वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ६२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १२ ] |
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बारहवाँ अध्याय
सुकेशीका नरक देनेवाले कर्मोंके सम्बन्धमें प्रश्न, ऋषियोंका उत्तर और नरकोंका वर्णन
| सुकेशिरुवाच | |
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| कर्मणा नरकानेतान् केन गच्छन्ति वै कथम्।<br>एतद् वदन्तु विप्रेन्द्राः परं कौतूहलं मम॥ १ | सुकेशीने पूछा— हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! इन नरकोंमें लोग किस कर्मसे और कैसे जाते हैं, यह आपलोग बतलायें। इस विषयको जाननेकी मेरी बड़ी उत्सुकता है॥ १॥ |
| ऋषय ऊचुः | |
| कर्मणा येन येनेह यान्ति शालकटंकट^*।<br>स्वकर्मफलभोगार्थं नरकान् मे शृणुष्व तान्॥ २ | ऋषिगण बोले— (सुकेशिन्!) मनुष्य अपने जिन-जिन कर्मोंके फल भोग करनेके लिये इन नरकोंमें जाते हैं, उन्हें हमसे सुनो। जिन लोगोंने वेद, देवता एवं द्विजातियोंकी सदा निन्दा की है, जो पुराण एवं इतिहासके अर्थोंमें आदरबुद्धि या श्रद्धा नहीं रखते और जो गुरुओंकी निन्दा करते हैं तथा यज्ञोंमें विघ्न डालते हैं, जो दाताको दान देनेसे रोकते हैं, वे सभी उन (वर्णित हो रहे) नरकोंमें गिरते हैं। जो अधम व्यक्ति मित्र, स्त्री-पुरुष, सहोदर भाई, स्वामी-सेवक, पिता-पुत्र एवं आचार्य तथा यजमानोंमें परस्पर झगड़ा लगाते हैं तथा जो अधम व्यक्ति एकको कन्या देकर पुनः दूसरेको दे देते हैं, वे सभी यमदूतोंद्वारा नरकोंमें आरासे दो भागोंमें चीरे जाते हैं॥ २—६॥ |
| वेददेवद्विजातीनां यैर्निन्दा सततं कृता।<br>ये पुराणेतिहासार्थान् नाभिनन्दन्ति पापिनः॥ ३ | |
| गुरुनिन्दाकरा ये च मखविघ्नकराश्च ये।<br>दातुर्निवारका ये च तेषु ते निपतन्ति हि॥ ४ | |
| सुहृद्दम्पतिसौदर्यस्वामिभृत्यपितासुतान् ।<br>याज्योपाध्याययोर्यैश्च कृतो भेदोऽधमैर्मिथः॥ ५ | |
| कन्यामेकस्य दत्वा च ददत्यन्यस्य येऽधमाः।<br>करपत्रेण पाट्यन्ते ते द्विधा यमकिंकरैः॥ ६ | |
| परोपतापजनकाश्चन्दोशीरहारिणः ।<br>बालव्यजनहर्तारः करम्भसिकताश्रिताः॥ ७ | (इसी प्रकार) जो दूसरोंको संताप देते, चन्दन और खसकी चोरी करते और बालोंसे बने व्यजनों—चँवरोंको चुराते हैं, वे करम्भसिकता नामक नरकमें जाते हैं। जो देव या पितृश्राद्धमें निमन्त्रित होकर अन्यत्र भोजन करता है, उस मूर्खको नरकमें तीक्ष्ण चोंचवाले बड़े-बड़े नरकपक्षी पकड़कर दोनों ओर खींचते हैं। जो तीखे वचनोंके द्वारा चोट करते हुए साधुओंके हृदयको दुखाता है, उसके ऊपर भयंकर पक्षी अपने चोंचोंसे कठोर प्रहार करते हैं। जो दुष्टबुद्धि मनुष्य साधुओंकी चुगली-निन्दा करता है, उसकी जीभको वज्रतुल्य चोंच और नखवाले कौए खींच लेते हैं॥ ७—१०॥ |
| निमन्त्रितोऽन्यतो भुङ्क्ते श्राद्धे दैवे सपैतृके।<br>स द्विधा कृष्यते मूढस्तीक्ष्णतुण्डैः खगोत्तमैः॥ ८ | |
| मर्माणि यस्तु साधूनां तुदन् वाग्भिर्निकृन्तति।<br>तस्योपरि तुदन्तस्तु तुण्डैस्तिष्ठन्ति पतत्रिणः॥ ९ | |
| यः करोति च पैशुन्यं साधूनामन्यथामतिः।<br>वज्रतुण्डनखा जिह्वामाकर्षन्तेऽस्य वायसाः॥ १० | |
| मातापितृगुरूणां च येऽवज्ञां चक्रुरुद्धताः।<br>मज्जन्ते पूयविण्मूत्रे त्वप्रतिष्ठे ह्यधोमुखाः॥ ११ | जो उद्धत लड़के अपने माता-पिता एवं गुरुकी आज्ञाका उल्लङ्घन करते हैं, वे पीव, विष्ठा एवं मूत्रसे पूर्ण अप्रतिष्ठ नामक नरकमें नीचेकी ओर मुँह कर डुबाये जाते हैं। |
* शालकटंकट महाभारत ७।१०९।२२—३१ में अलम्बुषका तथा यहाँ सुकेशीका नामान्तर है। सुकेशि और सुकेशी भी चलते हैं।