भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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| ७८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १४ | | :--- | :--- |

Sanskrit ShlokasHindi Translation
यः परेषां हि मर्माणि निकृन्तन्निव भाषते।<br>नित्यं परगुणद्वेषो स श्वान इति कथ्यते॥ ८८<br><br>सभागतानां यः सभ्यः पक्षपातं समाश्रयेत्।<br>तमाहुः कुक्कुटं देवास्तस्याप्यन्नं विगर्हितम्॥ ८९<br><br>स्वधर्मं यः समुत्सृज्य परधर्मं समाश्रयेत्।<br>अनापदि स विद्वद्भिः पतितः परिकीर्त्यते॥ ९०<br><br>देवत्यागी पितृत्यागी गुरुभक्त्यरदस्तथा।<br>गोब्राह्मणस्त्रीवधकृदपविद्धः स कीर्त्यते॥ ९१दूसरोंका मर्म भेदन करते हुए बातचीत करनेवाले तथा दूसरेके गुणोंसे द्वेष करनेवालेको ‘श्वान’ या ‘कुत्ता’ कहा गया है। सभामें आगत व्यक्तियोंमें जो सभ्य व्यक्ति पक्षपात करता है, उसे देवताओंने ‘कुक्कुट’ (मुर्गा) कहा है; उसका भी अन्न निन्दित है। विपत्तिकालके अतिरिक्त अन्य समयमें अपना धर्म छोड़कर दूसरेका धर्म ग्रहण करनेवालेको विद्वानोंने ‘पतित’ कहा है। देवत्यागी, पितृत्यागी, गुरुभक्तिसे विमुख तथा गो, ब्राह्मण एवं स्त्रीकी हत्या करनेवालेको ‘अपविद्ध’ कहा जाता है॥ ८८—९१ ॥
येषां कुले न वेदोऽस्ति न शास्त्रं नैव च व्रतम्।<br>ते नग्नाः कीर्तिताः सद्भिस्तेषामन्नं विगर्हितम्॥ ९२<br><br>आशार्तानामदाता च दातुश्च प्रतिषेधकः।<br>शरणागतं यस्त्यजति स चाण्डालोऽधमो नरः॥ ९३<br><br>यो बान्धवैः परित्यक्तः साधुभिर्ब्राह्मणैरपि।<br>कुण्डाशीयश्च तस्यान्नं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्॥ ९४<br><br>यो नित्यकर्मणो हानिं कुर्यान्नैमित्तिकस्य च।<br>भुक्तवान्नं तस्य शुद्ध्येत त्रिरात्रोपोषितो नरः॥ ९५जिनके कुलमें वेद, शास्त्र एवं व्रत नहीं हैं, उन्हें सज्जन लोग ‘नग्न’ कहते हैं। उनका अन्न निन्दित है। आशा रखनेवालोंको न देनेवाला, दाताको मना करनेवाला तथा शरणागतका परित्याग करनेवाला अधम मनुष्य ‘चाण्डाल’ कहा जाता है। बान्धवों, साधुओं एवं ब्राह्मणोंसे त्यागा गया तथा कुण्ड (पतिके जीवित रहनेपर परपुरुषसे उत्पन्न पुत्र)-के यहाँ अन्न खानेवालेको चान्द्रायण व्रत करना चाहिये। नित्य और नैमित्तिक कर्म न करनेवाले व्यक्तिका अन्न खानेपर मनुष्य तीन राततक उपवास करनेसे शुद्ध होता है॥ ९२—९५ ॥
गणकस्य निषादस्य गणिकाभिषजोस्तथा।<br>कदर्यस्यापि शुद्ध्येत त्रिरात्रोपोषितो नरः॥ ९६<br><br>नित्यस्य कर्मणो हानिः केवलं मृतजन्मसु।<br>न तु नैमित्तिकोच्छेदः कर्तव्यो हि कथंचन॥ ९७<br><br>जाते पुत्रे पितुः स्नानं सचैलस्य विधीयते।<br>मृते च सर्वबन्धूनामित्याह भगवान् भृगुः॥ ९८<br><br>प्रेताय सलिलं देयं बहिर्दग्ध्वा तु गोत्रजैः।<br>प्रथमेऽह्नि चतुर्थे वा सप्तमे वाऽस्थिसंचयम्॥ ९९गणक (ज्योतिषी), निषाद (मल्लाह), वेश्या, वैद्य तथा कृपणका अन्न खानेपर भी मनुष्य तीन दिन उपवास करनेपर शुद्ध होता है। घरमें जन्म या मृत्यु होनेपर नित्यकर्म रुक जाते हैं, किंतु नैमित्तिक कर्म कभी बंद नहीं करना चाहिये। भगवान् भृगुने कहा है कि पुत्र उत्पन्न होनेपर पिताके लिये एवं मरणमें सभी बन्धुओंके लिये वस्त्रके साथ स्नान करना चाहिये। ग्रामके बाहर शवदाह करना चाहिये। शवदाह करनेके बाद सगोत्रलोग प्रेतके उद्देश्यसे जलदान (तिलाञ्जलि) करें तथा पहले दिन या चौथे अथवा सातवें दिन अस्थि-चयन करें॥ ९६—९९ ॥
ऊर्ध्वं संचयनात्तेषामङ्गस्पर्शो विधीयते।<br>सोदकैस्तु क्रिया कार्या संशुद्धैस्तु सपिण्डजैः॥ १००अस्थि-चयनके बाद अङ्ग-स्पर्शका विधान है।<br><br>शुद्ध होकर सोदकों (चौदह पीढ़ीके अन्तर्गतके लोगों)<br><br>एवं सपिण्डजों (सात पीढ़ीके अंदरके लोगों)-को<br><br>और्ध्वदैहिक क्रिया (मरनेके बाद की जानेवाली विहित