षस ॥ ४१ स्वादु जलका समुद्र है। पुष्करद्वीपका परिमाण चार करोड़ बावन लाख योजन है। उसके चारों ओर उतने पुष्करद्वीपमानोऽयं तावदेव तथोदधिः । ही परिमाणका समुद्र है। उसके चारों ओर लाख लक्षखण्डकटाहेन समन्तादभिपूरितम् ॥ ४२ योजनका अण्डकटाह है। इस प्रकार वे सातों द्वीप एवं द्विपास्त्विमे सप्त पृथग्धर्माः पृथक्क्रियाः । भिन्न धर्मों और क्रियावाले हैं। निशाचर ! हम उनका गदिष्यामस्तव वयं शृणुष्व त्वं निशाचर ॥ ४३ ॥ वर्णन करते हैं। तुम उसे सुनो। वीर ! प्लक्षसे शाकतकके प्लक्षदिषु नरा वीर ये वसन्ति सनातनाः । द्वीपोंमें जो सनातन (नित्य) पुरुष निवास करते हैं, शाकान्तेषु न तेष्वस्ति युगावस्था कथंचन ॥ ४४ उनमें किसी प्रकारकी युग-व्यवस्था नहीं है।