भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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८२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १५ न व्ययुज्यन्त चक्राश्च तदा वै पुरदर्शने। उस समय सुकेशीके नगरके (सूर्यवत्) दर्शन मन्यमानास्तु दिवसमिदमुच्चैर्बुवन्ति च ॥ १३ होनेसे चकवा-चकई रात्रिको ही दिन मानकर परस्पर नूनं कान्ताविहीनेन केनचिच्चक्रपत्तिणा । अलग नहीं होते थे। वे उच्चस्वरसे कहते — निश्चय ही किसी पलीसे विहीन चक्रवाक पक्षीने एकान्तमें नदीतटपर उत्सृष्टं जीवितं शून्ये फूत्कृत्य सरितस्तटे ॥ १४ फूत्कार करके जीवन त्याग दिया है। इसीसे दयार्द्र सूर्य ततोऽनुकम्पयाविष्टो विवस्वांस्तीव्ररश्मिभिः । अपनी तेज किरणोंसे जगत्‌को तपाते हुए किसी प्रकार संतापयञ्जगत् सर्वं नास्तमेति कथंचन ॥ १५ अस्त नहीं हो रहे हैं। दूसरे कहते हैं — 'निश्चय ही कोई अन्ये वदन्ति चक्राह्वो नूनं कश्चिन् मृतो भवेत्। चक्रवाक मर गया है और पतिके शोकमें उसकी दुः‌खिनी तत्कान्तया तपस्तप्तं भर्तृशोकार्त्तया बत ॥ १६ कान्ताने भारी तप किया है। इसीलिये निश्चय ही उसकी आराधितस्तु भगवांस्तपसा वै दिवाकरः। तपस्यासे प्रसन्न हुए एवं चन्द्रमाको जीत लेनेवाले तेनासौ शशिनिर्जैता नास्तमेति रविर्ध्रुवम् ॥ १७ भगवान् सूर्य अस्त नहीं हो रहे हैं' ॥ १३–१७ ॥ यज्विनो होमशालासु सह ऋत्विग्भिरध्वरे। महामुने ! उन दिनों यज्ञशालाओंमें ऋत्विजोंके प्रावर्त्तयन्त कर्माणि रात्रावपि महामुने ॥ १८ साथ यजमानलोग रात्रिमें भी यज्ञकर्म करनेमें लगे रहते थे। विष्णुके भक्तलोग भक्तिपूर्वक सदा विष्णुकी पूजा महाभागवताः पूजां विष्णोः कुर्वन्ति भक्तितः । करते रहते एवं दूसरे लोग सूर्य, चन्द्र, ब्रह्मा और रवौ शशिनि चैवान्ये ब्रह्मणोऽन्ये हरस्य च ॥ १९ शिवकी आराधनामें लगे रहते थे। कामी लोग यह मानने कामिनश्चाप्यमन्यन्त साधु चन्द्रमसा कृतम्। लगे कि चन्द्रमाने रात्रिको निरन्तरके लिये अपनी यदिदं रजनी रम्या कृता सततकौमुदी ॥ २० ज्योत्स्नामयी बना दिया, अच्छा हुआ ॥ १८–२० ॥ अन्ये ब्रुवैल्लोकगुरुरस्माभिश्चक्रभृद् वशी। दूसरे लोग कहने लगे कि हमलोगोंने श्रावण निर्व्याजेन महागन्धैरर्चितः कुसुमैः शुभैः ॥ २१ आदि चार महीनोंमें शुद्धभावसे अति सुगन्धित पवित्र पुष्पोंद्वारा महालक्ष्मीके साथ सुदर्शनचक्रको धारण सह लक्ष्म्या महायोगी नभस्यादिचतुर्ष्वपि। करनेवाले भगवान् विष्णुकी पूजा की है। इसी अवधिमें अशून्यशयना नाम द्वितीया सर्वकामदा ॥ २२ सर्वकामदा अशून्यशयना द्वितीया तिथि होती है। उसीसे तेनासौ भगवान् प्रीतः प्रादाच्छयनमुत्तमम्। प्रसन्न होकर भगवान्‌ने अशून्य तथा महाभोगोंसे परिपूर्ण अशून्यं च महाभोगैरनस्तमितशेखरम् ॥ २३ उत्तम शयन प्रदान किया है। दूसरे कहते कि देवी रोहिणीने चन्द्रमाका क्षय देखकर निश्चय ही रुद्रकी अन्येऽब्रुवन् ध्रुवं देव्या रोहिण्या शशिनः क्षयम्। आराधना करनेकी अभिलाषासे परम पवित्र अक्षय दृष्ट्वा तप्तं तपो घोरं रुद्राराधनकाम्यया ॥ २४ अष्टमी तिथिमें वेदोक्त विधिसे कठिन तपस्या की है, पुण्यायामक्षयाष्टम्यां वेदोक्तविधिना स्वयम्। जिससे सन्तुष्ट होकर भगवान् शंकरने उसे अपनी तुष्टेन शंभुना दत्तं वरं चास्यै यदृच्छया ॥ २५ इच्छासे वर दिया है ॥ २१–२५ ॥ अन्येऽब्रुवन् चन्द्रमसा ध्रुवमाराधितो हरिः। दूसरे लोग कहते — चन्द्रमाने निश्चय ही अखण्ड- व्रतेनेह त्वखण्डेन तेनाखण्डः शशी दिवि ॥ २६ व्रतका आचरण करके भगवान् हरिको आराधित किया है। उससे आकाशमें चन्द्रमा अखण्डरूपसे प्रकाशित हो रहा है। दूसरोंने कहा — चन्द्रमाने अत्यधिक तेजवाले अन्ये ब्रुवञ्छशाङ्केन ध्रुवं रक्षा कृतात्मनः। पदद्वयं समभ्यर्च्य विष्णोरमिततेजसः ॥ २७ श्रीविष्णुके चरणयुगलकी विधिवत् पूजा करके अपनी