भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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पृष्ठ 65

अध्याय १०] अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय ५५ तोमरैर्वज्रसंस्पर्शैः शक्तिभिर्मार्गणैरपि। उसने वज्रतुल्य तोमर, शक्ति, बाण, मुद्गर और कणपों* जलेशं ताडयामास मुद्गरैः कणपैरपि ॥ २६ (भल्लों)-से वरुणदेवपर प्रहार किया। इसपर वरुणने उसके निकट जाकर गदासे मारकर उन्हें पृथ्वीपर गिरा ततस्तं गदयाभ्येत्य पातयित्वा धरातले। दिया। फिर दौड़कर उन्होंने पाशोंसे उसके मतवाले अभिद्रुत्य बबन्धाथ पाशैर्मत्तगजं बली ॥ २७ हाथीको बाँध लिया। पर अन्धकने तुरन्त ही उन पाशोंके सैकड़ों टुकड़े कर दिये। नारदजी! इतना ही तान् पाशशतधा चक्रे वेगाच्च दनुजेश्वरः। नहीं, उसने वरुणके निकट जाकर उनकी कमर भी वरुणं च समभ्येत्य मध्ये जग्राह नारद ॥ २८ पकड़ ली ॥ २५-२८ ॥ ततो दन्ती च शृङ्गाभ्यां प्रचिक्षेप तदाऽव्ययः। उस हाथीने भी अपने प्रबल दाँतोंसे वरुणको ममर्द च तथा पद्भ्यां सवाहं सलिलेश्वरम् ॥ २९ उठाकर फेंक दिया। साथ ही वह वाहनसहित वरुणको तं मर्द्यमानं वीक्ष्याथ शशाङ्कः शिशिरांशुमान्। अपने पैरोंसे कुचलने लगा। यह देख शीतकिरण अभ्येत्य ताडयामास मार्गणैः कायदारणैः ॥ ३० चन्द्रमाने हाथीके पास पहुँचकर अपने तेज नुकीले स ताड्यमानः शिशिरांशुबाणै- बाणोंसे उसके शरीरको विदीर्ण कर दिया। चन्द्रमाके रवाप पीडां परमां गजेन्द्रः। बाणोंसे विद्ध होनेपर अन्धकके हाथीको अत्यधिक दुष्टश्च वेगात् पयसामधीशं पीड़ा हुई। वह अपने पैरोंसे वरुणको तेजीसे बार-बार मुहुर्मुहुः पादतर्लैममर्द ॥ ३१ कुचलने लगा। नारदजी! वरुणदेवने भी हाथीके दोनों स मृद्यमानो वरुणो गजेन्द्रं पैरोंको दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया एवं अपने हाथों तथा पद्भ्यां सुगाढं जगृहे महर्षे। पैरोंसे भूमिको स्पर्श करते हुए मस्तक उठाकर बलपूर्वक पादेषु भूमिं करयोः स्पृशंश्च अङ्गुलियोंसे उस हाथीकी पूँछ पकड़ ली और सर्पराज मूर्द्धानमुल्लाल्य बलान्महात्मा ॥ ३२ वासुकिसे विरोचनको बाँधकर उसे हाथी और पिलवानके गृह्याङ्गुलीभिंश्च गजस्य पुच्छं सहित उठाकर आकाशमें फेंक दिया ॥ २९-३३॥ कृत्वेह बन्धं भुजगेश्वरेण। वरुणद्वारा फेंका गया विरोचन आकाशसे हाथीसहित उत्पाट्य चिक्षेप विरोचनं हि पृथ्वीपर इस प्रकार आ गिरा, जैसे सूर्यद्वारा पहले सकुञ्जरं खे सनियन्तृवाहम् ॥ ३३ सुकेशी दैत्यका नगर अट्टालिकाओं, यन्त्रों, अर्गलाओं क्षिप्तो जलेशेन विरोचनस्तु एवं महलोंके सहित पृथ्वीपर गिराया गया था। उसके सकुञ्जरो भूमितले पपात। बाद वरुण गदा और पाश लेकर दैत्यको मारनेके लिये साट्टं सन्यन्त्रार्गलहर्म्यभूमिं दौड़े। अब दैत्यलोग मेघ-गर्जन-जैसे जोर-जोरसे रोने पुरं सुकेशेरिव भास्करेण ॥ ३४ लगे-हाय! हाय! राक्षस-सेनाके रक्षक वीर विरोचन ततो जलेशः सगदः सपाशः वरुणद्वारा मारे जा रहे हैं। हे प्रह्लाद! हे जम्भ! हे समभ्यधावद् दितिजं निहन्तुम्। कुजम्भ! तुम सभी अन्धकके साथ आकर (उन्हें) ततः समाक्रन्दमनुत्तमं हि बचाओ। हाय! बलवान् वरुण दैत्यवीर विरोचनको मुक्तं तु दैत्यैर्घनरावतुल्यम् ॥ ३५ वाहनसहित चूर्ण करते हुए उन्हें पाशमें बाँधकर गदासे हा हा हतोऽसौ वरुणेन वीरो इस प्रकार मार रहे हैं, जैसे अश्वमेध यज्ञमें इन्द्र पशुको विरोचनो दानवसैन्यपालः। प्रह्लाद हे जम्भकुजम्भकाद्या रक्षध्वमभ्येत्य सहान्धकेन ॥ ३६ अहो महात्मा बलवाञ्जलेशः संचूर्णयन् दैत्यभटं सवाहम्। पाशेन बद्ध्वा गदया निहन्ति यथा पशुं वाजिमखे महेन्द्रः ॥ ३७ *कणप अस्त्रका वर्णन महाभारत तथा दशकुमारचरितमें आया है।