भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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८४श्रीवामनपुराण[ अध्याय १५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ज्ञातवान् देवपतिना सहस्रकिरणेन तत्।<br>पातितं राक्षसपुरं ततः क्रुद्धस्त्रिलोचनः॥ ४३<br>क्रुद्धस्तु भगवन्तं तं भानुमन्तमपश्यत्।<br>दृष्टमात्रस्त्रिनेत्रेण निपपात ततोऽम्बरात्॥ ४४<br>गगनात् स परिभ्रष्टः पथि वायुनिषेविते।<br>यदृच्छया निपतितो यन्त्रमुक्तो यथोपलः॥ ४५उन्होंने यह जान लिया कि देवोंके पति सहस्रकिरणमाली सूर्यद्वारा राक्षसोंका यह पुर गिराया गया है। इससे त्रिलोचन शंकर क्रुद्ध हो गये और उन्होंने भगवान् सूर्यको देखा। त्रिनेत्रधारी शंकरके देखते ही वे सूर्य आकाशसे नीचे आ गिरे। आकाशसे नीचे वायुमण्डलमार्गमें वे इस प्रकार गिरे जैसे यन्त्रके द्वारा कोई पत्थर फेंका गया हो॥ ४२-४५।
ततो वायुपथान्मुक्तः किंशुकोज्ज्वलविग्रहः।<br>निपपातान्तरिक्षात् स वृतः किन्नरचारणैः॥ ४६<br><br>चारणैर्वेष्टितो भानुः प्रभात्याम्बरात् पतन्।<br>अर्द्धपक्वं यथा तालात् फलं कपिभिरावृतम्॥ ४७<br><br>ततस्तु ऋषयोऽभ्येत्य प्रत्यूचुर्भानुमालिनम्।<br>निपतस्व हरिक्षेत्रे यदि श्रेयोऽभिवाञ्छसि॥ ४८<br><br>ततोऽब्रवीत् पतन्नेव विवस्वांस्तांस्तपोधनान्।<br>किं तत् क्षेत्रं हरेः पुण्यं वद्वध्वं शीघ्रमेव मे॥ ४९फिर पलाश-पुष्पके समान आभावाले सूर्य वायुमण्डलसे अलग होकर किंनरों एवं चारणोंसे भरे अन्तरिक्षसे नीचे गिर गये। उस समय आकाशसे नीचे गिरते हुए सूर्य चारणोंसे घिरे हुए ऐसे लग रहे थे, जैसे तालवृक्षसे गिरनेवाला अधपका तालफल कपियोंसे घिरा हो। तब मुनियोंने किरणमाली भगवान् सूर्यदेवके समीप आकर उनसे कहा कि यदि तुम कल्याण चाहते हो तो विष्णुके क्षेत्रमें गिरो। गिरते हुए ही सूर्यने (ऐसा सुनकर) उन तपस्वियोंसे पूछा-विष्णुभगवान्‌का वह पवित्र क्षेत्र कौन-सा है? आपलोग उसे मुझे शीघ्र बतलायें ॥ ४६-४९॥
तमूचुर्मुनयः सूर्य शृणु क्षेत्रं महाफलम्।<br>साम्प्रतं वासुदेवस्य भावि तच्छंकरस्य च॥ ५०<br><br>योगशायिनमारभ्य यावत् केशवदर्शनम्।<br>एतत् क्षेत्रं हरेः पुण्यं नाम्ना वाराणसी पुरी॥ ५१<br><br>तच्छ्रुत्वा भगवान् भानुर्भवनेत्राग्नितापितः।<br>वरणायास्तथैवास्यास्त्वन्तरे निपपात ह॥ ५२<br><br>ततः प्रदह्यति तनौ निमज्यास्यां लुलद् रविः।<br>वरणायां समभ्येत्य न्यमज्जत यथेच्छया॥ ५३इसपर मुनियोंने सूर्यसे बतलाया - सूर्यदेव! आप महाफल देनेवाले उस क्षेत्रका विवरण सुनिये- इस समय वह क्षेत्र वासुदेवका क्षेत्र है, किंतु भविष्यमें वह शंकरका क्षेत्र होगा। योगशायीसे प्रारम्भ कर केशवदर्शनतकका क्षेत्र हरिका पवित्र क्षेत्र है, इसका नाम वाराणसीपुरी है। उसे सुनकर शिवजीकी नेत्राग्निसे संतप्त होते हुए भगवान् सूर्य वरुणा और असी* इन दोनों नदियोंके बीचमें गिरे। उसके बाद शरीरके जलते रहनेसे व्याकुल हुए सूर्य असी नदीमें स्नान करनेके बाद वरुणा नदीमें इच्छानुकूल स्नान किये॥ ५०-५३॥
भूयोऽसिं वरणां भूयो भूयोऽपि वरणादसिम्।<br>लुलंस्त्रिनेत्रवह्न्यात्तौ भ्रमतेऽलातचक्रवत्॥ ५४<br>एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मन् ऋषयो यक्षराक्षसाः।<br>नागा विद्याधराश्चापि पक्षिणोऽप्सरसस्तथा॥ ५५<br>यावन्तो भास्कररथे भूतप्रेतादयः स्थिताः।<br>तावन्तो ब्रह्मसदनं गता वेदयितुं मुने॥ ५६इस प्रकार शंकरके तीसरे नेत्रकी अग्निसे दग्ध होकर वे बारंबार असि और वरुणा नदियोंकी ओर अलातचक्र (लुकाठीके मण्डल)-के समान चक्कर काटने लगे। मुने! इस बीच ऋषि, यक्ष, राक्षस, नाग, विद्याधर, पक्षी, अप्सराएँ और भास्करके रथमें जितने भूत-प्रेत आदि थे, वे सभी इसे ज्ञापित करनेके लिये ब्रह्मलोकमें गये।

* अब भी वरुणा और अस्सी नदियाँ वाराणसीको अपने अन्तरालमें किये हुए हैं। अस्सी बरसातमें जलभरित होती है, पर वरुणा सदा जलपूर्णा रहती है।