वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 93, कुल 489 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १५ ] दैत्योंका धर्म एवं सदाचारका पालन, सुकेशीके नगरका उत्थान-पतन, लोलार्क-प्रसंग ८३ तेनासौ दीप्तिमांश्चन्द्रः परिभूय दिवाकरम्। अस्माकमानन्दकरो दिवा तपति सूर्यवत् ॥ २८ लक्ष्यते कारणैरन्यैर्बहुभिः सत्यमेव हि। शशाङ्कनिर्जितः सूर्यो न विभाति यथा पुरा ॥ २९ यथामी कमलाः श्लक्ष्णा रणद्भृङ्गगणावृताः। विकचाः प्रतिभासन्ते जातः सूर्योदयो ध्रुवम् ॥ ३० यथा चामी विभासन्ति विकचाः कुमुदाकराः। अतो विज्ञायते चन्द्र उदितश्च प्रतापवान् ॥ ३१ एवं संभाषतां तत्र सूर्यो वाक्यानि नारद। अमन्यत किमेतद्धि लोको वक्ति शुभाशुभम् ॥ ३२ एवं संचिन्त्य भगवान् दध्यौ ध्यानं दिवाकरः । आसमन्ताज्जगद् ग्रस्तं त्रैलोक्यं रजनीचरैः ॥ ३३ ततस्तु भगवाञ्ज्ञात्वा तेजसोऽप्यसहिष्णुताम् । निशाचरस्य वृद्धिं तामचिन्तयत योगवित् ॥ ३४ ततोऽज्ञासीच्च तान् सर्वान् सदाचाररताञ्शुचीन्। देवब्राह्मणपूजासु संसक्तान् धर्मसंयुतान् ॥ ३५ ततस्तु रक्षः क्षयकृत् तिमिरद्विपकेसरी। महांशुनखरः सूर्यस्तद्विघातमचिन्तयत् ॥ ३६ ज्ञातवांश्च ततश्छिद्रं राक्षसानां दिवस्पतिः। स्वधर्मविच्युतिर्नाम सर्वधर्मविघातकृत् ॥ ३७ ततः क्रोधाभिभूतेन भानुना रिपुभेदिभिः। भानुभी राक्षसपुरं तद् दृष्टं च यथेच्छया ॥ ३८ स भानुना तदा दृष्टः क्रोधाध्मातेन चक्षुषा। निपपाताम्बराद् भ्रष्टः क्षीणपुण्य इव ग्रहः ॥ ३९ पतमानं समालोक्य पुरं शालकटङ्कटः। नमो भवाय शर्वाय इदमुच्चैरुदीरयत् ॥ ४० तमाक्रन्दितमाकर्ण्य चारणा गगनेचराः। हा हेति चुक्रुशुः सर्वे हरभक्तः पतत्यसौ ॥ ४१ तच्चारणवचः शर्वः श्रुतवान् सर्वगोऽव्ययः । श्रुत्वा संचिन्तयामास केनासौ पात्यते भुवि ॥ ४२ रक्षा की है। उससे तेजस्वी चन्द्रमा सूर्यपर विजय प्राप्त करके हमें आनन्द देते हुए दिनमें सूर्यकी भाँति दीप्तिमान् हो रहे हैं। अन्य अनेक प्रकारके कारणोंसे सचमुच यह लक्षित हो रहा है कि चन्द्रमाके द्वारा पराजित हुए सूर्य पूर्ववत् दीप्तिवाले नहीं दीख रहे हैं ॥ २६- २९ ॥ इधर ये सुन्दर कमल खिले हैं और उनपर भौंरे गुंजार कर रहे हैं। भ्रमर-समूहसे आवृत्त ये सुन्दर कमल विकसित दिखलायी पड़ रहे हैं; अतः निश्चय ही सूर्योदय हुआ है। और इधर ये कुमुद्वृन्द खिले हुए हैं; अतः लगता है कि प्रतापवान् चन्द्रमा उदित हुआ है। नारदजी! इस प्रकार वार्ता करनेवालोंके वाक्योंको सुनकर सूर्य सोचने लगे कि ये लोग इस प्रकार शुभाशुभ वचन क्यों बोल रहे हैं ? भगवान् दिवाकर ऐसा विचारकर ध्यानमग्न हो गये और उन्होंने देखा कि समस्त त्रैलोक्य चारों ओरसे राक्षसोंद्वारा ग्रस्त हो गया है ॥ ३०-३३॥ तब योगी भगवान् भास्कर राक्षसोंकी वृद्धि तथा तेजकी असहनीयताको जानकर स्वयं चिन्तन करने लगे। उन्हें यह ज्ञात हुआ कि सभी राक्षस सदाचार- परायण, पवित्र, देवता और ब्राह्मणोंकी पूजामें अनुरक्त तथा धार्मिक हैं। उसके बाद राक्षसोंको नष्ट करनेवाले तथा अन्धकाररूपी हाथीके लिये तेज किरणरूपी नखवाले सिंहके समान सूर्य उनके विनाशके विषयमें चिन्तन करने लगे। अन्तमें सूर्यको राक्षसोंके अपने धर्मसे गिरनेका मूल कारण मालूम हुआ, जो समस्त धर्मोंका विनाशक है ॥ ३४-३७॥ तब क्रोधसे अभिभूत सूर्यने शत्रुओंके भेदन करनेवाली अपनी किरणोंद्वारा भलीभाँति उस राक्षसको देखा। उस समय सूर्यद्वारा क्रोधभरी दृष्टिसे देखे जानेके कारण वह नगर नष्ट हुए पुण्यवाले ग्रहके समान आकाशसे नीचे गिर पड़ा। अपने नगरको गिरते देखकर शालकटंकट (सुकेशी)- ने ऊँचे स्वरसे चीखनेके स्वरमें 'नमो भवाय शर्वाय' यह कहा। उसकी उस चीखको सुनकर गगनमें विचरण करनेवाले सभी चारण चिल्लाने लगे - हाय हाय! हाय हाय ! यह शिव-भक्त तो नीचे गिर रहा है ॥ ३८-४१ ॥ सर्वत्र व्याप्त और अविनाशी नित्य शंकरने चारणोंके उस वचनको सुना और फिर सोचने लगे- यह नगर किसके द्वारा पृथ्वीपर गिराया जा रहा है।