वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| अध्याय १४ ] | दशाङ्ग-धर्म, आश्रम-धर्म और सदाचार-स्वरूपका वर्णन | ७७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| न लङ्घयेत्पुरीषासृक्ष्ठीवनोद्वर्त्तनानि च।<br>गृहादुच्छिष्टविण्मूत्रे पादाम्भांसि क्षिपेद बहिः॥ ७८<br><br>पञ्चपिण्डाननुद्धृत्य न स्नायात् परवारिणि।<br>स्नायीत देवखातेषु सरोह्रदसरित्सु च॥ ७९ | शुद्धि हो जाती है। विष्ठा, रक्त, थूक एवं उबटनका उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। जूठे पदार्थ, विष्ठा, मूत्र एवं पैर धोनेके जलको घरसे बाहर फेंक देना चाहिये। दूसरेके द्वारा निर्मित बावली आदिमें मिट्टीके पाँच टुकड़ोंके निकाले बिना स्नान नहीं करना चाहिये। (मुख्यतः) देव-निर्मित झीलोंमें, ताल-तलैयों और नदियोंमें स्नान करना चाहिये॥ ७६-७९॥ |
| नोद्यानादौ विकालेषु प्राज्ञस्तिष्ठेत् कदाचन।<br>नालपेज्जनविद्विष्टं वीरहीनां तथा स्त्रियम्॥ ८० | बुद्धिमान् पुरुष बाग-बगीचोंमें असमयमें कभी न ठहरे। लोगोंसे द्वेष रखनेवाले व्यक्ति तथा पति-पुत्रसे रहित स्त्रीसे वार्तालाप नहीं करना चाहिये। |
| देवतापितृसच्छास्त्रयज्ञवेदादिनिन्दकैः ।<br>कृत्वा तु स्पर्शमालापं शुद्ध्येते कर्मावलोकनात्॥ ८१ | देवता, पितरों, भले शास्त्रों (पुराण, धर्मशास्त्र, रामायण आदि), यज्ञ एवं वेदादिके निन्दकोंका स्पर्श और उनके साथ वार्तालाप करनेपर मनुष्य अपवित्र हो जाता है, वह सूर्यदर्शन करनेपर शुद्ध होता है। उसकी शुद्धि भगवान् सूर्यके समक्ष उपस्थान करके अपने किये हुए स्पर्श और वार्तालाप कर्मके त्याग तथा पश्चात्ताप करनेसे होती है। |
| अभोज्याः सूतिकाषण्ढमार्जारारखुश्वकुक्कुटाः।<br>पतितापविद्धनग्राश्चाण्डालाधामश्च ये॥ ८२ | सूतिक, नपुंसक, बिलाव, चूहा, कुत्ते, मुर्गे, पतित, नग्न (विधर्मी) (इनके लक्षण आगे बतलाये जायेंगे) समाजसे बहिष्कृत और जो चाण्डाल आदि अधम प्राणी हैं उनके यहाँ भोजन नहीं करना चाहिये॥ ८०-८२॥ |
| सुकेशिरुवाच<br>भवद्भिः कीर्तिताऽभोज्या य एते सूतिकादयः।<br>अमीषां श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतो लक्षणानि हि॥ ८३ | **सुकेशि बोला—**ऋषियो! आपलोगोंने जिन सूतिक आदिका अन्न अभक्ष्य कहा है, मैं उनके लक्षण विस्तारसे सुनना चाहता हूँ॥ ८३॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>ब्राह्मणी ब्राह्मणस्यैव याऽवरोधत्वमागता।<br>तावुभौ सूतिकेत्युक्तौ तयोरन्नं विगर्हितम्॥ ८४ | **ऋषियोंने कहा—**सुकेशि! अन्य ब्राह्मणके साथ ब्राह्मणीके व्यभिचरित होनेपर उन दोनोंको ही ‘सूतिक' कहा जाता है। उन दोनोंका अन्न निन्दित है। |
| न जुहोत्युचिते काले न स्नाति न ददाति च।<br>पितृदेवार्चनाद्धीनः स षण्ढः परगीयते॥ ८५ | उचित समयपर हवन, स्नान और दान न करनेवाला तथा पितरों एवं देवताओंकी पूजासे रहित व्यक्तिको ही यहाँ 'षण्ढ' या नपुंसक कहा गया है। |
| दम्भार्थं जपते यश्च तप्यते यजते तथा।<br>न परत्रार्थमुद्युक्तो स मार्जारः प्रकीर्तितः॥ ८६ | दम्भके लिये जप, तप और यज्ञ करनेवाले तथा परलोकार्थ उद्योग न करनेवाले व्यक्तिको यहाँ 'मार्जार' या 'बिलाव' कहा गया है। |
| विभवे सति नैवात्ति न ददाति जुहोति च।<br>तमाहुराखुं तस्यानं भुक्त्वा कृच्छ्रेण शुद्ध्यति ॥ ८७ | ऐश्वर्य रहते हुए भोग, दान एवं हवन न करनेवालेको 'आखु' (चूहा) कहते हैं। उसका अन्न खानेपर मनुष्य कृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्ध होता है॥ ८४-८७॥ |