वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| ४४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ततो नारायणं दैत्यो दैत्यं नारायणः शरैः।<br>आविध्येतां तदाऽन्योन्यं मर्मभिद्भिरजिह्मगैः॥ ७<br><br>ततोऽम्बरे संनिपातो देवानांमभवन्मुने।<br>दिदृक्षूणां तदा युद्धं लघु चित्रं च सुष्ठु च॥ ८ | तब दैत्यने नारायणको और नारायणने दैत्यको—एक-दूसरेको—मर्मभेदी एवं सीधे चलनेवाले बाणोंसे वेध दिया। मुने! उस समय शीघ्रतापूर्वक हो रहे इस कौशलयुक्त विचित्र एवं सुन्दर युद्धको देखनेकी इच्छावाले देवताओंका समूह आकाशमें एकत्र हो गया॥ ५-८॥ |
| ततः सुराणां दुन्दुभ्यस्त्ववाद्यन्त महास्वनाः।<br>पुष्पवर्षमनौपम्यं मुमुचुः साध्यदैत्ययोः॥ ९<br><br>ततः पश्यत्सु देवेषु गगनस्थेषु तावुभौ।<br>अयुध्येतां महेष्वासौ प्रेक्षकप्रीतिवर्द्धनम्॥ १०<br><br>बबन्धतुस्तदाकाशं तावुभौ शरवृष्टिभिः।<br>दिशश्च विदिशश्चैव छादयेतां शरोत्करैः॥ ११<br><br>ततो नारायणश्चापं समाकृष्य महामुने।<br>बिभेद मार्गणैस्तीक्ष्णैः प्रह्लादं सर्वमर्मसु॥ १२<br><br>तथा दैत्येश्वरः क्रुद्धश्चापमानम्य वेगवान्।<br>बिभेद हृदये बाह्वोर्वदने च नरोत्तमम्॥ १३ | उसके बाद बड़े जोरसे बजनेवाले नगाड़ोंको बजाकर देवताओंने भगवान् नारायणके और दैत्यके ऊपर अनुपमरूपमें पुष्पोंकी वर्षा की। फिर उन दोनों धनुर्धारियोंने आकाशमें स्थित देवताओंके सामने दर्शकोंको आनन्द देनेवाला (दिलचस्प) अनूठा युद्ध किया। उस समय उन दोनोंने बाणोंकी वृष्टिसे आकाशको मानो बाँध दिया और बाणवृष्टिसे दिशाओं एवं विदिशाओंको ढक दिया। महामुनि नारदजी! तब नारायणने धनुषको खींचकर तेज बाणोंसे प्रह्लादके सभी मर्मस्थलोंमें प्रहार किया और फुर्तीवाले दैत्येश्वरने क्रोधपूर्वक धनुषको चढ़ाकर नरोत्तमके हृदय, दोनों भुजाओं और मुँहको भी (बाणोंसे) बेध दिया॥ ९-१३॥ |
| ततोऽस्यतो दैत्यपतेः कार्मुकं मुष्टिबन्धनात्।<br>चिच्छेदैकेन बाणेन चन्द्रार्धाकारवर्चसा॥ १४<br><br>अपास्यत धनुश्छिन्नं चापमादाय चापरम्।<br>अधिज्यं लाघवात् कृत्वा ववर्ष निशिताञ्शरान्॥ १५<br><br>तानप्यस्य शरान् साध्यश्छित्त्वा बाणैरवारयत्।<br>कार्मुकं च क्षुरप्रेण चिच्छेद पुरुषोत्तमः॥ १६<br><br>छिन्नं छिन्नं धनुर्दैत्यस्त्वन्यदन्यत्समाददे।<br>समादत्ते तदा साध्यो मुने चिच्छेद लाघवात्॥ १७ | उसके बाद नारायणने बाण चला रहे प्रह्लादके धनुषके मुष्टिबन्धको अर्धचन्द्रके आकारवाले एक तेजस्वी बाणसे काट दिया। प्रह्लादने भी कटे धनुषको झट फेंककर दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और शीघ्र ही उसकी प्रत्यञ्चा (डोरी) चढ़ाकर तेज बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी। पर उसके उन शरोंको भी नारायणने बाणोंसे काटकर निवारित कर दिया और उन पुरुषोत्तमने तीक्ष्ण बाणसे उसके धनुषको भी काट डाला। नारदजी! एक धनुषके छिन्न होनेपर दैत्यराजने बारम्बार दूसरा धनुष ग्रहण किया, किंतु नारायणने लिये हुए उन-उन धनुषोंको भी तुरंत काटकर गिरा दिया॥ १४-१७॥ |
| संछिन्नेष्वथ चापेषु जग्राह दितिजेश्वरः।<br>परिघं दारुणं दीर्घं सर्वलोहमयं दृढम्॥ १८<br><br>परिगृह्याथ परिघं भ्रामयामास दानवः।<br>भ्राम्यमाणं स चिच्छेद नाराचेन महामुनिः॥ १९<br><br>छिन्ने तु परिघे श्रीमान् प्रह्लादो दानवेश्वरः।<br>मुद्गरं भ्राम्य वेगेन प्रचिक्षेप नराग्रजे॥ २०<br><br>तमापतन्तं बलवान् मार्गणैर्दशभिर्मुने।<br>चिच्छेद दशधा साध्यः स छिन्नो न्यपतद् भुवि॥ २१ | फिर धनुषोंके कट जानेपर दैत्यपति प्रह्लादने एक भयंकर, मजबूत और लौह (फौलाद)-से बने 'परिघ' नामक अस्त्रको उठा लिया। उसे लेकर वे दानव (प्रह्लाद) चारों ओर घुमाने लगे। उस घुमाये जाते हुए परिघको भी महामुनि नारायणने बाणसे काट दिया। उसके कट जानेपर श्रीमान् दनुजेश्वर प्रह्लादने पुनः एक मुद्गरको वेगसे घुमाकर उसे नारायणके ऊपर फेंका। नारदजी! उस आते हुए मुद्गरको भी बलवान् नारायणने दस बाणोंसे दस भागोंमें काट दिया; वह नष्ट होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ १८-२१॥ |