वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय १४ ] दशाङ्ग-धर्म, आश्रम-धर्म और सदाचार-स्वरूपका वर्णन ७९
| विषोद्वन्धनशस्त्राम्बुवह्निपातमृतेषु च।<br>बाले प्रव्राजि संन्यासे देशान्तरमृते तथा॥ १०१<br><br>सद्यः शौचं भवेद्वीर तच्चाप्युक्तं चतुर्विधम्।<br>गर्भस्रावे तदेवोक्तं पूर्णकालेन चेतरे॥ १०२<br><br>ब्राह्मणानामहोरात्रं क्षत्रियाणां दिनत्रयम्।<br>षड्रात्रं चैव वैश्यानां शूद्राणां द्वादशाहिकम्॥ १०३ | क्रिया) करनी चाहिये। हे वीर! विष, बन्धन, शस्त्र, जल, अग्नि और गिरनेसे मृत्युके होनेपर तथा बालक, परिव्राजक, संन्यासीकी एवं किसी व्यक्तिकी दूर देशमें मृत्यु होनेपर तत्काल शुद्धि हो जाती है। वह शुद्धि भी चार प्रकारकी कही गयी है। गर्भस्रावमें भी शीघ्र ही शुद्धि होती है। अन्य अशौच पूरे समयपर ही दूर होते हैं। (वह सद्यः शौच) ब्राह्मणोंका एक अहोरात्रका, क्षत्रियोंका तीन दिनोंका, वैश्योंका छः दिनोंका एवं शूद्रोंका बारह दिनोंका होता है॥ १००—१०३॥ |
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| दशद्वादशमासार्द्धमाससंख्यैर्दिनैश्च तैः।<br>स्वाः स्वाः कर्मक्रियाः कुर्युः सर्वे वर्णा यथाक्रमम्॥ १०४<br><br>प्रेतमुद्दिश्य कर्तव्यमेकोद्दिष्टं विधानतः।<br>सपिण्डीकरणं कार्यं प्रेते आवत्सरान्तरे॥ १०५<br><br>ततः पितृत्वमापन्ने दर्शपूर्णादिभिः शुभैः।<br>प्रीणनं तस्य कर्त्तव्यं यथा श्रुतिनिदर्शनात्॥ १०६<br><br>पितुरर्थं समुद्दिश्य भूमिदानादिकं स्वयम्।<br>कुर्यात्तेनास्य सुप्रीताः पितरो यान्ति राक्षस॥ १०७ | सभी वर्णोंके लोग (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) क्रमशः दस, बारह, पंद्रह दिन एवं एक मासके अन्तरपर अपनी-अपनी क्रियाएँ करें। प्रेतके उद्देश्यसे विधिके अनुसार एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिये। मरनेके एक वर्ष बीत जानेपर मनुष्यको सपिण्डीकरण श्राद्ध करना चाहिये। उसके बाद प्रेतके पितर हो जानेपर अमावास्या और पूर्णिमा तिथिके दिन वेदविहित विधिसे उनका तर्पण करना चाहिये। राक्षस! पिताके उद्देश्यसे स्वयं भूमिदान आदि करे, जिससे पितृगण इसके ऊपर प्रसन्न हो जायँ॥ १०४-१०७॥ |
| यद् यदिष्टतमं किंचिद् यच्चास्य दयितं गृहे।<br>त्तत्तद् गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता॥ १०८<br><br>अध्येतव्या त्रयी नित्यं भाव्यं च विदुषा सदा।<br>धर्मतो धनमाहार्यं यष्टव्यं चापि भक्तितः॥ १०९<br><br>यच्चापि कुर्वतो नात्मा जुगुप्सामेति राक्षस।<br>तत् कर्त्तव्यमशङ्केन यन्न गोप्यं महाजने॥ ११०<br><br>एवमाचरतो लोके पुरुषस्य गृहे सतः।<br>धर्मार्थकामसम्प्राप्तिं परत्रेह च शोभनम्॥ १११ | व्यक्तिकी जीवित-अवस्था में घरमें जो-जो पदार्थ उसको अत्यन्त अभिलषित एवं प्रिय रहा हो, उसकी अक्षयताकी कामना करते हुए गुणवान् पात्रको दान देना चाहिये। सदा त्रयी अर्थात् ऋक्, यजुः और सामवेदका अध्ययन करना चाहिये, विद्वान् बनना चाहिये, धर्मपूर्वक धनार्जन एवं यथाशक्ति यज्ञ करना चाहिये। राक्षस! मनुष्यको जिस कार्यके करनेसे कर्त्ताकी आत्मा निन्दित न हो एवं जो कार्य बड़े लोगोंसे छिपाने योग्य न हो ऐसा कार्य निःशङ्क (आसक्तिरहित) होकर करना चाहिये। इस प्रकारके आचरण करनेवाले पुरुषके गृहस्थ होनेपर भी उसे धर्म, अर्थ एवं कामकी प्राप्ति होती है तथा वह व्यक्ति इस लोक और परलोकमें कल्याणका भागी होता है॥ १०८—१११॥ |
| एष तूद्देशतः प्रोक्तो गृहस्थाश्रम उत्तमः।<br>वानप्रस्थाश्रमं धर्मं प्रवक्ष्यामोऽवधार्यताम्॥ ११२ | ऋषियोंने सुकेशिसे कहा— सुकेशि! अबतक हमने संक्षेपसे उत्तम गृहस्थाश्रमका वर्णन किया है। अब हम वानप्रस्थ-आश्रमके धर्मका वर्णन करेंगे, उसे |