वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १६ यदा त्वाषाढी संयाति व्रजते चोत्तरायणम्। तदा स्वपिति देवेशो भोगिभोगे श्रियः पतिः ॥ ३ प्रतिसुप्ते विभौ तस्मिन् देवगन्धर्वगुह्यकाः। देवानां मातरश्चापि प्रसुप्ताश्चाप्यनुक्रमात् ॥ ४ नारद उवाच कथयस्व सुरादीनां शयने विधिमुत्तमम्। सर्वमनुक्रमेणैव पुरस्कृत्य जनार्दनम् ॥ ५ पुलस्त्य उवाच मिथुनाभिगते सूर्ये शुक्लपक्षे तपोधन। एकादश्यां जगत्स्वामी शयनं परिकल्पयेत् ॥ ६ शेषाहिभोगपर्यङ्कं कृत्वा सम्पूज्य केशवम्। कृत्वोपवीतकं चैव सम्यक्सम्पूज्य वै द्विजान् ॥ ७ अनुज्ञां ब्राह्मणेभ्यश्च द्वादश्यां प्रयतः शुचिः। लब्ध्वा पीताम्बरधरः स्वस्तिनिद्रां समानयेत् ॥ ८ त्रयोदश्यां ततः कामः स्वपते शयने शुभे। कदम्बानां सुगन्धानां कुसुमैः परिकल्पिते ॥ ९ चतुर्दश्यां ततो यक्षाः स्वपन्ति सुखशीतले। सौवर्णपङ्कजकृते सुखास्तीर्णोपधानके ॥ १० पौर्णमास्यामुमानाथः स्वपते चर्मसंस्तरे। वैयाघ्रे च जटाभारं समुद्ग्रन्थ्यान्यचर्मणा ॥ ११ ततो दिवाकरो राशिं संप्रयाति च कर्कटम्। ततोऽमराणां रजनी भवति दक्षिणायनम् ॥ १२ ब्रह्मा प्रतिपदि तथा नीलोत्पलमयेऽनघ। तल्पे स्वपिति लोकानां दर्शयन् मार्गमुत्तमम् ॥ १३ विश्वकर्मा द्वितीयायां तृतीयायां गिरेः सुता। विनायकश्चतुर्थ्यां तु पञ्चम्यामपि धर्मराट् ॥ १४ षष्ठ्यां स्कन्दः प्रस्वपिति सप्तम्यां भगवान् रविः। कात्यायनी तथाष्टम्यां नवम्यां कमलालया ॥ १५ दशम्यां भुजगेन्द्राश्च स्वपन्ते वायुभोजनाः। एकादश्यां तु कृष्णायां साध्या ब्रह्मन् स्वपन्ति च ॥ १६ एष क्रमस्ते गदितो नभादौ स्वप्ने मुने। स्वपत्सु तत्र देवेषु प्रावृट्कालः समाययौ ॥ १७ जब आषाढ़ी पूर्णिमा बीत जाती है एवं उत्तरायण चलता रहता है, तब लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु भोगिभोग (शेषशय्या) - पर सो जाते हैं। उन विष्णुके सो जानेपर देवता, गन्धर्व, गुह्यक एवं देवमाताएँ भी क्रमशः सो जाती हैं ॥ २-४॥ नारदने कहा - जनार्दनसे लेकर अनुक्रमसे देवता आदिके शयनकी सब उत्तम विधि मुझे बतलाइये ॥ ५ ॥ पुलस्त्यजी बोले- तपोधन नारदजी ! आषाढ़के शुक्लपक्षमें सूर्यके मिथुनराशिमें चले जानेपर एकादशी तिथिके दिन जगदीश्वर विष्णुकी शय्याकी परिकल्पना करनी चाहिये। उस शय्यापर शेषनागके शरीर और फणकी रचना कर यज्ञोपवीतयुक्त श्रीकेशव (-की प्रतिमा)-की पूजा कर ब्राह्मणोंकी आज्ञासे संयम एवं पवित्रतापूर्वक रहते हुए स्वयं भी पीताम्बर धारण कर द्वादशी तिथिमें सुखपूर्वक उन्हें सुलाना चाहिये ॥ ६-८ ॥ इसके बाद त्रयोदशी तिथिमें सुगन्धित कदम्बके पुष्पोंसे बनी पवित्र शय्यापर कामदेव शयन करते हैं। फिर चतुर्दशीको सुशीतल स्वर्णपङ्कजसे निर्मित सुखदायकरूपमें बिछाये गये एवं तकियेवाली शय्यापर यक्षलोग शयन करते हैं। पूर्णमासी तिथिको चर्मवस्त्र धारणकर उमानाथ शंकर एक-दूसरे चर्मद्वारा जटाभार बाँधकर व्याघ्र-चर्मकी शय्यापर सोते हैं। उसके बाद जब सूर्य कर्कराशिमें गमन करते हैं तब देवताओंके लिये रात्रिस्वरूप दक्षिणायनका आरम्भ हो जाता है ॥ ९-१२॥ निष्पाप नारदजी ! लोगोंको उत्तम मार्ग दिखलाते हुए ब्रह्माजी (श्रावण कृष्ण) प्रतिपदाको नीले कमलकी शय्यापर सो जाते हैं। विश्वकर्मा द्वितीयाको, पार्वतीजी तृतीयाको, गणेशजी चतुर्थीको, धर्मराज पञ्चमीको, कार्तिकेयजी षष्ठीको, सूर्य भगवान् सप्तमीको, दुर्गादेवी अष्टमीको, लक्ष्मीजी नवमीको, वायु पीनेवाले श्रेष्ठ सर्प दशमीको और साध्यगण कृष्णपक्षकी एकादशीको सो जाते हैं ॥ १३-१६॥ मुने! इस प्रकार हमने तुम्हें श्रावण आदिके महीनोंमें देवताओंके सोनेका क्रम बतलाया। देवोंके सो जानेपर वर्षाकालका आगमन हो जाता है।