वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| अध्याय १४ ] | दशाङ्ग-धर्म, आश्रम-धर्म और सदाचार-स्वरूपका वर्णन | ७१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| उपावृत्तस्ततस्तस्माद् गृहस्थाश्रमकाम्यया।<br>असमानर्षिकुलजां कन्यामुद्वहेद् निशाचर ॥ ११<br><br>स्वकर्मणा धनं लब्ध्वा पितृदेवातिथीनपि।<br>सम्यक् संप्रीणयेद् भक्त्या सदाचाररतो द्विजः ॥ १२ | वहाँकी अवधि समाप्त कर ब्रह्मचारी द्विज गृहस्थाश्रमकी कामनासे अपने गोत्रसे भिन्न गोत्रके ऋषिवाले कुलमें उत्पन्न कन्यासे विवाह करे। सदाचारमें रत द्विज अपने नियत कर्मद्वारा धनोपार्जनकर पितरों, देवों एवं अतिथियोंको अपनी भक्तिसे अच्छी तरह तृप्त करे ॥ ९—१२ ॥ |
| सुकेशिरुवाच<br>सदाचारो निगदितो युष्माभिर्मम सुव्रताः।<br>लक्षणं श्रोतुमिच्छामि कथयध्वं तमद्य मे ॥ १३ | (ब्रह्मचारी ब्राह्मणके नियमोंको सुननेके बाद) सुकेशिने कहा— श्रेष्ठ व्रतवाले ऋषियो! आपलोगोंने मुझसे इसके पूर्व सदाचारका वर्णन किया है। सदाचारका लक्षण क्या है? अब मैं उसे सुनना चाहता हूँ। कृपया मुझसे अब उसका वर्णन करें ॥ १३ ॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>सदाचारो निगदितस्तव योऽस्माभिरादरात्।<br>लक्षणं तस्य वक्ष्यामस्तच्छृणुष्व निशाचर ॥ १४<br><br>गृहस्थेन सदा कार्यमाचारपरिपालनम्।<br>न ह्याचारविहीनस्य भद्रमत्र परत्र च ॥ १५<br><br>यज्ञदानतपांसीह पुरुषस्य न भूतये।<br>भवन्ति यः समुल्लङ्घ्य सदाचारं प्रवर्तते ॥ १६<br><br>दुराचारो हि पुरुषो नेह नामुत्र नन्दते।<br>कार्यो यत्नः सदाचारे आचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ १७ | ऋषियोंने कहा— राक्षस! हमलोगोंने तुमसे श्रद्धापूर्वक जिस सदाचारका वर्णन किया है, उसका (अब) लक्षण बतलाते हैं; तुम उसे सुनो। गृहस्थको आचारका सदा पालन करना चाहिये। आचारहीन व्यक्तिका इस लोक और परलोकमें कल्याण नहीं होता है। सदाचारका उल्लङ्घन कर लोक-व्यवहार तथा शास्त्र-व्यवहार करनेवाले पुरुषके यज्ञ, दान एवं तप कल्याणकर नहीं होते। दुराचारी पुरुष इस लोक तथा परलोकमें सुख नहीं पाता। अतः आचार-पालनमें सदा तत्पर रहना चाहिये। आचार दुर्लक्षणोंको नष्ट कर देता है ॥ १४—१७ ॥ |
| तस्य स्वरूपं वक्ष्यामः सदाचारस्य राक्षस।<br>शृणुष्वैकमनास्तच्च यदि श्रेयोऽभिवाञ्छसि ॥ १८<br>धर्मोऽस्य मूलं धनमस्य शाखा<br>पुष्पं च कामः फलमस्य मोक्षः।<br>असौ सदाचारतरुः सुकेशिन्<br>संसेवितो येन स पुण्यभोक्ता ॥ १९<br>ब्राह्मे मुहूर्ते प्रथमं विबुध्ये-<br>दनुस्मरेद् देववरान् महर्षीन्।<br>प्राभातिकं मङ्गलमेव वाच्यं<br>यदुक्तवान् देवपतिस्त्रिनेत्रः ॥ २० | राक्षस! हम उस (पृष्ट) सदाचारका स्वरूप कहते हैं। यदि तुम कल्याण चाहते हो तो एकाग्रचित्त होकर उसे सुनो। सुकेशिन्! सदाचारका मूल धर्म है, धन इसकी शाखा है, काम (मनोरथ) इसका पुष्प है एवं मोक्ष इसका फल है—ऐसे सदाचाररूपी वृक्षका जो सेवन करता है, वह पुण्यभोगी बन जाता है। मनुष्योंको ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर सर्वप्रथम श्रेष्ठ देवों एवं महर्षियोंका स्मरण करना चाहिये तथा देवाधिदेव महादेवद्वारा कथित प्रभातकालीन मङ्गलस्तोत्रका पाठ करना चाहिये ॥ १८—२० ॥ |
| सुकेशिरुवाच<br>किं तदुक्तं प्रभातं शंकरेण महात्मना।<br>प्रभाते यत् पठन्मर्त्यो मुच्यते पापबन्धनात् ॥ २१ | सुकेशिने पूछा— ऋषियो! महादेव शंकरने कौन-सा 'सुप्रभात' कहा है कि जिसका प्रातःकाल पाठ करनेसे मनुष्य पाप-बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ २१ ॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>श्रूयतां राक्षसश्रेष्ठ सुप्रभातं हरोदितम्।<br>श्रुत्वा स्मृत्वा पठित्वा च सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २२ | ऋषिगण बोले— राक्षसश्रेष्ठ! महादेवजीद्वारा वर्णित 'सुप्रभात' स्तोत्रको सुनो। इसको सुनने, स्मरण करने और पढ़नेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। |