भारतकोश
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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

१५- दैत्योंका धर्म एवं सदाचारका पालन, सुकेशीके नगरका उत्थान-पतन, वरुणा-असीकी महिमा, लोलार्क-प्रसंग

अध्याय १४ ]दशाङ्ग-धर्म, आश्रम-धर्म और सदाचार-स्वरूपका वर्णन७१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उपावृत्तस्ततस्तस्माद् गृहस्थाश्रमकाम्यया।<br>असमानर्षिकुलजां कन्यामुद्वहेद् निशाचर ॥ ११<br><br>स्वकर्मणा धनं लब्ध्वा पितृदेवातिथीनपि।<br>सम्यक् संप्रीणयेद् भक्त्या सदाचाररतो द्विजः ॥ १२वहाँकी अवधि समाप्त कर ब्रह्मचारी द्विज गृहस्थाश्रमकी कामनासे अपने गोत्रसे भिन्न गोत्रके ऋषिवाले कुलमें उत्पन्न कन्यासे विवाह करे। सदाचारमें रत द्विज अपने नियत कर्मद्वारा धनोपार्जनकर पितरों, देवों एवं अतिथियोंको अपनी भक्तिसे अच्छी तरह तृप्त करे ॥ ९—१२ ॥
सुकेशिरुवाच<br>सदाचारो निगदितो युष्माभिर्मम सुव्रताः।<br>लक्षणं श्रोतुमिच्छामि कथयध्वं तमद्य मे ॥ १३(ब्रह्मचारी ब्राह्मणके नियमोंको सुननेके बाद) सुकेशिने कहा— श्रेष्ठ व्रतवाले ऋषियो! आपलोगोंने मुझसे इसके पूर्व सदाचारका वर्णन किया है। सदाचारका लक्षण क्या है? अब मैं उसे सुनना चाहता हूँ। कृपया मुझसे अब उसका वर्णन करें ॥ १३ ॥
ऋषय ऊचुः<br>सदाचारो निगदितस्तव योऽस्माभिरादरात्।<br>लक्षणं तस्य वक्ष्यामस्तच्छृणुष्व निशाचर ॥ १४<br><br>गृहस्थेन सदा कार्यमाचारपरिपालनम्।<br>न ह्याचारविहीनस्य भद्रमत्र परत्र च ॥ १५<br><br>यज्ञदानतपांसीह पुरुषस्य न भूतये।<br>भवन्ति यः समुल्लङ्घ्य सदाचारं प्रवर्तते ॥ १६<br><br>दुराचारो हि पुरुषो नेह नामुत्र नन्दते।<br>कार्यो यत्नः सदाचारे आचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ १७ऋषियोंने कहा— राक्षस! हमलोगोंने तुमसे श्रद्धापूर्वक जिस सदाचारका वर्णन किया है, उसका (अब) लक्षण बतलाते हैं; तुम उसे सुनो। गृहस्थको आचारका सदा पालन करना चाहिये। आचारहीन व्यक्तिका इस लोक और परलोकमें कल्याण नहीं होता है। सदाचारका उल्लङ्घन कर लोक-व्यवहार तथा शास्त्र-व्यवहार करनेवाले पुरुषके यज्ञ, दान एवं तप कल्याणकर नहीं होते। दुराचारी पुरुष इस लोक तथा परलोकमें सुख नहीं पाता। अतः आचार-पालनमें सदा तत्पर रहना चाहिये। आचार दुर्लक्षणोंको नष्ट कर देता है ॥ १४—१७ ॥
तस्य स्वरूपं वक्ष्यामः सदाचारस्य राक्षस।<br>शृणुष्वैकमनास्तच्च यदि श्रेयोऽभिवाञ्छसि ॥ १८<br>धर्मोऽस्य मूलं धनमस्य शाखा<br>पुष्पं च कामः फलमस्य मोक्षः।<br>असौ सदाचारतरुः सुकेशिन्<br>संसेवितो येन स पुण्यभोक्ता ॥ १९<br>ब्राह्मे मुहूर्ते प्रथमं विबुध्ये-<br>दनुस्मरेद् देववरान् महर्षीन्।<br>प्राभातिकं मङ्गलमेव वाच्यं<br>यदुक्तवान् देवपतिस्त्रिनेत्रः ॥ २०राक्षस! हम उस (पृष्ट) सदाचारका स्वरूप कहते हैं। यदि तुम कल्याण चाहते हो तो एकाग्रचित्त होकर उसे सुनो। सुकेशिन्! सदाचारका मूल धर्म है, धन इसकी शाखा है, काम (मनोरथ) इसका पुष्प है एवं मोक्ष इसका फल है—ऐसे सदाचाररूपी वृक्षका जो सेवन करता है, वह पुण्यभोगी बन जाता है। मनुष्योंको ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर सर्वप्रथम श्रेष्ठ देवों एवं महर्षियोंका स्मरण करना चाहिये तथा देवाधिदेव महादेवद्वारा कथित प्रभातकालीन मङ्गलस्तोत्रका पाठ करना चाहिये ॥ १८—२० ॥
सुकेशिरुवाच<br>किं तदुक्तं प्रभातं शंकरेण महात्मना।<br>प्रभाते यत् पठन्मर्त्यो मुच्यते पापबन्धनात् ॥ २१सुकेशिने पूछा— ऋषियो! महादेव शंकरने कौन-सा 'सुप्रभात' कहा है कि जिसका प्रातःकाल पाठ करनेसे मनुष्य पाप-बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ २१ ॥
ऋषय ऊचुः<br>श्रूयतां राक्षसश्रेष्ठ सुप्रभातं हरोदितम्।<br>श्रुत्वा स्मृत्वा पठित्वा च सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २२ऋषिगण बोले— राक्षसश्रेष्ठ! महादेवजीद्वारा वर्णित 'सुप्रभात' स्तोत्रको सुनो। इसको सुनने, स्मरण करने और पढ़नेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है।
७२श्रीवामनपुराण[ अध्याय १४

| ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी<br>भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च।<br>गुरुश्च शुक्रः सह भानुजेन<br>कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ २३<br>भृगुर्वसिष्ठः क्रतुरङ्गिराश्च<br>मनुः पुलस्त्यः पुलहः सगौतमः।<br>रैभ्यो मरीचिश्प्यवनो ऋभुश्च<br>कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ २४<br>सनत्कुमारः सनकः सनन्दनः<br>सनातनोऽप्यासुरिपिङ्गलौ च।<br>सप्त स्वराः सप्त रसातलाश्च<br>कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ २५ | (स्तुति इस प्रकार है—) 'ब्रह्मा, विष्णु, शंकर ये देवता तथा सूर्य, चन्द्रमा, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनैश्चर ग्रह—ये सभी मेरे प्रातःकालको मङ्गलमय बनायें। भृगु, वसिष्ठ, क्रतु, अङ्गिरा, मनु, पुलस्त्य, पुलह, गौतम, रैभ्य, मरीचि, च्यवन तथा ऋभु—ये सभी (ऋषि) मेरे प्रातःकालको मङ्गलमय बनायें। सनत्कुमार, सनक, सनन्दन, सनातन, आसुरि, पिङ्गल, सातों स्वर एवं सातों रसातल—ये सभी मेरे प्रातःकालको मङ्गलमय बनायें'॥ २२–२५॥ | | पृथ्वी सगन्धा सरसास्तथापः<br>स्पर्शश्च वायुर्ज्वलनः सतेजाः।<br>नभः सशब्दं महता सहैव<br>यच्छन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ २६<br>सप्तार्णवाः सप्त कुलाचलाश्च<br>सप्तर्षयो द्वीपवराश्च सप्त।<br>भूरादि कृत्वा भुवनानि सप्त<br>ददन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ २७<br>इत्थं प्रभाते परमं पवित्रं<br>पठेत् स्मरेद्वा शृणुयाच्च भक्त्या।<br>दुःस्वप्ननाशोऽनघ सुप्रभातं<br>भवेच्च सत्यं भगवत्प्रसादात्॥ २८<br>ततः समुत्थाय विचिन्तयेत<br>धर्मं तथार्थं च विहाय शय्याम्।<br>उत्थाय पश्चाद्धरिरित्युदीर्य<br>गच्छेत् तदोत्सर्गविधिं हि कर्तुम्॥ २९ | 'गन्धगुणवाली पृथ्वी, रसगुणवाला जल, स्पर्शगुणवाली वायु, तेजोगुणवाली अग्नि, शब्दगुणवाला आकाश एवं महत्तत्त्व—ये सभी मेरे प्रातःकालको मङ्गलमय बनायें। सातों समुद्र, सातों कुलपर्वत, सप्तर्षि, सातों श्रेष्ठ द्वीप और भू आदि सातों लोक—ये सभी प्रभातकालमें मुझे मङ्गल प्रदान करें।' इस प्रकार प्रातःकालमें परम पवित्र सुप्रभात-स्तोत्रको भक्तिपूर्वक पढ़े, स्मरण करे अथवा सुने। निष्पाप! ऐसा करनेसे भगवान्की कृपासे निश्चय ही उसके दुःस्वप्नका नाश होता है तथा सुन्दर प्रभात होता है। उसके बाद उठकर धर्म तथा अर्थके विषयमें चिन्तन करे और शय्या त्याग करनेके बाद 'हरि'का नाम लेकर उत्सर्ग-विधि (शौच आदि) करनेके लिये जाय॥ २६–२९॥ | | न देवगोब्राह्मणवह्निमार्गे<br>न राजमार्गे न चतुष्पथे च।<br>कुर्यादधोत्सर्गमपीह गोष्ठे<br>पूर्वापरां चैव समाश्रितो गाम्॥ ३०<br>ततस्तु शौचार्थमुपाहरेन्मृदं<br>गुदे त्रयं पाणितले च सप्त।<br>तथोभयोः पञ्च चतुस्तथैकां<br>लिङ्गे तथैकां मृदमाहरेत॥ ३१<br>नान्तर्जलाद्राक्षस मूषिकस्थला-<br>च्छौचावशिष्टा शरणात् तथान्या। | मल-त्याग देवता, गौ, ब्राह्मण और अग्निके मार्ग, राजपथ (सड़क) और चौराहेपर, गोशालामें तथा पूर्व या पश्चिम दिशाकी ओर मुख करके न करे। मलत्यागके बाद फिर शुद्धिके लिये मिट्टी ग्रहण करे और मलद्वारमें तीन बार, बायें हाथमें सात बार तथा दोनों हाथोंमें दस बार एवं लिङ्गमें एक बार मिट्टी लगाये। राक्षस! सदाचार जाननेवाले मनुष्यको जलके भीतरसे, चूहेकी बिलसे, दूसरोंके शौचसे बची हुई एवं गृहसे मिट्टी नहीं लेनी |

| अध्याय १४ ] | दशाङ्ग-धर्म, आश्रम-धर्म और सदाचार-स्वरूपका वर्णन | ७३ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वल्मीकमृच्चापि हि शौचनाय<br>ग्राह्या सदाचारविदा नरेण ॥ ३२<br>उदङ्मुखः प्राङ्मुखो वापि विद्वान्<br>प्रक्षाल्य पादौ भुवि संनिविष्टः ।<br>समाचमेदद्भिर्फेनिालाभि-<br>रादौ परिमृज्य मुखं द्विरद्भिः ॥ ३३चाहिये। दीमककी बाँबीसे भी शुद्धिके लिये मिट्टी नहीं लेनी चाहिये। विद्वान् पुरुष पैर धोनेके पश्चात् उत्तर या पूर्वमुख बैठकर फेनरहित जलसे पहले मुखको दो बार धोये फिर धोनेके बाद आचमन करे ॥ ३०—३३ ॥
ततः स्पृशेत्खानि शिरः करेण<br>संध्यामुपासीत ततः क्रमेण ।<br>केशांस्तु संशोध्य च दन्तधावनं<br>कृत्वा तथा दर्पणदर्शनं च ॥ ३४<br>कृत्वा शिरःस्नानमथाङ्गिकं वा<br>संपूज्य तोयेन पितॄन् सदेवान् ।<br>होमं च कृत्वालभनं शुभानां<br>कृत्वा बहिर्निर्गमनं प्रशस्तम् ॥ ३५<br>दूर्वादधिसर्पिस्थोदकुम्भं<br>धेनुं सवत्सां वृषभं सुवर्णम् ।<br>मृद्गोमयं स्वस्तिकमक्षतानि<br>लाजामधु ब्राह्मणकन्यकां च ॥ ३६<br>श्वेतानि पुष्पाण्यथ शोभनानि<br>हुताशनं चन्दनमर्कबिम्बम् ।<br>अश्वत्थवृक्षं च समालभेत<br>ततस्तु कुर्यान्निजजातिधर्मम् ॥ ३७आचमन करनेके बाद अपनी इन्द्रियों तथा सिरको हाथसे स्पर्शकर क्रमशः केश-संशोधन, दन्तधावन एवं दर्पण-दर्शनकर संध्योपासन करे। शिरःस्नान (सिरसे पैरतक स्नान) अथवा अर्धस्नान कर पितरों एवं देवताओंका जलसे पूजन करनेके पश्चात् हवन एवं माङ्गलिक वस्तुओंका स्पर्श कर बाहर निकलना प्रशस्त होता है। दूर्वा, दधि, घृत, जलपूर्ण कलश, बछड़ेके साथ गाय, बैल, सुवर्ण, मिट्टी, गोबर, स्वस्तिक चिह्न (卐), अक्षत, लाजा, मधुका स्पर्श करे और ब्राह्मणकी कन्या एवं सूर्यबिम्बका दर्शन करे तथा सुन्दर श्वेतपुष्प, अग्नि, चन्दनका दर्शन कर अश्वत्थ (पीपल) वृक्षका स्पर्श करनेके बाद अपने जाति-धर्म (अपने वर्णके लिये नियतकर्म)-का पालन करे ॥ ३४—३७ ॥
देशानुशिष्टं कुलधर्ममग्र्यं<br>स्वगोत्रधर्मं न हि संत्यजेत ।<br>तेनार्थसिद्धिं समुपाचरेत<br>नासत्प्रलापं न च सत्यहीनम् ॥ ३८<br>न निष्ठुरं नागमशास्त्रहीनं<br>वाक्यं वदेत्साधुजनेन येन ।<br>निन्द्यो भवेन्नैव च धर्मभेदी<br>सङ्गं न चासत्सु नरेषु कुर्यात् ॥ ३९<br>संध्यासु वर्ज्यं सुरतं दिवा च<br>सर्वासु योनीषु पराबलासु ।<br>आगारशून्येषु महीतलेषु<br>रजस्वलास्वेव जलेषु वीर ॥ ४०<br>वृथाऽटनं वृथा दानं वृथा च पशुमारणम् ।<br>न कर्त्तव्यं गृहस्थेन वृथा दारपरिग्रहम् ॥ ४१देश-विहित धर्म, श्रेष्ठ कुलधर्म और गोत्रधर्मका त्याग नहीं करना चाहिये, उसीसे अर्थकी सिद्धि करनी चाहिये। असत्प्रलाप, सत्यरहित, निष्ठुर और वेद-आगमशास्त्रसे असंगत वाक्य कभी न कहे, जिससे साधुजनोंद्वारा निन्दित होना पड़े। किसीके धर्मको हानि न पहुँचाये एवं बुरे लोगोंका सङ्ग भी न करे। वीर! सन्ध्या एवं दिनके समय रति नहीं करनी चाहिये। सभी योनियोंकी परस्त्रियोंमें, गृहहीन पृथ्वीपर, रजस्वला स्त्रीमें तथा जलमें सुरतव्यापार वर्जित है। गृहस्थको व्यर्थ भ्रमण, व्यर्थ दान, व्यर्थ पशुवध तथा व्यर्थ दार-परिग्रह नहीं करना चाहिये ॥ ३८—४१ ॥
वृथाऽटनान्नित्यहानिर्वृथादानाद्धनक्षयः ।<br>वृथा पशुघ्नः प्राप्नोति पातकं नरकप्रदम् ॥ ४२व्यर्थ घूमनेसे नित्यकर्मकी हानि होती है तथा वृथा दानसे धनकी हानि होती है और वृथा पशुवध करनेवाला नरक प्राप्त करानेवाले पापको प्राप्त होता है। अवैध
७४श्रीवामनपुराण[ अध्याय १४ ]
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
संतत्या हानिरश्लाघ्या वर्णसंकरतो भयम्।<br>भेतव्यं च भवेल्लोके वृथादारपरिग्रहात् ॥ ४३<br>परस्वे परदारे च न कार्या बुद्धिरुत्तमैः।<br>परस्वं नरकायैव परदाराश्च मृत्यवे ॥ ४४<br>नेक्षेत् परस्त्रियं नग्नां न सम्भाषेत तस्करान्।<br>उदक्यादर्शनं स्पर्शं संभाषं च विवर्जयेत् ॥ ४५स्त्री-संग्रहसे सन्तानकी निन्दनीय हानि, वर्णसांकर्यका भय तथा लोकमें भी भय होता है। उत्तम व्यक्ति परधन तथा परस्त्रीमें बुद्धि न लगाये। परधन नरक देनेवाला और परस्त्री मृत्युका कारण होती है। परस्त्रीको नग्नावस्थामें न देखे, चोरोंसे बातचीत न करे एवं रजस्वला स्त्रीको न तो देखे, न उसका स्पर्श ही करे और न उससे बातचीत ही करे॥ ४२—४५॥
नैकासने तथा स्थेयं सोदर्या परजायया।<br>तथैव स्यान्न मातुश्च तथा स्वदुहितुस्त्वपि ॥ ४६<br>न च स्नायीत वै नग्नो न शयीत कदाचन।<br>दिग्वाससोऽपि न तथा परिभ्रमणमिष्यते।<br>भिन्नासनभाजनादीन् दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ४७<br>नन्दासु नाभ्यङ्गमुपाचरेत<br>क्षौरं च रिक्तासु जयासु मांसम्।<br>पूर्णासु योषित्परिवर्जयेत<br>भद्रासु सर्वाणि समाचरेत ॥ ४८<br>नाभ्यङ्गमर्के न च भूमिपुत्रे<br>क्षौरं च शुक्रे रविजे च मांसम्।<br>बुधेषु योषिन्न समाचरेत<br>शेषेषु सर्वाणि सदैव कुर्यात् ॥ ४९अपनी बहन तथा परस्त्रीके साथ एक आसनपर न बैठे। इसी प्रकार अपनी माता तथा कन्याके साथ भी एक आसनपर न बैठे। नग्न होकर स्नान और शयन न करे। वस्त्रहीन होकर इधर-उधर न घूमे, टूटे आसन और बर्तन आदिको अलग रख दे। नन्दा (प्रतिपद्, षष्ठी और एकादशी) तिथियोंमें तेलसे मालिश न करे, रिक्ता (चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी) तिथियोंमें क्षौर कर्म न करे (न कराये) तथा जया (तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी) तिथियोंमें फलका गूदा नहीं खाना चाहिये। पूर्णा (पञ्चमी, दशमी और पूर्णिमा) तिथियोंमें स्त्रीका सम्पर्क न करे तथा भद्रा (द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी) तिथियोंमें सभी कार्य करे। रविवार एवं मङ्गलवारको तेलकी मालिश, शुक्रवारको क्षौरकर्म नहीं कराना चाहिये (न करना चाहिये)। शनिवारको फलका गूदा न खाये तथा बुधवारको स्त्री वर्ज्य है। शेष दिनोंमें सभी कार्य सदैव कर्तव्य हैं॥ ४६—४९॥
चित्रासु हस्ते श्रवणे न तैलं<br>क्षौरं विशाखास्वभिजित्सु वर्ज्यम्।<br>मूले मृगे भाद्रपदास मांसं<br>योषिन्मघाकृत्तिकयोत्तरासु ॥ ५०<br>सदैव वर्ज्यं शयनमुदक्शिरा-<br>स्तथा प्रतीच्यां रजनीचरेश।<br>भुञ्जीत नैवेह च दक्षिणामुखो<br>न च प्रतीच्यामभिभोजनीयम् ॥ ५१<br>देवालयं चैत्यतरुं चतुष्पथं<br>विद्याधिकं चापि गुरुं प्रदक्षिणम्।<br>माल्यान्नपानं वसनानि यत्नतो<br>नान्यैर्धृतांश्चापि हि धारयेद् बुधः ॥ ५२<br>स्नायाच्छिरःस्नानतया च नित्यं<br>न कारणं चैव विना निशासु।<br>ग्रहोपरागे स्वजनापयाते<br>मुक्त्वा च जन्मर्क्षगते शशाङ्के ॥ ५३चित्रा, हस्त और श्रवण नक्षत्रोंमें तेल तथा विशाखा और अभिजित् नक्षत्रोंमें क्षौर-कार्य नहीं करना-कराना चाहिये। मूल, मृगशिरा, पूर्वाभाद्रपद और उत्तराभाद्रपदमें गूदा-भक्षण तथा मघा, कृत्तिका और तीनों उत्तरा (उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद)-में स्त्री-सहवास न करे। राक्षसराज! उत्तर एवं पश्चिमकी ओर सिर करके शयन नहीं करना चाहिये। दक्षिण एवं पश्चिममुख भोजन नहीं करना चाहिये। देवमन्दिर, चैत्य-वृक्ष, देवताके समान पूज्य पीपल आदिके वृक्ष, चौराहे, अपनेसे अधिक विद्वान् तथा गुरुकी प्रदक्षिणा करे। बुद्धिमान् व्यक्ति यत्नपूर्वक दूसरेके द्वारा व्यवहृत माला, अन्न और वस्त्रका व्यवहार न करे। नित्य सिरके ऊपरसे स्नान करे। ग्रहोपराग (ग्रहणके समय) और स्वजनकी मृत्यु तथा जन्म-नक्षत्रमें चन्द्रमाके रहनेके अतिरिक्त समयमें रात्रिमें बिना विशेष कारण स्नान नहीं करना चाहिये॥ ५०—५३॥

१६- देवताओंका शयन-तिथियों और उनके अशून्यशयन आदि व्रतों एवं शिव-पूजनका वर्णन

७६श्रीवामनपुराण[ अध्याय १४
श्लोकअर्थ
कर्मान्ताङ्गारशालासु स्तनंधयसुताः स्त्रियः।<br>वाग्विप्रुषो द्विजेन्द्राणां संतप्ताश्चाम्बुबिन्दवः॥ ६७कर्मशाला, अन्तर्गृह एवं अग्निशालामें दुधमुँहे बच्चोंको ली हुई स्त्रियाँ, सम्भाषण करते हुए विद्वान् ब्राह्मणोंके मुखके छींटे तथा उष्ण जलके बिन्दु पवित्र होते हैं।
भूमिर्विशुध्यते खातदाहमार्जनगोक्रमैः।<br>लेपादुल्लेखनात् सेकाद् वेश्मसंमार्जनार्चनात्॥ ६८पृथ्वीकी शुद्धि खोदने, जलाने, झाडू देने, गौओंके चलने, लीपने, खरोंचने तथा सींचनेसे होती है और गृहकी शुद्धि झाडू देने, जलके छिड़कने तथा पूजा आदिसे होती है।
केशकीटावपनेऽन्ने गोघ्राते मक्षिकान्विते।<br>मृदम्बुभस्मक्षाराणि प्रक्षेप्तव्यानि शुद्धये॥ ६९केश, कीट पड़े हुए और मक्खीके बैठ जानेपर तथा गायके द्वारा सूँघे जानेपर अन्नकी शुद्धिके लिये उसपर जल, भस्म, क्षार या मृत्तिका छिड़कनी चाहिये।
औदुम्बराणां चाम्लेन क्षारेण त्रपुसीसयोः।<br>भस्माम्बुभिश्च कांस्यानां शुद्धिः प्लावो द्रव्यस्य च॥ ७०ताम्रपात्रकी शुद्धि खटाईसे, जस्ते और शीशेकी क्षारके द्वारा, काँसेकी वस्तुएँ भस्म और जलके द्वारा तथा तरल पदार्थ कुछ अंशको बहा देनेसे शुद्ध हो जाते हैं¹॥ ६७–७०॥
अमेध्याक्तस्य मृत्तोयैर्गन्धापहरणेन च।<br>अन्येषामपि द्रव्याणां शुद्धिर्गन्धापहारतः॥ ७१अपवित्र वस्तुसे मिले पदार्थ जल और मिट्टीसे धोने तथा दुर्गन्ध दूर कर देनेसे शुद्ध होते हैं। अन्य (गन्धवाले) पदार्थोंकी शुद्धि भी गन्ध दूर करनेसे होती है।
मातुः प्रस्रवणे वत्सः शकुनिः फलपातने।<br>गर्दभो भारवाहित्वे श्वा मृगग्रहणे शुचिः॥ ७२माताके स्तनको प्रस्रुत कराने (पेन्हाने)-में बछड़ा, वृक्षसे फल गिरानेमें पक्षी, बोझा ढोनेमें गधा और शिकार पकड़नेमें कुत्ता शुद्ध (माना गया) है।
रथ्याकर्दमतोयानि नावः पथि तृणानि च।<br>मारुतेनैव शुद्ध्यन्ति पक्केष्टकचितानि च॥ ७३मार्गके कीचड़ और जल, नाव तथा रास्तेकी घास, तृण एवं पके हुए ईंटोंके समूह वायुके द्वारा ही शुद्ध हो जाते हैं।
शृतं द्रोणाढकस्याननममेध्याभिप्लुतं भवेत्।<br>अग्रमुद्धृत्य संत्याज्यं शेषस्य प्रोक्षणं स्मृतम्॥ ७४यदि एक द्रोण (ढाई सेरसे अधिक) पके अन्नके अपवित्र वस्तुसे सम्पर्क हो जाय तो उसके ऊपरका अंश निकाल कर फेंक देना एवं शेषपर जल छिड़क देना चाहिये। इससे उसकी शुद्धि हो जाती है।
उपवासं त्रिरात्रं वा दूषितान्नस्य भोजने।<br>अज्ञाते ज्ञातपूर्वे च नैव शुद्धिर्विधीयते॥ ७५अज्ञातरूपसे दूषित अन्न खा लेनेपर तीन रात्रितक उपवास करनेसे शुद्धि हो जानेका विधान है, किंतु जान-बूझकर दूषित अन्न खानेपर शुद्धि नहीं हो सकती॥ ७१–७५॥
उदक्याश्वाननग्नांश्च सूतिकान्त्यावसायिनः।<br>स्पृष्ट्वा स्नायीत शौचार्थं तथैव मृतहारिणः॥ ७६रजस्वला स्त्री, कुत्ता, नग्न (दिगम्बर साधु),² प्रसूता स्त्री, चाण्डाल और शववाहकोंका स्पर्श हो जानेपर अपवित्र हुए व्यक्तिको पवित्र होनेके लिये स्नान करना चाहिये।
सस्नेहमस्थि संस्पृश्य सवासाः स्नानमाचरेत्।<br>आचम्यैव तु निःस्नेहं गामलभ्यार्कमीक्ष्य च॥ ७७मज्जायुक्त हड्डीके छू जानेपर वस्त्रसहित स्नान करना चाहिये, किंतु सूखी हड्डीका स्पर्श होनेपर आचमन करने, गो-स्पर्श तथा सूर्यदर्शन करनेमात्रसे ही

१-द्रव्यशुद्धिका यह प्रकरण मनुस्मृति ५। ११०–१४६ तथा याज्ञवल्क्यस्मृति १। १८२–१९७ आदिमें भी प्रायः इसी भावका है।
२-पद्मपुराण आदिमें नग्न-धर्मविपाक प्रश्नोत्तर द्रष्टव्य है।

| अध्याय १४ ] | दशाङ्ग-धर्म, आश्रम-धर्म और सदाचार-स्वरूपका वर्णन | ७७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
न लङ्घयेत्पुरीषासृक्ष्ठीवनोद्वर्त्तनानि च।<br>गृहादुच्छिष्टविण्मूत्रे पादाम्भांसि क्षिपेद बहिः॥ ७८<br><br>पञ्चपिण्डाननुद्धृत्य न स्नायात् परवारिणि।<br>स्नायीत देवखातेषु सरोह्रदसरित्सु च॥ ७९शुद्धि हो जाती है। विष्ठा, रक्त, थूक एवं उबटनका उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। जूठे पदार्थ, विष्ठा, मूत्र एवं पैर धोनेके जलको घरसे बाहर फेंक देना चाहिये। दूसरेके द्वारा निर्मित बावली आदिमें मिट्टीके पाँच टुकड़ोंके निकाले बिना स्नान नहीं करना चाहिये। (मुख्यतः) देव-निर्मित झीलोंमें, ताल-तलैयों और नदियोंमें स्नान करना चाहिये॥ ७६-७९॥
नोद्यानादौ विकालेषु प्राज्ञस्तिष्ठेत् कदाचन।<br>नालपेज्जनविद्विष्टं वीरहीनां तथा स्त्रियम्॥ ८०बुद्धिमान् पुरुष बाग-बगीचोंमें असमयमें कभी न ठहरे। लोगोंसे द्वेष रखनेवाले व्यक्ति तथा पति-पुत्रसे रहित स्त्रीसे वार्तालाप नहीं करना चाहिये।
देवतापितृसच्छास्त्रयज्ञवेदादिनिन्दकैः ।<br>कृत्वा तु स्पर्शमालापं शुद्ध्येते कर्मावलोकनात्॥ ८१देवता, पितरों, भले शास्त्रों (पुराण, धर्मशास्त्र, रामायण आदि), यज्ञ एवं वेदादिके निन्दकोंका स्पर्श और उनके साथ वार्तालाप करनेपर मनुष्य अपवित्र हो जाता है, वह सूर्यदर्शन करनेपर शुद्ध होता है। उसकी शुद्धि भगवान् सूर्यके समक्ष उपस्थान करके अपने किये हुए स्पर्श और वार्तालाप कर्मके त्याग तथा पश्चात्ताप करनेसे होती है।
अभोज्याः सूतिकाषण्ढमार्जारारखुश्वकुक्कुटाः।<br>पतितापविद्धनग्राश्चाण्डालाधामश्च ये॥ ८२सूतिक, नपुंसक, बिलाव, चूहा, कुत्ते, मुर्गे, पतित, नग्न (विधर्मी) (इनके लक्षण आगे बतलाये जायेंगे) समाजसे बहिष्कृत और जो चाण्डाल आदि अधम प्राणी हैं उनके यहाँ भोजन नहीं करना चाहिये॥ ८०-८२॥
सुकेशिरुवाच<br>भवद्भिः कीर्तिताऽभोज्या य एते सूतिकादयः।<br>अमीषां श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतो लक्षणानि हि॥ ८३**सुकेशि बोला—**ऋषियो! आपलोगोंने जिन सूतिक आदिका अन्न अभक्ष्य कहा है, मैं उनके लक्षण विस्तारसे सुनना चाहता हूँ॥ ८३॥
ऋषय ऊचुः<br>ब्राह्मणी ब्राह्मणस्यैव याऽवरोधत्वमागता।<br>तावुभौ सूतिकेत्युक्तौ तयोरन्नं विगर्हितम्॥ ८४**ऋषियोंने कहा—**सुकेशि! अन्य ब्राह्मणके साथ ब्राह्मणीके व्यभिचरित होनेपर उन दोनोंको ही ‘सूतिक' कहा जाता है। उन दोनोंका अन्न निन्दित है।
न जुहोत्युचिते काले न स्नाति न ददाति च।<br>पितृदेवार्चनाद्धीनः स षण्ढः परगीयते॥ ८५उचित समयपर हवन, स्नान और दान न करनेवाला तथा पितरों एवं देवताओंकी पूजासे रहित व्यक्तिको ही यहाँ 'षण्ढ' या नपुंसक कहा गया है।
दम्भार्थं जपते यश्च तप्यते यजते तथा।<br>न परत्रार्थमुद्युक्तो स मार्जारः प्रकीर्तितः॥ ८६दम्भके लिये जप, तप और यज्ञ करनेवाले तथा परलोकार्थ उद्योग न करनेवाले व्यक्तिको यहाँ 'मार्जार' या 'बिलाव' कहा गया है।
विभवे सति नैवात्ति न ददाति जुहोति च।<br>तमाहुराखुं तस्यानं भुक्त्वा कृच्छ्रेण शुद्ध्यति ॥ ८७ऐश्वर्य रहते हुए भोग, दान एवं हवन न करनेवालेको 'आखु' (चूहा) कहते हैं। उसका अन्न खानेपर मनुष्य कृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्ध होता है॥ ८४-८७॥

| ७८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १४ | | :--- | :--- |

Sanskrit ShlokasHindi Translation
यः परेषां हि मर्माणि निकृन्तन्निव भाषते।<br>नित्यं परगुणद्वेषो स श्वान इति कथ्यते॥ ८८<br><br>सभागतानां यः सभ्यः पक्षपातं समाश्रयेत्।<br>तमाहुः कुक्कुटं देवास्तस्याप्यन्नं विगर्हितम्॥ ८९<br><br>स्वधर्मं यः समुत्सृज्य परधर्मं समाश्रयेत्।<br>अनापदि स विद्वद्भिः पतितः परिकीर्त्यते॥ ९०<br><br>देवत्यागी पितृत्यागी गुरुभक्त्यरदस्तथा।<br>गोब्राह्मणस्त्रीवधकृदपविद्धः स कीर्त्यते॥ ९१दूसरोंका मर्म भेदन करते हुए बातचीत करनेवाले तथा दूसरेके गुणोंसे द्वेष करनेवालेको ‘श्वान’ या ‘कुत्ता’ कहा गया है। सभामें आगत व्यक्तियोंमें जो सभ्य व्यक्ति पक्षपात करता है, उसे देवताओंने ‘कुक्कुट’ (मुर्गा) कहा है; उसका भी अन्न निन्दित है। विपत्तिकालके अतिरिक्त अन्य समयमें अपना धर्म छोड़कर दूसरेका धर्म ग्रहण करनेवालेको विद्वानोंने ‘पतित’ कहा है। देवत्यागी, पितृत्यागी, गुरुभक्तिसे विमुख तथा गो, ब्राह्मण एवं स्त्रीकी हत्या करनेवालेको ‘अपविद्ध’ कहा जाता है॥ ८८—९१ ॥
येषां कुले न वेदोऽस्ति न शास्त्रं नैव च व्रतम्।<br>ते नग्नाः कीर्तिताः सद्भिस्तेषामन्नं विगर्हितम्॥ ९२<br><br>आशार्तानामदाता च दातुश्च प्रतिषेधकः।<br>शरणागतं यस्त्यजति स चाण्डालोऽधमो नरः॥ ९३<br><br>यो बान्धवैः परित्यक्तः साधुभिर्ब्राह्मणैरपि।<br>कुण्डाशीयश्च तस्यान्नं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्॥ ९४<br><br>यो नित्यकर्मणो हानिं कुर्यान्नैमित्तिकस्य च।<br>भुक्तवान्नं तस्य शुद्ध्येत त्रिरात्रोपोषितो नरः॥ ९५जिनके कुलमें वेद, शास्त्र एवं व्रत नहीं हैं, उन्हें सज्जन लोग ‘नग्न’ कहते हैं। उनका अन्न निन्दित है। आशा रखनेवालोंको न देनेवाला, दाताको मना करनेवाला तथा शरणागतका परित्याग करनेवाला अधम मनुष्य ‘चाण्डाल’ कहा जाता है। बान्धवों, साधुओं एवं ब्राह्मणोंसे त्यागा गया तथा कुण्ड (पतिके जीवित रहनेपर परपुरुषसे उत्पन्न पुत्र)-के यहाँ अन्न खानेवालेको चान्द्रायण व्रत करना चाहिये। नित्य और नैमित्तिक कर्म न करनेवाले व्यक्तिका अन्न खानेपर मनुष्य तीन राततक उपवास करनेसे शुद्ध होता है॥ ९२—९५ ॥
गणकस्य निषादस्य गणिकाभिषजोस्तथा।<br>कदर्यस्यापि शुद्ध्येत त्रिरात्रोपोषितो नरः॥ ९६<br><br>नित्यस्य कर्मणो हानिः केवलं मृतजन्मसु।<br>न तु नैमित्तिकोच्छेदः कर्तव्यो हि कथंचन॥ ९७<br><br>जाते पुत्रे पितुः स्नानं सचैलस्य विधीयते।<br>मृते च सर्वबन्धूनामित्याह भगवान् भृगुः॥ ९८<br><br>प्रेताय सलिलं देयं बहिर्दग्ध्वा तु गोत्रजैः।<br>प्रथमेऽह्नि चतुर्थे वा सप्तमे वाऽस्थिसंचयम्॥ ९९गणक (ज्योतिषी), निषाद (मल्लाह), वेश्या, वैद्य तथा कृपणका अन्न खानेपर भी मनुष्य तीन दिन उपवास करनेपर शुद्ध होता है। घरमें जन्म या मृत्यु होनेपर नित्यकर्म रुक जाते हैं, किंतु नैमित्तिक कर्म कभी बंद नहीं करना चाहिये। भगवान् भृगुने कहा है कि पुत्र उत्पन्न होनेपर पिताके लिये एवं मरणमें सभी बन्धुओंके लिये वस्त्रके साथ स्नान करना चाहिये। ग्रामके बाहर शवदाह करना चाहिये। शवदाह करनेके बाद सगोत्रलोग प्रेतके उद्देश्यसे जलदान (तिलाञ्जलि) करें तथा पहले दिन या चौथे अथवा सातवें दिन अस्थि-चयन करें॥ ९६—९९ ॥
ऊर्ध्वं संचयनात्तेषामङ्गस्पर्शो विधीयते।<br>सोदकैस्तु क्रिया कार्या संशुद्धैस्तु सपिण्डजैः॥ १००अस्थि-चयनके बाद अङ्ग-स्पर्शका विधान है।<br><br>शुद्ध होकर सोदकों (चौदह पीढ़ीके अन्तर्गतके लोगों)<br><br>एवं सपिण्डजों (सात पीढ़ीके अंदरके लोगों)-को<br><br>और्ध्वदैहिक क्रिया (मरनेके बाद की जानेवाली विहित

अध्याय १४ ] दशाङ्ग-धर्म, आश्रम-धर्म और सदाचार-स्वरूपका वर्णन ७९


विषोद्वन्धनशस्त्राम्बुवह्निपातमृतेषु च।<br>बाले प्रव्राजि संन्यासे देशान्तरमृते तथा॥ १०१<br><br>सद्यः शौचं भवेद्वीर तच्चाप्युक्तं चतुर्विधम्।<br>गर्भस्रावे तदेवोक्तं पूर्णकालेन चेतरे॥ १०२<br><br>ब्राह्मणानामहोरात्रं क्षत्रियाणां दिनत्रयम्।<br>षड्रात्रं चैव वैश्यानां शूद्राणां द्वादशाहिकम्॥ १०३क्रिया) करनी चाहिये। हे वीर! विष, बन्धन, शस्त्र, जल, अग्नि और गिरनेसे मृत्युके होनेपर तथा बालक, परिव्राजक, संन्यासीकी एवं किसी व्यक्तिकी दूर देशमें मृत्यु होनेपर तत्काल शुद्धि हो जाती है। वह शुद्धि भी चार प्रकारकी कही गयी है। गर्भस्रावमें भी शीघ्र ही शुद्धि होती है। अन्य अशौच पूरे समयपर ही दूर होते हैं। (वह सद्यः शौच) ब्राह्मणोंका एक अहोरात्रका, क्षत्रियोंका तीन दिनोंका, वैश्योंका छः दिनोंका एवं शूद्रोंका बारह दिनोंका होता है॥ १००—१०३॥
दशद्वादशमासार्द्धमाससंख्यैर्दिनैश्च तैः।<br>स्वाः स्वाः कर्मक्रियाः कुर्युः सर्वे वर्णा यथाक्रमम्॥ १०४<br><br>प्रेतमुद्दिश्य कर्तव्यमेकोद्दिष्टं विधानतः।<br>सपिण्डीकरणं कार्यं प्रेते आवत्सरान्तरे॥ १०५<br><br>ततः पितृत्वमापन्ने दर्शपूर्णादिभिः शुभैः।<br>प्रीणनं तस्य कर्त्तव्यं यथा श्रुतिनिदर्शनात्॥ १०६<br><br>पितुरर्थं समुद्दिश्य भूमिदानादिकं स्वयम्।<br>कुर्यात्तेनास्य सुप्रीताः पितरो यान्ति राक्षस॥ १०७सभी वर्णोंके लोग (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) क्रमशः दस, बारह, पंद्रह दिन एवं एक मासके अन्तरपर अपनी-अपनी क्रियाएँ करें। प्रेतके उद्देश्यसे विधिके अनुसार एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिये। मरनेके एक वर्ष बीत जानेपर मनुष्यको सपिण्डीकरण श्राद्ध करना चाहिये। उसके बाद प्रेतके पितर हो जानेपर अमावास्या और पूर्णिमा तिथिके दिन वेदविहित विधिसे उनका तर्पण करना चाहिये। राक्षस! पिताके उद्देश्यसे स्वयं भूमिदान आदि करे, जिससे पितृगण इसके ऊपर प्रसन्न हो जायँ॥ १०४-१०७॥
यद् यदिष्टतमं किंचिद् यच्चास्य दयितं गृहे।<br>त्तत्तद् गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता॥ १०८<br><br>अध्येतव्या त्रयी नित्यं भाव्यं च विदुषा सदा।<br>धर्मतो धनमाहार्यं यष्टव्यं चापि भक्तितः॥ १०९<br><br>यच्चापि कुर्वतो नात्मा जुगुप्सामेति राक्षस।<br>तत् कर्त्तव्यमशङ्केन यन्न गोप्यं महाजने॥ ११०<br><br>एवमाचरतो लोके पुरुषस्य गृहे सतः।<br>धर्मार्थकामसम्प्राप्तिं परत्रेह च शोभनम्॥ १११व्यक्तिकी जीवित-अवस्था में घरमें जो-जो पदार्थ उसको अत्यन्त अभिलषित एवं प्रिय रहा हो, उसकी अक्षयताकी कामना करते हुए गुणवान् पात्रको दान देना चाहिये। सदा त्रयी अर्थात् ऋक्, यजुः और सामवेदका अध्ययन करना चाहिये, विद्वान् बनना चाहिये, धर्मपूर्वक धनार्जन एवं यथाशक्ति यज्ञ करना चाहिये। राक्षस! मनुष्यको जिस कार्यके करनेसे कर्त्ताकी आत्मा निन्दित न हो एवं जो कार्य बड़े लोगोंसे छिपाने योग्य न हो ऐसा कार्य निःशङ्क (आसक्तिरहित) होकर करना चाहिये। इस प्रकारके आचरण करनेवाले पुरुषके गृहस्थ होनेपर भी उसे धर्म, अर्थ एवं कामकी प्राप्ति होती है तथा वह व्यक्ति इस लोक और परलोकमें कल्याणका भागी होता है॥ १०८—१११॥
एष तूद्देशतः प्रोक्तो गृहस्थाश्रम उत्तमः।<br>वानप्रस्थाश्रमं धर्मं प्रवक्ष्यामोऽवधार्यताम्॥ ११२ऋषियोंने सुकेशिसे कहा— सुकेशि! अबतक हमने संक्षेपसे उत्तम गृहस्थाश्रमका वर्णन किया है। अब हम वानप्रस्थ-आश्रमके धर्मका वर्णन करेंगे, उसे

१७- देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत-विधान, विष्णु-पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग

८० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १४


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अपत्यसंततिं दृष्ट्वा प्राज्ञो देहस्य चानतिम्।<br>वानप्रस्थाश्रमं गच्छेद्रात्मनः शुद्धिकारणम्॥ ११३<br><br>तत्रारण्योपभोगैश्च तपोभिश्चात्मकर्षणम्।<br>भूमौ शय्या ब्रह्मचर्यं पितृदेवातिथिक्रिया॥ ११४<br><br>होमस्त्रिषवणं स्नानं जटावल्कलधारणम्।<br>वन्यस्नेहनिषेवित्वं वानप्रस्थविधिस्त्वयम्॥ ११५ध्यानपूर्वक सुनो। बुद्धिमान् व्यक्ति पुत्रकी संतान (पौत्र) और अपने शरीरकी गिरती अवस्था देखकर अपने आत्माकी शुद्धिके लिये वानप्रस्थ-आश्रमको ग्रहण करे। वहाँ अरण्यमें उत्पन्न मूल-फल आदिसे अपना जीवन-यापन करते हुए तपद्वारा शरीर-शोषण करे। इस आश्रममें भूमिपर शयन, ब्रह्मचर्यका पालन एवं पितर, देवता तथा अतिथियोंकी पूजा करे। हवन, तीनों काल—प्रातः, मध्याह्न, सन्ध्याकाल—स्नान, जटा और वल्कलका धारण तथा वन्य फलोंसे निकाले रसका सेवन करे। यही वानप्रस्थ-आश्रमकी विधि है॥ ११२—११५॥
सर्वसङ्गपरित्यागो ब्रह्मचर्यममानिता।<br>जितेन्द्रियत्वमावासे नैकस्मिन् वसतिश्चिरम्॥ ११६<br><br>अनारम्भस्तथाहारो भैक्षान्नं नातिकोपिता।<br>आत्मज्ञानावबोधेच्छा तथा चात्मावबोधनम्॥ ११७<br><br>चतुर्थे त्वाश्रमे धर्मा अस्माभिस्ते प्रकीर्तिताः।<br>वर्णधर्माणि चान्यानि निशामय निशाचर॥ ११८<br><br>गार्हस्थ्यं ब्रह्मचर्यं च वानप्रस्थं त्रयाश्रमाः।<br>क्षत्रियस्यापि कथिता ये चाचारा द्विजस्य हि॥ ११९[चतुर्थ आश्रम (संन्यास)-के धर्म ये हैं—]<br>सभी प्रकारकी आसक्तियोंका त्याग, ब्रह्मचर्य, अहंकारका अभाव, जितेन्द्रियता, एक स्थानपर अधिक समयतक न रहना, उद्योगका अभाव, भिक्षान्न-भोजन, क्रोधका त्याग, आत्मज्ञानकी इच्छा तथा आत्मज्ञान। निशाचर! हमने तुमसे चतुर्थ-आश्रम (संन्यास)-के इन धर्मोंका वर्णन किया। अब अन्य वर्ण-धर्मोंको सुनो। क्षत्रियोंके लिये भी गार्हस्थ्य, ब्रह्मचर्य एवं वानप्रस्थ—इन तीन आश्रमों एवं ब्राह्मणोंके लिये विहित आचारोंका विधान है॥ ११६—११९॥
वैखानसत्वं गार्हस्थ्यमाश्रमद्वितयं विशः।<br>गार्हस्थ्यमुत्तमं त्वेकं शूद्रस्य क्षणदाचर॥ १२०<br><br>स्वानि वर्णाश्रमोक्तानि धर्माणीह न हापयेत्।<br>यो हापयति तस्यासौ परिकुप्यति भास्करः॥ १२१<br><br>कुपितः कुलनाशाय ईश्वरो रोगवृद्धये।<br>भानुर्वै यतते तस्य नरस्य क्षणदाचर॥ १२२<br><br>तस्मात् स्वधर्मं न हि संत्यजेत<br>न हापयेच्चापि हि नात्मवंशम्।<br>यः संत्यजेच्चापि निजं हि धर्मं<br>तस्मै प्रकुप्येत दिवाकरस्तु॥ १२३राक्षस! वैश्यजातिके लिये गार्हस्थ्य एवं वानप्रस्थ—इन दो आश्रमोंका विधान है तथा शूद्रके लिये एकमात्र उत्तम गृहस्थ-आश्रमका ही नियम है। अपने वर्ण और आश्रमके लिये विहित धर्मोंका इस लोकमें त्याग नहीं करना चाहिये। जो इनका त्याग करता है, उसपर सूर्य भगवान् क्रुद्ध होते हैं। निशाचर! भगवान् भास्कर क्रुद्ध होकर उस मनुष्यकी रोगवृद्धि एवं उसके कुलका नाश करनेके लिये प्रयत्न करते हैं। अतः मनुष्य स्वधर्मका न तो त्याग करे और न अपने वंशकी हानि होने दे। जो मनुष्य अपने धर्मका त्याग करता है, उसपर भगवान् सूर्य क्रोध करते हैं॥ १२०—१२३॥
पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्तो मुनिभिः सुकेशी<br>प्रणम्य तान् ब्रह्मनिधीन् महर्षीन्।<br>जगाम चोत्पत्य पुरं स्वकीयं<br>मुहुर्मुहुर्धर्ममवेक्षमाणः॥ १२४पुलस्त्यजी बोले— मुनियोंके ऐसा कहनेके बाद सुकेशी उन ब्रह्मज्ञानी महर्षियोंको बारम्बार प्रणामकर धर्मका चिन्तन करते हुए उड़कर अपने पुरको चला गया॥ १२४॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौदहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १४॥

अध्याय १५ ] दैत्योंका धर्म एवं सदाचारका पालन, सुकेशीके नगरका उत्थान-पतन एवं लोलार्क-प्रसंग ८१


पन्द्रहवाँ अध्याय

दैत्योंका धर्म एवं सदाचारका पालन, सुकेशीके नगरका उत्थान-पतन, वरुणा-असीकी महिमा, लोलार्क-प्रसंग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुलस्त्य उवाच<br>ततः सुकेशिर्देवर्षे गत्वा स्वपुरमुत्तमम्।<br>समाहूयाब्रवीत् सर्वान् राक्षसान् धार्मिकं वचः॥ १<br><br>अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियसंयमः।<br>दानं दया च क्षान्तिश्च ब्रह्मचर्यममानिता॥ २<br><br>शुभा सत्या च मधुरा वाङ् नित्यं सत्क्रियारतिः।<br>सदाचारनिषेवित्वं परलोकप्रदायकाः॥ ३<br><br>इत्यूचुर्मुनयो मह्यं धर्ममाद्यं पुरातनम्।<br>सोहमाज्ञापये सर्वान् क्रियतामविकल्पतः॥ ४पुलस्त्यजी बोले— देवर्षे! उसके बाद अपने उत्तम नगरमें जाकर सुकेशीने सभी राक्षसोंको बुलाकर उनसे धर्मकी बात बतलायी। (सुकेशीने कहा—) अहिंसा, सत्य, चोरीका सर्वथा त्याग, पवित्रता, इन्द्रियसंयम, दान, दया, क्षमा, ब्रह्मचर्य, अहंकारका न करना, प्रिय, सत्य और मधुर वाणी बोलना, सदा सत्कार्योंमें अनुराग रखना एवं सदाचारका पालन करना—ये सब धर्म परलोकमें सुख देनेवाले हैं। मुनियोंने इस प्रकारके आदिकालके पुरातन धर्मको मुझे बतलाया है। मैं तुमलोगोंको आज्ञा देता हूँ कि तुमलोग बिना किसी हिचकके इन सभी धर्मोंका आचरण करो॥ १–४॥
पुलस्त्य उवाच<br>ततः सुकेशिवचनात् सर्व एव निशाचराः।<br>त्रयोदशाङ्गं ते धर्मं चक्रुर्मुदितमानसाः॥ ५<br><br>ततः प्रवृद्धिं सुतरामगच्छन्त निशाचराः।<br>पुत्रपौत्रार्थसंयुक्ताः सदाचारसमन्विताः॥ ६<br><br>तज्ज्योतिस्तेजसस्तेषां राक्षसानां महात्मनाम्।<br>गन्तुं नाशनुवन् सूर्यो नक्षत्राणि न चन्द्रमाः॥ ७<br><br>ततस्त्रिभुवने ब्रह्मन् निशाचरपुरोऽभवत्।<br>दिवा चन्द्रस्य सदृशः क्षणदायां च सूर्यवत्॥ ८पुलस्त्यजीने कहा— उसके बाद सुकेशीके वचनसे सभी राक्षस प्रसन्न-चित्त होकर (अहिंसा आदि) तेरह अङ्गवाले धर्मका आचरण करने लगे। इससे राक्षसोंकी सभी प्रकारकी अच्छी उन्नति हुई। वे पुत्र-पौत्र तथा अर्थ-धर्म-सदाचार आदिसे सम्पन्न हो गये। उन महान् राक्षसोंके तेजके सामने सूर्य, नक्षत्र और चन्द्रमाकी गति और कान्ति क्षीण-सी दीखने लगी। ब्रह्मन्! उसके बाद निशाचरोंकी नगरी तीनों लोकोंमें दिनमें चन्द्रमाके समान और रातमें सूर्यके समान चमकने लगी॥ ५–८॥
न ज्ञायते गतिर्व्योम्नि भास्करस्य ततोऽम्बरे।<br>शशाङ्कमिति तेजस्वादमन्यन्त पुरोत्तमम्॥ ९<br><br>स्वं विकासं विमुञ्चन्ति निशामिति व्यचिन्तयन्।<br>कमलाकरेषु कमला मित्रमित्यवगम्य हि।<br>रात्रौ विकसिता ब्रह्मन् विभूतिं दातुमीप्सवः॥ १०<br><br>कौशिका रात्रिसमयं बुद्ध्वा निरगमन् किल।<br>तान् वायसास्तदा ज्ञात्वा दिवा निघ्नन्ति कौशिकान्॥ ११<br><br>स्नातकास्त्वापगास्वेव स्नानजप्यपरायणाः।<br>आकण्ठमग्नास्तिष्ठन्ति रात्रौ ज्ञात्वाऽथ वासरम्॥ १२(फलतः) अब आकाशमें सूर्यकी गति (चलने)-का पता नहीं लगता था। लोग उस श्रेष्ठ नगरको नगरके तेजके कारण आकाशमें चन्द्रमा समझने लग गये। ब्रह्मन्! सरोवरके कमल दिनको रात्रि समझकर विकसित नहीं होते थे। पर वे रात्रिमें सुकेशीके पुरको सूर्य समझकर विभूति प्रदान करनेकी इच्छासे विकसित होने लगे। इसी प्रकार उल्लू भी दिनको रात समझकर बाहर निकल आये और कौए दिनमें आये जानकर उन उल्लुओंको मारने लगे। स्नान करनेवाले लोग भी रात्रिको दिन समझकर गलेतक खुले बदन होकर स्नान करने लगे एवं जप करते हुए जलमें खड़े रहे॥ ९–१२॥

८२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १५ न व्ययुज्यन्त चक्राश्च तदा वै पुरदर्शने। उस समय सुकेशीके नगरके (सूर्यवत्) दर्शन मन्यमानास्तु दिवसमिदमुच्चैर्बुवन्ति च ॥ १३ होनेसे चकवा-चकई रात्रिको ही दिन मानकर परस्पर नूनं कान्ताविहीनेन केनचिच्चक्रपत्तिणा । अलग नहीं होते थे। वे उच्चस्वरसे कहते — निश्चय ही किसी पलीसे विहीन चक्रवाक पक्षीने एकान्तमें नदीतटपर उत्सृष्टं जीवितं शून्ये फूत्कृत्य सरितस्तटे ॥ १४ फूत्कार करके जीवन त्याग दिया है। इसीसे दयार्द्र सूर्य ततोऽनुकम्पयाविष्टो विवस्वांस्तीव्ररश्मिभिः । अपनी तेज किरणोंसे जगत्‌को तपाते हुए किसी प्रकार संतापयञ्जगत् सर्वं नास्तमेति कथंचन ॥ १५ अस्त नहीं हो रहे हैं। दूसरे कहते हैं — 'निश्चय ही कोई अन्ये वदन्ति चक्राह्वो नूनं कश्चिन् मृतो भवेत्। चक्रवाक मर गया है और पतिके शोकमें उसकी दुः‌खिनी तत्कान्तया तपस्तप्तं भर्तृशोकार्त्तया बत ॥ १६ कान्ताने भारी तप किया है। इसीलिये निश्चय ही उसकी आराधितस्तु भगवांस्तपसा वै दिवाकरः। तपस्यासे प्रसन्न हुए एवं चन्द्रमाको जीत लेनेवाले तेनासौ शशिनिर्जैता नास्तमेति रविर्ध्रुवम् ॥ १७ भगवान् सूर्य अस्त नहीं हो रहे हैं' ॥ १३–१७ ॥ यज्विनो होमशालासु सह ऋत्विग्भिरध्वरे। महामुने ! उन दिनों यज्ञशालाओंमें ऋत्विजोंके प्रावर्त्तयन्त कर्माणि रात्रावपि महामुने ॥ १८ साथ यजमानलोग रात्रिमें भी यज्ञकर्म करनेमें लगे रहते थे। विष्णुके भक्तलोग भक्तिपूर्वक सदा विष्णुकी पूजा महाभागवताः पूजां विष्णोः कुर्वन्ति भक्तितः । करते रहते एवं दूसरे लोग सूर्य, चन्द्र, ब्रह्मा और रवौ शशिनि चैवान्ये ब्रह्मणोऽन्ये हरस्य च ॥ १९ शिवकी आराधनामें लगे रहते थे। कामी लोग यह मानने कामिनश्चाप्यमन्यन्त साधु चन्द्रमसा कृतम्। लगे कि चन्द्रमाने रात्रिको निरन्तरके लिये अपनी यदिदं रजनी रम्या कृता सततकौमुदी ॥ २० ज्योत्स्नामयी बना दिया, अच्छा हुआ ॥ १८–२० ॥ अन्ये ब्रुवैल्लोकगुरुरस्माभिश्चक्रभृद् वशी। दूसरे लोग कहने लगे कि हमलोगोंने श्रावण निर्व्याजेन महागन्धैरर्चितः कुसुमैः शुभैः ॥ २१ आदि चार महीनोंमें शुद्धभावसे अति सुगन्धित पवित्र पुष्पोंद्वारा महालक्ष्मीके साथ सुदर्शनचक्रको धारण सह लक्ष्म्या महायोगी नभस्यादिचतुर्ष्वपि। करनेवाले भगवान् विष्णुकी पूजा की है। इसी अवधिमें अशून्यशयना नाम द्वितीया सर्वकामदा ॥ २२ सर्वकामदा अशून्यशयना द्वितीया तिथि होती है। उसीसे तेनासौ भगवान् प्रीतः प्रादाच्छयनमुत्तमम्। प्रसन्न होकर भगवान्‌ने अशून्य तथा महाभोगोंसे परिपूर्ण अशून्यं च महाभोगैरनस्तमितशेखरम् ॥ २३ उत्तम शयन प्रदान किया है। दूसरे कहते कि देवी रोहिणीने चन्द्रमाका क्षय देखकर निश्चय ही रुद्रकी अन्येऽब्रुवन् ध्रुवं देव्या रोहिण्या शशिनः क्षयम्। आराधना करनेकी अभिलाषासे परम पवित्र अक्षय दृष्ट्वा तप्तं तपो घोरं रुद्राराधनकाम्यया ॥ २४ अष्टमी तिथिमें वेदोक्त विधिसे कठिन तपस्या की है, पुण्यायामक्षयाष्टम्यां वेदोक्तविधिना स्वयम्। जिससे सन्तुष्ट होकर भगवान् शंकरने उसे अपनी तुष्टेन शंभुना दत्तं वरं चास्यै यदृच्छया ॥ २५ इच्छासे वर दिया है ॥ २१–२५ ॥ अन्येऽब्रुवन् चन्द्रमसा ध्रुवमाराधितो हरिः। दूसरे लोग कहते — चन्द्रमाने निश्चय ही अखण्ड- व्रतेनेह त्वखण्डेन तेनाखण्डः शशी दिवि ॥ २६ व्रतका आचरण करके भगवान् हरिको आराधित किया है। उससे आकाशमें चन्द्रमा अखण्डरूपसे प्रकाशित हो रहा है। दूसरोंने कहा — चन्द्रमाने अत्यधिक तेजवाले अन्ये ब्रुवञ्छशाङ्केन ध्रुवं रक्षा कृतात्मनः। पदद्वयं समभ्यर्च्य विष्णोरमिततेजसः ॥ २७ श्रीविष्णुके चरणयुगलकी विधिवत् पूजा करके अपनी

अध्याय १५ ] दैत्योंका धर्म एवं सदाचारका पालन, सुकेशीके नगरका उत्थान-पतन, लोलार्क-प्रसंग ८३ तेनासौ दीप्तिमांश्चन्द्रः परिभूय दिवाकरम्। अस्माकमानन्दकरो दिवा तपति सूर्यवत् ॥ २८ लक्ष्यते कारणैरन्यैर्बहुभिः सत्यमेव हि। शशाङ्कनिर्जितः सूर्यो न विभाति यथा पुरा ॥ २९ यथामी कमलाः श्लक्ष्णा रणद्भृङ्गगणावृताः। विकचाः प्रतिभासन्ते जातः सूर्योदयो ध्रुवम् ॥ ३० यथा चामी विभासन्ति विकचाः कुमुदाकराः। अतो विज्ञायते चन्द्र उदितश्च प्रतापवान् ॥ ३१ एवं संभाषतां तत्र सूर्यो वाक्यानि नारद। अमन्यत किमेतद्धि लोको वक्ति शुभाशुभम् ॥ ३२ एवं संचिन्त्य भगवान् दध्यौ ध्यानं दिवाकरः । आसमन्ताज्जगद् ग्रस्तं त्रैलोक्यं रजनीचरैः ॥ ३३ ततस्तु भगवाञ्ज्ञात्वा तेजसोऽप्यसहिष्णुताम् । निशाचरस्य वृद्धिं तामचिन्तयत योगवित् ॥ ३४ ततोऽज्ञासीच्च तान् सर्वान् सदाचाररताञ्शुचीन्। देवब्राह्मणपूजासु संसक्तान् धर्मसंयुतान् ॥ ३५ ततस्तु रक्षः क्षयकृत् तिमिरद्विपकेसरी। महांशुनखरः सूर्यस्तद्विघातमचिन्तयत् ॥ ३६ ज्ञातवांश्च ततश्छिद्रं राक्षसानां दिवस्पतिः। स्वधर्मविच्युतिर्नाम सर्वधर्मविघातकृत् ॥ ३७ ततः क्रोधाभिभूतेन भानुना रिपुभेदिभिः। भानुभी राक्षसपुरं तद् दृष्टं च यथेच्छया ॥ ३८ स भानुना तदा दृष्टः क्रोधाध्मातेन चक्षुषा। निपपाताम्बराद् भ्रष्टः क्षीणपुण्य इव ग्रहः ॥ ३९ पतमानं समालोक्य पुरं शालकटङ्कटः। नमो भवाय शर्वाय इदमुच्चैरुदीरयत् ॥ ४० तमाक्रन्दितमाकर्ण्य चारणा गगनेचराः। हा हेति चुक्रुशुः सर्वे हरभक्तः पतत्यसौ ॥ ४१ तच्चारणवचः शर्वः श्रुतवान् सर्वगोऽव्ययः । श्रुत्वा संचिन्तयामास केनासौ पात्यते भुवि ॥ ४२ रक्षा की है। उससे तेजस्वी चन्द्रमा सूर्यपर विजय प्राप्त करके हमें आनन्द देते हुए दिनमें सूर्यकी भाँति दीप्तिमान् हो रहे हैं। अन्य अनेक प्रकारके कारणोंसे सचमुच यह लक्षित हो रहा है कि चन्द्रमाके द्वारा पराजित हुए सूर्य पूर्ववत् दीप्तिवाले नहीं दीख रहे हैं ॥ २६- २९ ॥ इधर ये सुन्दर कमल खिले हैं और उनपर भौंरे गुंजार कर रहे हैं। भ्रमर-समूहसे आवृत्त ये सुन्दर कमल विकसित दिखलायी पड़ रहे हैं; अतः निश्चय ही सूर्योदय हुआ है। और इधर ये कुमुद्वृन्द खिले हुए हैं; अतः लगता है कि प्रतापवान् चन्द्रमा उदित हुआ है। नारदजी! इस प्रकार वार्ता करनेवालोंके वाक्योंको सुनकर सूर्य सोचने लगे कि ये लोग इस प्रकार शुभाशुभ वचन क्यों बोल रहे हैं ? भगवान् दिवाकर ऐसा विचारकर ध्यानमग्न हो गये और उन्होंने देखा कि समस्त त्रैलोक्य चारों ओरसे राक्षसोंद्वारा ग्रस्त हो गया है ॥ ३०-३३॥ तब योगी भगवान् भास्कर राक्षसोंकी वृद्धि तथा तेजकी असहनीयताको जानकर स्वयं चिन्तन करने लगे। उन्हें यह ज्ञात हुआ कि सभी राक्षस सदाचार- परायण, पवित्र, देवता और ब्राह्मणोंकी पूजामें अनुरक्त तथा धार्मिक हैं। उसके बाद राक्षसोंको नष्ट करनेवाले तथा अन्धकाररूपी हाथीके लिये तेज किरणरूपी नखवाले सिंहके समान सूर्य उनके विनाशके विषयमें चिन्तन करने लगे। अन्तमें सूर्यको राक्षसोंके अपने धर्मसे गिरनेका मूल कारण मालूम हुआ, जो समस्त धर्मोंका विनाशक है ॥ ३४-३७॥ तब क्रोधसे अभिभूत सूर्यने शत्रुओंके भेदन करनेवाली अपनी किरणोंद्वारा भलीभाँति उस राक्षसको देखा। उस समय सूर्यद्वारा क्रोधभरी दृष्टिसे देखे जानेके कारण वह नगर नष्ट हुए पुण्यवाले ग्रहके समान आकाशसे नीचे गिर पड़ा। अपने नगरको गिरते देखकर शालकटंकट (सुकेशी)- ने ऊँचे स्वरसे चीखनेके स्वरमें 'नमो भवाय शर्वाय' यह कहा। उसकी उस चीखको सुनकर गगनमें विचरण करनेवाले सभी चारण चिल्लाने लगे - हाय हाय! हाय हाय ! यह शिव-भक्त तो नीचे गिर रहा है ॥ ३८-४१ ॥ सर्वत्र व्याप्त और अविनाशी नित्य शंकरने चारणोंके उस वचनको सुना और फिर सोचने लगे- यह नगर किसके द्वारा पृथ्वीपर गिराया जा रहा है।

८४श्रीवामनपुराण[ अध्याय १५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ज्ञातवान् देवपतिना सहस्रकिरणेन तत्।<br>पातितं राक्षसपुरं ततः क्रुद्धस्त्रिलोचनः॥ ४३<br>क्रुद्धस्तु भगवन्तं तं भानुमन्तमपश्यत्।<br>दृष्टमात्रस्त्रिनेत्रेण निपपात ततोऽम्बरात्॥ ४४<br>गगनात् स परिभ्रष्टः पथि वायुनिषेविते।<br>यदृच्छया निपतितो यन्त्रमुक्तो यथोपलः॥ ४५उन्होंने यह जान लिया कि देवोंके पति सहस्रकिरणमाली सूर्यद्वारा राक्षसोंका यह पुर गिराया गया है। इससे त्रिलोचन शंकर क्रुद्ध हो गये और उन्होंने भगवान् सूर्यको देखा। त्रिनेत्रधारी शंकरके देखते ही वे सूर्य आकाशसे नीचे आ गिरे। आकाशसे नीचे वायुमण्डलमार्गमें वे इस प्रकार गिरे जैसे यन्त्रके द्वारा कोई पत्थर फेंका गया हो॥ ४२-४५।
ततो वायुपथान्मुक्तः किंशुकोज्ज्वलविग्रहः।<br>निपपातान्तरिक्षात् स वृतः किन्नरचारणैः॥ ४६<br><br>चारणैर्वेष्टितो भानुः प्रभात्याम्बरात् पतन्।<br>अर्द्धपक्वं यथा तालात् फलं कपिभिरावृतम्॥ ४७<br><br>ततस्तु ऋषयोऽभ्येत्य प्रत्यूचुर्भानुमालिनम्।<br>निपतस्व हरिक्षेत्रे यदि श्रेयोऽभिवाञ्छसि॥ ४८<br><br>ततोऽब्रवीत् पतन्नेव विवस्वांस्तांस्तपोधनान्।<br>किं तत् क्षेत्रं हरेः पुण्यं वद्वध्वं शीघ्रमेव मे॥ ४९फिर पलाश-पुष्पके समान आभावाले सूर्य वायुमण्डलसे अलग होकर किंनरों एवं चारणोंसे भरे अन्तरिक्षसे नीचे गिर गये। उस समय आकाशसे नीचे गिरते हुए सूर्य चारणोंसे घिरे हुए ऐसे लग रहे थे, जैसे तालवृक्षसे गिरनेवाला अधपका तालफल कपियोंसे घिरा हो। तब मुनियोंने किरणमाली भगवान् सूर्यदेवके समीप आकर उनसे कहा कि यदि तुम कल्याण चाहते हो तो विष्णुके क्षेत्रमें गिरो। गिरते हुए ही सूर्यने (ऐसा सुनकर) उन तपस्वियोंसे पूछा-विष्णुभगवान्‌का वह पवित्र क्षेत्र कौन-सा है? आपलोग उसे मुझे शीघ्र बतलायें ॥ ४६-४९॥
तमूचुर्मुनयः सूर्य शृणु क्षेत्रं महाफलम्।<br>साम्प्रतं वासुदेवस्य भावि तच्छंकरस्य च॥ ५०<br><br>योगशायिनमारभ्य यावत् केशवदर्शनम्।<br>एतत् क्षेत्रं हरेः पुण्यं नाम्ना वाराणसी पुरी॥ ५१<br><br>तच्छ्रुत्वा भगवान् भानुर्भवनेत्राग्नितापितः।<br>वरणायास्तथैवास्यास्त्वन्तरे निपपात ह॥ ५२<br><br>ततः प्रदह्यति तनौ निमज्यास्यां लुलद् रविः।<br>वरणायां समभ्येत्य न्यमज्जत यथेच्छया॥ ५३इसपर मुनियोंने सूर्यसे बतलाया - सूर्यदेव! आप महाफल देनेवाले उस क्षेत्रका विवरण सुनिये- इस समय वह क्षेत्र वासुदेवका क्षेत्र है, किंतु भविष्यमें वह शंकरका क्षेत्र होगा। योगशायीसे प्रारम्भ कर केशवदर्शनतकका क्षेत्र हरिका पवित्र क्षेत्र है, इसका नाम वाराणसीपुरी है। उसे सुनकर शिवजीकी नेत्राग्निसे संतप्त होते हुए भगवान् सूर्य वरुणा और असी* इन दोनों नदियोंके बीचमें गिरे। उसके बाद शरीरके जलते रहनेसे व्याकुल हुए सूर्य असी नदीमें स्नान करनेके बाद वरुणा नदीमें इच्छानुकूल स्नान किये॥ ५०-५३॥
भूयोऽसिं वरणां भूयो भूयोऽपि वरणादसिम्।<br>लुलंस्त्रिनेत्रवह्न्यात्तौ भ्रमतेऽलातचक्रवत्॥ ५४<br>एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मन् ऋषयो यक्षराक्षसाः।<br>नागा विद्याधराश्चापि पक्षिणोऽप्सरसस्तथा॥ ५५<br>यावन्तो भास्कररथे भूतप्रेतादयः स्थिताः।<br>तावन्तो ब्रह्मसदनं गता वेदयितुं मुने॥ ५६इस प्रकार शंकरके तीसरे नेत्रकी अग्निसे दग्ध होकर वे बारंबार असि और वरुणा नदियोंकी ओर अलातचक्र (लुकाठीके मण्डल)-के समान चक्कर काटने लगे। मुने! इस बीच ऋषि, यक्ष, राक्षस, नाग, विद्याधर, पक्षी, अप्सराएँ और भास्करके रथमें जितने भूत-प्रेत आदि थे, वे सभी इसे ज्ञापित करनेके लिये ब्रह्मलोकमें गये।

* अब भी वरुणा और अस्सी नदियाँ वाराणसीको अपने अन्तरालमें किये हुए हैं। अस्सी बरसातमें जलभरित होती है, पर वरुणा सदा जलपूर्णा रहती है।

अध्याय १६ ] देवताओंका शयन—तिथियों और उनके अशून्यशयन आदि व्रतों एवं शिव-पूजनका वर्णन ८५ ततो ब्रह्मा सुरपतिः सुरैः सार्धं समभ्यगात्। रम्यं महेश्वरावासं मन्दरं रविकारणात् ॥ ५७ गत्वा दृष्ट्वा च देवेशं शंकरं शूलपाणिनम्। प्रसाद्य भास्कारार्थाय वाराणस्यामुपानयत् ॥ ५८ ततो दिवाकरं भूयः पाणिनादाय शंकरः। कृत्वा नामास्य लोलेति रथमारोपयत् पुनः ॥ ५९ आरोपिते दिनकरे ब्रह्माऽभ्येत्य सुकेशिनम्। सबान्धवं सनगरं पुनरारोपयद् दिवि ॥ ६० समारोप्य सुकेशिं च परिष्वज्य च शंकरम्। प्रणम्य केशवं देवं वैराजं स्वगृहं गतः ॥ ६१ एवं पुरा नारद भास्करेण पुरं सुकेशर्भुवि सन्निपातितम्। दिवाकरो भूमितले भवेन क्षिप्तस्तु दृष्ट्या न च संप्रदग्धः ॥ ६२ आरोपितो भूमितलाद् भवेन भूयोऽपि भानुः प्रतिभासनाय। स्वयंभुवा चापि निशाचरेन्द्र- स्त्वारोपितः खे सपुरः सबन्धुः ॥ ६३ तब सुरपति इन्द्र, ब्रह्मा देवताओंके साथ सूर्यकी शान्तिके लिये महेश्वरके आवास-स्थान मन्दर पर्वतपर गये। वहाँ जाकर तथा देवेश शूलपाणि भगवान् शिवका दर्शन करनेके बाद भगवान् ब्रह्माजी भास्करके लिये उन्हें (शिवजीको) प्रसन्न कर उन्हें (सूर्यको) वाराणसीमें लाये ॥ ५४—५८ ॥ फिर भगवान् शंकरने सूर्यभगवान्को हाथमें लेकर उनका नाम 'लोल' रख दिया और उन्हें पुनः उनके रथपर स्थापित कर दिया। दिनकरके अपने रथमें आरूढ़ हो जानेपर ब्रह्मा सुकेशीके पास गये एवं उसे भी पुनः बान्धवों और नगरसहित आकाशमें पूर्ववत् स्थापित कर दिया। सुकेशीको पुनः आकाशमें स्थापित करनेके बाद ब्रह्माजी शंकरका आलिङ्गन एवं केशवदेवको प्रणाम कर अपने वैराज नामक लोकमें चले गये। नारदजी ! प्राचीन समयमें इस प्रकार सूर्यने सुकेशीके नगरको पृथ्वीपर गिराया एवं महादेवने भगवान् सूर्यको अपने तृतीय नेत्रकी अग्निसे दग्ध न कर केवल भूमितलपर गिरा ही दिया था। फिर शंकरने सूर्यको प्रतिभासित होनेके लिये भूमितलसे आकाशमें स्थित किया और ब्रह्माने निशाचरराजको उसके पुर और बन्धुओंके साथ आकाशमें फिर संस्थापित कर दिया ॥ ५९—६३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १५ ॥ सोलहवाँ अध्याय देवताओंका शयन — तिथियों और उनके अशून्यशयन आदि व्रतों एवं शिव-पूजनका वर्णन नारद उवाच यानेतान् भगवान् प्राह कामिभिः शशिनं प्रति। आराधनाय देवाभ्यां हरीशाभ्यां वदस्व तान् ॥ १ पुलस्त्य उवाच शृणुष्व कामिभिः प्रोक्तान् व्रतान् पुण्यान् कलिप्रिय। आराधनाय शर्वस्य केशवस्य च धीमतः ॥ २ नारदजीने कहा — पुलस्त्यजी ! आपने चन्द्रमाके प्रति कामियोंद्वारा वर्णित श्रीहरि और शंकरकी आराधनाके लिये जिन व्रतोंका उल्लेख किया है उनका वर्णन करें ॥ १ ॥ पुलस्त्यजी बोले - लोक-कल्याणके लिये कलहको भी इष्ट माननेवाले कलि (कलह) - प्रिय नारदजी ! आप महादेव और बुद्धिमान् श्रीहरिकी आराधनाके लिये कामियोंद्वारा कहे गये पवित्र व्रतोंका वर्णन सुनें।

१८- महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव, विन्ध्यप्रसंग, दुर्गाकी अवस्थिति

८६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १६ यदा त्वाषाढी संयाति व्रजते चोत्तरायणम्। तदा स्वपिति देवेशो भोगिभोगे श्रियः पतिः ॥ ३ प्रतिसुप्ते विभौ तस्मिन् देवगन्धर्वगुह्यकाः। देवानां मातरश्चापि प्रसुप्ताश्चाप्यनुक्रमात् ॥ ४ नारद उवाच कथयस्व सुरादीनां शयने विधिमुत्तमम्। सर्वमनुक्रमेणैव पुरस्कृत्य जनार्दनम् ॥ ५ पुलस्त्य उवाच मिथुनाभिगते सूर्ये शुक्लपक्षे तपोधन। एकादश्यां जगत्स्वामी शयनं परिकल्पयेत् ॥ ६ शेषाहिभोगपर्यङ्कं कृत्वा सम्पूज्य केशवम्। कृत्वोपवीतकं चैव सम्यक्सम्पूज्य वै द्विजान् ॥ ७ अनुज्ञां ब्राह्मणेभ्यश्च द्वादश्यां प्रयतः शुचिः। लब्ध्वा पीताम्बरधरः स्वस्तिनिद्रां समानयेत् ॥ ८ त्रयोदश्यां ततः कामः स्वपते शयने शुभे। कदम्बानां सुगन्धानां कुसुमैः परिकल्पिते ॥ ९ चतुर्दश्यां ततो यक्षाः स्वपन्ति सुखशीतले। सौवर्णपङ्कजकृते सुखास्तीर्णोपधानके ॥ १० पौर्णमास्यामुमानाथः स्वपते चर्मसंस्तरे। वैयाघ्रे च जटाभारं समुद्ग्रन्थ्यान्यचर्मणा ॥ ११ ततो दिवाकरो राशिं संप्रयाति च कर्कटम्। ततोऽमराणां रजनी भवति दक्षिणायनम् ॥ १२ ब्रह्मा प्रतिपदि तथा नीलोत्पलमयेऽनघ। तल्पे स्वपिति लोकानां दर्शयन् मार्गमुत्तमम् ॥ १३ विश्वकर्मा द्वितीयायां तृतीयायां गिरेः सुता। विनायकश्चतुर्थ्यां तु पञ्चम्यामपि धर्मराट् ॥ १४ षष्ठ्यां स्कन्दः प्रस्वपिति सप्तम्यां भगवान् रविः। कात्यायनी तथाष्टम्यां नवम्यां कमलालया ॥ १५ दशम्यां भुजगेन्द्राश्च स्वपन्ते वायुभोजनाः। एकादश्यां तु कृष्णायां साध्या ब्रह्मन् स्वपन्ति च ॥ १६ एष क्रमस्ते गदितो नभादौ स्वप्ने मुने। स्वपत्सु तत्र देवेषु प्रावृट्कालः समाययौ ॥ १७ जब आषाढ़ी पूर्णिमा बीत जाती है एवं उत्तरायण चलता रहता है, तब लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु भोगिभोग (शेषशय्या) - पर सो जाते हैं। उन विष्णुके सो जानेपर देवता, गन्धर्व, गुह्यक एवं देवमाताएँ भी क्रमशः सो जाती हैं ॥ २-४॥ नारदने कहा - जनार्दनसे लेकर अनुक्रमसे देवता आदिके शयनकी सब उत्तम विधि मुझे बतलाइये ॥ ५ ॥ पुलस्त्यजी बोले- तपोधन नारदजी ! आषाढ़के शुक्लपक्षमें सूर्यके मिथुनराशिमें चले जानेपर एकादशी तिथिके दिन जगदीश्वर विष्णुकी शय्याकी परिकल्पना करनी चाहिये। उस शय्यापर शेषनागके शरीर और फणकी रचना कर यज्ञोपवीतयुक्त श्रीकेशव (-की प्रतिमा)-की पूजा कर ब्राह्मणोंकी आज्ञासे संयम एवं पवित्रतापूर्वक रहते हुए स्वयं भी पीताम्बर धारण कर द्वादशी तिथिमें सुखपूर्वक उन्हें सुलाना चाहिये ॥ ६-८ ॥ इसके बाद त्रयोदशी तिथिमें सुगन्धित कदम्बके पुष्पोंसे बनी पवित्र शय्यापर कामदेव शयन करते हैं। फिर चतुर्दशीको सुशीतल स्वर्णपङ्कजसे निर्मित सुखदायकरूपमें बिछाये गये एवं तकियेवाली शय्यापर यक्षलोग शयन करते हैं। पूर्णमासी तिथिको चर्मवस्त्र धारणकर उमानाथ शंकर एक-दूसरे चर्मद्वारा जटाभार बाँधकर व्याघ्र-चर्मकी शय्यापर सोते हैं। उसके बाद जब सूर्य कर्कराशिमें गमन करते हैं तब देवताओंके लिये रात्रिस्वरूप दक्षिणायनका आरम्भ हो जाता है ॥ ९-१२॥ निष्पाप नारदजी ! लोगोंको उत्तम मार्ग दिखलाते हुए ब्रह्माजी (श्रावण कृष्ण) प्रतिपदाको नीले कमलकी शय्यापर सो जाते हैं। विश्वकर्मा द्वितीयाको, पार्वतीजी तृतीयाको, गणेशजी चतुर्थीको, धर्मराज पञ्चमीको, कार्तिकेयजी षष्ठीको, सूर्य भगवान् सप्तमीको, दुर्गादेवी अष्टमीको, लक्ष्मीजी नवमीको, वायु पीनेवाले श्रेष्ठ सर्प दशमीको और साध्यगण कृष्णपक्षकी एकादशीको सो जाते हैं ॥ १३-१६॥ मुने! इस प्रकार हमने तुम्हें श्रावण आदिके महीनोंमें देवताओंके सोनेका क्रम बतलाया। देवोंके सो जानेपर वर्षाकालका आगमन हो जाता है।

अध्याय १६] देवताओंका शयन—तिथियों और उनके अशून्यशयन आदि व्रतों एवं शिव-पूजनका वर्णन ८७ कङ्काः समं बलाकाभिरारोहन्ति नभोत्तमान्। ऋषिश्रेष्ठ ! (तब) बलाकाओं (बगुलोंके झुंडों)-के साथ वायसाश्चापि कुर्वन्ति नीडानि ऋषिपूंगव । कङ्क पक्षी ऊँचे पर्वतोंपर चढ़ जाते हैं तथा कौए घोंसले वायसाश्च स्वपन्त्येते ऋतौ गर्भभरालसाः ॥ १८ बनाने लगते हैं। इस ऋतुमें मादा कौएँ गर्भभारके कारण यस्यां तिथ्यां प्रस्वपिति विश्वकर्मा प्रजापतिः। आलस्यसे सोती हैं। प्रजापति विश्वकर्मा जिस द्वितीया तिथिमें सोते हैं, वह कल्याणकारिणी पवित्र तिथि अशून्यशयना द्वितीया सा शुभा पुण्या अशून्यशयनोदिता ॥ १९ द्वितीया तिथि कही जाती है। मुने ! उस तिथिमें लक्ष्मीके तस्यां तिथावर्च्य हरिं श्रीवत्साङ्कं चतुर्भुजम् । साथ पर्यङ्कस्थ श्रीवत्स नामक चिह्न धारण करनेवाले पर्यङ्कस्थं समं लक्ष्म्या गन्धपुष्पादिभिर्मुने ॥ २० चतुर्भुज विष्णुभगवान्‌की गन्ध-पुष्पादिके द्वारा पूजाके ततो देवाय शय्यायां फलानि प्रक्षिपेत् क्रमात्। हेतु शय्यापर क्रमशः फल तथा सुगन्ध-द्रव्य निवेदित सुरभीणि निवेद्येत्थं विज्ञाप्यो मधुसूदनः ॥ २१ कर उनसे इस प्रकार प्रार्थना करे कि— ॥ १७–२१ ॥ यथा हि लक्ष्म्या न वियुज्यसे त्वं हे त्रिविक्रम ! हे अनन्त !! हे जगन्निवास !!! जिस त्रिविक्रमानन्त जगन्निवास। प्रकार आप लक्ष्मीसे कभी अलग नहीं होते, उसी तथा त्वशून्यं शयनं सदैव प्रकार आपकी कृपासे हमारी शय्या भी कभी शून्य न अस्माकमेवेह तव प्रसादात् ॥ २२ हो। हे देव! हे वरद! हे अच्युत! हे ईश ! हे यथा त्वशून्यं तव देव तल्पं अमितवीर्यशाली विष्णो ! आपकी शय्या लक्ष्मीसे शून्य समं हि लक्ष्म्या वरदाच्युतेश। नहीं होती, उसी सत्यके प्रभावसे हमारी भी गृहस्थीके सत्येन तेनामितवीर्य विष्णो नाशका अवसर न आवे—पत्नीका वियोग न हो। देवर्षे ! गार्हस्थ्यनाशो मम नास्तु देव ॥ २३ इस प्रकार स्तुति करनेके बाद भगवान् विष्णुको इत्युच्चार्य प्रणम्येशं प्रसाद्य च पुनः पुनः। प्रणामद्वारा बार-बार प्रसन्नकर रात्रिमें तेल एवं नमकसे नक्तं भुञ्जीत देवर्षे तैलक्षारविवर्जितम् ॥ २४ रहित भोजन करे। दूसरे दिन बुद्धिमान् व्यक्ति, भगवान् द्वितीयेऽह्नि द्विजाग्र्याय फलान् दद्याद् विचक्षणः। लक्ष्मीधर मेरे ऊपर प्रसन्न हों-यह वाक्य उच्चारण लक्ष्मीधरः प्रीयतां मे इत्युच्चार्य निवेदयेत् ॥ २५ कर श्रेष्ठ ब्राह्मणको फलोंका दान दे ॥ २२-२५ ॥ अनेन तु विधानेन चातुर्मास्यव्रतं चरेत्। जबतक सूर्य वृश्चिकराशिपर रहते हैं, तबतक इसी यावद् वृश्चिकराशिस्थः प्रतिभाति दिवाकरः ॥ २६ विधिसे चातुर्मास्य-व्रतका पालन किया जाना चाहिये। ततो विबुध्यन्ति सुराः क्रमशः क्रमशो मुने। मुने ! उसके बाद क्रमशः देवता जागते हैं। सूर्यके तुलाराशिमें स्थित होनेपर विष्णु जाग जाते हैं। उसके बाद काम और तुलास्थेऽर्के हरिः कामः शिवः पश्चाद्विबुध्यते ॥ २७ शिव जागते हैं। उसके पश्चात् द्वितीयाके दिन अपने तत्र दानं द्वितीयायां मूर्तिर्लक्ष्मीधरस्य तु। विभवके अनुसार बिछौनेवाली शय्याके साथ लक्ष्मीधरकी सशय्यास्तरणोपेता यथा विभवमात्मनः ॥ २८ मूर्तिका दान करे। महामुने ! इस प्रकार मैंने आपको यह एष व्रतस्तु प्रथमः प्रोक्तस्तव महामुने । प्रथम व्रत बतलाया, जिसका आचरण करनेपर इस यस्मिंश्चीर्णे वियोगस्तु न भवेदिह कस्यचित् ॥ २९ संसारमें किसीको वियोग नहीं होता ॥ २६-२९ ॥ नभस्ये मासि च तथा या स्यात्कृष्णाष्टमी शुभा। इसी प्रकार भाद्रपदमासमें मृगशिरा नक्षत्रसे युक्ता मृगशिरेणैव सा तु कालाष्टमी स्मृता ॥ ३० युक्त जो पवित्र कृष्णाष्टमी होती है उसे कालाष्टमी माना गया है। उस तिथिमें भगवान् शंकर समस्त लिङ्गोंमें तस्यां सर्वेषु लिङ्गेषु तिथौ स्वपिति शंकरः। सोते एवं उनके संनिधानमें निवास करते हैं। इस वसते संनिधाने तु तत्र पूजाऽक्षया स्मृता ॥ ३१ अवसरपर की गयी शंकरजीकी पूजा अक्षय मानी गयी है।

८८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १६

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत्र स्नायीत वै विद्वान् गोमूत्रेण जलेन च।<br>स्नातः संपूजयेत् पुष्पैर्धत्तूरस्य त्रिलोचनम्॥ ३२<br><br>धूपं केसरनिर्यासं नैवेद्यं मधुसर्पिषी।<br>प्रीयतां मे विरूपाक्षस्त्वित्युच्चार्य च दक्षिणाम्।<br>विप्राय दद्यान्नैवेद्यं सहिरणयं द्विजोत्तम॥ ३३उस तिथिमें विद्वान् मनुष्यको चाहिये कि गोमूत्र और जलसे स्नान करे। स्नानके बाद धतूरेके पुष्पोंसे शंकरकी पूजा करे। द्विजोत्तम! केसरके गोंदका धूप तथा मधु एवं घृतका नैवेद्य अर्पित करनेके बाद 'विरूपाक्ष (त्रिनेत्र) मेरे ऊपर प्रसन्न हों'—यह कहकर ब्राह्मणको दक्षिणा तथा सुवर्णके साथ नैवेद्य प्रदान करे॥ ३०—३३॥
तद्वदाश्वयुजे मासि उपवासी जितेन्द्रियः।<br>नवम्यां गोमयस्नानं कुर्यात्पूजां तु पङ्कजैः।<br>धूपयेत् सर्जनिर्यासं नैवेद्यं मधुमोदकैः॥ ३४<br><br>कृतोपवासस्त्वष्टम्यां नवम्यां स्नानमाचरेत्।<br>प्रीयतां मे हिरण्याक्षो दक्षिणा सतिला स्मृता॥ ३५<br><br>कार्तिके पयसा स्नानं करवीरेण चार्चनम्।<br>धूपं श्रीवासनिर्र्यासं नैवेद्यं मधुपायसम्॥ ३६<br><br>सनैवेद्यं च रजतं दातव्यं दानमग्रजे।<br>प्रीयतां भगवान् स्थाणुरिति वाच्यमनिष्ठुरम्॥ ३७इसी प्रकार आश्विनमासमें नवमी तिथिको इन्द्रियोंको वशमें करके उपवास रहकर गोबरसे स्नान करनेके पश्चात् कमलोंसे पूजन करे तथा सर्ज वृक्षके निर्यास (गोंद)-का धूप एवं मधु और मोदकका नैवेद्य अर्पित करे। अष्टमीको उपवास करके नवमीको स्नान करनेके बाद 'हिरण्याक्ष मेरे ऊपर प्रसन्न हों'—यह कहते हुए तिलके साथ दक्षिणा प्रदान करे। कार्तिक (मास)-में दुग्धस्नान तथा कनेरके पुष्पसे पूजा करे और सरल वृक्षकी गोंदका धूप तथा मधु एवं खीर नैवेद्य अर्पितकर विनयपूर्वक 'भगवान् शिव मेरे ऊपर प्रसन्न हों'—यह उच्चारण करते हुए ब्राह्मणको नैवेद्यके साथ रजतका दान करे॥ ३४—३७॥
कृत्वोपवासमष्टम्यां नवम्यां स्नानमाचरेत्।<br>मासि मार्गशिरे स्नानं दध्नार्चा भद्रया स्मृता॥ ३८<br><br>धूपं श्रीवृक्षनिर्यासं नैवेद्यं मधुनोदनम्।<br>संनिवेद्या रक्तशालिर्दक्षिणा परिकीर्तिता।<br>नमोऽस्तु प्रीयतां शर्वस्त्विति वाच्यं च पण्डितैः॥ ३९<br><br>पौषे स्नानं च हविषा पूजा स्यात्तगरैः शुभैः।<br>धूपो मधुकनिर्यासो नैवेद्यं मधु शष्कुली॥ ४०<br><br>समुद्गा दक्षिणा प्रोक्ता प्रीणनाय जगद्गुरोः।<br>वाच्यं नमस्ते देवेश त्र्यम्बकेति प्रकीर्तयेत्॥ ४१मार्गशीर्ष (अगहन) मासमें अष्टमी तिथिको उपवास करके नवमी तिथिमें दधिसे स्नान करना चाहिये। इस समय 'भद्रा' ओषधिके द्वारा पूजाका विधान है। पण्डित व्यक्ति श्रीवृक्षके गोंदका धूप एवं मधु और ओदनका नैवेद्य देकर 'शर्व (शिवजी)-को नमस्कार है, वे मेरे ऊपर प्रसन्न हों'—यह कहते हुए रक्तशालि (लाल चावल)-की दक्षिणा प्रदान करे—ऐसा कहा गया है। पौषमासमें घृतका स्नान तथा सुन्दर तगर-पुष्पोंद्वारा पूजा करनी चाहिये। फिर महुएके वृक्षकी गोंदका धूप देकर मधु एवं पूड़ीका नैवेद्य अर्पित करे और 'हे देवेश त्र्यम्बक! आपको नमस्कार है'—यह कहते हुए शंकरजीकी प्रसन्नताके लिये मूँगसहित दक्षिणा प्रदान करे॥ ३८—४१॥
माघे कुशोदकस्नानं मृगमदेन चार्चनम्।<br>धूपः कदम्बनिर्यासो नैवेद्यं सतिलोदनम्॥ ४२<br><br>पयोभक्तं सनैवेद्यं सरुक्मं प्रतिपादयेत्।<br>प्रीयतां मे महादेव उमापतिरितीरयेत्॥ ४३माघमासमें कुशके जलसे स्नान करे और मृगमद (कस्तूरीसे) अर्चन करे। उसके बाद कदम्ब-वृक्षके गोंदका धूप देकर तिल एवं ओदन (भात)-का नैवेद्य अर्पित करनेके पश्चात् 'महादेव उमापति मेरे ऊपर प्रसन्न हों'—यह कहते हुए सुवर्णके साथ दूध एवं भातकी दक्षिणा

अध्याय १६] देवताओंका शयन—तिथियों और उनके अशून्यशयन आदि व्रतों एवं शिव-पूजनका वर्णन ८९ एवमेव समुद्दिष्टं षड्भिर्मासैस्तु पारणम्। पारणान्ते त्रिनेत्रस्य स्नपनं कारयेत्क्रमात्॥ ४४ गोरोचनायाः सहिता गुडेन देवं समालभ्य च पूजयेत। प्रीयस्व दीनोऽस्मि भवन्तमीश मच्छोकनाशं कुरुष्व योग्यम्॥ ४५ ततस्तु फाल्गुने मासि कृष्णाष्टम्यां यतव्रत। उपवासं समुदितं कर्तव्यं द्विजसत्तम॥ ४६ द्वितीयेऽह्नि ततः स्नानं पञ्चगव्येन कारयेत्। पूजयेत्कुन्दकुसुमैर्धूपयेच्चन्दनं त्वपि॥ ४७ नैवेद्यं सघृतं दद्यात् ताम्रपात्रे गुडोदनम्। दक्षिणां च द्विजातिभ्यो नैवेद्यसहितां मुने। वासोयुगं प्रीणयेच्च रुद्रमुच्चार्य नामतः॥ ४८ चैत्रे चोदुम्बरफलैः स्नानं मन्दारकार्चनम्। गुग्गुलं महिषाख्यं च घृताक्तं धूपयेद् बुधः॥ ४९ समोदकं तथा सर्पिः प्रीणनं विनिवेदयेत्। दक्षिणा च सनैवेद्यं मृगाजिनमुदाहृतम्॥ ५० नाट्येश्वर नमस्तेऽस्तु इदमुच्चार्य नारद। प्रीणनं देवनाथाय कुर्याच्छ्रद्धासमन्वितः॥ ५१ वैशाखे स्नानमुदितं सुगन्धकुसुमाम्भसा। पूजनं शंकरस्योक्तं चूतसञ्जरिभिर्विभो॥ ५२ धूपं सर्जाज्ययुक्तं च नैवेद्यं सफलं घृतम्। नामजप्यमपीशस्य कालघ्नेति विपश्चिता॥ ५३ जलकुम्भान् सनैवेद्यान् ब्राह्मणाय निवेदयेत्। सोपवीतान् सहानाद्यांस्तच्चित्तैस्तत्परायणैः॥ ५४ ज्येष्ठे स्नानं चामलकैः पूजार्ककुसुमैस्तथा। धूपयेत्तत्त्रिनेत्रं च आयत्यां पुष्टिकार कम्॥ ५५ सक्तूंश्च सघृतान् देवे दध्नाक्तान् विनिवेदयेत्। उपानद्युगलं छत्रं दानं दद्याच्च भक्तिमान्॥ ५६ नमस्ते भगनेत्रघ्न पूष्णो दशननाशन। इदमुच्चारयेद् भक्त्या प्रीणनाय जगत्पतेः॥ ५७ प्रदान करनी चाहिये। इस प्रकार छः मासके बाद (प्रथम) पारणकी विधि कही गयी है। पारणके अन्तमें त्रिनेत्रधारी महादेवका क्रमसे स्नान-कार्य सम्पन्न कराये। गोरोचनके सहित गुड़द्वारा महादेवकी प्रतिमाका अनुलेपन कर उसकी पूजा करे तथा इस प्रकार प्रार्थना करे कि 'हे ईश! मैं दीन हूँ तथा आपकी शरणमें हूँ; आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों तथा मेरे दुःख-शोकका नाश करें'॥ ४२-४५॥ व्रतधारी द्विजसत्तम ! इसके बाद फाल्गुन मासकी कृष्णाष्टमीको उपवास करना चाहिये। दूसरे दिन नवमीको पञ्चगव्यसे भगवान् शिवको स्नान कराये तथा कुन्दद्वारा अर्चनकर चन्दनका धूप और ताम्रपात्रमें घृतसहित गुड तथा ओदनका नैवेद्य प्रदान करे। उसके बाद 'रुद्र' शब्दका उच्चारण कर ब्राह्मणोंको नैवेद्यके साथ दक्षिणा तथा दो वस्त्र प्रदान कर महादेवको प्रसन्न करे। चैत्र मासमें गूलरके फलके जलसे स्नान कराये और मदारके फूलोंसे पूजा करे। उसके बाद बुद्धिमान् व्यक्ति घृतमिश्रित 'महिष' नामक गुग्गुलसे धूप देकर मोदकके साथ घृत उनकी प्रसन्नताके लिये अर्पित करे एवं 'नाट्येश्वर (भगवान्) ! आपको नमस्कार है'—यह कहते हुए नैवेद्यसहित दक्षिणारूपमें मृगचर्म प्रदान करे। इस प्रकार पूर्ण श्रद्धायुक्त होकर महादेवजीको प्रसन्न करे॥ ४६-५१॥ नारदजी! वैशाखमासमें सुगन्धित पुष्पोंके जलसे स्नान तथा आमकी मञ्जरियोंसे शंकरके पूजनका विधान है। इस समय घी-मिले सर्ज-वृक्षके गोंदका धूप तथा फलसहित घृतका नैवेद्य अर्पित करना चाहिये। बुद्धिमान् व्यक्तिको इस समय श्रीशिवके 'कालघ्न' नामका जप करना चाहिये और तल्लीनतापूर्वक ब्राह्मणको नैवेद्य, उपवीत (जनेऊ) एवं अन्न आदिके साथ पानीसे भरा घड़ा दक्षिणा देनी चाहिये। ज्येष्ठमासमें आँवलेके जलसे स्नान कराये तथा मन्दारके पुष्पोंसे उनकी पूजा करे। उसके बाद त्रिनेत्रधारी पुष्टि-कर्ता श्रीशिवको धूपदानमें धूप दिखलाये। फिर घी तथा दही मिला सत्तूका नैवेद्य अर्पित करे। जगत्पतिके प्रीत्यर्थ 'हे पूषाके दाँत तोड़नेवाले, भगनेत्रघ्न शिव ! आपको नमस्कार है'—यह कहकर भक्तिपूर्वक छत्र एवं उपानद्युगल (एक जोड़ा जूता) दक्षिणामें प्रदान करना चाहिये ॥ ५२-५७॥

१९- चण्ड-मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन, महिषासुरका संदेश और युद्धोपक्रम

९०श्रीवामनपुराण[ अध्याय १७
आषाढे स्नानमुदितं श्रीफलैरर्चनं तथा।<br>धत्तूरकुसुमैः शुक्लैर्र्धूपयेत् सिल्हकं तथा॥ ५८<br><br>नैवेद्याः सघृताः पूपाः दक्षिणा सघृता यवाः।<br>नमस्ते दक्षयज्ञघ्न इदमुच्चैरूदीरयेत्॥ ५९<br><br>श्रावणे मृगभोज्येन स्नानं कृत्वाऽर्चयेद्धरम्।<br>श्रीवृक्षपत्रैः सफलैर्धूपं दद्यात् तथागुरुम्॥ ६०<br><br>नैवेद्यं सघृतं दद्याद् दधि पूपान् समोदकान्।<br>दध्योदनं सकृसरं माषधानाः सशष्कुलीः॥ ६१<br><br>दक्षिणां श्वेतवृषभं धेनुं च कपिलां शुभाम्।<br>कनकं रक्तवसनं प्रदद्याद् ब्राह्मणाय हि।<br>गङ्गाधरेति जप्तव्यं नाम शंभोश्च पण्डितैः॥ ६२<br><br>अमीभिः षड्भिरपरैर्मासैः पारणमुत्तमम्।<br>एवं संवत्सरं पूर्णं सम्पूज्य वृषभध्वजम्।<br>अक्षयाँल्लभते कामान् महेश्वरवचो यथा॥ ६३<br><br>इदमुक्तं व्रतं पुण्यं सर्वाक्षयकरं शुभम्।<br>स्वयं रुद्रेण देवर्षे तत्तथा न तदन्यथा॥ ६४आषाढ़मासमें बिल्वके जलसे भगवान् शिवको स्नान कराये तथा धतूरके उजले पुष्पोंसे उनकी पूजा करे; सिल्हक (सिलारस-वृक्षका गोंद)-का धूप दे और घृतके सहित मालपूएका नैवेद्य अर्पित करे एवं—हे दक्षके यज्ञका विनाश करनेवाले शंकर! आपको नमस्कार है—यह ऊँचे स्वरसे उच्चारण करे। श्रावणमासमें मृगभोज्य (जटामासी)-के जलसे स्नान कराकर फलयुक्त बिल्वपत्रोंसे महादेवकी पूजा करे तथा अगुरुका धूप दे। उसके बाद घृतयुक्त पूप, मोदक, दधि, दध्योदन, उड़दकी दाल, भुना हुआ जौ एवं कचौड़ीका नैवेद्य अर्पित करनेके बाद बुद्धिमान् व्यक्ति ब्राह्मणको श्वेत बैल, शुभा कपिला (काली) गौ, स्वर्ण एवं रक्तवस्त्रकी दक्षिणा दे। पण्डितोंको चाहिये कि शिवजीके ‘गङ्गाधर’ इस नामका जप करें॥ ५८—६२॥<br><br>इन दूसरे छः महीनोंके अनन्तर द्वितीय पारण होता है। इस प्रकार एक वर्षतक वृषभध्वज (शिवजी)-का पूजन कर महेश्वरके वचनानुसार मनुष्य अक्षय कामनाओंको प्राप्त करता है। स्वयं भगवान् शंकरने यह कल्याणकारी पवित्र एवं सभी पुण्योंको अक्षय करनेवाला व्रत बतलाया था। यह जैसा कहा गया है, वैसा ही है। यह कभी व्यर्थ नहीं जाता॥ ६३-६४॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सोलहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १६॥


सत्रहवाँ अध्याय

देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत-विधान, विष्णु-पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग

पुलस्त्य उवाच<br>मासि चाश्वयुजे ब्रह्मन् यदा पद्मं जगत्पतेः।<br>नाभ्या निर्याति हि तदा देवेष्वेतान्यथोऽभवन्॥ १<br><br>कंदर्पस्य कराग्रे तु कदम्बश्चारुदर्शनः।<br>तेन तस्य परा प्रीतिः कदम्बेन विवर्द्धते॥ २<br><br>यक्षाणामधिपस्यापि मणिभद्रस्य नारद।<br>वटवृक्षः समभवत् तस्मिंस्तस्य रतिः सदा॥ ३पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! आश्विन मासमें जब जगत्पति (विष्णु)-की नाभिसे कमल निकला, तब अन्य देवताओंसे भी ये वस्तुएँ उत्पन्न हुईं— कामदेवके करतलके अग्रभागमें सुन्दर कदम्ब वृक्ष उत्पन्न हुआ। इसीलिये कदम्बसे उसे बड़ी प्रीति रहती है। नारदजी! यक्षोंके राजा मणिभद्रसे वटवृक्ष उत्पन्न हुआ, अतः उन्हें उसके प्रति विशेष प्रेम है।