भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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| अध्याय १४ ] | दशाङ्ग-धर्म, आश्रम-धर्म और सदाचार-स्वरूपका वर्णन | ७३ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वल्मीकमृच्चापि हि शौचनाय<br>ग्राह्या सदाचारविदा नरेण ॥ ३२<br>उदङ्मुखः प्राङ्मुखो वापि विद्वान्<br>प्रक्षाल्य पादौ भुवि संनिविष्टः ।<br>समाचमेदद्भिर्फेनिालाभि-<br>रादौ परिमृज्य मुखं द्विरद्भिः ॥ ३३चाहिये। दीमककी बाँबीसे भी शुद्धिके लिये मिट्टी नहीं लेनी चाहिये। विद्वान् पुरुष पैर धोनेके पश्चात् उत्तर या पूर्वमुख बैठकर फेनरहित जलसे पहले मुखको दो बार धोये फिर धोनेके बाद आचमन करे ॥ ३०—३३ ॥
ततः स्पृशेत्खानि शिरः करेण<br>संध्यामुपासीत ततः क्रमेण ।<br>केशांस्तु संशोध्य च दन्तधावनं<br>कृत्वा तथा दर्पणदर्शनं च ॥ ३४<br>कृत्वा शिरःस्नानमथाङ्गिकं वा<br>संपूज्य तोयेन पितॄन् सदेवान् ।<br>होमं च कृत्वालभनं शुभानां<br>कृत्वा बहिर्निर्गमनं प्रशस्तम् ॥ ३५<br>दूर्वादधिसर्पिस्थोदकुम्भं<br>धेनुं सवत्सां वृषभं सुवर्णम् ।<br>मृद्गोमयं स्वस्तिकमक्षतानि<br>लाजामधु ब्राह्मणकन्यकां च ॥ ३६<br>श्वेतानि पुष्पाण्यथ शोभनानि<br>हुताशनं चन्दनमर्कबिम्बम् ।<br>अश्वत्थवृक्षं च समालभेत<br>ततस्तु कुर्यान्निजजातिधर्मम् ॥ ३७आचमन करनेके बाद अपनी इन्द्रियों तथा सिरको हाथसे स्पर्शकर क्रमशः केश-संशोधन, दन्तधावन एवं दर्पण-दर्शनकर संध्योपासन करे। शिरःस्नान (सिरसे पैरतक स्नान) अथवा अर्धस्नान कर पितरों एवं देवताओंका जलसे पूजन करनेके पश्चात् हवन एवं माङ्गलिक वस्तुओंका स्पर्श कर बाहर निकलना प्रशस्त होता है। दूर्वा, दधि, घृत, जलपूर्ण कलश, बछड़ेके साथ गाय, बैल, सुवर्ण, मिट्टी, गोबर, स्वस्तिक चिह्न (卐), अक्षत, लाजा, मधुका स्पर्श करे और ब्राह्मणकी कन्या एवं सूर्यबिम्बका दर्शन करे तथा सुन्दर श्वेतपुष्प, अग्नि, चन्दनका दर्शन कर अश्वत्थ (पीपल) वृक्षका स्पर्श करनेके बाद अपने जाति-धर्म (अपने वर्णके लिये नियतकर्म)-का पालन करे ॥ ३४—३७ ॥
देशानुशिष्टं कुलधर्ममग्र्यं<br>स्वगोत्रधर्मं न हि संत्यजेत ।<br>तेनार्थसिद्धिं समुपाचरेत<br>नासत्प्रलापं न च सत्यहीनम् ॥ ३८<br>न निष्ठुरं नागमशास्त्रहीनं<br>वाक्यं वदेत्साधुजनेन येन ।<br>निन्द्यो भवेन्नैव च धर्मभेदी<br>सङ्गं न चासत्सु नरेषु कुर्यात् ॥ ३९<br>संध्यासु वर्ज्यं सुरतं दिवा च<br>सर्वासु योनीषु पराबलासु ।<br>आगारशून्येषु महीतलेषु<br>रजस्वलास्वेव जलेषु वीर ॥ ४०<br>वृथाऽटनं वृथा दानं वृथा च पशुमारणम् ।<br>न कर्त्तव्यं गृहस्थेन वृथा दारपरिग्रहम् ॥ ४१देश-विहित धर्म, श्रेष्ठ कुलधर्म और गोत्रधर्मका त्याग नहीं करना चाहिये, उसीसे अर्थकी सिद्धि करनी चाहिये। असत्प्रलाप, सत्यरहित, निष्ठुर और वेद-आगमशास्त्रसे असंगत वाक्य कभी न कहे, जिससे साधुजनोंद्वारा निन्दित होना पड़े। किसीके धर्मको हानि न पहुँचाये एवं बुरे लोगोंका सङ्ग भी न करे। वीर! सन्ध्या एवं दिनके समय रति नहीं करनी चाहिये। सभी योनियोंकी परस्त्रियोंमें, गृहहीन पृथ्वीपर, रजस्वला स्त्रीमें तथा जलमें सुरतव्यापार वर्जित है। गृहस्थको व्यर्थ भ्रमण, व्यर्थ दान, व्यर्थ पशुवध तथा व्यर्थ दार-परिग्रह नहीं करना चाहिये ॥ ३८—४१ ॥
वृथाऽटनान्नित्यहानिर्वृथादानाद्धनक्षयः ।<br>वृथा पशुघ्नः प्राप्नोति पातकं नरकप्रदम् ॥ ४२व्यर्थ घूमनेसे नित्यकर्मकी हानि होती है तथा वृथा दानसे धनकी हानि होती है और वृथा पशुवध करनेवाला नरक प्राप्त करानेवाले पापको प्राप्त होता है। अवैध