वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय १५ ] दैत्योंका धर्म एवं सदाचारका पालन, सुकेशीके नगरका उत्थान-पतन एवं लोलार्क-प्रसंग ८१
पन्द्रहवाँ अध्याय
दैत्योंका धर्म एवं सदाचारका पालन, सुकेशीके नगरका उत्थान-पतन, वरुणा-असीकी महिमा, लोलार्क-प्रसंग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुलस्त्य उवाच<br>ततः सुकेशिर्देवर्षे गत्वा स्वपुरमुत्तमम्।<br>समाहूयाब्रवीत् सर्वान् राक्षसान् धार्मिकं वचः॥ १<br><br>अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियसंयमः।<br>दानं दया च क्षान्तिश्च ब्रह्मचर्यममानिता॥ २<br><br>शुभा सत्या च मधुरा वाङ् नित्यं सत्क्रियारतिः।<br>सदाचारनिषेवित्वं परलोकप्रदायकाः॥ ३<br><br>इत्यूचुर्मुनयो मह्यं धर्ममाद्यं पुरातनम्।<br>सोहमाज्ञापये सर्वान् क्रियतामविकल्पतः॥ ४ | पुलस्त्यजी बोले— देवर्षे! उसके बाद अपने उत्तम नगरमें जाकर सुकेशीने सभी राक्षसोंको बुलाकर उनसे धर्मकी बात बतलायी। (सुकेशीने कहा—) अहिंसा, सत्य, चोरीका सर्वथा त्याग, पवित्रता, इन्द्रियसंयम, दान, दया, क्षमा, ब्रह्मचर्य, अहंकारका न करना, प्रिय, सत्य और मधुर वाणी बोलना, सदा सत्कार्योंमें अनुराग रखना एवं सदाचारका पालन करना—ये सब धर्म परलोकमें सुख देनेवाले हैं। मुनियोंने इस प्रकारके आदिकालके पुरातन धर्मको मुझे बतलाया है। मैं तुमलोगोंको आज्ञा देता हूँ कि तुमलोग बिना किसी हिचकके इन सभी धर्मोंका आचरण करो॥ १–४॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>ततः सुकेशिवचनात् सर्व एव निशाचराः।<br>त्रयोदशाङ्गं ते धर्मं चक्रुर्मुदितमानसाः॥ ५<br><br>ततः प्रवृद्धिं सुतरामगच्छन्त निशाचराः।<br>पुत्रपौत्रार्थसंयुक्ताः सदाचारसमन्विताः॥ ६<br><br>तज्ज्योतिस्तेजसस्तेषां राक्षसानां महात्मनाम्।<br>गन्तुं नाशनुवन् सूर्यो नक्षत्राणि न चन्द्रमाः॥ ७<br><br>ततस्त्रिभुवने ब्रह्मन् निशाचरपुरोऽभवत्।<br>दिवा चन्द्रस्य सदृशः क्षणदायां च सूर्यवत्॥ ८ | पुलस्त्यजीने कहा— उसके बाद सुकेशीके वचनसे सभी राक्षस प्रसन्न-चित्त होकर (अहिंसा आदि) तेरह अङ्गवाले धर्मका आचरण करने लगे। इससे राक्षसोंकी सभी प्रकारकी अच्छी उन्नति हुई। वे पुत्र-पौत्र तथा अर्थ-धर्म-सदाचार आदिसे सम्पन्न हो गये। उन महान् राक्षसोंके तेजके सामने सूर्य, नक्षत्र और चन्द्रमाकी गति और कान्ति क्षीण-सी दीखने लगी। ब्रह्मन्! उसके बाद निशाचरोंकी नगरी तीनों लोकोंमें दिनमें चन्द्रमाके समान और रातमें सूर्यके समान चमकने लगी॥ ५–८॥ |
| न ज्ञायते गतिर्व्योम्नि भास्करस्य ततोऽम्बरे।<br>शशाङ्कमिति तेजस्वादमन्यन्त पुरोत्तमम्॥ ९<br><br>स्वं विकासं विमुञ्चन्ति निशामिति व्यचिन्तयन्।<br>कमलाकरेषु कमला मित्रमित्यवगम्य हि।<br>रात्रौ विकसिता ब्रह्मन् विभूतिं दातुमीप्सवः॥ १०<br><br>कौशिका रात्रिसमयं बुद्ध्वा निरगमन् किल।<br>तान् वायसास्तदा ज्ञात्वा दिवा निघ्नन्ति कौशिकान्॥ ११<br><br>स्नातकास्त्वापगास्वेव स्नानजप्यपरायणाः।<br>आकण्ठमग्नास्तिष्ठन्ति रात्रौ ज्ञात्वाऽथ वासरम्॥ १२ | (फलतः) अब आकाशमें सूर्यकी गति (चलने)-का पता नहीं लगता था। लोग उस श्रेष्ठ नगरको नगरके तेजके कारण आकाशमें चन्द्रमा समझने लग गये। ब्रह्मन्! सरोवरके कमल दिनको रात्रि समझकर विकसित नहीं होते थे। पर वे रात्रिमें सुकेशीके पुरको सूर्य समझकर विभूति प्रदान करनेकी इच्छासे विकसित होने लगे। इसी प्रकार उल्लू भी दिनको रात समझकर बाहर निकल आये और कौए दिनमें आये जानकर उन उल्लुओंको मारने लगे। स्नान करनेवाले लोग भी रात्रिको दिन समझकर गलेतक खुले बदन होकर स्नान करने लगे एवं जप करते हुए जलमें खड़े रहे॥ ९–१२॥ |