भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 489 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 71

अध्याय ११] सुकेशीकी कथा, ऋषियोंका धर्मोपदेश, देवादिके धर्म एवं इक्कीस नरकोंका वर्णन ६१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मोदन्ते देववत्तेषां धर्मो दिव्य उदाहृतः ।<br>कल्पान्ते प्रलयस्तेषां निगद्येत महाभुज ॥ ४५<br><br>ये जनाः पुष्करद्वीपे वसन्ते रौद्रदर्शने ।<br>पैशाचमाश्रिता धर्मे कर्मान्ते ते विनाशितः ॥ ४६महाबाहो ! वे देवताओंके समान सुखभोग करते हैं। उनका धर्म दिव्य कहा जाता है। कल्पके अन्तमें उनका प्रलयमात्र होना वर्णित है। पुष्करद्वीप देखनेमें भयंकर है। वहाँके निवासी पैशाच-धर्मोंका पालन करते हैं। कर्मके अन्तमें उनका नाश होता है ॥ ४५-४६ ॥
सुकेशिरुवाच<br>किमर्थं पुष्करद्वीपो भवद्भिः समुदाहृतः ।<br>दुर्दर्शः शौचरहितो घोरः कर्मान्तनाशकृत् ॥ ४७सुकेशिने कहा—आपलोगोंने पुष्करद्वीपको भयंकर, पवित्रतारहित, घोर एवं कर्मके अन्तमें नाश करनेवाला क्यों बतलाया ? कृपाकर यह बात हमें समझायें ॥ ४७ ॥
ऋषय ऊचुः<br>तस्मिन् निशाचर द्वीपे नरकाः सन्ति दारुणाः ।<br>रौरवाद्यास्ततो रौद्रः पुष्करो घोरदर्शनः ॥ ४८ऋषियोंने कहा—निशाचर ! उस द्वीपमें रौरव आदि भयानक नरक हैं। इसीसे पुष्करद्वीप देखनेमें बड़ा भयंकर है ॥ ४८ ॥
सुकेशिरुवाच<br>कियन्त्येतानि रौद्राणि नरकाणि तपोधनाः ।<br>कियन्मात्राणि मार्गेण का च तेषु स्वरूपता ॥ ४९सुकेशिने पूछा—तपस्विगण ! वे रौद्र नरक कितने हैं ? उनका मार्ग कितना है ? उनका स्वरूप कैसा है ? ॥ ४९ ॥
ऋषय ऊचुः<br>शृणुष्व राक्षसश्रेष्ठ प्रमाणं लक्षणं तथा ।<br>सर्वेषां रौरवादीनां संख्या या त्वेकविंशतिः ॥ ५०<br>द्वे सहस्रे योजनानां ज्वलिताङ्गारविस्तृते ।<br>रौरवो नाम नरकः प्रथमः परिकीर्तितः ॥ ५१<br>तप्तताम्रमयी भूमिरधस्तादग्नितापिता ।<br>द्वितीयो द्विगुणस्तस्मान्महारौरव उच्यते ॥ ५२<br>ततोऽपि द्विःस्थितश्चान्यस्तामिस्रो नरकः स्मृतः ।<br>अन्धतामिस्रको नाम चतुर्थो द्विगुणः परः ॥ ५३<br>ततस्तु कालचक्रेति पञ्चमः परिगीयते ।<br>अप्रतिष्ठं च नरकं घटीयन्त्रं च सप्तमम् ॥ ५४ऋषियोंने कहा—राक्षसश्रेष्ठ ! उन समस्त रौरव आदि नरकोंका लक्षण और प्रमाण सुनो, जिन (मुख्य नरकों)-की संख्या इक्कीस है। उनमें प्रथम रौरव नरक कहा जाता है। वह दो हजार योजन विस्तृत एवं प्रज्वलित अङ्गारमय है। उससे द्विगुणित महारौरव नामक द्वितीय नरक है। उसकी भूमि जलते हुए ताँबेसे बनी है, जो नीचेसे अग्निद्वारा तापित होती रहती है। उससे द्विगुणित विस्तृत तीसरा तामिस्र नामक नरक कहा जाता है। उससे द्विगुणित अन्धतामिस्र नामक चतुर्थ नरक है। उसके बाद पञ्चम नरकको कालचक्र कहते हैं। अप्रतिष्ठ नामक नरक षष्ठ और घटीयन्त्र सप्तम है ॥ ५०-५४ ॥
असिपत्रवनं चान्यत्सहस्त्राणि द्विसप्ततिः ।<br>योजनानां परिख्यातमष्टमं नरकोत्तमम् ॥ ५५<br>नवमं तप्तकुम्भं च दशमं कूटशाल्मलिः ।<br>करपत्रस्तथैवोक्तस्तथाऽन्यः श्वानभोजनः ॥ ५६<br>संदंशो लौहपिण्डश्च करम्भसिकता तथा ।<br>घोरा क्षारनदी चान्या तथान्यः कृमिभोजनः ।<br>तथाऽष्टादशमी प्रोक्ता घोरा वैतरणी नदी ॥ ५७<br>तथा परः शोणितपूयभोजनः<br>क्षुराग्रधारो निशितश्च चक्रकः ।<br>संशोषणो नाम तथाप्यनन्तः<br>प्रोक्तास्तवैते नरकाः सुकेशिन् ॥ ५८नरकोंमें श्रेष्ठ असिपत्रवन नामक आठवाँ नरक बहत्तर हजार योजन विस्तृत कहा जाता है। नवाँ तप्तकुम्भ, दसवाँ कूटशाल्मलि, ग्यारहवाँ करपत्र और बारहवाँ नरक श्वानभोजन है। उसके बाद क्रमशः संदंश, लोहपिण्ड, करम्भसिकता, भयंकर क्षार नदी, कृमिभोजन और अठारहवेंको घोर वैतरणी नदी कहा जाता है। उनके अतिरिक्त शोणित-पूयभोजन, क्षुराग्रधार, निशितचक्रक तथा संशोषण नामक अन्तरहित नरक हैं। सुकेशिन् ! हमलोगोंने तुमसे इन नरकोंका वर्णन कर दिया ॥ ५५-५८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ११ ॥

वामन पुराण · पृष्ठ 71, कुल 489 में से · BharatKosha