भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १० ] अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय ५३

मन्दाकिनीवेगनिभां वहन्तीं<br>प्रवर्तयन्तो भयदां नदीं च ॥ ५०<br>त्रैलोक्यमाकांक्षिभिरुग्रवेगैः<br>सुरासुरैर्नारद संप्रयुद्धे।<br>पिशाचरक्षोगणपुष्टिवर्धनी-<br>मुत्तर्तुमिच्छद्भिरसृग्नदी बभौ ॥ ५१<br>वाद्यन्ति तूर्याणि सुरासुराणां<br>पश्यन्ति खस्था मुनिसिद्धसंघाः।<br>नयन्ति तानप्सरसां गणाग्र्या<br>हता रणे येऽभिमुखास्तु शूराः ॥ ५२उन लोगोंने गङ्गाके समान तीव्र वेगसे प्रवाहित होनेवाली, (किंतु) भयंकर नदीको प्रवर्तित कर दिया। नारदजी! उस युद्धमें तीनों लोकोंको चाहनेवाले उग्रवेगशाली देवता एवं असुरगण पिशाचों एवं राक्षसोंकी पुष्टि बढ़ानेवाली शोणित-सरिताको पार करनेकी इच्छा कर रहे थे। उस समय देवता और दानवोंके बाजे बज रहे थे। आकाशमें स्थित मुनियों और सिद्धोंके समूह उस युद्धको देख रहे थे। जो वीर उस युद्धमें सम्मुख मारे गये थे, उन्हें अप्सराएँ सीधे स्वर्गमें लिये चली जा रही थीं॥ ४९–५२॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें नवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९ ॥


दसवाँ अध्याय

अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय

पुलस्त्य उवाच<br>ततः प्रवृत्ते संग्रामे भीरूणां भयवर्धने।<br>सहस्त्राक्षो महाचापमादाय व्यसृजच्छरान् ॥ १<br>अन्धकोऽपि महावेगं धनुराकृष्य भास्वरम्।<br>पुरंदराय चिक्षेप शरान् बर्हिणवाससः ॥ २<br>तावन्योन्यं सुतीक्ष्णाग्रैः शरैः संनतपर्वभिः।<br>रुक्मपुङ्खैर्महावेगैराजघ्नतुरुभावपि ॥ ३<br>ततः क्रुद्धः शतमखः कुलिशं भ्राम्य पाणिना।<br>चिक्षेप दैत्यराजाय तं ददर्श तथान्धकः ॥ ४<br>आजघान च बाणौघैरस्त्रैः शस्त्रैः स नारद।<br>तान् भस्मसात्तदा चक्रे नगानिव हुताशनः ॥ ५पुलस्त्यजी बोले— तत्पश्चात् भीरुओंके लिये भय बढ़ानेवाला समर आरम्भ हो गया। हजार नेत्रोंवाले इन्द्र अपने विशाल धनुषको लेकर बाणोंकी वर्षा करने लगे। अन्धक भी अपने दीप्तिमान् धनुषको लेकर बड़े वेगसे मयूरपंख लगे बाणोंको इन्द्रपर छोड़ने लगा। वे दोनों एक-दूसरेको झुके हुए पर्वोंवाले स्वर्णपंखयुक्त तथा महावेगवान् तीक्ष्ण बाणोंसे आहत कर दिये। फिर इन्द्रने क्रुद्ध होकर वज्रको अपने हाथसे घुमाकर उसे अन्धकके ऊपर फेंका। नारदजी! अंधकने उसे आते देखा। उसने बाणों, अस्त्रों और शस्त्रोंसे उसपर प्रहार किया; पर अग्नि जिस प्रकार वनों, पर्वतों (या वृक्षों)-को भस्म कर देती है, उसी प्रकार उस वज्रने उन सभी अस्त्रोंको भस्म कर डाला॥ १–५॥
ततोऽतिवेगिनं वज्रं दृष्ट्वा बलवतां वरः।<br>समाप्लुत्य रथात्तस्थौ भुवि बाहुसहायवान् ॥ ६<br>रथं सारथिना सार्धं साश्वध्वजसकूबरम्।<br>भस्म कृत्वाथ कुलिशमन्धकं समुपाययौ ॥ ७<br>तमापतन्तं वेगेन मुष्टिनाहत्य भूतले।<br>पातयामास बलवाञ्जगर्ज च तदाऽन्धकः ॥ ८तब बलवानोंमें श्रेष्ठ अन्धक अति वेगवान् वज्रको आते देखकर रथसे कूदकर बाहुबलका आश्रय लेकर पृथ्वीपर खड़ा हो गया। वह वज्र, सारथि, अश्व, ध्वजा एवं कूबरके साथ रथको भस्मकर इन्द्रके पास पहुँच गया। उस (वज्र)-को वेगपूर्वक आते देख बलवान् अन्धकने मुष्टिसे मारकर उसे भूमिपर गिरा दिया और गर्जन करने लगा॥ ६–८॥