वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १० तं गर्जमानं वीक्ष्याथ वासवः सायकैर्दृढम् । ववर्ष तान् वारयन् स समभ्यायाच्छतक्रतुम् ॥ ९ आजघान त लेनेभं कुम्भमध्ये पदा करे। जानुना च समाहत्य विषाणं प्रभभञ्ज च ॥ १० वाममुष्ट्या तथा पार्श्वं समाहत्यान्धकस्त्वरन् । गजेन्द्रं पातयामास प्रहारैर्जर्जरीकृतम् ॥ ११ गजेन्द्रात् पतमानाच्च अवप्लुत्य शतक्रतुः । पाणिना वज्रमादाय प्रविवेशामरावतीम् ॥ १२ पराङ्मुखे सहस्त्राक्षे तद् दैवतबलं महत् । पातयामास दैत्येन्द्रः पादमुष्टितलादिभिः ॥ १३ ततो वैवस्वतो दण्डं परिभ्राम्य द्विजोत्तम । समभ्यधावत् प्रह्लादं हन्तुकामः सुरोत्तमः ॥ १४ तमापतन्तं बाणौघैर्ववर्ष रविनन्दनम् । हिरण्यकशिपोः पुत्रश्चापमानम्य वेगवान् ॥ १५ तां बाणवृष्टिमतुलां दण्डेनाहत्य भास्करिः। शातयित्वा प्रचिक्षेप दण्डं लोकभयंकरम् ॥ १६ स वायुपथमास्थाय धर्मराजकरे स्थितः । जज्वाल कालाग्निनिभो यद्वद् दग्धुं जगत्त्रयम् ॥ १७ जाज्वल्यमानमायान्तं दण्डं दृष्ट्वा दितेः सुताः । प्राक्रोशन्ति हतः कष्टं प्रह्लादोऽयं यमेन हि ॥ १८ तमाक्रन्दितमाकर्ण्य हिरण्याक्षसुतोऽन्धकः । प्रोवाच मा भैष्ट मयि स्थिते कोऽयं सुराधमः ॥ १९ इत्येवमुक्त्वा वचनं वेगेनाभिससार च। जग्राह पाणिना दण्डं हसन् सव्येन नारद ॥ २० तमादाय ततो वेगाद् भ्रामयामास चान्धकः। जगर्ज च महानादं यथा प्रावृषि तोयदः ॥ २१ प्रह्लादं रक्षितं दृष्ट्वा दण्डाद् दैत्येश्वरेण हि । साधुवादं ददुर्हष्टा दैत्यदानवयूथपाः ॥ २२ भ्रामयन्तं महादण्डं दृष्ट्वा भानुसुतो मुने। दुःसहं दुर्धरं मत्वा अन्तर्धानमगाद् यमः ॥ २३ अन्तर्हिते धर्मराजे प्रह्लादोऽपि महामुने । दारयामास बलवान् देवसैन्यं समन्ततः ॥ २४ वरुणः शिशुमारस्थो बद्ध्वा पाशैर्महासुरान् । गदया दारयामास तमभ्यगाद् विरोचनः ॥ २५ उसे इस प्रकार गरजते देखकर इन्द्रने उसके ऊपर जोरोंसे बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी। अन्धक भी उनको निवारित करते हुए इन्द्रके पास पहुँच गया। उसने अपने हाथसे ऐरावत हाथीके सिरपर एवं अपने पैरसे सूँड़पर प्रहार कर और घुटनोंसे दाँतोंपर प्रहार कर उन्हें तोड़ डाला। फिर अन्धकने बायीं मुट्ठीसे ऐरावतकी कमरपर शीघ्रतापूर्वक चोट मारकर उसे जर्जर कर गिरा दिया। इन्द्र भी हाथीसे नीचे गिरे जा रहे थे। वे झटसे कूदकर एवं हाथमें वज्र लेकर अमरावतीमें प्रविष्ट हो गये ॥ ९-१२॥ इन्द्रके रणसे विमुख हो जानेपर अन्धकने उस विशाल देव-सेनाको पैर, मुट्ठी एवं थप्पड़ों आदिसे मारकर गिरा दिया। नारदजी ! इसके बाद देवश्रेष्ठ यमराज अपना दण्ड घुमाते हुए प्रह्लादको मारनेकी इच्छासे दौड़ पड़े। यमराजको अपनी ओर आते देख प्रह्लादने भी अपने धनुषको चढ़ाकर फुर्तीसे बाण-समूहोंकी झड़ी लगा दी। यमराजने अपने दण्डके प्रहारसे उस अतुलनीय बाण-वृष्टिको व्यर्थ कर लोकभयकारी दण्ड चला दिया ॥ १३-१६॥ धर्मराजके हाथमें स्थित वह दण्ड हवामें ऊपर घूम रहा था। वह ऐसा लगता था मानो तीनों लोकोंको जलानेके लिये कालाग्नि प्रज्वलित हो रही हो। उस प्रज्वलित दण्डको अपनी ओर आते देखकर दैत्यलोग चिल्लाने लगे- हाय ! हाय ! यमराजने प्रह्लादको मार दिया। उस आक्रन्दनको सुनकर हिरण्याक्षके पुत्र अन्धकने कहा- डरो मत। मेरे रहते ये यमराज क्या वस्तु हैं? नारदजी! ऐसा कहकर वह वेगसे दौड़ पड़ा और हँसते हुए उस दण्डको बायें हाथसे पकड़ लिया ॥ १७-२० ॥ फिर अन्धक उसे लेकर घुमाने लगा और साथ ही वर्षाकालिक मेघके तुल्य वह महानाद करते हुए गर्जन करने लगा। अन्धकके द्वारा यम-दण्डसे प्रह्लादको सुरक्षित देखकर दैत्यों एवं दानवोंके सेनानायक प्रसन्न होकर उसे धन्यवाद देने लगे। मुने! अपने महादण्डको अन्धकद्वारा घुमाते देख सूर्यनय यम दैत्यको दुःसह और दुर्धर समझकर अन्तर्धान हो गये। महामुने! धर्मराजके अन्तर्हित होनेपर अब बली प्रह्लाद भी सभी ओरसे देवसेनाको नष्ट करने लगे ॥ २१-२४॥ वरुणदेव सूँसपर स्थित थे। वे प्रबल असुरोंको अपने पाशोंसे बाँधकर गदाद्वारा विदीर्ण करने लगे। इसपर विरोचनने उनका सामना किया।