भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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अध्याय ८] प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय ४५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मुद्गरे वितथे जाते प्रासमाविध्य वेगवान्।<br>प्रचिक्षेप नराग्र्याय तं च चिच्छेद धर्मजः॥ २२<br>प्रासे छिन्ने ततो दैत्यः शक्तिमादाय चिक्षिपे।<br>तां च चिच्छेद बलवान् क्षुरप्रेण महातपाः॥ २३<br>छिन्नेषु तेषु शस्त्रेषु दानवोऽन्यन्महद्धनुः।<br>समादाय ततो बाणैरवतस्तार नारद॥ २४<br>ततो नारायणो देवो दैत्यनाथं जगद्गुरुः।<br>नाराचेन जघानाथ हृदये सुरतापसः॥ २५प्रह्लादने मुद्गरके विफल हो जानेपर 'प्राश' नामक अस्त्र लेकर बड़े जोरसे नरके बड़े भाई नारायणके ऊपर चला दिया; पर उन्होंने उसे भी काट डाला। प्राशके नष्ट हो जानेपर दैत्यने तेज 'शक्ति' फेंकी, पर बलवान् महातपा नारायणने उसे भी अपने क्षुरप्रके द्वारा काट डाला। नारदजी! उन सभी अस्त्रोंके नष्ट हो जानेपर प्रह्लाद दूसरे विशाल धनुषको लेकर बाणोंकी वर्षा करने लगे। तब परम तपस्वी जगद्गुरु नारायणदेवने प्रह्लादके हृदयमें नाराचसे प्रहार किया॥ २२—२५॥
संभिन्नहृदयो ब्रह्मन् देवेनाद्भुतकर्मणा।<br>निपपात रथोपस्थे तमपोवाह सारथिः॥ २६<br><br>स संज्ञां सुचिरेणैव प्रतिलभ्य दितीश्वरः।<br>सुदृढं चापमादाय भूयो योद्धुमुपागतः॥ २७<br><br>तमागतं संनिरीक्ष्य प्रत्युवाच नराग्रजः।<br>गच्छ दैत्येन्द्र योत्स्यामः प्रातस्त्वाहिकमाचर॥ २८<br><br>एवमुक्तो दितीशस्तु साध्येनाद्भुतकर्मणा।<br>जगाम नैमिषारण्यं क्रियां चक्रे तदाह्निकम्॥ २९नारदजी! अद्भुत पराक्रमी नारायणके प्रहारसे प्रह्लादका हृदय बिंध गया, फलतः वे बेहोश होकर रथके पिछले भागमें गिर पड़े। यह देखकर सारथी उन्हें वहाँसे हटाकर दूर ले गया। बहुत देरके बाद जब उन्हें चेतना प्राप्त हुई—होश आया, तब वे पुनः सुदृढ़ धनुष लेकर नर-नारायणसे युद्ध करनेके लिये संग्रामभूमिमें आ गये। उन्हें आया देख नारायणने कहा—दैत्येन्द्र! अब हम कल प्रातः युद्ध करेंगे; तुम भी जाओ, इस समय अपना नित्य कर्म करो। अद्भुत पराक्रमी श्रीमन्नारायणके ऐसा कहनेपर प्रह्लाद नैमिषारण्य चले गये और वहाँ अपने नित्य कर्म सम्पन्न किये॥ २६—२९॥
एवं युध्यति देवे च प्रह्लादो ह्यसुरो मुने।<br>रात्रौ चिन्तयते युद्धे कथं जेष्यामि दाम्भिकम्॥ ३०<br><br>एवं नारायणेनाऽसौ सहायुध्यत नारद।<br>दिव्यं वर्षसहस्रं तु दैत्यो देवं न चायजत्॥ ३१<br><br>ततो वर्षसहस्रान्ते ह्यजिते पुरुषोत्तमे।<br>पीतवाससमभ्येत्य दानवो वाक्यमब्रवीत्॥ ३२<br><br>किमर्थं देवदेवेश साध्यं नारायणं हरिम्।<br>विजेतुं नाद्य शक्नोमि एतन्मे कारणं वद॥ ३३नारदजी! इस प्रकार भगवान् नारायण एवं दानवेन्द्र प्रह्लाद—दोनोंमें युद्ध चलता रहा। रात्रिमें प्रह्लाद यह विचार किया करते थे कि मैं युद्धमें इन दम्भ करनेवाले ऋषिको कैसे जीतूँगा? नारदजी! इस प्रकार प्रह्लादने भगवान् नारायणके साथ एक हजार दिव्य वर्षोंतक युद्ध किया, परंतु वे उन्हें (नारायणको) जीत न पाये। फिर हजार दिव्य वर्षोंके बीत जानेपर भी पुरुषोत्तम नारायणको न जीत सकनेपर प्रह्लादने वैकुण्ठमें जाकर पीतवस्त्रधारी भगवान् विष्णुसे कहा—देवेश! मैं (सरलतासे) साध्य नारायणको आजतक क्यों न जीत पाया, आप मुझे इसका कारण बतलायें॥ ३०—३३॥
पीतवासा उवाच<br><br>दुर्जयोऽसौ महाबाहुस्त्वया प्रह्लाद धर्मजः।<br>साध्यो विप्रवरो धीमान् मृधे देवासुरैरपि॥ ३४इसपर पीतवस्त्रधारी भगवान् विष्णु बोले—<br><br>प्रह्लाद! महाबाहु धर्मपुत्र नारायण तुम्हारे द्वारा दुर्जेय हैं। वे ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ ऋषि परम ज्ञानी हैं। वे सभी देवताओं एवं असुरोंसे भी युद्धमें नहीं जीते जा सकते॥ ३४॥