वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १६ ] देवताओंका शयन—तिथियों और उनके अशून्यशयन आदि व्रतों एवं शिव-पूजनका वर्णन ८५ ततो ब्रह्मा सुरपतिः सुरैः सार्धं समभ्यगात्। रम्यं महेश्वरावासं मन्दरं रविकारणात् ॥ ५७ गत्वा दृष्ट्वा च देवेशं शंकरं शूलपाणिनम्। प्रसाद्य भास्कारार्थाय वाराणस्यामुपानयत् ॥ ५८ ततो दिवाकरं भूयः पाणिनादाय शंकरः। कृत्वा नामास्य लोलेति रथमारोपयत् पुनः ॥ ५९ आरोपिते दिनकरे ब्रह्माऽभ्येत्य सुकेशिनम्। सबान्धवं सनगरं पुनरारोपयद् दिवि ॥ ६० समारोप्य सुकेशिं च परिष्वज्य च शंकरम्। प्रणम्य केशवं देवं वैराजं स्वगृहं गतः ॥ ६१ एवं पुरा नारद भास्करेण पुरं सुकेशर्भुवि सन्निपातितम्। दिवाकरो भूमितले भवेन क्षिप्तस्तु दृष्ट्या न च संप्रदग्धः ॥ ६२ आरोपितो भूमितलाद् भवेन भूयोऽपि भानुः प्रतिभासनाय। स्वयंभुवा चापि निशाचरेन्द्र- स्त्वारोपितः खे सपुरः सबन्धुः ॥ ६३ तब सुरपति इन्द्र, ब्रह्मा देवताओंके साथ सूर्यकी शान्तिके लिये महेश्वरके आवास-स्थान मन्दर पर्वतपर गये। वहाँ जाकर तथा देवेश शूलपाणि भगवान् शिवका दर्शन करनेके बाद भगवान् ब्रह्माजी भास्करके लिये उन्हें (शिवजीको) प्रसन्न कर उन्हें (सूर्यको) वाराणसीमें लाये ॥ ५४—५८ ॥ फिर भगवान् शंकरने सूर्यभगवान्को हाथमें लेकर उनका नाम 'लोल' रख दिया और उन्हें पुनः उनके रथपर स्थापित कर दिया। दिनकरके अपने रथमें आरूढ़ हो जानेपर ब्रह्मा सुकेशीके पास गये एवं उसे भी पुनः बान्धवों और नगरसहित आकाशमें पूर्ववत् स्थापित कर दिया। सुकेशीको पुनः आकाशमें स्थापित करनेके बाद ब्रह्माजी शंकरका आलिङ्गन एवं केशवदेवको प्रणाम कर अपने वैराज नामक लोकमें चले गये। नारदजी ! प्राचीन समयमें इस प्रकार सूर्यने सुकेशीके नगरको पृथ्वीपर गिराया एवं महादेवने भगवान् सूर्यको अपने तृतीय नेत्रकी अग्निसे दग्ध न कर केवल भूमितलपर गिरा ही दिया था। फिर शंकरने सूर्यको प्रतिभासित होनेके लिये भूमितलसे आकाशमें स्थित किया और ब्रह्माने निशाचरराजको उसके पुर और बन्धुओंके साथ आकाशमें फिर संस्थापित कर दिया ॥ ५९—६३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १५ ॥ सोलहवाँ अध्याय देवताओंका शयन — तिथियों और उनके अशून्यशयन आदि व्रतों एवं शिव-पूजनका वर्णन नारद उवाच यानेतान् भगवान् प्राह कामिभिः शशिनं प्रति। आराधनाय देवाभ्यां हरीशाभ्यां वदस्व तान् ॥ १ पुलस्त्य उवाच शृणुष्व कामिभिः प्रोक्तान् व्रतान् पुण्यान् कलिप्रिय। आराधनाय शर्वस्य केशवस्य च धीमतः ॥ २ नारदजीने कहा — पुलस्त्यजी ! आपने चन्द्रमाके प्रति कामियोंद्वारा वर्णित श्रीहरि और शंकरकी आराधनाके लिये जिन व्रतोंका उल्लेख किया है उनका वर्णन करें ॥ १ ॥ पुलस्त्यजी बोले - लोक-कल्याणके लिये कलहको भी इष्ट माननेवाले कलि (कलह) - प्रिय नारदजी ! आप महादेव और बुद्धिमान् श्रीहरिकी आराधनाके लिये कामियोंद्वारा कहे गये पवित्र व्रतोंका वर्णन सुनें।