वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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८० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १४
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अपत्यसंततिं दृष्ट्वा प्राज्ञो देहस्य चानतिम्।<br>वानप्रस्थाश्रमं गच्छेद्रात्मनः शुद्धिकारणम्॥ ११३<br><br>तत्रारण्योपभोगैश्च तपोभिश्चात्मकर्षणम्।<br>भूमौ शय्या ब्रह्मचर्यं पितृदेवातिथिक्रिया॥ ११४<br><br>होमस्त्रिषवणं स्नानं जटावल्कलधारणम्।<br>वन्यस्नेहनिषेवित्वं वानप्रस्थविधिस्त्वयम्॥ ११५ | ध्यानपूर्वक सुनो। बुद्धिमान् व्यक्ति पुत्रकी संतान (पौत्र) और अपने शरीरकी गिरती अवस्था देखकर अपने आत्माकी शुद्धिके लिये वानप्रस्थ-आश्रमको ग्रहण करे। वहाँ अरण्यमें उत्पन्न मूल-फल आदिसे अपना जीवन-यापन करते हुए तपद्वारा शरीर-शोषण करे। इस आश्रममें भूमिपर शयन, ब्रह्मचर्यका पालन एवं पितर, देवता तथा अतिथियोंकी पूजा करे। हवन, तीनों काल—प्रातः, मध्याह्न, सन्ध्याकाल—स्नान, जटा और वल्कलका धारण तथा वन्य फलोंसे निकाले रसका सेवन करे। यही वानप्रस्थ-आश्रमकी विधि है॥ ११२—११५॥ |
| सर्वसङ्गपरित्यागो ब्रह्मचर्यममानिता।<br>जितेन्द्रियत्वमावासे नैकस्मिन् वसतिश्चिरम्॥ ११६<br><br>अनारम्भस्तथाहारो भैक्षान्नं नातिकोपिता।<br>आत्मज्ञानावबोधेच्छा तथा चात्मावबोधनम्॥ ११७<br><br>चतुर्थे त्वाश्रमे धर्मा अस्माभिस्ते प्रकीर्तिताः।<br>वर्णधर्माणि चान्यानि निशामय निशाचर॥ ११८<br><br>गार्हस्थ्यं ब्रह्मचर्यं च वानप्रस्थं त्रयाश्रमाः।<br>क्षत्रियस्यापि कथिता ये चाचारा द्विजस्य हि॥ ११९ | [चतुर्थ आश्रम (संन्यास)-के धर्म ये हैं—]<br>सभी प्रकारकी आसक्तियोंका त्याग, ब्रह्मचर्य, अहंकारका अभाव, जितेन्द्रियता, एक स्थानपर अधिक समयतक न रहना, उद्योगका अभाव, भिक्षान्न-भोजन, क्रोधका त्याग, आत्मज्ञानकी इच्छा तथा आत्मज्ञान। निशाचर! हमने तुमसे चतुर्थ-आश्रम (संन्यास)-के इन धर्मोंका वर्णन किया। अब अन्य वर्ण-धर्मोंको सुनो। क्षत्रियोंके लिये भी गार्हस्थ्य, ब्रह्मचर्य एवं वानप्रस्थ—इन तीन आश्रमों एवं ब्राह्मणोंके लिये विहित आचारोंका विधान है॥ ११६—११९॥ |
| वैखानसत्वं गार्हस्थ्यमाश्रमद्वितयं विशः।<br>गार्हस्थ्यमुत्तमं त्वेकं शूद्रस्य क्षणदाचर॥ १२०<br><br>स्वानि वर्णाश्रमोक्तानि धर्माणीह न हापयेत्।<br>यो हापयति तस्यासौ परिकुप्यति भास्करः॥ १२१<br><br>कुपितः कुलनाशाय ईश्वरो रोगवृद्धये।<br>भानुर्वै यतते तस्य नरस्य क्षणदाचर॥ १२२<br><br>तस्मात् स्वधर्मं न हि संत्यजेत<br>न हापयेच्चापि हि नात्मवंशम्।<br>यः संत्यजेच्चापि निजं हि धर्मं<br>तस्मै प्रकुप्येत दिवाकरस्तु॥ १२३ | राक्षस! वैश्यजातिके लिये गार्हस्थ्य एवं वानप्रस्थ—इन दो आश्रमोंका विधान है तथा शूद्रके लिये एकमात्र उत्तम गृहस्थ-आश्रमका ही नियम है। अपने वर्ण और आश्रमके लिये विहित धर्मोंका इस लोकमें त्याग नहीं करना चाहिये। जो इनका त्याग करता है, उसपर सूर्य भगवान् क्रुद्ध होते हैं। निशाचर! भगवान् भास्कर क्रुद्ध होकर उस मनुष्यकी रोगवृद्धि एवं उसके कुलका नाश करनेके लिये प्रयत्न करते हैं। अतः मनुष्य स्वधर्मका न तो त्याग करे और न अपने वंशकी हानि होने दे। जो मनुष्य अपने धर्मका त्याग करता है, उसपर भगवान् सूर्य क्रोध करते हैं॥ १२०—१२३॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्तो मुनिभिः सुकेशी<br>प्रणम्य तान् ब्रह्मनिधीन् महर्षीन्।<br>जगाम चोत्पत्य पुरं स्वकीयं<br>मुहुर्मुहुर्धर्ममवेक्षमाणः॥ १२४ | पुलस्त्यजी बोले— मुनियोंके ऐसा कहनेके बाद सुकेशी उन ब्रह्मज्ञानी महर्षियोंको बारम्बार प्रणामकर धर्मका चिन्तन करते हुए उड़कर अपने पुरको चला गया॥ १२४॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौदहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १४॥