भारतकोश
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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

अध्याय १५ ] दैत्योंका धर्म एवं सदाचारका पालन, सुकेशीके नगरका उत्थान-पतन, लोलार्क-प्रसंग ८३ तेनासौ दीप्तिमांश्चन्द्रः परिभूय दिवाकरम्। अस्माकमानन्दकरो दिवा तपति सूर्यवत् ॥ २८ लक्ष्यते कारणैरन्यैर्बहुभिः सत्यमेव हि। शशाङ्कनिर्जितः सूर्यो न विभाति यथा पुरा ॥ २९ यथामी कमलाः श्लक्ष्णा रणद्भृङ्गगणावृताः। विकचाः प्रतिभासन्ते जातः सूर्योदयो ध्रुवम् ॥ ३० यथा चामी विभासन्ति विकचाः कुमुदाकराः। अतो विज्ञायते चन्द्र उदितश्च प्रतापवान् ॥ ३१ एवं संभाषतां तत्र सूर्यो वाक्यानि नारद। अमन्यत किमेतद्धि लोको वक्ति शुभाशुभम् ॥ ३२ एवं संचिन्त्य भगवान् दध्यौ ध्यानं दिवाकरः । आसमन्ताज्जगद् ग्रस्तं त्रैलोक्यं रजनीचरैः ॥ ३३ ततस्तु भगवाञ्ज्ञात्वा तेजसोऽप्यसहिष्णुताम् । निशाचरस्य वृद्धिं तामचिन्तयत योगवित् ॥ ३४ ततोऽज्ञासीच्च तान् सर्वान् सदाचाररताञ्शुचीन्। देवब्राह्मणपूजासु संसक्तान् धर्मसंयुतान् ॥ ३५ ततस्तु रक्षः क्षयकृत् तिमिरद्विपकेसरी। महांशुनखरः सूर्यस्तद्विघातमचिन्तयत् ॥ ३६ ज्ञातवांश्च ततश्छिद्रं राक्षसानां दिवस्पतिः। स्वधर्मविच्युतिर्नाम सर्वधर्मविघातकृत् ॥ ३७ ततः क्रोधाभिभूतेन भानुना रिपुभेदिभिः। भानुभी राक्षसपुरं तद् दृष्टं च यथेच्छया ॥ ३८ स भानुना तदा दृष्टः क्रोधाध्मातेन चक्षुषा। निपपाताम्बराद् भ्रष्टः क्षीणपुण्य इव ग्रहः ॥ ३९ पतमानं समालोक्य पुरं शालकटङ्कटः। नमो भवाय शर्वाय इदमुच्चैरुदीरयत् ॥ ४० तमाक्रन्दितमाकर्ण्य चारणा गगनेचराः। हा हेति चुक्रुशुः सर्वे हरभक्तः पतत्यसौ ॥ ४१ तच्चारणवचः शर्वः श्रुतवान् सर्वगोऽव्ययः । श्रुत्वा संचिन्तयामास केनासौ पात्यते भुवि ॥ ४२ रक्षा की है। उससे तेजस्वी चन्द्रमा सूर्यपर विजय प्राप्त करके हमें आनन्द देते हुए दिनमें सूर्यकी भाँति दीप्तिमान् हो रहे हैं। अन्य अनेक प्रकारके कारणोंसे सचमुच यह लक्षित हो रहा है कि चन्द्रमाके द्वारा पराजित हुए सूर्य पूर्ववत् दीप्तिवाले नहीं दीख रहे हैं ॥ २६- २९ ॥ इधर ये सुन्दर कमल खिले हैं और उनपर भौंरे गुंजार कर रहे हैं। भ्रमर-समूहसे आवृत्त ये सुन्दर कमल विकसित दिखलायी पड़ रहे हैं; अतः निश्चय ही सूर्योदय हुआ है। और इधर ये कुमुद्वृन्द खिले हुए हैं; अतः लगता है कि प्रतापवान् चन्द्रमा उदित हुआ है। नारदजी! इस प्रकार वार्ता करनेवालोंके वाक्योंको सुनकर सूर्य सोचने लगे कि ये लोग इस प्रकार शुभाशुभ वचन क्यों बोल रहे हैं ? भगवान् दिवाकर ऐसा विचारकर ध्यानमग्न हो गये और उन्होंने देखा कि समस्त त्रैलोक्य चारों ओरसे राक्षसोंद्वारा ग्रस्त हो गया है ॥ ३०-३३॥ तब योगी भगवान् भास्कर राक्षसोंकी वृद्धि तथा तेजकी असहनीयताको जानकर स्वयं चिन्तन करने लगे। उन्हें यह ज्ञात हुआ कि सभी राक्षस सदाचार- परायण, पवित्र, देवता और ब्राह्मणोंकी पूजामें अनुरक्त तथा धार्मिक हैं। उसके बाद राक्षसोंको नष्ट करनेवाले तथा अन्धकाररूपी हाथीके लिये तेज किरणरूपी नखवाले सिंहके समान सूर्य उनके विनाशके विषयमें चिन्तन करने लगे। अन्तमें सूर्यको राक्षसोंके अपने धर्मसे गिरनेका मूल कारण मालूम हुआ, जो समस्त धर्मोंका विनाशक है ॥ ३४-३७॥ तब क्रोधसे अभिभूत सूर्यने शत्रुओंके भेदन करनेवाली अपनी किरणोंद्वारा भलीभाँति उस राक्षसको देखा। उस समय सूर्यद्वारा क्रोधभरी दृष्टिसे देखे जानेके कारण वह नगर नष्ट हुए पुण्यवाले ग्रहके समान आकाशसे नीचे गिर पड़ा। अपने नगरको गिरते देखकर शालकटंकट (सुकेशी)- ने ऊँचे स्वरसे चीखनेके स्वरमें 'नमो भवाय शर्वाय' यह कहा। उसकी उस चीखको सुनकर गगनमें विचरण करनेवाले सभी चारण चिल्लाने लगे - हाय हाय! हाय हाय ! यह शिव-भक्त तो नीचे गिर रहा है ॥ ३८-४१ ॥ सर्वत्र व्याप्त और अविनाशी नित्य शंकरने चारणोंके उस वचनको सुना और फिर सोचने लगे- यह नगर किसके द्वारा पृथ्वीपर गिराया जा रहा है।

८४श्रीवामनपुराण[ अध्याय १५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ज्ञातवान् देवपतिना सहस्रकिरणेन तत्।<br>पातितं राक्षसपुरं ततः क्रुद्धस्त्रिलोचनः॥ ४३<br>क्रुद्धस्तु भगवन्तं तं भानुमन्तमपश्यत्।<br>दृष्टमात्रस्त्रिनेत्रेण निपपात ततोऽम्बरात्॥ ४४<br>गगनात् स परिभ्रष्टः पथि वायुनिषेविते।<br>यदृच्छया निपतितो यन्त्रमुक्तो यथोपलः॥ ४५उन्होंने यह जान लिया कि देवोंके पति सहस्रकिरणमाली सूर्यद्वारा राक्षसोंका यह पुर गिराया गया है। इससे त्रिलोचन शंकर क्रुद्ध हो गये और उन्होंने भगवान् सूर्यको देखा। त्रिनेत्रधारी शंकरके देखते ही वे सूर्य आकाशसे नीचे आ गिरे। आकाशसे नीचे वायुमण्डलमार्गमें वे इस प्रकार गिरे जैसे यन्त्रके द्वारा कोई पत्थर फेंका गया हो॥ ४२-४५।
ततो वायुपथान्मुक्तः किंशुकोज्ज्वलविग्रहः।<br>निपपातान्तरिक्षात् स वृतः किन्नरचारणैः॥ ४६<br><br>चारणैर्वेष्टितो भानुः प्रभात्याम्बरात् पतन्।<br>अर्द्धपक्वं यथा तालात् फलं कपिभिरावृतम्॥ ४७<br><br>ततस्तु ऋषयोऽभ्येत्य प्रत्यूचुर्भानुमालिनम्।<br>निपतस्व हरिक्षेत्रे यदि श्रेयोऽभिवाञ्छसि॥ ४८<br><br>ततोऽब्रवीत् पतन्नेव विवस्वांस्तांस्तपोधनान्।<br>किं तत् क्षेत्रं हरेः पुण्यं वद्वध्वं शीघ्रमेव मे॥ ४९फिर पलाश-पुष्पके समान आभावाले सूर्य वायुमण्डलसे अलग होकर किंनरों एवं चारणोंसे भरे अन्तरिक्षसे नीचे गिर गये। उस समय आकाशसे नीचे गिरते हुए सूर्य चारणोंसे घिरे हुए ऐसे लग रहे थे, जैसे तालवृक्षसे गिरनेवाला अधपका तालफल कपियोंसे घिरा हो। तब मुनियोंने किरणमाली भगवान् सूर्यदेवके समीप आकर उनसे कहा कि यदि तुम कल्याण चाहते हो तो विष्णुके क्षेत्रमें गिरो। गिरते हुए ही सूर्यने (ऐसा सुनकर) उन तपस्वियोंसे पूछा-विष्णुभगवान्‌का वह पवित्र क्षेत्र कौन-सा है? आपलोग उसे मुझे शीघ्र बतलायें ॥ ४६-४९॥
तमूचुर्मुनयः सूर्य शृणु क्षेत्रं महाफलम्।<br>साम्प्रतं वासुदेवस्य भावि तच्छंकरस्य च॥ ५०<br><br>योगशायिनमारभ्य यावत् केशवदर्शनम्।<br>एतत् क्षेत्रं हरेः पुण्यं नाम्ना वाराणसी पुरी॥ ५१<br><br>तच्छ्रुत्वा भगवान् भानुर्भवनेत्राग्नितापितः।<br>वरणायास्तथैवास्यास्त्वन्तरे निपपात ह॥ ५२<br><br>ततः प्रदह्यति तनौ निमज्यास्यां लुलद् रविः।<br>वरणायां समभ्येत्य न्यमज्जत यथेच्छया॥ ५३इसपर मुनियोंने सूर्यसे बतलाया - सूर्यदेव! आप महाफल देनेवाले उस क्षेत्रका विवरण सुनिये- इस समय वह क्षेत्र वासुदेवका क्षेत्र है, किंतु भविष्यमें वह शंकरका क्षेत्र होगा। योगशायीसे प्रारम्भ कर केशवदर्शनतकका क्षेत्र हरिका पवित्र क्षेत्र है, इसका नाम वाराणसीपुरी है। उसे सुनकर शिवजीकी नेत्राग्निसे संतप्त होते हुए भगवान् सूर्य वरुणा और असी* इन दोनों नदियोंके बीचमें गिरे। उसके बाद शरीरके जलते रहनेसे व्याकुल हुए सूर्य असी नदीमें स्नान करनेके बाद वरुणा नदीमें इच्छानुकूल स्नान किये॥ ५०-५३॥
भूयोऽसिं वरणां भूयो भूयोऽपि वरणादसिम्।<br>लुलंस्त्रिनेत्रवह्न्यात्तौ भ्रमतेऽलातचक्रवत्॥ ५४<br>एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मन् ऋषयो यक्षराक्षसाः।<br>नागा विद्याधराश्चापि पक्षिणोऽप्सरसस्तथा॥ ५५<br>यावन्तो भास्कररथे भूतप्रेतादयः स्थिताः।<br>तावन्तो ब्रह्मसदनं गता वेदयितुं मुने॥ ५६इस प्रकार शंकरके तीसरे नेत्रकी अग्निसे दग्ध होकर वे बारंबार असि और वरुणा नदियोंकी ओर अलातचक्र (लुकाठीके मण्डल)-के समान चक्कर काटने लगे। मुने! इस बीच ऋषि, यक्ष, राक्षस, नाग, विद्याधर, पक्षी, अप्सराएँ और भास्करके रथमें जितने भूत-प्रेत आदि थे, वे सभी इसे ज्ञापित करनेके लिये ब्रह्मलोकमें गये।

* अब भी वरुणा और अस्सी नदियाँ वाराणसीको अपने अन्तरालमें किये हुए हैं। अस्सी बरसातमें जलभरित होती है, पर वरुणा सदा जलपूर्णा रहती है।

अध्याय १६ ] देवताओंका शयन—तिथियों और उनके अशून्यशयन आदि व्रतों एवं शिव-पूजनका वर्णन ८५ ततो ब्रह्मा सुरपतिः सुरैः सार्धं समभ्यगात्। रम्यं महेश्वरावासं मन्दरं रविकारणात् ॥ ५७ गत्वा दृष्ट्वा च देवेशं शंकरं शूलपाणिनम्। प्रसाद्य भास्कारार्थाय वाराणस्यामुपानयत् ॥ ५८ ततो दिवाकरं भूयः पाणिनादाय शंकरः। कृत्वा नामास्य लोलेति रथमारोपयत् पुनः ॥ ५९ आरोपिते दिनकरे ब्रह्माऽभ्येत्य सुकेशिनम्। सबान्धवं सनगरं पुनरारोपयद् दिवि ॥ ६० समारोप्य सुकेशिं च परिष्वज्य च शंकरम्। प्रणम्य केशवं देवं वैराजं स्वगृहं गतः ॥ ६१ एवं पुरा नारद भास्करेण पुरं सुकेशर्भुवि सन्निपातितम्। दिवाकरो भूमितले भवेन क्षिप्तस्तु दृष्ट्या न च संप्रदग्धः ॥ ६२ आरोपितो भूमितलाद् भवेन भूयोऽपि भानुः प्रतिभासनाय। स्वयंभुवा चापि निशाचरेन्द्र- स्त्वारोपितः खे सपुरः सबन्धुः ॥ ६३ तब सुरपति इन्द्र, ब्रह्मा देवताओंके साथ सूर्यकी शान्तिके लिये महेश्वरके आवास-स्थान मन्दर पर्वतपर गये। वहाँ जाकर तथा देवेश शूलपाणि भगवान् शिवका दर्शन करनेके बाद भगवान् ब्रह्माजी भास्करके लिये उन्हें (शिवजीको) प्रसन्न कर उन्हें (सूर्यको) वाराणसीमें लाये ॥ ५४—५८ ॥ फिर भगवान् शंकरने सूर्यभगवान्को हाथमें लेकर उनका नाम 'लोल' रख दिया और उन्हें पुनः उनके रथपर स्थापित कर दिया। दिनकरके अपने रथमें आरूढ़ हो जानेपर ब्रह्मा सुकेशीके पास गये एवं उसे भी पुनः बान्धवों और नगरसहित आकाशमें पूर्ववत् स्थापित कर दिया। सुकेशीको पुनः आकाशमें स्थापित करनेके बाद ब्रह्माजी शंकरका आलिङ्गन एवं केशवदेवको प्रणाम कर अपने वैराज नामक लोकमें चले गये। नारदजी ! प्राचीन समयमें इस प्रकार सूर्यने सुकेशीके नगरको पृथ्वीपर गिराया एवं महादेवने भगवान् सूर्यको अपने तृतीय नेत्रकी अग्निसे दग्ध न कर केवल भूमितलपर गिरा ही दिया था। फिर शंकरने सूर्यको प्रतिभासित होनेके लिये भूमितलसे आकाशमें स्थित किया और ब्रह्माने निशाचरराजको उसके पुर और बन्धुओंके साथ आकाशमें फिर संस्थापित कर दिया ॥ ५९—६३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १५ ॥ सोलहवाँ अध्याय देवताओंका शयन — तिथियों और उनके अशून्यशयन आदि व्रतों एवं शिव-पूजनका वर्णन नारद उवाच यानेतान् भगवान् प्राह कामिभिः शशिनं प्रति। आराधनाय देवाभ्यां हरीशाभ्यां वदस्व तान् ॥ १ पुलस्त्य उवाच शृणुष्व कामिभिः प्रोक्तान् व्रतान् पुण्यान् कलिप्रिय। आराधनाय शर्वस्य केशवस्य च धीमतः ॥ २ नारदजीने कहा — पुलस्त्यजी ! आपने चन्द्रमाके प्रति कामियोंद्वारा वर्णित श्रीहरि और शंकरकी आराधनाके लिये जिन व्रतोंका उल्लेख किया है उनका वर्णन करें ॥ १ ॥ पुलस्त्यजी बोले - लोक-कल्याणके लिये कलहको भी इष्ट माननेवाले कलि (कलह) - प्रिय नारदजी ! आप महादेव और बुद्धिमान् श्रीहरिकी आराधनाके लिये कामियोंद्वारा कहे गये पवित्र व्रतोंका वर्णन सुनें।

१८- महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव, विन्ध्यप्रसंग, दुर्गाकी अवस्थिति

८६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १६ यदा त्वाषाढी संयाति व्रजते चोत्तरायणम्। तदा स्वपिति देवेशो भोगिभोगे श्रियः पतिः ॥ ३ प्रतिसुप्ते विभौ तस्मिन् देवगन्धर्वगुह्यकाः। देवानां मातरश्चापि प्रसुप्ताश्चाप्यनुक्रमात् ॥ ४ नारद उवाच कथयस्व सुरादीनां शयने विधिमुत्तमम्। सर्वमनुक्रमेणैव पुरस्कृत्य जनार्दनम् ॥ ५ पुलस्त्य उवाच मिथुनाभिगते सूर्ये शुक्लपक्षे तपोधन। एकादश्यां जगत्स्वामी शयनं परिकल्पयेत् ॥ ६ शेषाहिभोगपर्यङ्कं कृत्वा सम्पूज्य केशवम्। कृत्वोपवीतकं चैव सम्यक्सम्पूज्य वै द्विजान् ॥ ७ अनुज्ञां ब्राह्मणेभ्यश्च द्वादश्यां प्रयतः शुचिः। लब्ध्वा पीताम्बरधरः स्वस्तिनिद्रां समानयेत् ॥ ८ त्रयोदश्यां ततः कामः स्वपते शयने शुभे। कदम्बानां सुगन्धानां कुसुमैः परिकल्पिते ॥ ९ चतुर्दश्यां ततो यक्षाः स्वपन्ति सुखशीतले। सौवर्णपङ्कजकृते सुखास्तीर्णोपधानके ॥ १० पौर्णमास्यामुमानाथः स्वपते चर्मसंस्तरे। वैयाघ्रे च जटाभारं समुद्ग्रन्थ्यान्यचर्मणा ॥ ११ ततो दिवाकरो राशिं संप्रयाति च कर्कटम्। ततोऽमराणां रजनी भवति दक्षिणायनम् ॥ १२ ब्रह्मा प्रतिपदि तथा नीलोत्पलमयेऽनघ। तल्पे स्वपिति लोकानां दर्शयन् मार्गमुत्तमम् ॥ १३ विश्वकर्मा द्वितीयायां तृतीयायां गिरेः सुता। विनायकश्चतुर्थ्यां तु पञ्चम्यामपि धर्मराट् ॥ १४ षष्ठ्यां स्कन्दः प्रस्वपिति सप्तम्यां भगवान् रविः। कात्यायनी तथाष्टम्यां नवम्यां कमलालया ॥ १५ दशम्यां भुजगेन्द्राश्च स्वपन्ते वायुभोजनाः। एकादश्यां तु कृष्णायां साध्या ब्रह्मन् स्वपन्ति च ॥ १६ एष क्रमस्ते गदितो नभादौ स्वप्ने मुने। स्वपत्सु तत्र देवेषु प्रावृट्कालः समाययौ ॥ १७ जब आषाढ़ी पूर्णिमा बीत जाती है एवं उत्तरायण चलता रहता है, तब लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु भोगिभोग (शेषशय्या) - पर सो जाते हैं। उन विष्णुके सो जानेपर देवता, गन्धर्व, गुह्यक एवं देवमाताएँ भी क्रमशः सो जाती हैं ॥ २-४॥ नारदने कहा - जनार्दनसे लेकर अनुक्रमसे देवता आदिके शयनकी सब उत्तम विधि मुझे बतलाइये ॥ ५ ॥ पुलस्त्यजी बोले- तपोधन नारदजी ! आषाढ़के शुक्लपक्षमें सूर्यके मिथुनराशिमें चले जानेपर एकादशी तिथिके दिन जगदीश्वर विष्णुकी शय्याकी परिकल्पना करनी चाहिये। उस शय्यापर शेषनागके शरीर और फणकी रचना कर यज्ञोपवीतयुक्त श्रीकेशव (-की प्रतिमा)-की पूजा कर ब्राह्मणोंकी आज्ञासे संयम एवं पवित्रतापूर्वक रहते हुए स्वयं भी पीताम्बर धारण कर द्वादशी तिथिमें सुखपूर्वक उन्हें सुलाना चाहिये ॥ ६-८ ॥ इसके बाद त्रयोदशी तिथिमें सुगन्धित कदम्बके पुष्पोंसे बनी पवित्र शय्यापर कामदेव शयन करते हैं। फिर चतुर्दशीको सुशीतल स्वर्णपङ्कजसे निर्मित सुखदायकरूपमें बिछाये गये एवं तकियेवाली शय्यापर यक्षलोग शयन करते हैं। पूर्णमासी तिथिको चर्मवस्त्र धारणकर उमानाथ शंकर एक-दूसरे चर्मद्वारा जटाभार बाँधकर व्याघ्र-चर्मकी शय्यापर सोते हैं। उसके बाद जब सूर्य कर्कराशिमें गमन करते हैं तब देवताओंके लिये रात्रिस्वरूप दक्षिणायनका आरम्भ हो जाता है ॥ ९-१२॥ निष्पाप नारदजी ! लोगोंको उत्तम मार्ग दिखलाते हुए ब्रह्माजी (श्रावण कृष्ण) प्रतिपदाको नीले कमलकी शय्यापर सो जाते हैं। विश्वकर्मा द्वितीयाको, पार्वतीजी तृतीयाको, गणेशजी चतुर्थीको, धर्मराज पञ्चमीको, कार्तिकेयजी षष्ठीको, सूर्य भगवान् सप्तमीको, दुर्गादेवी अष्टमीको, लक्ष्मीजी नवमीको, वायु पीनेवाले श्रेष्ठ सर्प दशमीको और साध्यगण कृष्णपक्षकी एकादशीको सो जाते हैं ॥ १३-१६॥ मुने! इस प्रकार हमने तुम्हें श्रावण आदिके महीनोंमें देवताओंके सोनेका क्रम बतलाया। देवोंके सो जानेपर वर्षाकालका आगमन हो जाता है।

अध्याय १६] देवताओंका शयन—तिथियों और उनके अशून्यशयन आदि व्रतों एवं शिव-पूजनका वर्णन ८७ कङ्काः समं बलाकाभिरारोहन्ति नभोत्तमान्। ऋषिश्रेष्ठ ! (तब) बलाकाओं (बगुलोंके झुंडों)-के साथ वायसाश्चापि कुर्वन्ति नीडानि ऋषिपूंगव । कङ्क पक्षी ऊँचे पर्वतोंपर चढ़ जाते हैं तथा कौए घोंसले वायसाश्च स्वपन्त्येते ऋतौ गर्भभरालसाः ॥ १८ बनाने लगते हैं। इस ऋतुमें मादा कौएँ गर्भभारके कारण यस्यां तिथ्यां प्रस्वपिति विश्वकर्मा प्रजापतिः। आलस्यसे सोती हैं। प्रजापति विश्वकर्मा जिस द्वितीया तिथिमें सोते हैं, वह कल्याणकारिणी पवित्र तिथि अशून्यशयना द्वितीया सा शुभा पुण्या अशून्यशयनोदिता ॥ १९ द्वितीया तिथि कही जाती है। मुने ! उस तिथिमें लक्ष्मीके तस्यां तिथावर्च्य हरिं श्रीवत्साङ्कं चतुर्भुजम् । साथ पर्यङ्कस्थ श्रीवत्स नामक चिह्न धारण करनेवाले पर्यङ्कस्थं समं लक्ष्म्या गन्धपुष्पादिभिर्मुने ॥ २० चतुर्भुज विष्णुभगवान्‌की गन्ध-पुष्पादिके द्वारा पूजाके ततो देवाय शय्यायां फलानि प्रक्षिपेत् क्रमात्। हेतु शय्यापर क्रमशः फल तथा सुगन्ध-द्रव्य निवेदित सुरभीणि निवेद्येत्थं विज्ञाप्यो मधुसूदनः ॥ २१ कर उनसे इस प्रकार प्रार्थना करे कि— ॥ १७–२१ ॥ यथा हि लक्ष्म्या न वियुज्यसे त्वं हे त्रिविक्रम ! हे अनन्त !! हे जगन्निवास !!! जिस त्रिविक्रमानन्त जगन्निवास। प्रकार आप लक्ष्मीसे कभी अलग नहीं होते, उसी तथा त्वशून्यं शयनं सदैव प्रकार आपकी कृपासे हमारी शय्या भी कभी शून्य न अस्माकमेवेह तव प्रसादात् ॥ २२ हो। हे देव! हे वरद! हे अच्युत! हे ईश ! हे यथा त्वशून्यं तव देव तल्पं अमितवीर्यशाली विष्णो ! आपकी शय्या लक्ष्मीसे शून्य समं हि लक्ष्म्या वरदाच्युतेश। नहीं होती, उसी सत्यके प्रभावसे हमारी भी गृहस्थीके सत्येन तेनामितवीर्य विष्णो नाशका अवसर न आवे—पत्नीका वियोग न हो। देवर्षे ! गार्हस्थ्यनाशो मम नास्तु देव ॥ २३ इस प्रकार स्तुति करनेके बाद भगवान् विष्णुको इत्युच्चार्य प्रणम्येशं प्रसाद्य च पुनः पुनः। प्रणामद्वारा बार-बार प्रसन्नकर रात्रिमें तेल एवं नमकसे नक्तं भुञ्जीत देवर्षे तैलक्षारविवर्जितम् ॥ २४ रहित भोजन करे। दूसरे दिन बुद्धिमान् व्यक्ति, भगवान् द्वितीयेऽह्नि द्विजाग्र्याय फलान् दद्याद् विचक्षणः। लक्ष्मीधर मेरे ऊपर प्रसन्न हों-यह वाक्य उच्चारण लक्ष्मीधरः प्रीयतां मे इत्युच्चार्य निवेदयेत् ॥ २५ कर श्रेष्ठ ब्राह्मणको फलोंका दान दे ॥ २२-२५ ॥ अनेन तु विधानेन चातुर्मास्यव्रतं चरेत्। जबतक सूर्य वृश्चिकराशिपर रहते हैं, तबतक इसी यावद् वृश्चिकराशिस्थः प्रतिभाति दिवाकरः ॥ २६ विधिसे चातुर्मास्य-व्रतका पालन किया जाना चाहिये। ततो विबुध्यन्ति सुराः क्रमशः क्रमशो मुने। मुने ! उसके बाद क्रमशः देवता जागते हैं। सूर्यके तुलाराशिमें स्थित होनेपर विष्णु जाग जाते हैं। उसके बाद काम और तुलास्थेऽर्के हरिः कामः शिवः पश्चाद्विबुध्यते ॥ २७ शिव जागते हैं। उसके पश्चात् द्वितीयाके दिन अपने तत्र दानं द्वितीयायां मूर्तिर्लक्ष्मीधरस्य तु। विभवके अनुसार बिछौनेवाली शय्याके साथ लक्ष्मीधरकी सशय्यास्तरणोपेता यथा विभवमात्मनः ॥ २८ मूर्तिका दान करे। महामुने ! इस प्रकार मैंने आपको यह एष व्रतस्तु प्रथमः प्रोक्तस्तव महामुने । प्रथम व्रत बतलाया, जिसका आचरण करनेपर इस यस्मिंश्चीर्णे वियोगस्तु न भवेदिह कस्यचित् ॥ २९ संसारमें किसीको वियोग नहीं होता ॥ २६-२९ ॥ नभस्ये मासि च तथा या स्यात्कृष्णाष्टमी शुभा। इसी प्रकार भाद्रपदमासमें मृगशिरा नक्षत्रसे युक्ता मृगशिरेणैव सा तु कालाष्टमी स्मृता ॥ ३० युक्त जो पवित्र कृष्णाष्टमी होती है उसे कालाष्टमी माना गया है। उस तिथिमें भगवान् शंकर समस्त लिङ्गोंमें तस्यां सर्वेषु लिङ्गेषु तिथौ स्वपिति शंकरः। सोते एवं उनके संनिधानमें निवास करते हैं। इस वसते संनिधाने तु तत्र पूजाऽक्षया स्मृता ॥ ३१ अवसरपर की गयी शंकरजीकी पूजा अक्षय मानी गयी है।

८८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १६

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत्र स्नायीत वै विद्वान् गोमूत्रेण जलेन च।<br>स्नातः संपूजयेत् पुष्पैर्धत्तूरस्य त्रिलोचनम्॥ ३२<br><br>धूपं केसरनिर्यासं नैवेद्यं मधुसर्पिषी।<br>प्रीयतां मे विरूपाक्षस्त्वित्युच्चार्य च दक्षिणाम्।<br>विप्राय दद्यान्नैवेद्यं सहिरणयं द्विजोत्तम॥ ३३उस तिथिमें विद्वान् मनुष्यको चाहिये कि गोमूत्र और जलसे स्नान करे। स्नानके बाद धतूरेके पुष्पोंसे शंकरकी पूजा करे। द्विजोत्तम! केसरके गोंदका धूप तथा मधु एवं घृतका नैवेद्य अर्पित करनेके बाद 'विरूपाक्ष (त्रिनेत्र) मेरे ऊपर प्रसन्न हों'—यह कहकर ब्राह्मणको दक्षिणा तथा सुवर्णके साथ नैवेद्य प्रदान करे॥ ३०—३३॥
तद्वदाश्वयुजे मासि उपवासी जितेन्द्रियः।<br>नवम्यां गोमयस्नानं कुर्यात्पूजां तु पङ्कजैः।<br>धूपयेत् सर्जनिर्यासं नैवेद्यं मधुमोदकैः॥ ३४<br><br>कृतोपवासस्त्वष्टम्यां नवम्यां स्नानमाचरेत्।<br>प्रीयतां मे हिरण्याक्षो दक्षिणा सतिला स्मृता॥ ३५<br><br>कार्तिके पयसा स्नानं करवीरेण चार्चनम्।<br>धूपं श्रीवासनिर्र्यासं नैवेद्यं मधुपायसम्॥ ३६<br><br>सनैवेद्यं च रजतं दातव्यं दानमग्रजे।<br>प्रीयतां भगवान् स्थाणुरिति वाच्यमनिष्ठुरम्॥ ३७इसी प्रकार आश्विनमासमें नवमी तिथिको इन्द्रियोंको वशमें करके उपवास रहकर गोबरसे स्नान करनेके पश्चात् कमलोंसे पूजन करे तथा सर्ज वृक्षके निर्यास (गोंद)-का धूप एवं मधु और मोदकका नैवेद्य अर्पित करे। अष्टमीको उपवास करके नवमीको स्नान करनेके बाद 'हिरण्याक्ष मेरे ऊपर प्रसन्न हों'—यह कहते हुए तिलके साथ दक्षिणा प्रदान करे। कार्तिक (मास)-में दुग्धस्नान तथा कनेरके पुष्पसे पूजा करे और सरल वृक्षकी गोंदका धूप तथा मधु एवं खीर नैवेद्य अर्पितकर विनयपूर्वक 'भगवान् शिव मेरे ऊपर प्रसन्न हों'—यह उच्चारण करते हुए ब्राह्मणको नैवेद्यके साथ रजतका दान करे॥ ३४—३७॥
कृत्वोपवासमष्टम्यां नवम्यां स्नानमाचरेत्।<br>मासि मार्गशिरे स्नानं दध्नार्चा भद्रया स्मृता॥ ३८<br><br>धूपं श्रीवृक्षनिर्यासं नैवेद्यं मधुनोदनम्।<br>संनिवेद्या रक्तशालिर्दक्षिणा परिकीर्तिता।<br>नमोऽस्तु प्रीयतां शर्वस्त्विति वाच्यं च पण्डितैः॥ ३९<br><br>पौषे स्नानं च हविषा पूजा स्यात्तगरैः शुभैः।<br>धूपो मधुकनिर्यासो नैवेद्यं मधु शष्कुली॥ ४०<br><br>समुद्गा दक्षिणा प्रोक्ता प्रीणनाय जगद्गुरोः।<br>वाच्यं नमस्ते देवेश त्र्यम्बकेति प्रकीर्तयेत्॥ ४१मार्गशीर्ष (अगहन) मासमें अष्टमी तिथिको उपवास करके नवमी तिथिमें दधिसे स्नान करना चाहिये। इस समय 'भद्रा' ओषधिके द्वारा पूजाका विधान है। पण्डित व्यक्ति श्रीवृक्षके गोंदका धूप एवं मधु और ओदनका नैवेद्य देकर 'शर्व (शिवजी)-को नमस्कार है, वे मेरे ऊपर प्रसन्न हों'—यह कहते हुए रक्तशालि (लाल चावल)-की दक्षिणा प्रदान करे—ऐसा कहा गया है। पौषमासमें घृतका स्नान तथा सुन्दर तगर-पुष्पोंद्वारा पूजा करनी चाहिये। फिर महुएके वृक्षकी गोंदका धूप देकर मधु एवं पूड़ीका नैवेद्य अर्पित करे और 'हे देवेश त्र्यम्बक! आपको नमस्कार है'—यह कहते हुए शंकरजीकी प्रसन्नताके लिये मूँगसहित दक्षिणा प्रदान करे॥ ३८—४१॥
माघे कुशोदकस्नानं मृगमदेन चार्चनम्।<br>धूपः कदम्बनिर्यासो नैवेद्यं सतिलोदनम्॥ ४२<br><br>पयोभक्तं सनैवेद्यं सरुक्मं प्रतिपादयेत्।<br>प्रीयतां मे महादेव उमापतिरितीरयेत्॥ ४३माघमासमें कुशके जलसे स्नान करे और मृगमद (कस्तूरीसे) अर्चन करे। उसके बाद कदम्ब-वृक्षके गोंदका धूप देकर तिल एवं ओदन (भात)-का नैवेद्य अर्पित करनेके पश्चात् 'महादेव उमापति मेरे ऊपर प्रसन्न हों'—यह कहते हुए सुवर्णके साथ दूध एवं भातकी दक्षिणा

अध्याय १६] देवताओंका शयन—तिथियों और उनके अशून्यशयन आदि व्रतों एवं शिव-पूजनका वर्णन ८९ एवमेव समुद्दिष्टं षड्भिर्मासैस्तु पारणम्। पारणान्ते त्रिनेत्रस्य स्नपनं कारयेत्क्रमात्॥ ४४ गोरोचनायाः सहिता गुडेन देवं समालभ्य च पूजयेत। प्रीयस्व दीनोऽस्मि भवन्तमीश मच्छोकनाशं कुरुष्व योग्यम्॥ ४५ ततस्तु फाल्गुने मासि कृष्णाष्टम्यां यतव्रत। उपवासं समुदितं कर्तव्यं द्विजसत्तम॥ ४६ द्वितीयेऽह्नि ततः स्नानं पञ्चगव्येन कारयेत्। पूजयेत्कुन्दकुसुमैर्धूपयेच्चन्दनं त्वपि॥ ४७ नैवेद्यं सघृतं दद्यात् ताम्रपात्रे गुडोदनम्। दक्षिणां च द्विजातिभ्यो नैवेद्यसहितां मुने। वासोयुगं प्रीणयेच्च रुद्रमुच्चार्य नामतः॥ ४८ चैत्रे चोदुम्बरफलैः स्नानं मन्दारकार्चनम्। गुग्गुलं महिषाख्यं च घृताक्तं धूपयेद् बुधः॥ ४९ समोदकं तथा सर्पिः प्रीणनं विनिवेदयेत्। दक्षिणा च सनैवेद्यं मृगाजिनमुदाहृतम्॥ ५० नाट्येश्वर नमस्तेऽस्तु इदमुच्चार्य नारद। प्रीणनं देवनाथाय कुर्याच्छ्रद्धासमन्वितः॥ ५१ वैशाखे स्नानमुदितं सुगन्धकुसुमाम्भसा। पूजनं शंकरस्योक्तं चूतसञ्जरिभिर्विभो॥ ५२ धूपं सर्जाज्ययुक्तं च नैवेद्यं सफलं घृतम्। नामजप्यमपीशस्य कालघ्नेति विपश्चिता॥ ५३ जलकुम्भान् सनैवेद्यान् ब्राह्मणाय निवेदयेत्। सोपवीतान् सहानाद्यांस्तच्चित्तैस्तत्परायणैः॥ ५४ ज्येष्ठे स्नानं चामलकैः पूजार्ककुसुमैस्तथा। धूपयेत्तत्त्रिनेत्रं च आयत्यां पुष्टिकार कम्॥ ५५ सक्तूंश्च सघृतान् देवे दध्नाक्तान् विनिवेदयेत्। उपानद्युगलं छत्रं दानं दद्याच्च भक्तिमान्॥ ५६ नमस्ते भगनेत्रघ्न पूष्णो दशननाशन। इदमुच्चारयेद् भक्त्या प्रीणनाय जगत्पतेः॥ ५७ प्रदान करनी चाहिये। इस प्रकार छः मासके बाद (प्रथम) पारणकी विधि कही गयी है। पारणके अन्तमें त्रिनेत्रधारी महादेवका क्रमसे स्नान-कार्य सम्पन्न कराये। गोरोचनके सहित गुड़द्वारा महादेवकी प्रतिमाका अनुलेपन कर उसकी पूजा करे तथा इस प्रकार प्रार्थना करे कि 'हे ईश! मैं दीन हूँ तथा आपकी शरणमें हूँ; आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों तथा मेरे दुःख-शोकका नाश करें'॥ ४२-४५॥ व्रतधारी द्विजसत्तम ! इसके बाद फाल्गुन मासकी कृष्णाष्टमीको उपवास करना चाहिये। दूसरे दिन नवमीको पञ्चगव्यसे भगवान् शिवको स्नान कराये तथा कुन्दद्वारा अर्चनकर चन्दनका धूप और ताम्रपात्रमें घृतसहित गुड तथा ओदनका नैवेद्य प्रदान करे। उसके बाद 'रुद्र' शब्दका उच्चारण कर ब्राह्मणोंको नैवेद्यके साथ दक्षिणा तथा दो वस्त्र प्रदान कर महादेवको प्रसन्न करे। चैत्र मासमें गूलरके फलके जलसे स्नान कराये और मदारके फूलोंसे पूजा करे। उसके बाद बुद्धिमान् व्यक्ति घृतमिश्रित 'महिष' नामक गुग्गुलसे धूप देकर मोदकके साथ घृत उनकी प्रसन्नताके लिये अर्पित करे एवं 'नाट्येश्वर (भगवान्) ! आपको नमस्कार है'—यह कहते हुए नैवेद्यसहित दक्षिणारूपमें मृगचर्म प्रदान करे। इस प्रकार पूर्ण श्रद्धायुक्त होकर महादेवजीको प्रसन्न करे॥ ४६-५१॥ नारदजी! वैशाखमासमें सुगन्धित पुष्पोंके जलसे स्नान तथा आमकी मञ्जरियोंसे शंकरके पूजनका विधान है। इस समय घी-मिले सर्ज-वृक्षके गोंदका धूप तथा फलसहित घृतका नैवेद्य अर्पित करना चाहिये। बुद्धिमान् व्यक्तिको इस समय श्रीशिवके 'कालघ्न' नामका जप करना चाहिये और तल्लीनतापूर्वक ब्राह्मणको नैवेद्य, उपवीत (जनेऊ) एवं अन्न आदिके साथ पानीसे भरा घड़ा दक्षिणा देनी चाहिये। ज्येष्ठमासमें आँवलेके जलसे स्नान कराये तथा मन्दारके पुष्पोंसे उनकी पूजा करे। उसके बाद त्रिनेत्रधारी पुष्टि-कर्ता श्रीशिवको धूपदानमें धूप दिखलाये। फिर घी तथा दही मिला सत्तूका नैवेद्य अर्पित करे। जगत्पतिके प्रीत्यर्थ 'हे पूषाके दाँत तोड़नेवाले, भगनेत्रघ्न शिव ! आपको नमस्कार है'—यह कहकर भक्तिपूर्वक छत्र एवं उपानद्युगल (एक जोड़ा जूता) दक्षिणामें प्रदान करना चाहिये ॥ ५२-५७॥

१९- चण्ड-मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन, महिषासुरका संदेश और युद्धोपक्रम

९०श्रीवामनपुराण[ अध्याय १७
आषाढे स्नानमुदितं श्रीफलैरर्चनं तथा।<br>धत्तूरकुसुमैः शुक्लैर्र्धूपयेत् सिल्हकं तथा॥ ५८<br><br>नैवेद्याः सघृताः पूपाः दक्षिणा सघृता यवाः।<br>नमस्ते दक्षयज्ञघ्न इदमुच्चैरूदीरयेत्॥ ५९<br><br>श्रावणे मृगभोज्येन स्नानं कृत्वाऽर्चयेद्धरम्।<br>श्रीवृक्षपत्रैः सफलैर्धूपं दद्यात् तथागुरुम्॥ ६०<br><br>नैवेद्यं सघृतं दद्याद् दधि पूपान् समोदकान्।<br>दध्योदनं सकृसरं माषधानाः सशष्कुलीः॥ ६१<br><br>दक्षिणां श्वेतवृषभं धेनुं च कपिलां शुभाम्।<br>कनकं रक्तवसनं प्रदद्याद् ब्राह्मणाय हि।<br>गङ्गाधरेति जप्तव्यं नाम शंभोश्च पण्डितैः॥ ६२<br><br>अमीभिः षड्भिरपरैर्मासैः पारणमुत्तमम्।<br>एवं संवत्सरं पूर्णं सम्पूज्य वृषभध्वजम्।<br>अक्षयाँल्लभते कामान् महेश्वरवचो यथा॥ ६३<br><br>इदमुक्तं व्रतं पुण्यं सर्वाक्षयकरं शुभम्।<br>स्वयं रुद्रेण देवर्षे तत्तथा न तदन्यथा॥ ६४आषाढ़मासमें बिल्वके जलसे भगवान् शिवको स्नान कराये तथा धतूरके उजले पुष्पोंसे उनकी पूजा करे; सिल्हक (सिलारस-वृक्षका गोंद)-का धूप दे और घृतके सहित मालपूएका नैवेद्य अर्पित करे एवं—हे दक्षके यज्ञका विनाश करनेवाले शंकर! आपको नमस्कार है—यह ऊँचे स्वरसे उच्चारण करे। श्रावणमासमें मृगभोज्य (जटामासी)-के जलसे स्नान कराकर फलयुक्त बिल्वपत्रोंसे महादेवकी पूजा करे तथा अगुरुका धूप दे। उसके बाद घृतयुक्त पूप, मोदक, दधि, दध्योदन, उड़दकी दाल, भुना हुआ जौ एवं कचौड़ीका नैवेद्य अर्पित करनेके बाद बुद्धिमान् व्यक्ति ब्राह्मणको श्वेत बैल, शुभा कपिला (काली) गौ, स्वर्ण एवं रक्तवस्त्रकी दक्षिणा दे। पण्डितोंको चाहिये कि शिवजीके ‘गङ्गाधर’ इस नामका जप करें॥ ५८—६२॥<br><br>इन दूसरे छः महीनोंके अनन्तर द्वितीय पारण होता है। इस प्रकार एक वर्षतक वृषभध्वज (शिवजी)-का पूजन कर महेश्वरके वचनानुसार मनुष्य अक्षय कामनाओंको प्राप्त करता है। स्वयं भगवान् शंकरने यह कल्याणकारी पवित्र एवं सभी पुण्योंको अक्षय करनेवाला व्रत बतलाया था। यह जैसा कहा गया है, वैसा ही है। यह कभी व्यर्थ नहीं जाता॥ ६३-६४॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सोलहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १६॥


सत्रहवाँ अध्याय

देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत-विधान, विष्णु-पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग

पुलस्त्य उवाच<br>मासि चाश्वयुजे ब्रह्मन् यदा पद्मं जगत्पतेः।<br>नाभ्या निर्याति हि तदा देवेष्वेतान्यथोऽभवन्॥ १<br><br>कंदर्पस्य कराग्रे तु कदम्बश्चारुदर्शनः।<br>तेन तस्य परा प्रीतिः कदम्बेन विवर्द्धते॥ २<br><br>यक्षाणामधिपस्यापि मणिभद्रस्य नारद।<br>वटवृक्षः समभवत् तस्मिंस्तस्य रतिः सदा॥ ३पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! आश्विन मासमें जब जगत्पति (विष्णु)-की नाभिसे कमल निकला, तब अन्य देवताओंसे भी ये वस्तुएँ उत्पन्न हुईं— कामदेवके करतलके अग्रभागमें सुन्दर कदम्ब वृक्ष उत्पन्न हुआ। इसीलिये कदम्बसे उसे बड़ी प्रीति रहती है। नारदजी! यक्षोंके राजा मणिभद्रसे वटवृक्ष उत्पन्न हुआ, अतः उन्हें उसके प्रति विशेष प्रेम है।

अध्याय १७ ] देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत-विधान, विष्णु-पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग ९१ महेश्वरस्य हृदये धत्तूरविटपः शुभः। संजातः स च शर्वस्य रतिकृत् तस्य नित्यशः ॥ ४ ब्रह्मणो मध्यतो देहाज्जातो मरकतप्रभः। खदिरः कण्टकी श्रेयानभवद्विश्वकर्मणः ॥ ५ भगवान् शंकरके हृदयपर सुन्दर धतूर-वृक्ष उत्पन्न हुआ, अतः वह शिवजीको सदा प्यारा है॥१-४॥ ब्रह्माजीके शरीरके बीचसे मरकतमणिके समान खैरवृक्षकी उत्पत्ति हुई और विश्वकर्माके शरीरसे सुन्दर कटैया उत्पन्न हुआ। गिरिनन्दिनी पार्वतीके करतलपर कुन्द लता उत्पन्न हुई और गणपति के कुम्भ-देशसे सेंदुवारवृक्ष उत्पन्न हुआ। यमराजकी दाहिनी बगलसे पलाश तथा बायीं बगलसे गूलरका वृक्ष उत्पन्न हुआ। रुद्रसे उद्विग्न करनेवाला वृष (ओषधि-विशेष)-की उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार स्कन्दसे बन्धुजीव, सूर्यसे पीपल, कात्यायनी दुर्गासे शमी और लक्ष्मीजीके हाथसे बिल्ववृक्ष उत्पन्न हुआ ॥ ५-८ ॥ गिरिजायाः करतले कुन्दगुल्मस्त्वजायत। गणाधिपस्य कुम्भस्थो राजते सिन्धुवारकः ॥ ६ यमस्य दक्षिणे पार्श्वे पालाशो दक्षिणोत्तरे। कृष्णोदुम्बरको रुद्राज्जातः क्षोभकरो वृषः ॥ ७ स्कन्दस्य बन्धुजीवस्तु रखेरश्वत्थ एव च। कात्यायन्याः शमी जाता बिल्वो लक्ष्म्याः करेऽभवत् ॥ ८ नागानां पतये ब्रह्मञ्छरस्तम्बो व्यजायत। वासुकेर्विस्तृते पुच्छे पृष्ठे दूर्वा सितासिता ॥ ९ साध्यानां हृदये जातो वृक्षो हरितचन्दनः । एवं जातेषु सर्वेषु तेन तत्र रतिर्भवेत् ॥ १० नारदजी! इसी प्रकार शेषनागसे सरपत, वासुकिनागकी पुच्छ और पीठपर श्वेत एवं कृष्ण दूर्वा उत्पन्न हुई। साध्योंके हृदयमें हरिचन्दनवृक्ष उत्पन्न हुआ। इस प्रकार उत्पन्न होनेसे उन सभी वृक्षोंमें उन- उन देवताओंका प्रेम होता है। उस रमणीय सुन्दर समयमें शुक्लपक्षकी जो एकादशी तिथि होती है, उसमें भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। इससे पूजाकी न्यूनता दूर हो जाती है। शरत्कालकी उपस्थितितक गन्ध, वर्ण और रसयुक्त पत्र, पुष्प एवं फलों तथा मुख्य ओषधियोंसे भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये ॥ ९-१२ ॥ तत्र रम्ये शुभे काले या शुक्लौकादशी भवेत् । तस्यां सम्पूजयेद् विष्णुं तेन खण्डोऽस्य पूर्यते ॥ ११ पुष्पैः पत्रैः फलैर्वापि गन्धवर्णरसान्वितैः । ओषधीभिश्च मुख्याभिर्यावत्स्याच्छरदागमः ॥ १२ घृतं तिला ब्रीहयवा हिरण्यकनकादि यत्। मणिमुक्ताप्रवालानि वस्त्राणि विविधानि च ॥ १३ रसानि स्वादुक्ट्वम्लकषायलवणानि च । तिक्तानि च निवेद्यानि तान्यखण्डानि यानि हि ॥ १४ तत्पूजार्थं प्रदातव्यं केशवाय महात्मने। यदा संवत्सरं पूर्णमखण्डं भवते गृहे ॥ १५ कृतोपवासो देवर्षे द्वितीयेऽहनि संयतः। स्नानेन तेन स्नायीत येनाखण्डं हि वत्सरम् ॥ १६ घी, तिल, चावल, जौ, चाँदी, सोना, मणि, मुक्ता, मूँगा तथा नाना प्रकारके वस्त्र, स्वादु, कटु, अम्ल, कषाय, लवण और तिक्त रस आदि वस्तुओंको अखण्डितरूपसे महात्मा केशवकी पूजाके लिये अर्पित करना चाहिये। इस प्रकार पूजा करते हुए वर्षको बितानेपर घरमें पूर्ण समृद्धि होती है। देवर्षे ! जितेन्द्रिय होकर दूसरे दिन उपवास करके जिससे वर्ष अखण्डित रहे इसलिये इस प्रकार स्नान करे - ॥ १३-१६ ॥ सफेद सरसों या तिलके द्वारा उबटन तैयार करना चाहिये ऐसा कहा गया है। उससे या घीसे भगवान् विष्णुको स्नान कराना चाहिये। नारदजी! होममें भी घीका ही विधान है और दानमें भी यथाशक्ति उसीकी विधि है। सिद्धार्थकैस्तिलैर्वापि तेनैवोद्वर्त्तनं स्मृतम् । हविषा पद्मनाभस्य स्नानमेव समाचरेत्। होमे तदेव गदितं दाने शक्तिर्निजा द्विज ॥ १७

९२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १७ पूजयेताथ कुसुमैः पादादारभ्य केशवम्। धूपयेद् विविधं धूपं येन स्याद् वत्सरं परम्॥ १८ हिरण्यरत्नवासोभिः पूजयेत जगद्गुरुम्। रागखाण्डवचोष्याणि हविष्याणि निवेदयेत्॥ १९ ततः संपूज्य देवेशं पद्मनाभं जगद्गुरुम्। विज्ञापयेन्मुनिश्रेष्ठ मन्त्रेणानेन सुव्रत॥ २० फिर पुष्पोंद्वारा चरणसे आरम्भकर (सिरतक) सभी अङ्गोंमें केशवकी पूजा करे एवं नाना प्रकारके धूपोंसे उन्हें सुवासित करे, जिससे संवत्सर पूर्ण हो। सुवर्ण, रत्नों और वस्त्रोंद्वारा (उन) जगद्गुरुका पूजन करे तथा राग-खाँड, चोष्य एवं हविष्योंका नैवेद्य अर्पित करे। सुव्रत नारदजी! देवेश जगद्गुरु विष्णुकी पूजा करनेके बाद इस मन्त्रसे प्रार्थना करे - ॥ १७-२०॥ नमोऽस्तु ते पद्मनाभ पद्माधव महाद्युते। धर्मार्थकाममोक्षाणि त्वखण्डानि भवन्तु मे॥ २१ विकासिपद्मपत्राक्ष यथाऽखण्डोसि सर्वतः। तेन सत्येन धर्माद्या अखण्डाः सन्तु केशव॥ २२ एवं संवत्सरं पूर्णं सोपवासो जितेन्द्रियः। अखण्डं पारयेद् ब्रह्मन् व्रतं वै सर्ववस्तुषु॥ २३ अस्मिंश्चीर्णे व्रते व्यक्तं परितुष्यन्ति देवताः। धर्मार्थकाममोक्षाद्यास्त्वक्षयाः सम्भवन्ति हि॥ २४ हे महाकान्तिवाले पद्मनाभ लक्ष्मीपते! आपको प्रणाम है। (आपकी कृपाके प्रसादसे) हमारे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष अखण्ड हों। विकसित कमलपत्रके समान नेत्रवाले! आप जिस प्रकार चारों ओरसे अखण्ड हैं, उसी सत्यके प्रभावसे मेरे भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष (पुरुषार्थ) अखण्डित रहें। ब्रह्मन् ! इस प्रकार वर्षभर उपवास और जितेन्द्रिय रहते हुए सभी वस्तुओंके द्वारा व्रतको अखण्डरूपसे पूरा करे। इस व्रतके करनेपर देवता निश्चितरूपसे प्रसन्न होते हैं एवं धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष सभी पूर्ण होते हैं ॥ २१-२४ ॥ एतानि ते मयोक्तानि व्रतान्युक्तानि कामिभिः। प्रवक्ष्याम्यधुना त्वेतद्वैष्णवं पञ्जरं शुभम्॥ २५ नारद! यहाँतक मैंने तुमसे सकाम व्रतोंका वर्णन किया है। अब मैं कल्याणकारी विष्णुपञ्जर* स्तोत्रको कहूँगा। (वह इस प्रकार है - ) नमो नमस्ते गोविन्द चक्रं गृह्य सुदर्शनम्। प्राच्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः॥ २६ गोविन्द! आपको नमस्कार है। आप सुदर्शनचक्र लेकर मेरी पूर्व दिशामें रक्षा करें। विष्णो ! मैं आपकी शरणमें हूँ। गदां कौमोदकीं गृह्य पद्मनाभामितद्युते। याम्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः॥ २७ अमितद्युते पद्मनाभ ! आप कौमोदकी गदा धारणकर मेरी दक्षिण दिशामें रक्षा करें। विष्णो ! मैं आपके शरण हूँ। हलमादाय सौनन्दं नमस्ते पुरुषोत्तम। प्रतीच्यां रक्ष मे विष्णो भवन्तं शरणं गतः॥ २८ पुरुषोत्तम ! आपको नमस्कार है। आप सौनन्द नामक हल लेकर मेरी पश्चिम दिशामें रक्षा करें। विष्णो ! मैं आपकी शरणमें हूँ॥ २५-२८॥ मुसलं शातनं गृह्य पुण्डरीकाक्ष रक्ष माम्। उत्तरस्यां जगन्नाथ भवन्तं शरणं गतः॥ २९ पुण्डरीकाक्ष ! आप 'शातन' नामके विनाशकारी मुसलको लेकर मेरी उत्तर दिशामें रक्षा करें। जगन्नाथ ! मैं आपकी शरणमें हूँ। शार्ङ्गमादाय च धनुरस्त्रं नारायणं हरे। नमस्ते रक्ष रक्षोघ्न ऐशान्यां शरणं गतः॥ ३० हरे ! शार्ङ्गधनुष एवं नारायणास्त्र लेकर मेरी ईशानकोणमें रक्षा करें। रक्षोघ्न ! आपको नमस्कार है, मैं आपके शरण हूँ।

  • यह विष्णुपञ्जरस्तोत्र बहुत प्रसिद्ध है तथा स्वल्पान्तरसे अग्निपुराण अ० १३, ब्रह्मवैवर्त ३।१९, विष्णुधर्मोत्तर १।११५ आदिमें प्राप्त होता है। वामनपुराणमें तो यह दो बार आया है- एक यहाँ तथा आगे ८५वें अध्यायमें।

अध्याय १७] देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत-विधान, विष्णु-पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग९३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पाञ्चजन्यं महाशङ्खमन्तर्बोध्यं च पङ्कजम्।<br>प्रगृह्य रक्ष मां विष्णो आग्नेय्यां यज्ञसूकर॥ ३१<br><br>चर्म सूर्यशतं गृह्य खड्गं चन्द्रमसं तथा।<br>नैर्ऋत्यां मां च रक्षस्व दिव्यमूर्ते नृकेसरिन्॥ ३२यज्ञवाराह विष्णो! आप पाञ्चजन्य नामक विशाल शङ्ख तथा अन्तर्बोध्य पङ्कजको लेकर मेरी अग्निकोणमें रक्षा करें। दिव्यमूर्ति नृसिंह! सूर्यशत नामकी ढाल तथा चन्द्रहास नामकी तलवार लेकर मेरी नैर्ऋत्यकोणमें रक्षा करें॥ २९–३२॥
वैजयन्तीं प्रगृह्य त्वं श्रीवत्सं कण्ठभूषणम्।<br>वायव्यां रक्ष मां देव अश्वशीर्ष नमोऽस्तु ते॥ ३३<br><br>वैनतेयं समारुह्य अन्तरिक्षे जनार्दन।<br>मां त्वं रक्षाजित सदा नमस्ते त्वपराजित॥ ३४<br><br>विशालाक्षं समारुह्य रक्ष मां त्वं रसातले।<br>अकूपार नमस्तुभ्यं महामोह नमोऽस्तु ते॥ ३५<br><br>करशीर्षाङ्घ्रिपर्वेषु तथाऽष्टबाहुपञ्जरम्।<br>कृत्वा रक्षस्व मां देव नमस्ते पुरुषोत्तम॥ ३६आप वैजयन्ती नामकी माला तथा श्रीवत्स नामका कण्ठाभूषण धारणकर मेरी वायव्यकोणमें रक्षा करें। देव हयग्रीव! आपको नमस्कार है। जनार्दन! वैनतेय (गरुड़)-पर आरूढ़ होकर आप मेरी अन्तरिक्षमें रक्षा करें। अजित! अपराजित! आपको सदा नमस्कार है। महाकच्छप! आप विशालाक्षपर चढ़कर मेरी रसातलमें रक्षा करें। महामोह! आपको नमस्कार है। पुरुषोत्तम! आप आठ हाथोंसे पञ्जर बनाकर हाथ, सिर एवं सन्धि-स्थलों (जोड़ों) आदिमें मेरी रक्षा करें। देव! आपको नमस्कार है॥ ३३–३६॥
एतदुक्तं भगवता वैष्णवं पञ्जरं महत्।<br>पुरा रक्षार्थमीशेन कात्यायन्या द्विजोत्तम॥ ३७<br><br>नाशयामास सा यत्र दानवं महिषासुरम्।<br>नमरं रक्तबीजं च तथान्यान् सुरकण्टकान्॥ ३८द्विजोत्तम! प्राचीन कालमें भगवान् शंकरने कात्यायनी (दुर्गा)-की रक्षाके लिये इस महान् विष्णुपञ्जरस्तोत्रको उस स्थानपर कहा था, जहाँ उन्होंने महिषासुर, नमर, रक्तबीज एवं अन्यान्य देव-शत्रुओंका नाश किया था॥ ३७-३८॥
नारद उवाच<br>काऽसौ कात्यायनी नाम या जघ्ने महिषासुरम्।<br>नमरं रक्तबीजं च तथान्यान् सुरकण्टकान्॥ ३९<br>कश्चासौ महिषो नाम कुले जातश्च कस्य सः।<br>कश्चासौ रक्तबीजाख्यो नमरः कस्य चात्मजः।<br>एतद्विस्तरतःतात यथावद् वक्तुमर्हसि॥ ४०**नारदजीने पूछा—**ऋषे! महिषासुर, नमर, रक्तबीज तथा अन्यान्य सुर-कण्टकोंका वध करनेवाली ये भगवती कात्यायनी कौन हैं? तात! यह महिष कौन है? तथा वह किसके कुलमें उत्पन्न हुआ था? यह रक्तबीज कौन है? तथा नमर किसका पुत्र है? आप इसका यथार्थ रूपसे विस्तारपूर्वक वर्णन करें॥ ३९-४०॥
पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां संप्रवक्ष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम्।<br>सर्वदा वरदा दुर्गा येयं कात्यायनी मुने॥ ४१<br><br>पुराऽसुरवरौ रौद्रौ जगत्क्षोभकरावुभौ।<br>रम्भश्चैव करम्भश्च द्वावास्तां सुमहाबलौ॥ ४२<br><br>तावपुत्रौ च देवर्षे पुत्रार्थं तेपतुस्तपः।<br>बहून् वर्षगणान् दैत्यौ स्थितौ पञ्चनदे जले॥ ४३<br><br>तत्रैको जलमध्यस्थो द्वितीयोऽप्यग्निपञ्चमी।<br>करम्भश्चैव रम्भश्च यक्षं मालवटं प्रति॥ ४४**पुलस्त्यजी बोले—**नारदजी! सुनिये, मैं उस पापनाशक कथाको कहता हूँ। मुने! सब कुछ देनेवाली वरदायिनी भगवती दुर्गा ही ये कात्यायनी हैं। प्राचीन-कालमें संसारमें उथल-पुथल मचानेवाले रम्भ और करम्भ नामके दो भयंकर और महाबलवान् असुर-श्रेष्ठ थे। देवर्षे! वे दोनों पुत्रहीन थे। उन दोनों दैत्योंने पुत्रके लिये पञ्चनदके जलमें रहकर बहुत वर्षोंतक तप किया। मालवट यक्षके प्रति एकाग्र होकर करम्भ और रम्भ—इन दोनोंमेंसे एक जलमें स्थित होकर और दूसरा पञ्चाग्निके मध्य बैठकर तप कर रहा था॥ ४१–४४॥

९४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १७ ]

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एकं निमग्नं सलिले ग्राहरूपेण वासवः।<br>चरणाभ्यां समादाय निजघान यथेच्छया॥ ४५<br>ततो भ्रातरि नष्टे च रम्भः कोपपरिप्लुतः।<br>वह्नौ स्वशीर्षं संक्षिप्य होतुमैच्छन् महाबलः॥ ४६<br>ततः प्रगृह्य केशेषु खड्गं च रविसप्रभम्।<br>छेत्तुकामो निजं शीर्षं वह्निना प्रतिषेधितः॥ ४७<br>उक्तश्च मा दैत्यवर नाशायात्मानमात्मना।<br>दुस्तरा परवध्याऽपि स्ववध्याऽप्यतिदुस्तरा॥ ४८इन्द्रने ग्राहका रूप धारणकर इनमेंसे एकको जलमें निमग्न होनेपर पैर पकड़कर इच्छानुसार दूर ले जाकर मार डाला। उसके बाद भाईके नष्ट हो जानेपर क्रोधयुक्त महाबलशाली रम्भने अपने सिरको काटकर अग्निमें हवन करना चाहा। वह अपना केश पकड़कर हाथमें सूर्यके समान चमकनेवाली तलवार लेकर अपना सिर काटना ही चाहता था कि अग्निने उसे रोक दिया और कहा—दैत्यवर! तुम स्वयं अपना नाश मत करो। दूसरेका वध तो पाप होता ही है, आत्महत्या भी भयानक पाप है॥ ४५–४८॥
यच्च प्रार्थयसे वीर तद्ददामि यथेप्सितम्।<br>मा म्रियस्व मृतस्येह नष्टा भवति वै कथा॥ ४९<br>ततोऽब्रवीद् वचो रम्भो वरं चेन्मे ददासि हि।<br>त्रैलोक्यविजयी पुत्रः स्यान्मे त्वत्तेजसाऽधिकः॥ ५०<br>अजेयो दैवतैः सर्वैः पुंभिर्दैत्यैश्च पावक।<br>महाबलो वायुरिव कामरूपी कृतास्त्रवित्॥ ५१<br>तं प्रोवाच कविर्ब्रह्मन् बाढमेवं भविष्यति।<br>यस्यां चित्तं समालम्बि करिष्यसि ततः सुतः॥ ५२वीर! तुम जो माँगोगे, तुम्हारी इच्छाके अनुसार वह मैं तुम्हें दूँगा। तुम मरो मत। इस संसारमें मृत व्यक्तिकी कथा नष्ट हो जाती है। इसपर रम्भने कहा—यदि आप वर देते हैं तो यह वर दीजिये कि मुझे आपसे भी अधिक तेजस्वी त्रैलोक्यविजयी पुत्र उत्पन्न हो। अग्निदेव! समस्त देवताओं तथा मानवों और दैत्योंसे भी वह अजेय हो। वह वायुके समान महाबलवान् तथा कामरूपी एवं सर्वास्त्रवेत्ता हो। नारदजी! इसपर अग्निने उससे कहा—अच्छा, ऐसा ही होगा। जिस स्त्रीमें तुम्हारा चित्त लग जायगा उसीसे तुम पुत्र उत्पन्न करोगे॥ ४९–५२॥
इत्येवमुक्तो देवेन वह्निना दानवो ययौ।<br>द्रष्टुं मालवटं यक्षं यक्षैश्च परिवारितम्॥ ५३<br>तेषां पद्मनिधिस्तत्र वसते नान्यचेतनः।<br>गजाश्च महिषाश्चाश्वा गावोऽजाविपरिप्लुताः॥ ५४<br>तान् दृष्ट्वैव तदा चक्रे भावं दानवपार्थिवः।<br>महिष्यां रूपयुक्तायां त्रिहायण्यां तपोधन॥ ५५<br>सा समागाच्च दैत्येन्द्रं कामयन्ती तरस्विनी।<br>स चापि गमनं चक्रे भवितव्यप्रचोदितः॥ ५६अग्निदेवके ऐसा कहनेपर रम्भ यक्षोंसे घिरा हुआ मालवट यक्षका दर्शन करने गया। वहाँ उन यक्षोंका एक पद्म नामकी निधि अनन्य-चित्त होकर निवास करती थी। वहाँ बहुत-से बकरे, भेंड़े, घोड़े, भैंसे तथा हाथी और गाय-बैल थे। तपोधन! दानवराजने उन्हें देखकर तीन वर्षोंवाली रूपवती एक महिषीमें प्रेम प्रकट किया (अर्थात् आसक्त हुआ)। कामपरायण होकर वह महिषी शीघ्र दैत्येन्द्रके समीप आ गयी तब भवितव्यतासे प्रेरित उसने (रम्भने) भी उस महिषीके साथ संगत किया॥ ५३–५६॥
तस्यां समभवद् गर्भस्तां प्रगृह्याथ दानवः।<br>पातालं प्रविवेशाथ ततः स्वभवनं गतः॥ ५७<br>दृष्टश्च दानवैः सर्वैः परित्यक्तश्च बन्धुभिः।<br>अकार्यकारकेत्येवं भूयो मालवटं गतः॥ ५८उसे गर्भ रह गया। उसके बाद उस महिषीको लेकर दानव पातालमें प्रविष्ट हुआ और अपने घर चला गया। उसके दानव-बन्धुओंने उसे देख एवं ‘अकार्यकारक’ जानकर उसका परित्याग कर दिया। फिर वह पुनः

२०- भगवती कात्यायनीका दैत्योंके साथ युद्ध; महिषासुर-वध एवं देवीका शिवजीके पादमूलमें लीन हो जाना

अध्याय १७ ] देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत-विधान, विष्णु-पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग ९५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
साऽपि तेनैव पतिना महिषी चारुदर्शना।<br>समं जगाम तत् पुण्यं यक्षमण्डलमुत्तमम् ॥ ५९<br>ततस्तु वसतस्तस्य श्यामा सा सुषुवे मुने।<br>अजीजनत् सुतं शुभ्रं महिषं कामरूपिणम् ॥ ६०मालवटके निकट गया। वह सुन्दरी महिषी भी उसी पतिके साथ उस पवित्र और उत्तम यक्षमण्डलमें गयी। मुने! उसके वहीं निवास करते समय उस महिषीने सन्तान उत्पन्न की। उसने एक शुभ्र तथा इच्छाके अनुकूल रूप धारण करनेवाले महिष-पुत्रको जन्म दिया॥ ५७—६०॥
एतामृतुमतीं जातां महिषोऽन्यो ददर्श ह।<br>सा चाभ्यगाद् दितिवरं रक्षन्ती शीलमात्मनः ॥ ६१<br>तमुन्नामितनासं च महिषं वीक्ष्य दानवः।<br>खड्गं निष्कृष्य तरसा महिषं समुपाद्रवत् ॥ ६२<br>तेनापि दैत्यस्तीक्ष्णाभ्यां शृङ्गाभ्यां हृदि ताडितः।<br>निर्भिन्नहृदयो भूमौ निपपात ममार च ॥ ६३<br>मृते भर्तरि सा श्यामा यक्षाणां शरणं गता।<br>रक्षिता गुह्यकैः साध्वी निवार्य महिषं ततः ॥ ६४उसके पुनः ऋतुमती होनेपर एक दूसरे महिषने उसे देखा। वह अपने शीलकी रक्षा करती हुई दैत्यश्रेष्ठके निकट गयी। नाकको ऊपर उठाये उस महिषको देखकर दानवने खड्ग निकालकर महिषपर वेगसे आक्रमण किया। उस महिषने भी तीक्ष्ण शृङ्गोंसे दैत्यके हृदयमें प्रहार किया। वह दैत्य हृदय फट जानेसे भूमिपर गिर पड़ा और मर गया। पतिके मर जानेपर वह महिषी यक्षोंकी शरणमें गयी। उसके बाद गुह्यकोंने महिषको हटाकर साध्वी महिषीकी रक्षा की॥ ६१—६४॥
ततो निवारितो यक्षैर्ह्यारिमर्दनातुरः।<br>निपपात सरो दिव्यं ततो दैत्योऽभवन्मृतः ॥ ६५<br>नमरो नाम विख्यातो महाबलपराक्रमः।<br>यक्षानाश्रित्य तस्थौ च कालयन् श्वापदान् मुने ॥ ६६<br>स च दैत्येश्वरो यक्षैर्मालवटपुरस्सरैः।<br>चितामारोपितः सा च श्यामा तं चारुहत् पतिम् ॥ ६७<br>ततोऽग्निमध्यादुत्तस्थौ पुरुषो रौद्रदर्शनः।<br>व्यद्रावयत् स तान् यक्षान् खड्गपाणिर्भयंकरः ॥ ६८यक्षोंद्वारा हटाया गया कामातुर ह्यारि (महिष) एक दिव्य सरोवरमें गिर पड़ा। उसके बाद वह मरकर एक दैत्य हो गया। मुने! वन्य पशुओंको मारते हुए यक्षोंके आश्रयमें रहनेवाला महान् बली तथा पराक्रमी वह दैत्य 'नमर' नामसे विख्यात हुआ। फिर मालवट आदि यक्षोंने उस ह्यारि दैत्येश्वरको चितापर रखा। वह श्यामा भी पतिके साथ चितापर चढ़ गयी। तब अग्निके मध्यसे हाथमें खड्ग लिये विकराल रूपवाला भयंकर पुरुष प्रकट हुआ। उसने सभी यक्षोंको भगा दिया॥ ६५—६८॥
ततो हतास्तु महिषाः सर्व एव महात्मना।<br>ऋते संरक्षितां हि महिषं रम्भनन्दन ॥ ६९<br>स नामतः स्मृतो दैत्यो रक्तबीजो महामुने।<br>योज्जयत् सर्वतो देवान् सेन्द्ररुद्रार्कमारुतान् ॥ ७०<br>एवं प्रभावा दनुपुंगवास्ते<br>तेजोऽधिकस्तत्र बभौ हयारिः।<br>राज्येऽभिषिक्तश्च महासुरेन्द्रै-<br>र्विनिर्जितैः शम्बरतारकाद्यैः ॥ ७१<br>अशक्नुवद्भिः सहितैश्च देवैः<br>सलोकपालैः सहुताशभास्करैः।<br>स्थानानि त्यक्तानि शशीन्द्रभास्करै-<br>र्धर्मश्च दूरे प्रतियोजितश्च ॥ ७२और फिर उस बलवान् दैत्यने रम्भनन्दन महिषको छोड़कर सारे महिषोंको मार डाला। महामुने! वह दैत्य रक्तबीज नामसे विख्यात हुआ। उसने इन्द्र, रुद्र, सूर्य एवं मारुत आदिके साथ देवोंको जीत लिया। यद्यपि वे सभी दैत्य इस प्रकारके प्रभावसे युक्त थे; फिर भी उनमें महिष अधिक तेजस्वी था। उसके द्वारा विजित शम्बर, तारक आदि महान् असुरोंने उसका राज्याभिषेक किया। लोकपालोंसहित अग्नि, सूर्य आदि देवोंके द्वारा एक साथ मिलकर जब वह जीता नहीं गया तब चन्द्र, इन्द्र एवं सूर्यने अपना-अपना स्थान छोड़ दिया तथा धर्मको भी दूर हटा दिया गया॥ ६९—७२॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १७॥

९६श्रीवामनपुराण[ अध्याय १८

अठारहवाँ अध्याय

महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोरराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव, विन्ध्यप्रसंग, दुर्गाकी अवस्थिति

पुलस्त्य उवाचपुलस्त्यजी बोले— इसके बाद महिषद्वारा पराजित देवता अपने-अपने स्थानको छोड़कर पितामहको आगे कर चक्रधारी लक्ष्मीपति विष्णुके दर्शनार्थ अपने वाहनों और आयुधोंको लेकर विष्णुलोक चले गये। वहाँ जाकर उन लोगोंने गरुड़वाहन विष्णु एवं शङ्कर—इन दोनों देवश्रेष्ठोंको एक साथ बैठे देखा। उन दोनों सिद्धि-साधकोंको देखनेके बाद उन लोगोंने उन्हें प्रणामकर उनसे महिषासुरकी दुश्चेष्टा बतलायी। वे बोले—प्रभो! महिषासुरने अश्विनीकुमार, सूर्य, चन्द्र, वायु, अग्नि, ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र आदि सभी देवताओंके अधिकारोंको छीनकर स्वर्गसे निकाल दिया है और अब हमलोग भूलोकमें रहनेको विवश हो गये हैं। हम शरणमें आये देवताओंकी यह बात सुनकर आप दोनों हमारे हितकी बात बतलायें; अन्यथा दानवद्वारा युद्धमें मारे जा रहे हमलोग अब रसातलमें चले जायँगे॥ १—४॥
ततस्तु देवा महिषेण निर्जिताः<br>स्थानानि संत्यज्य सवाहनायुधाः।<br>जग्मुः पुरस्कृत्य पितामहं ते<br>द्रष्टुं तदा चक्रधरं श्रियः पतिम्॥ १<br>गत्वा त्वपश्यंश्च मिथः सुरोत्तमौ<br>स्थितौ खगेन्द्रासनशङ्करौ हि।<br>दृष्ट्वा प्रणम्यैव च सिद्धिसाधकौ<br>न्यवेदयंस्तन्महिषादिचेष्टितम् ॥ २<br>प्रभोऽश्विसूर्येन्दुनिलाग्निवेधसां<br>जलेशशक्रादिषु चाधिकारान्।<br>आक्रम्य नाकात्तु निराकृता वयं<br>कृतावनिस्था महिषासुरेण॥ ३<br>एतद् भवन्तौ शरणागतानां<br>श्रुत्वा वचो ब्रूत हितं सुराणाम्।<br>न चेद् व्रजामोऽद्य रसातलं हि<br>संकाल्यमाना युधि दानवेन॥ ४
इत्थं मुरारिः सह शङ्करेण<br>श्रुत्वा वचो विप्लुतचेतसस्तान्।<br>दृष्ट्वाऽथ चक्रे सहसैव कोपं<br>कालाग्निकल्पो हरिरव्ययात्मा॥ ५<br>ततोऽनुकोपान्मधुसूदनस्य<br>सशङ्करस्यापि पितामहस्य।<br>तथैव शक्रादिषु दैवतेषु<br>महर्द्धि तेजो वदनाद्विनिःसृतम्॥ ६<br>तच्चैकतां पर्वतकूटसन्निभं<br>जगाम तेजः प्रवराश्रमे मुने।<br>कात्यायनस्याप्रतिमस्य तेन<br>महर्षिणा तेज उपाकृतं च॥ ७<br>तेनर्षिसृष्टेन च तेजसा वृतं<br>ज्वलत्प्रकाशार्कसहस्रतुल्यम् ।<br>तस्माच्च जाता तरलायताक्षी<br>कात्यायनी योगविशुद्धदेहा॥ ८शिवजीके साथ ही विष्णुभगवान्ने (भी) उनके इस प्रकारके वचनको सुना तथा दुःखसे व्याकुल चित्तवाले उन देवताओंको देखा तो उनका क्रोध कालाग्निके समान प्रज्वलित हो गया। उसके बाद मधु नामक राक्षसको मारनेवाले विष्णु, शङ्कर, पितामह (ब्रह्मा) तथा इन्द्र आदि देवताओंके क्रोध करनेपर उन सबके मुखसे महान् तेज प्रकट हुआ। मुने! फिर वह तेजोरराशि कात्यायन ऋषिके अनुपम आश्रममें पर्वतशृङ्गके समान एकत्र हो गयी। उन महर्षिने भी उस तेजकी और अभिवृद्धि की। उन महर्षिद्वारा उत्पन्न किये गये तेजसे आवृत वह तेज हजारों सूर्योंके समान प्रदीप्त हो गया। उसके योगसे विशुद्ध शरीरवाली एवं चञ्चल तथा विशाल नेत्रोंवाली कात्यायनी देवी प्रकट हो गयीं॥ ५—८॥

अध्याय १८ ] महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव ९७ माहेश्वराद् वक्त्रमथो बभूव महादेवजीके तेजसे कात्यायनीका मुख बन गया नेत्रत्रयं पावकतेजसा च। और अग्निके तेजसे उनके तीन नेत्र प्रकट हो गये। याम्येन केशा हरितेजसा च इसी प्रकार यमके तेजसे केश तथा हरिके तेजसे भुजास्तथाष्टादश संप्रजज्ञिरे ॥ ९ उनकी अट्ठारह भुजाएँ, चन्द्रमाके तेजसे उनके सटे हुए सौम्येन युग्मं स्तनयोः सुसंहतं स्तनयुगल, इन्द्रके तेजसे मध्यभाग तथा वरुणके मध्यं तथैन्द्रेन च तेजसाऽभवत्। तेजसे ऊरु, जङ्घाएँ एवं नितम्बोंकी उत्पत्ति हुई। ऊरू च जङ्घे च नितम्बसंयुते लोकपितामह ब्रह्माके तेजसे कमलकोशके समान जाते जलेश्यस्य तु तेजसा हि ॥ १० उनके दोनों चरण, आदित्योंके तेजसे पैरोंकी अङ्गुलियाँ पादौ च लोकप्रपितामहस्य एवं वसुओंके तेजसे उनके हाथोंकी अङ्गुलियाँ पद्माभिकोशप्रतिमौ बभूवतुः । उत्पन्न हुईं। प्रजापतियोंके तेजसे उनके दाँत, यक्षोंके दिवाकराणामपि तेजसाऽङ्गुलीः तेजसे नाक, वायुके तेजसे दोनों कान, साध्यके कराङ्गुलीश्च वसुतेजसैव ॥ ११ तेजसे कामदेवके धनुषके समान उनकी दोनों भौंहें प्रजापतीनां दशनाश्च तेजसा प्रकट हुई - ॥ ९-१२ ॥ याक्षेण नासा श्रवणौ च मारुतात् । इस प्रकार महर्षियोंका उत्तमोत्तम तथा महान् साध्येन च भ्रूयुगलं सुकान्तिमत् तेज पृथ्वीपर 'कात्यायनी' इस नामसे प्रसिद्ध हुआ, कंदर्पबाणासनसन्निभं बभौ ॥ १२ तब वे उसी नामसे विश्वमें प्रसिद्ध हुईं। वरदानी तथर्षितेजोत्तममुत्तमं मह- शङ्करजीने उन्हें त्रिशूल, मुरके मारनेवाले श्रीकृष्णने नाम्ना पृथिव्यामभवत् प्रसिद्धम्। चक्र, वरुणने शङ्ख, अग्निने शक्ति, वायुने धनुष तथा कात्यायनीत्येव तदा बभौ सा सूर्यने अक्षय बाणोंवाले दो तूणीर (तरकस) प्रदान नाम्ना च तेनैव जगत्प्रसिद्धा ॥ १३ किये। इन्द्रने घण्टासहित वज्र, यमने दण्ड, कुबेरने ददौ त्रिशूलं वरदस्तत्रिशूली गदा, ब्रह्माने कमण्डलुके साथ रुद्राक्षकी माला चक्रं मुरारिर्वरुणश्च शङ्खम् । तथा कालने उन्हें ढालसहित प्रचण्ड खड्ग प्रदान शक्तिं हुताशः श्वसनश्च चापं किया। चन्द्रमाने चँवरके साथ हार, समुद्रने तूणौ तथाक्षय्यशरौ विवस्वान् ॥ १४ माला, हिमालयने सिंह, विश्वकर्माने चूडामणि, वज्रं तथैन्द्रः सह घण्टया च कुण्डल, अर्धचन्द्र, कुठार तथा पर्याप्त ऐश्वर्य* यमोऽथ दण्डं धनदो गदां च। प्रदान किया ॥ १३-१६ ॥ ब्रह्माऽक्षमालां सकमण्डलुं च गन्धर्वराजने उनके अनुरूप रजतका पूर्ण पान कालोऽसिमुग्रं सह चर्मणा च ॥ १५ (मद्य)-पात्र, नागराजने भुजङ्गहार तथा ऋतुओंने हारं च सोमः सह चामरेण कभी न कुम्हिलानेवाले पुष्पोंकी माला प्रदान की। मालां समुद्रो हिमवान् मृगेन्द्रम्। चूडामणिं कुण्डलमर्द्धचन्द्रं प्रादात् कुठारं वसु शिल्पकत्र्ता ॥ १६ गन्धर्वराजो रजतानुलिप्तं पानस्य पूर्णं सदृशं च भाजनम्। भुजंगहारं भुजगेश्वरोऽपि अम्लानपुष्पामृतवः स्त्रजं च ॥ १७

  • सभी पुराणों तथा सप्तशतीकी व्याख्याओंमें विश्वकर्माद्वारा ही आभूषण बनाने - देनेकी चर्चा है। कुछ प्रतियोंके अर्थमें समुद्रद्वारा देनेकी बात छप गयी है, जो गलत है।

| ९८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १८ | | :--- | :--- |

| तदाऽतितुष्टा सुरसत्तमानां<br>अट्टाट्टहासं मुमुचे त्रिनेत्रा।<br>तां तुष्टुवुर्देववराः सहेन्द्राः<br>सविष्णुरुद्रेन्द्रनिलाग्निभास्कराः॥ १८<br>नमोऽस्तु देव्यै सुरपूजितायै<br>या संस्थिता योगविशुद्धदेहा।<br>निद्रास्वरूपेण महीं वितत्य<br>तृष्णा त्रपा क्षुद् भयदाऽथ कान्तिः॥ १९<br>श्रद्धा स्मृतिः पुष्टि्रथो क्षमा च<br>छाया च शक्तिः कमलालया च।<br>वृत्तिर्दया भ्रान्तिरथेह माया<br>नमोऽस्तु देव्यै भवरूपिकायै॥ २० | उसके बाद श्रेष्ठ देवताओंके ऊपर अत्यन्त प्रसन्न होकर त्रिनेत्रा (कात्यायनी)-ने उच्च अट्टहास किया। इन्द्र, विष्णु, रुद्र, चन्द्रमा, वायु, अग्नि तथा सूर्य आदि श्रेष्ठ देव उनकी स्तुति करने लगे—योगसे विशुद्ध देहवाली देवोंसे पूजित देवीको नमस्कार है। वे निद्रारूपसे पृथ्वीमें व्याप्त हैं, वे ही तृष्णा, त्रपा, क्षुधा, भयदा, कान्ति, श्रद्धा, स्मृति, पुष्टि, क्षमा, छाया, शक्ति, लक्ष्मी, वृत्ति, दया, भ्रान्ति तथा माया हैं; ऐसी कल्याणमयी देवीको नमस्कार है॥ १७—२०॥ | | ततः स्तुता देववरैर्मृगेन्द्र-<br>मारुह्य देवी प्रगताऽवनीध्रम्।<br>विन्ध्यं महापर्वतमुच्चशृङ्गं<br>चकार यं निम्नतरं त्वगस्त्यः॥ २१ | फिर देववरोंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर वे देवी सिंहपर आरूढ़ होकर विन्ध्य नामके उस ऊँचे शृङ्गवाले महान् पर्वतपर गयीं, जिसे अगस्त्य मुनिने अति निम्न कर दिया था॥ २१॥ | | नारद उवाच<br>किमर्थमद्रिं भगवानगस्त्य-<br>स्तं निम्नशृङ्गं कृतवान् महर्षिः।<br>कस्मै कृते केन च कारणेन<br>एतद् वदस्वामलसत्त्ववृत्ते॥ २२ | नारदजीने पूछा— शुद्धात्मन् (पुलस्त्यजी)! आप यह बतलायें कि भगवान् अगस्त्यमहर्षिने उस पर्वतको किसके लिये एवं किस कारणसे निम्न शृङ्गवाला कर दिया?॥ २२॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>पुरा हि विन्ध्येन दिवाकरस्य<br>गतिर्निरुद्धा गगनेचरस्य।<br>रविस्ततः कुम्भभवं समेत्य<br>होमावसाने वचनं बभाषे॥ २३<br>समागतोऽहं द्विज दूरतस्त्वां<br>कुरुष्व मामुद्धरणं मुनीन्द्र।<br>ददस्व दानं मम यन्मनीषितं<br>चरामि येन त्रिदिवेषु निर्वृतः॥ २४<br>इत्थं दिवाकरवचो गुणसंप्रयोगि<br>श्रुत्वा तदा कलशजो वचनं बभाषे।<br>दानं ददामि तव यन्मनसस्त्वभीष्टं<br>नार्थी प्रयाति विमुखो मम कश्चिदेव॥ २५<br>श्रुत्वा वचोऽमृतमयं कलशोद्भवस्य<br>प्राह प्रभुः करतले विनिधाय मूर्ध्नि।<br>एषोऽद्य मे गिरिवरः प्ररुणद्धि मार्गं<br>विन्ध्यस्य निम्नकरणे भगवन् यतस्व॥ २६ | पुलस्त्यजीने कहा— प्राचीनकालमें विन्ध्य-पर्वतने (अपने ऊँचे शिखरोंसे) आकाशचारी सूर्यकी गतिको अवरुद्ध कर दिया था। तब सूर्यने महर्षि अगस्त्यके पास जाकर होमके अन्तमें यह वचन कहा—द्विज! मैं बहुत दूरसे आपके पास आया हूँ। मुनिश्रेष्ठ! आप मेरा उद्धार करें। मुझे अभीष्ट प्रदान करें, जिससे मैं निश्चिन्त होकर आकाशमें विचरण कर सकूँ। इस प्रकार सूर्यके नम्र वचनोंको सुनकर अगस्त्यजी बोले—मैं आपकी अभीष्ट वस्तु प्रदान करूँगा। मेरे पाससे कोई भी याचक विमुख होकर नहीं जाता। अगस्त्यजीकी अमृतमयी वाणी सुन करके सिरपर दोनों हाथ जोड़कर सूर्यने कहा—भगवन्! यह पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य आज मेरा मार्ग रोक रहा है, अतः आप इसे नीचा करनेका प्रयत्न करें॥ २३—२६॥ |

२१- देवीके पुनराविर्भाव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; कुरुक्षेत्रस्थ पृथूदकतीर्थका प्रसङ्ग; संवरण-तपतीका विवाह ..

अध्याय १८ ] महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोरराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव ९९ इति रविवचनादथाह कुम्भजन्मा कृतमिति विद्धि मया हि नीचशृङ्गम्। तव किरणजितो भविष्यते महीध्रो मम चरणसमाश्रितस्य का व्यथा ते॥ २७ इत्येवमुक्त्वा कलशोद्भवस्तु सूर्यं हि संस्तूय विनम्य भक्त्या। जगाम संत्यज्य हि दण्डकं हि विन्ध्याचलं वृद्धवपुर्महर्षिः ॥ २८ गत्वा वचः प्राह मुनिर्महीध्रं यास्ये महातीर्थवरं सुपुण्यम्। वृद्धोऽस्म्यशक्तश्च तवाधिरोढुं तस्माद् भवान् नीचतरोऽस्तु सद्यः ॥ २९ इत्येवमुक्तो मुनिसत्तमेन स नीचशृङ्गस्त्वभवन्महीध्रः। समाक्रमच्चापि महर्षिमुख्यः प्रोल्लङ्घ्य विन्ध्यं त्विदमाह शैलम् ॥ ३० सूर्यकी बात सुनकर अगस्त्यजीने कहा—सूर्यदेव ! विन्ध्यको आप मेरे द्वारा नीचा किया हुआ ही समझें। यह पर्वत आपकी किरणोंसे पराजित हो जायगा। मेरे चरणोंके आश्रय लेनेपर आपको अब व्यथा कैसी? वृद्ध शरीरवाले महर्षि अगस्त्यजी ऐसा कहकर विनम्रतापूर्वक भक्तिसे सूर्यकी स्तुति करनेके बाद दण्डकको छोड़कर विन्ध्यपर्वतके निकट चले गये। वहाँ जाकर मुनिने पर्वतसे कहा—पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य! मैं अत्यन्त पवित्र महातीर्थको जा रहा हूँ। मैं वृद्ध होनेसे तुम्हारे ऊपर चढ़नेमें असमर्थ हूँ; अतः तुम तत्काल नीचा हो जाओ। मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यके ऐसा कहनेपर विन्ध्य पर्वत निम्न शिखरवाला हो गया। तब महर्षिश्रेष्ठ (अगस्त्यजी)-ने विन्ध्यपर्वतपर चढ़कर विन्ध्यको पार कर लिया और तब उससे यह कहा— ॥ २७-३० ॥ यावन्न भूयो निजमाव्रजामि महाश्रमं धौतवपुः सुतीर्थात्। त्वया न तावत्त्विह वर्धितव्यं नो चेद् विशप्येऽहमवज्ञया ते॥ ३१ इत्येवमुक्त्वा भगवाञ्जगाम दिशं स याम्यां सहसान्तरिक्षम्। आक्रम्य तस्थौ स हि तां तदाशां काले व्रजाम्यत्र यदा मुनीन्द्रः ॥ ३२ तत्राश्रमं रम्यतरं हि कृत्वा संशुद्धजाम्बूनदतोरणान्तम् । तत्राथ निक्षिप्य विदर्भपुत्रीं स्वमाश्रमं सौम्यमुपाजगाम ॥ ३३ ऋतावृतौ पर्वकालेषु नित्यं तमम्बरे ह्याश्रममावसत् सः। शेषं च कालं स हि दण्डकस्थ- स्तपश्चचारामितकान्तिमान् मुनिः ॥ ३४ मैं जबतक पवित्र तीर्थसे स्नान कर पुनः अपने महान् आश्रममें न लौटूँ, तबतक तुम्हें नहीं बढ़ना चाहिये; अन्यथा अवज्ञा करनेके कारण मैं तुम्हें घोर शाप दे दूँगा। 'मैं उचित समयपर फिर आऊँगा'-ऐसा कहकर भगवान् अगस्त्य सहसा दक्षिण दिशाकी ओर चले गये तथा वहीं रह गये। मुनिने वहाँ विशुद्ध स्वर्णिम तोरणोंवाले अति रमणीय आश्रमकी रचना की एवं उसमें विदर्भपुत्री लोपामुद्राको रखकर स्वयं अपने आश्रमको चले गये। अत्यन्त प्रकाशमान मुनि (शरद्से वसन्ततक) विभिन्न ऋतुओंमें पर्व (अष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पूर्णिमा तिथियों तथा रवि-संक्रान्ति, सूर्यग्रहण एवं चन्द्रग्रहण)-के समय नित्य आकाशमें और शेष समय दण्डकवनमें अपने आश्रममें निवासकर तप करने लगे ॥ ३१-३४॥ विन्ध्योऽपि दृष्ट्वा गगने महाश्रमं वृद्धिं न यात्येव भ्यान्महर्षेः। नासौ निवृत्तेति मतिं विधाय स संस्थितो नीचतराग्रशृङ्गः ॥ ३५ विन्ध्यपर्वत भी आकाशमें महान् आश्रमको देखकर महर्षिके भयसे नहीं बढ़ा। वे नहीं लौटे हैं—ऐसा समझकर वह अपना शिखर नीचा किये हुए अब भी

१००श्रीवामनपुराण[ अध्याय १९

| एवं त्वगस्त्येन महाचलेन्द्रः<br>स नीचशृङ्गो हि कृतो महर्षे।<br>तस्योर्ध्वशृङ्गे मुनिसंस्तुता सा<br>दुर्गा स्थिता दानवनाशनार्थम्॥ ३६<br>देवाश्च सिद्धाश्च महोरगाश्च<br>विद्याधरा भूतगणाश्च सर्वे।<br>सर्वाप्सरोभिः प्रतिरामयन्तः<br>कात्यायनीं तस्थुरपेतशोकाः॥ ३७ | वैसे ही स्थित है। हे महर्षे ! इस प्रकार अगस्त्यने महान् पर्वतराज विन्ध्यको नीचा कर दिया। उसीके शिखरके ऊपर मुनियोंद्वारा संस्तुता दुर्गादेवी दानवोंके विनाशके लिये स्थित हुईं और देवता, सिद्ध, महानाग, अप्सराओंके सहित विद्याधर एवं समस्त भूतगण इनके बदले कात्यायनीदेवीको प्रसन्न करते हुए निःशोक होकर उनके निकट रहने लगे ॥ ३५-३७ ॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अठारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १८ ॥


उन्नीसवाँ अध्याय

चण्ड-मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन, महिषासुरका संदेश और युद्धोपक्रम

पुलस्त्य उवाच
ततस्तु तां तत्र तदा वसन्तीं<br>कात्यायनीं शैलवरस्य शृङ्गे।<br>अपश्यतां दानवसत्तमौ द्वौ<br>चण्डश्च मुण्डश्च तपस्विनीं ताम्॥ १<br>दृष्ट्वैव शैलादवतीर्य शीघ्र-<br>माजग्मतुः स्वभवनं सुरारी।<br>दृष्ट्वोचतुस्तौ महिषासुरस्य<br>दूताविदं चण्डमुण्डौ दितीशम्॥ २<br>स्वस्थो भवान् किं त्वसुरेन्द्र साम्प्रत-<br>मागच्छ पश्याम च तत्र विन्ध्यम्।<br>तत्रास्ति देवी सुमहानुभावा<br>कन्या सुरूपा सुरसुन्दरीणाम्॥ ३<br>जितास्तया तोयधराऽलकैर्हि<br>जितः शशाङ्को वदनेन तन्व्या।<br>नेत्रैस्त्रिभिस्त्रीणि हुताशनानि<br>जितानि कण्ठेन जितस्तु शङ्खः॥ ४पुलस्त्यजीने कहा— उसके बाद उस श्रेष्ठ पर्वतशिखरपर निवास करनेवाली उन तपस्विनी कात्यायनी (दुर्गा)-को चण्ड और मुण्ड नामके दो श्रेष्ठ दानवोंने देखा और देखते ही पर्वतसे उतरकर वे दोनों असुर अपने घर चले गये। फिर उन दोनों दूतोंने दैत्यराज महिषासुरके निकट जाकर कहा—'असुरेन्द्र! आप इस समय स्वस्थ तो हैं? आइये, हमलोग विन्ध्यपर्वतपर चलकर देखें; वहाँ सुर-सुन्दरियोंमें अत्यन्त सुन्दर, श्रेष्ठ लक्षणोंसे युक्त एक कन्या है। उस तन्वी (सूक्ष्म देहवाली)-ने केशपाशके द्वारा मेघोंको, मुखके द्वारा चन्द्रमाको, तीन नेत्रोंद्वारा तीनों (गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय) अग्नियोंको और कण्ठके द्वारा शङ्खको जीत लिया है (उसकी शोभा और तेजसे ये फीके पड़ गये हैं)'॥ १—४॥
स्तनौ सुवृत्तावथ मग्नचूचुकौ<br>स्थितौ विजित्येव गजस्य कुम्भौ।<br>त्वां सर्वजेतारमिति प्रतर्क्य<br>कुचौ स्मरेणैव कृतौ सुदुर्गौ॥ ५'उसके मग्न चूचुकवाले वृत्त (सुडौल गोले)-स्तन हाथीके गण्डस्थलोंको मात कर रहे हैं। मालूम होता है कि कामदेवने अपनेको सर्वविजयी समझकर आपको परास्त करनेके लिये उसके दो कुचरूपी दो

अध्याय १९ ] चण्ड-मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन और युद्धोपक्रम १०१ पीनाः सशस्त्राः परिघोपमाश्च भुजास्तथाऽष्टादश भान्ति तस्याः। पराक्रमं वै भवतो विदित्वा कामेन यन्त्रा इव ते कृतास्तु॥ ६ मध्यं च तस्यास्त्रिवलीतरङ्गं विभाति दैत्येन्द्र सुरोमराजि। भयात्तुरारोहणकातरस्य कामस्य सोपानमिव प्रयुक्तम्॥ ७ सा रोमराजी सुतरां हि तस्या विराजते पीनकुचावलग्ना। आरोहणे त्वद्व्यकातरस्य स्वेदप्रवाहोऽसुर मन्मथस्य ॥ ८ नाभिर्गभीरा सुतरां विभाति प्रदक्षिणाऽस्याः परिवर्तमाना। तस्यैव लावण्यगृहस्य मुद्रा कंदर्पराज्ञा स्वयमेव दत्ता ॥ ९ विभाति रम्यं जघनं मृगाक्ष्याः समंततो मेखलयाऽवजुष्टम् । मन्याम तं कामनराधिपस्य प्राकारगुप्तं नगरं सुदुर्गम् ॥ १० वृत्तावरोमौ च मृदू कुमार्याः शोभेत ऊरू समनुत्तमौ हि। आवासनार्थं मकरध्वजेन जनस्य देशाविव संनिविष्टौ ॥ ११ तज्जानुयुग्मं महिषासुरेन्द्र अर्द्धोन्नतं भाति तथैव तस्याः। सृष्ट्वा विधाता हि निरूपणाय श्रान्तस्तथा हस्ततले ददौ हि ॥ १२ जङ्घे सुवृत्तेऽपि च रोमहीने शोभेत दैत्येश्वर ते तदीये। आक्रम्य लोकानिव निर्मिताया रूपार्जितस्यैव कृताधरौ हि ॥ १३ पादौ च तस्याः कमलोदराभौ प्रयत्नतस्तौ हि कृतौ विधात्रा। आभ्राजि ताभ्यां नखरत्नमाला नक्षत्रमाला गगने यथैव ॥ १४ दुर्गोंकी रचना की है। शस्त्रसहित उसकी मोटी परिघके समान अठारह भुजाएँ इस प्रकार सुशोभित हो रही हैं, मानो आपका पराक्रम जानकर कामदेवने यन्त्रके समान उसका निर्माण किया है। दैत्येन्द्र ! त्रिवलीसे तरङ्गायमान उसकी कमर इस प्रकार सुशोभित हो रही है, मानो वह भयार्त तथा अधीर कामदेवका आरोहण करनेके लिये सोपान हो। असुर! उसके पीन कुचोंतककी वह रोमावलि इस प्रकार सुशोभित हो रही है, मानो आरोहण करनेमें आपके भयसे कातर कामदेवका स्वेद-प्रवाह हो' ॥ ५-८॥ 'उसकी गम्भीर दक्षिणावर्त नाभि ऐसी लगती है, मानो कंदर्पने स्वयं ही उस सौन्दर्यगृहके ऊपर मुहर लगा दी है। मेखलासे चारों ओर आवेष्टित उस मृगनयनीका जघन बड़ा सुन्दर सुशोभित हो रहा है। उसे हम राजा कामका प्राकारसे (चहारदीवारियोंसे) गुप्त (सुरक्षित) दुर्गम नगर मानते हैं। उस कुमारीके वृत्ताकार रोमरहित, कोमल तथा उत्तम ऊरु इस प्रकार शोभित हो रहे हैं, मानो कामदेवने मनुष्योंके निवासके लिये दो रेखाओंका संनिवेश किया है। महिषासुरेन्द्र! उसके अर्द्धोन्नत जानुयुगल इस प्रकार सुशोभित हो रहे हैं, मानो उसकी रचना करनेके बाद थके विधाताने निरूपण करनेके लिये अपना करतल ही स्थापित कर दिया हो' ॥ ९-१२॥ 'दैत्येश्वर! उसकी सुवृत्त तथा रोमहीन दोनों जंघाएँ इस प्रकार सुशोभित हो रही हैं, मानो (दिव्य) निर्मित की गयी नायिकाके रूपके द्वारा सभी लोग पराजित कर दिये गये हैं। विधाताने प्रयत्नपूर्वक उसके कमलोदरके समान कान्तिवाले दोनों पैरोंका निर्माण किया है। उन्होंने कात्यायनीके उन चरणोंके नखरूपी रत्नशृङ्खलाको इस प्रकार प्रकाशित किया है, मानो वह आकाशमें नक्षत्रोंकी माला हो।

१०२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १९ एवंस्वरूपा दनुनाथ कन्या महोग्रशस्त्राणि च धारयन्ती। दृष्ट्वा यथेष्टं न च विद्म का सा सुताऽथवा कस्यचिदेव बाला ॥ १५ तद्भूतले रत्नमनुत्तमं स्थितं स्वर्गं परित्यज्य महासुरेन्द्र । गत्वाथ विन्ध्यं स्वयमेव पश्य कुरुष्व यत् तेऽभिमतं क्षमं च ॥ १६ श्रुत्वैव ताभ्यां महिषासुरस्तु देव्याः प्रवृत्तिं कमनीयरूपाम् । चक्रे मतिं नात्र विचारमस्ति इत्येवमुक्त्वा महिषोऽपि नास्ति ॥ १७ प्रागेव पुंसस्तु शुभाशुभानि स्थाने विधात्रा प्रतिपादितानि । यस्मिन् यथा यानि यतोऽथ विप्र स नीयते वा व्रजति स्वयं वा ॥ १८ ततोऽनु मुण्डं नमरं सचण्डं विडालनेत्रं सपिाशङ्गवाष्कलम् । उग्रायुधं चिक्षुररक्तबीजौ समादिदेशाथ महासुरेन्द्रः ॥ १९ आहत्य भेरी रणकर्कशास्ते स्वर्गं परित्यज्य महीधरं तु । आगम्य मूले शिविरं निवेश्य तस्थुश्च सज्जा दनुनन्दनास्ते ॥ २० ततस्तु दैत्यो महिषासुरेण सम्प्रेषितो दानवयूथपालः । मयस्य पुत्रो रिपुसैन्यमर्दी स दुन्दुभिर्दुन्दुभिनिःस्वनस्तु ॥ २१ अभ्येत्य देवीं गगनस्थितोऽपि स दुन्दुभिर्वाक्यमुवाच विप्र । कुमारि दूतोऽस्मि महासुरस्य रम्भात्मजस्याप्रतिमस्य युद्धे ॥ २२ कात्यायनी दुन्दुभिमभ्युवाच एह्येहि दैत्येन्द्र भयं विमुच्य । वाक्यं च यद्रम्भसुतो बभाषे वदस्व तत्सत्यमपेतमोहः ॥ २३ दैत्येश्वर ! वह कन्या बड़े और भयानक शस्त्रोंको धारण किये हुए है। उसे भलीभाँति देखकर भी हम यह न जान सके कि वह कौन है तथा किसकी पुत्री या स्त्री है। महासुरेन्द्र ! वह स्वर्गका परित्याग कर भूतलमें स्थित श्रेष्ठरत्न है। आप स्वयं विन्ध्यपर्वतपर जाकर उसे देखें और फिर जो आपकी इच्छा एवं सामर्थ्य हो वह करें' ॥ १३-१६ ॥ उन दोनों दूतोंसे कात्यायनीके आकर्षक सौन्दर्यकी बात सुनकर महिषने 'इस विषयमें कुछ भी विचारना नहीं है'- यह कहकर जानेका निश्चय किया। इस प्रकार मानो महिषका अन्त ही आ गया। मनुष्यके शुभाशुभको ब्रह्माने पहलेसे ही निर्धारित कर रखा है। जिस व्यक्तिको जहाँपर या जहाँसे जिस प्रकार जो कुछ भी शुभाशुभ परिणाम होनेवाला होता है, वह वहाँ ले जाया जाता है या स्वयं चला जाता है। फिर महिषने मुण्ड, नमर, चण्ड, विडालनेत्र, पिशङ्गके साथ वाष्कल, उग्रायुध, चिक्षुर और रक्तबीजको आज्ञा दी। वे सभी दानव रणकर्कश भेरियाँ बजाकर स्वर्गको छोड़कर उस पर्वतके निकट आ गये और उसके मूलमें सेनाके दलोंका पड़ाव डालकर युद्धके लिये तैयार हो गये ॥ १७-२० ॥ तत्पश्चात् महिषासुरने देवीके पास धौंसकी ध्वनिकी भाँति उच्च और गम्भीर ध्वनिमें बोलनेवाले तथा शत्रुओंकी सेनाओंके समूहोंका मर्दन करनेवाले दानवोंके सेनापति मयपुत्र दुन्दुभिको भेजा। ब्राह्मणदेवता नारदजी ! दुन्दुभिने देवीके पास पहुँचकर आकाशमें स्थित होकर उनसे यह वाक्य कहा - हे कुमारि ! मैं महान् असुर रम्भके पुत्र महिषका दूत हूँ। वह युद्धमें अद्वितीय वीर है। इसपर कात्यायनीने दुन्दुभिसे कहा- दैत्येन्द्र ! तुम निडर होकर इधर आओ और रम्भपुत्रने जो वचन कहा है, उसे स्वस्थ होकर ठीक-ठीक कहो।