वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ७२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १४ |
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| ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी<br>भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च।<br>गुरुश्च शुक्रः सह भानुजेन<br>कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ २३<br>भृगुर्वसिष्ठः क्रतुरङ्गिराश्च<br>मनुः पुलस्त्यः पुलहः सगौतमः।<br>रैभ्यो मरीचिश्प्यवनो ऋभुश्च<br>कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ २४<br>सनत्कुमारः सनकः सनन्दनः<br>सनातनोऽप्यासुरिपिङ्गलौ च।<br>सप्त स्वराः सप्त रसातलाश्च<br>कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ २५ | (स्तुति इस प्रकार है—) 'ब्रह्मा, विष्णु, शंकर ये देवता तथा सूर्य, चन्द्रमा, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनैश्चर ग्रह—ये सभी मेरे प्रातःकालको मङ्गलमय बनायें। भृगु, वसिष्ठ, क्रतु, अङ्गिरा, मनु, पुलस्त्य, पुलह, गौतम, रैभ्य, मरीचि, च्यवन तथा ऋभु—ये सभी (ऋषि) मेरे प्रातःकालको मङ्गलमय बनायें। सनत्कुमार, सनक, सनन्दन, सनातन, आसुरि, पिङ्गल, सातों स्वर एवं सातों रसातल—ये सभी मेरे प्रातःकालको मङ्गलमय बनायें'॥ २२–२५॥ | | पृथ्वी सगन्धा सरसास्तथापः<br>स्पर्शश्च वायुर्ज्वलनः सतेजाः।<br>नभः सशब्दं महता सहैव<br>यच्छन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ २६<br>सप्तार्णवाः सप्त कुलाचलाश्च<br>सप्तर्षयो द्वीपवराश्च सप्त।<br>भूरादि कृत्वा भुवनानि सप्त<br>ददन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ २७<br>इत्थं प्रभाते परमं पवित्रं<br>पठेत् स्मरेद्वा शृणुयाच्च भक्त्या।<br>दुःस्वप्ननाशोऽनघ सुप्रभातं<br>भवेच्च सत्यं भगवत्प्रसादात्॥ २८<br>ततः समुत्थाय विचिन्तयेत<br>धर्मं तथार्थं च विहाय शय्याम्।<br>उत्थाय पश्चाद्धरिरित्युदीर्य<br>गच्छेत् तदोत्सर्गविधिं हि कर्तुम्॥ २९ | 'गन्धगुणवाली पृथ्वी, रसगुणवाला जल, स्पर्शगुणवाली वायु, तेजोगुणवाली अग्नि, शब्दगुणवाला आकाश एवं महत्तत्त्व—ये सभी मेरे प्रातःकालको मङ्गलमय बनायें। सातों समुद्र, सातों कुलपर्वत, सप्तर्षि, सातों श्रेष्ठ द्वीप और भू आदि सातों लोक—ये सभी प्रभातकालमें मुझे मङ्गल प्रदान करें।' इस प्रकार प्रातःकालमें परम पवित्र सुप्रभात-स्तोत्रको भक्तिपूर्वक पढ़े, स्मरण करे अथवा सुने। निष्पाप! ऐसा करनेसे भगवान्की कृपासे निश्चय ही उसके दुःस्वप्नका नाश होता है तथा सुन्दर प्रभात होता है। उसके बाद उठकर धर्म तथा अर्थके विषयमें चिन्तन करे और शय्या त्याग करनेके बाद 'हरि'का नाम लेकर उत्सर्ग-विधि (शौच आदि) करनेके लिये जाय॥ २६–२९॥ | | न देवगोब्राह्मणवह्निमार्गे<br>न राजमार्गे न चतुष्पथे च।<br>कुर्यादधोत्सर्गमपीह गोष्ठे<br>पूर्वापरां चैव समाश्रितो गाम्॥ ३०<br>ततस्तु शौचार्थमुपाहरेन्मृदं<br>गुदे त्रयं पाणितले च सप्त।<br>तथोभयोः पञ्च चतुस्तथैकां<br>लिङ्गे तथैकां मृदमाहरेत॥ ३१<br>नान्तर्जलाद्राक्षस मूषिकस्थला-<br>च्छौचावशिष्टा शरणात् तथान्या। | मल-त्याग देवता, गौ, ब्राह्मण और अग्निके मार्ग, राजपथ (सड़क) और चौराहेपर, गोशालामें तथा पूर्व या पश्चिम दिशाकी ओर मुख करके न करे। मलत्यागके बाद फिर शुद्धिके लिये मिट्टी ग्रहण करे और मलद्वारमें तीन बार, बायें हाथमें सात बार तथा दोनों हाथोंमें दस बार एवं लिङ्गमें एक बार मिट्टी लगाये। राक्षस! सदाचार जाननेवाले मनुष्यको जलके भीतरसे, चूहेकी बिलसे, दूसरोंके शौचसे बची हुई एवं गृहसे मिट्टी नहीं लेनी |