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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

अध्याय १२ ] सुकेशिका नरक देनेवाले कर्मोंके सम्बन्धमें प्रश्न, नरकोंका वर्णन ६३ देवतातिथिभूतेषु भृत्येष्वभ्यागतेषु च। अभुक्तवत्सु ये ऽश्नन्ति बालपित्रग्रिमातृषु ॥ १२ दुष्टासृक्पूयनिर्यासं भुञ्जते त्वधमा इमे । सूचीमुखाश्च जायन्ते क्षुधार्त्ता गिरिविग्रहाः ॥ १३ एकपङ्क्त्युपविष्टानां विषमं भोजयन्ति ये । विड्भोजनं राक्षसेन्द्र नरकं ते व्रजन्ति च ॥ १४ एकसार्थप्रयातं ये पश्यन्तश्चार्थिनं नराः। असंविभज्य भुञ्जन्ति ते यान्ति श्लेष्मभोजनम् ॥ १५ गोब्राह्मणाग्रयः स्पृष्टा पैरुच्छिष्टैः क्षपाचर । छिद्यन्ते हि करास्तेषां तप्तकुम्भे सुदारुणे ॥ १६ सूर्येन्दुतारका दृष्टा यैरुच्छिष्टैश्च कामतः। तेषां नेत्रगतो वह्निर्दह्यते यमकिंकरैः ॥ १७ मित्रजायाथ जननी ज्येष्ठो भ्राता पिता स्वसा । जामयो गुरवो वृद्धा यैः संस्पृष्टाः पदानृभिः ॥ १८ बद्धाङ्घ्रयस्ते निगडैर्लोहैर्वह्निप्रतापितैः । क्षिप्यन्ते रौरवे घोरे ह्याजानुपरिदाहिनः ॥ १९ पायसं कृशरं मांसं वृथा भुक्तानि यैर्नरैः । तेषामयोगुडास्तप्ताः क्षिप्यन्ते वदनेऽद्भुताः ॥ २० गुरुदेवद्विजातीनां वेदानां च नराधमैः । निन्दा निशामिता यैस्तु पापानामिति कुर्वताम् ॥ २१ तेषां लोहमयाः कीला वह्निवर्णाः पुनः पुनः। श्रवणेषु निखन्यन्ते धर्मराजस्य किंकरैः ॥ २२ प्रपादेवकुलारामान् विप्रवेश्मसभासठान् । कूपवापीतडागांश्च भङ्क्त्वा विध्वंसयन्ति ये ॥ २३ तेषां विलपतां चर्म देहतः क्रियते पृथक् । कर्तिकाभिः सुतीक्ष्णाभिः सुरौद्रैर्यमकिंकरैः ॥ २४ गोब्राह्मणार्र्कमग्निं च ये वै मेहन्ति मानवाः । तेषां गुदेन चान्त्राणि विनिष्कृन्तन्ति वायसाः ॥ २५ स्वपोषणपरो यस्तु परित्यजति मानवः। पुत्रभृत्यकलत्रादिबन्धुवर्गमकिंचनम् । दुर्भिक्षे संभ्रमे चापि स श्वभोज्ये निपात्यते ॥ २६ शरणागतं ये त्यजन्ति ये च बन्धनपालकाः । पतन्ति यन्त्रपीडे ते ताड्यमानास्तु किंकरैः ॥ २७ जो देवता, अतिथि, अन्य प्राणी, सेवक, बाहरसे आये व्यक्ति, बालक, पिता, अग्नि एवं माताओंको बिना भोजन कराये पहले ही खा लेते हैं, वे अधम पुरुष पर्वततुल्य शरीर एवं सूची-सदृश मुखवाले होकर भूखसे व्याकुल रहते हुए दूषित रक्त एवं पीबका सार भक्षण करते हैं। हे राक्षसराज ! एक ही पङ्क्तिमें बैठे हुए लोगोंको जो समानरूपसे भोजन नहीं कराते, वे विड्भोजन नामक नरकमें जाते हैं ॥ ११-१४॥ जो लोग एक साथ चलनेवाले किसी बहुत तीव्र चाहवालेको देखते हुए भी उसे अन्न नहीं देते - अकेले भोजन करते हैं, वे श्लेष्मभोजन नामक नरकमें जाते हैं। हे राक्षस ! जो उच्छिष्टावस्थामें (जूठे रहते हुए) गाय, ब्राह्मण और अग्निको स्पर्श करते हैं, उनके हाथ भयंकर तप्तकुम्भमें डाले जाते हैं। जो उच्छिष्टावस्थामें स्वेच्छासे सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रको देखते हैं, उनके नेत्रोंमें यमदूत अग्नि जलाते हैं। जो मित्रकी पत्नी, माता, जेठ भाई, पिता, बहन, पुत्री, गुरु और वृद्धोंको पैरसे छूते हैं, उन मनुष्योंके पैर खूब जलते हुए बेड़ीसे बाँधकर उन्हें रौरव-नरकमें डाला जाता है, जहाँ वे घुटनोंतक जलते रहते हैं ॥ १५-१९॥ जो बिना विशेष प्रयोजनके खीर, खिचड़ी एवं मांसका भोजन करते हैं, उनके मुँहमें जलता हुआ लोहेका पिण्ड डाला जाता है। जो पापियोंद्वारा की गयी गुरु, देवता, ब्राह्मण और वेदोंकी निन्दाको सुनते हैं, उन नीच मनुष्योंके कानोंमें धर्मराजके किंकर अग्निवर्ण लोहेकी कीलें बार-बार ठोंकते रहते हैं। जो प्याऊ (पौसार), देवमन्दिर, बगीचा, ब्राह्मणगृह, सभा, मठ, कुआँ, बावली एवं तड़ागको तोड़कर नष्ट करते हैं, उन मनुष्योंके विलाप करते रहनेपर भी भयंकर यमकिंकर सुतीक्ष्ण छुरिकाओंद्वारा उनकी चमड़ी उधेड़ते हैं - उनकी देहसे चर्मको काटकर पृथक् करते रहते हैं ॥ २०-२४॥ जो गाय, ब्राह्मण, सूर्य और अग्निके सम्मुख मल- मूत्रादिका त्याग करते हैं, उनकी गुदासे कौए उनकी आँतोंको नोच-नोचकर काटते हैं। जो दुर्भिक्ष (अकाल) एवं विप्लवके समय अकिंचन, पुत्र, भृत्य एवं कलत्र (स्त्री) आदि बन्धुवर्गको छोड़कर आत्म-पोषण करता है, वह यमदूतोंद्वारा श्वभोजन नामक नरकमें डाला जाता है। जो रक्षाके लिये शरणमें आये व्यक्तिका परित्याग करता है, वह मनुष्य बन्दीगृह-रक्षक यमदूतोंके द्वारा पीटे जाते हुए यन्त्रपीड नामक नरकमें गिरते हैं।

६४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १२ क्लेशयन्ति हि विप्रादीन् ये ह्यकर्मसु पापिनः । ते पिष्यन्ते शिलापेषे शोष्यन्तेऽपि च शोषकैः ॥ २८ न्यासापहारिणः पापा बध्यन्ते निगडैरपि । क्षुत्क्षामाः शुष्कताल्वोष्ठाः पात्यन्ते वृश्चिकाशने ॥ २९ पर्वमैथुनिनः पापाः परदाररताश्च ये। ते वह्नितप्तां कूटाग्रामालिङ्गन्ते च शाल्मलीम् ॥ ३० उपाध्यायमधःकृत्य यैरधीतं द्विजाधमैः । तेषामध्यापको यश्च स शिलां शिरसा वहेत् ॥ ३१ मूत्रश्लेष्मपुरीषाणि यैरूत्सृष्टानि वारिणि। ते पात्यन्ते च विण्मूत्रे दुर्गन्धे पूयपूरिते ॥ ३२ श्राद्धातिथ्यर्थमन्योन्यं यैरभुक्तं भुवि मानवैः । परस्परं भक्ष्यन्ते मांसानि स्वानि बालिशाः ॥ ३३ वेदवह्निगुरुत्यागी भार्यापित्रोस्तथैव च। गिरिशृङ्गादधःपातं पात्यन्ते यमकिंकरैः ॥ ३४ पुनर्भूयतयो ये च कन्याविध्वंसकाश्च ये। तद्गर्भश्राद्धभुग् यश्च कृमीन्भक्षेत्पिपीलिकाः ॥ ३५ चाण्डालादन्त्यजाद्वापि प्रतिगृह्णाति दक्षिणाम्। याजको यजमानश्च सो श्मान्तः स्थूलकीटकः ॥ ३६ पृष्ठमांसशिनो मूढास्तथैवोत्कोचजीविनः । क्षिप्यन्ते वृकभक्षे ते नरके रजनीचर ॥ ३७ स्वर्णस्तेयी च ब्रह्मघ्नः सुरापी गुरुतल्पगः । तथा गोभूमिहर्त्तारो गोस्त्रीबालहनाश्च ये ॥ ३८ एते नरा द्विजा ये च गोषु विक्रयिणस्तथा । सोमविक्रयिणो ये च वेदविक्रयिणस्तथा ॥ ३९ कूटसभ्यास्त्वशौचाश्च नित्यनैमित्तनाशकाः । कूटसाक्ष्यप्रदा ये च ते महारौरवे स्थिताः ॥ ४० दशवर्षसहस्राणि तावत् तामिस्रके स्थिताः । तावच्चैवान्धतामिस्रे असिपत्रवने ततः ॥ ४१ तावच्चैव घटीयन्त्रे तप्तकुम्भे ततः परम्। प्रपातो भवते तेषां यैरिदं दुष्कृतं कृतम् ॥ ४२ जो लोग ब्राह्मणोंको कुकर्मोंमें लगाकर उन्हें क्लेश देते हैं, वे पापी मनुष्य शिलाओंपर पीसे जाते हैं और अग्नि- सूर्य आदिद्वारा शोषित भी किये जाते हैं॥ २५-२८॥ जो धरोहरको चुरा लेते हैं, उन्हें बेड़ी लगाकर भूखसे पीड़ित एवं सूखे तालु और ओठकी अवस्थामें वृश्चिकाशन नामक नरकमें गिराया जाता है। जो पर्वोंमें मैथुन करते तथा परस्त्री-संग करते हैं, उन पापियोंको वह्नितप्त कीलोंवाले शाल्मलिका (विवशतासे) आलिङ्गन करना पड़ता है। जो द्विज उपाध्यायको स्वयंकी अपेक्षा निम्नासनपर बैठाकर अध्ययन करता है, उन अधम द्विजों एवं उनके अध्यापकको सिरपर शिला वहन करनी पड़ती है। जो जलमें मूत्र, कफ एवं मलका त्याग करते हैं, उन्हें दुर्गन्धयुक्त विष्ठा और पीबसे पूर्ण विण्मूत्र नामक नरकमें गिराया जाता है॥ २९-३२॥ जो इस संसारमें श्राद्धके अवसरपर अतिथिके निमित्त तैयार किये गये पदार्थको परस्पर भक्षण कर लेते हैं, उन मूर्खोंको परलोकमें एक-दूसरेका मांस खाना पड़ता है। जो वेद, अग्नि, गुरु, भार्या, पिता एवं माताका त्याग करते हैं, उन्हें यमदूत गिरिशिखरके ऊपरसे नीचे गिराते हैं। जो विधवासे विवाह कराते, अविवाहित कन्याको दूषित करते एवं उक्त प्रकारसे उत्पन्न व्यक्तियोंकी सन्तानके यहाँ श्राद्धमें भोजन करते हैं, उन्हें कृमि तथा पिपीलिकाका भक्षण करना पड़ता है। जो ब्राह्मण चाण्डाल और अन्त्यजोंसे दक्षिणा लेते हैं उन्हें तथा उनके यजमानको पत्थरोंमें रहनेवाला स्थूल कीट बनना पड़ता है॥ ३३-३६॥ राक्षस! जो पीठपीछे शिकायत करते हैं-चुगली करते एवं घूस लेते हैं, उन्हें वृकभक्ष नामक नरकमें डाला जाता है। इसी प्रकार सोना चुरानेवाले, ब्रह्महत्यारे, मद्यपी, गुरुपत्नीगामी, गाय तथा भूमिकी चोरी करनेवाले एवं स्त्री तथा बालकको मारनेवाले मनुष्यों तथा गो, सोम एवं वेदका विक्रय करनेवाले, दम्भी, टेढ़ी भाषामें झूठी गवाही देनेवाले तथा पवित्रताके आचरणको छोड़ देनेवाले और नित्य एवं नैमित्तिक कर्मोंके नाश करनेवाले द्विजोंको महारौरव नामक नरकमें रहना पड़ता है॥ ३७-४०॥ उपर्युक्त प्रकारके पापियोंको दस हजार वर्ष तामिस्र नरकमें तथा उतने ही वर्षोंतक अन्धतामिस्र और असिपत्र- वन नामक नरकमें रहनेके बादमें भी-उतने ही वर्षोंतक घटीयन्त्र और तप्तकुम्भमें रहना पड़ता है। जिन भयंकर

अध्याय १२ ]सुकेशिका नरक देनेवाले कर्मोंके सम्बन्धमें प्रश्न, नरकोंका वर्णन६५
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
ये त्वेते नरका रौद्रा रौरवाद्यास्तवोदिताः।<br>ते सर्वे क्रमशः प्रोक्ताः कृतघ्ने लोकनिन्दिते॥ ४३रौरव आदि नरकोंका हमने तुमसे वर्णन किया है, वे सभी लोक-निन्दित कृतघ्नोंको बारी-बारीसे प्राप्त होते रहते हैं॥ ४१-४३॥
यथा सुराणां प्रवरो जनार्दनो<br>यथा गिरीणामपि शैशिराद्रिः।<br>यथायुधानां प्रवरं सुदर्शनं<br>यथा खगानां विनतानूजः।<br>महोरगाणां प्रवरोऽप्यनन्तो<br>यथा च भूतेषु मही प्रधाना॥ ४४<br>नदीषु गङ्गा जलजेषु पद्मं<br>सुरारिमुख्येषु हराङ्घ्रिभक्तः।<br>क्षेत्रेषु यद्वत्कुरुजाङ्गलं वरं<br>तीर्थेषु यद्वत् प्रवरं पृथूदकम्॥ ४५<br>सरस्सु चैवोत्तरमानसं यथा<br>वनेषु पुण्येषु हि नन्दनं यथा।<br>लोकेषु यद्वत्सदनं विरिञ्चेः<br>सत्यं यथा धर्मविधिक्रियासु॥ ४६<br>यथाश्वमेधः प्रवरः क्रतूनां<br>पुत्रो यथा स्पर्शवतां वरिष्ठः।<br>तपोधनानामपि कुम्भयोनिः<br>श्रुतिर्वरा यद्वदिहागमेषु॥ ४७<br>मुख्यः पुराणेषु यथैव<br>मात्स्यः स्वायंभुवोक्तिस्त्वपि संहितासु।<br>मनुः स्मृतीनां प्रवरो यथैव<br>तिथीषु दर्शो विषुवेषु दानम्॥ ४८जैसे देवताओंमें श्रीविष्णु, पर्वतोंमें हिमालय, अस्त्रोंमें सुदर्शन, पक्षियोंमें गरुड़, महान् सर्पोंमें अनन्तनाग तथा भूतोंमें पृथ्वी श्रेष्ठ है; नदियोंमें गङ्गा, जलमें उत्पन्न होनेवालोंमें कमल, देव-शत्रु-दैत्योंमें महादेवके चरणोंका भक्त और क्षेत्रोंमें जैसे कुरु-जांगल और तीर्थोंमें पृथूदक है; जलाशयोंमें उत्तर-मानस, पवित्र वनोंमें नन्दनवन, लोकोंमें ब्रह्मलोक, धर्म-कार्योंमें सत्य प्रधान है तथा जैसे यज्ञोंमें अश्वमेध, छूनेयोग्य (स्पर्शसुखवाले) पदार्थोंमें पुत्र सुखदायक है; तपस्वियोंमें अगस्त्य, आगम शास्त्रोंमें वेद श्रेष्ठ है; जैसे पुराणोंमें मत्स्यपुराण, संहिताओंमें स्वयम्भूंसंहिता, स्मृतियोंमें मनुस्मृति, तिथियोंमें अमावास्या और विषुवों अर्थात् मेष और तुला राशिमें सूर्यके संक्रमण संक्रान्तिके अवसरपर किया गया दान श्रेष्ठ होता है;॥ ४४-४८॥
तेजस्विनां यद्वदिहार्क उक्तो<br>ऋक्षेषु चन्द्रो जलधिर्ह्रदेषु।<br>भवान् तथा राक्षससत्तमेषु<br>पाशेषु नागस्तिमितेषु बन्धः॥ ४९<br>धान्येषु शालिर्द्विपदेषु विप्रः<br>चतुष्पदे गोः श्वपदां मृगेन्द्रः।<br>पुष्पेषु जाती नगरेषु काञ्ची<br>नारीषु रम्भाश्रमिणां गृहस्थः॥ ५०<br>कुशस्थली श्रेष्ठतमा पुरेषु<br>देशेषु सर्वेषु च मध्यदेशः।<br>फलेषु चूतो मुकुलेष्वशोकः<br>सर्वौषधीनां प्रवरा च पथ्या॥ ५१<br>मूलेषु कन्दः प्रवरो यथोक्तो<br>व्याधिश्वजीर्णं क्षणदाचरेन्द्र।<br>श्वेतेषु दुग्धं प्रवरं यथैव<br>कार्पासिकं प्रावरणेषु यद्वत्॥ ५२जैसे तेजस्वियोंमें सूर्य, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, जलाशयोंमें समुद्र, अच्छे राक्षसोंमें आप और निश्चेष्ट करनेवाले पाशोंमें नागपाश श्रेष्ठ है एवं जैसे धानोंमें शालि, दो पैरवालोंमें ब्राह्मण, चौपायोंमें गाय, जंगली जानवरोंमें सिंह, फूलोंमें जाती (चमेली), नगरोंमें काञ्ची, नारियोंमें रम्भा और आश्रमियोंमें गृहस्थ श्रेष्ठ हैं; जैसे सप्तपुरियोंमें द्वारका, समस्त देशोंमें मध्यदेश, फलोंमें आम, मुकुलोंमें अशोक और जड़ी-बूटियोंमें हरीतकी सर्वश्रेष्ठ है; हे निशाचर! जैसे मूलोंमें कन्द, रोगोंमें अपच, श्वेत वस्तुओंमें दुग्ध और वस्त्रोंमें रूईके कपड़े श्रेष्ठ हैं॥ ४९-५२॥
६६श्रीवामनपुराण[ अध्याय १३

| कलासु मुख्या गणितज्ञता च विज्ञानमुख्येषु यथेन्द्रजालम्।<br>शाकेषु मुख्या त्वपि काकमाची रसेषु मुख्यं लवणं यथैव॥ ५३<br>तुङ्गेषु तालो नलिनीषु पम्पा वनौकसेष्वेव च ऋक्षराजः।<br>महीरुहेष्वेव यथा वटश्च यथा हरो ज्ञानवतां वरिष्ठः॥ ५४<br>यथा सतीनां हिमवत्सुता हि यथार्जुनीनां कपिला वरिष्ठा।<br>यथा वृषाणामपि नीलवर्णो यथैव सर्वेष्वपि दुःसहेषु।<br>दुर्गेषु रौद्रेषु निशाचरेश नृपातनं वैतरणी प्रधाना॥ ५५<br>पापीयसां तद्वदिह कृतघ्नः सर्वेषु पापेषु निशाचरेन्द्र।<br>ब्रह्मघ्नगोघ्नादिषु निष्कृतिर्हि विद्येत नैवास्य तु दुष्टचारिणः।<br>न निष्कृतिश्चास्ति कृतघ्नवृत्तेः सुहृत्कृतं नाशयतोऽब्दकोटिभिः॥ ५६ | निशाचर! जैसे कलाओंमें गणितका जानना, विज्ञानोंमें इन्द्रजाल, शाकोंमें मकोय, रसोंमें नमक, ऊँचे पेड़ोंमें ताड़, कमल-सरोवरोंमें पंपासर, बनैले जीवोंमें भालू, वृक्षोंमें वट, ज्ञानियोंमें महादेव वरिष्ठ हैं; जैसे सतियोंमें हिमालयकी पुत्री पार्वती, गौओंमें काली गाय, बैलोंमें नील रंगका बैल, सभी दुःसह कठिन एवं भयंकर नरकोंमें नृपातन वैतरणी प्रधान है, उसी प्रकार हे निशाचरेश! पापियोंमें कृतघ्न प्रधानतम पापी होता है। ब्रह्म-हत्या एवं गोहत्या आदि पापोंकी निष्कृति तो हो जाती है, पर दुराचारी पापी एवं मित्र-द्रोही कृतघ्नका करोड़ों वर्षोंमें भी निस्तार नहीं होता॥ ५३-५६॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १२ ॥


तेरहवाँ अध्याय

सुकेशि के प्रश्नके उत्तरमें ऋषियोंका जम्बू-द्वीपकी स्थिति और उनमें स्थित पर्वत तथा नदियोंका वर्णन

सुकेशिरुवाचसुकेशिने कहा—
भवद्भिरुदिता घोरा पुष्करद्वीपसंस्थितिः।<br>जम्बूद्वीपस्य तु संस्थानं कथयन्तु महर्षयः॥ १आदरणीय ऋषियो! आपलोगोंने पुष्करद्वीपके भयंकर अवस्थानका वर्णन किया, अब आप-लोग (कृपाकर) जम्बूद्वीपकी स्थितिका वर्णन करें॥ १॥
ऋषय ऊचुःऋषियोंने कहा—
जम्बूद्वीपस्य संस्थानं कथ्यमानं निशामय।<br>नवभेदं सुविस्तीर्णं स्वर्गमोक्षफलप्रदम्॥ २<br>मध्ये त्विलावृतो वर्षो भद्राश्वः पूर्वतोऽद्भुतः।<br>पूर्वं उत्तरतश्चापि हिरण्यो राक्षसेश्वर॥ ३<br>पूर्वदक्षिणतश्चापि किंनरो वर्ष उच्यते।<br>भारतो दक्षिणे प्रोक्तो हरिर्दक्षिणपश्चिमे॥ ४<br>पश्चिमे केतुमालश्च रम्यकः पश्चिमोत्तरे।<br>उत्तरे च कुरुर्वर्षः कल्पवृक्षसमावृतः॥ ५राक्षसेश्वर! (अब) तुम हमलोगोंसे जम्बूद्वीपकी स्थितिका वर्णन सुनो। यह द्वीप अत्यन्त विशाल है और नव भागोंमें विभक्त है। यह स्वर्ग एवं मोक्ष-फलको देनेवाला है। जम्बूद्वीपके बीचमें इलावृतवर्ष, पूर्वमें अद्भुत भद्राश्ववर्ष तथा पूर्वोत्तरमें हिरण्यवर्ष है। पूर्व-दक्षिणमें किन्नरवर्ष, दक्षिणमें भारतवर्ष तथा दक्षिण-पश्चिममें हरिवर्ष बताया गया है। इसके पश्चिममें केतुमालवर्ष, पश्चिमोत्तरमें रम्यकवर्ष और उत्तरमें कल्पवृक्षसे समादृत कुरुवर्ष है॥ २–५॥

अध्याय १३ ] सुकेशिके प्रश्नके उत्तरमें ऋषियोंका जम्बू-द्वीपकी और उनमें स्थित पर्वत तथा नदियोंका वर्णन ६७ पुण्या रम्या नवैवैते वर्षाः शालकटंकट । (सुकेशि!) ये नव पवित्र और रमणीय वर्ष हैं। इलावृताद्या ये चाष्टौ वर्षमुक्त्वैव भारतम् ॥ ६ भारतवर्षके अतिरिक्त इलावृतादि आठ वर्षोंमें युगावस्था न तेष्वस्ति युगावस्था जरामृत्युभयं न च । तथा जरामृत्युका भय नहीं होता। उन वर्षोंमें बिना तेषां स्वाभाविका सिद्धिः सुखप्राया ह्ययत्नतः । प्रयत्नके स्वभावतः बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ मिलती हैं। उनमें विपर्ययो न तेष्वस्ति नोत्तमाधममध्यमाः ॥ ७ उत्तम, मध्यम, अधम आदिका किसी प्रकारका कोई भेद यदेतद् भारतं वर्षं नवद्वीपं निशाचर । नहीं है। निशाचर! इस भारतवर्षके भी नव उपद्वीप हैं। सागरान्तरिताः सर्वे अगम्याश्च परस्परम् ॥ ८ ये सभी द्वीप समुद्रोंसे घिरे हैं और परस्पर अगम्य हैं। इन्द्रद्वीपः कसेरुमांस्ताम्रवर्णो गभस्तिमान् । भारतवर्षके नव उपद्वीपोंके नाम इस प्रकार हैं—इन्द्रद्वीप, नागद्वीपः कटाहश्च सिंहलो वारुणस्तथा ॥ ९ कसेरुमान्, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, कटाह, सिंहल अयं तु नवमस्तेषां द्वीपः सागरसंवृतः । और वारुण। नवाँ मुख्य यह कुमारद्वीप भारत-सागरसे कुमाराख्यः परिख्यातो द्वीपोऽयं दक्षिणोत्तरः ॥ १० लगा हुआ दक्षिणसे उत्तरकी ओर फैला है ॥ ६-१०॥ पूर्वे किराता यस्यान्ते पश्चिमे यवनाः स्थिताः । वीर ! भारतवर्षके पूर्वकी सीमापर किरात, पश्चिममें आन्ध्रा दक्षिणतो वीर तुरुष्कास्त्वपि चोत्तरे ॥ ११ यवन, दक्षिणमें आन्ध्र तथा उत्तरमें तुरुष्क लोग निवास ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चान्तरवासिनः । करते हैं। इसके बीचमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं इज्ज्यायुद्धवणिज्याद्यैः कर्मभिः कृतपावनाः ॥ १२ शूद्रलोग रहते हैं। यज्ञ, युद्ध एवं वाणिज्य आदि कर्मोंके तेषां संव्यवहारश्च एभिः कर्मभिरिष्यते । द्वारा वे सभी पवित्र हो गये हैं। उनका व्यवहार, स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष)-की प्राप्ति तथा पाप एवं पुण्य स्वर्गापवर्गप्राप्तिश्च पुण्यं पापं तथैव च ॥ १३ इन्हीं (यज्ञादि) कर्मोंद्वारा होते हैं। इस वर्षमें महेन्द्र, महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमान् ऋक्षपर्वतः । मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य एवं पारियात्र विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तात्र कुलपर्वताः ॥ १४ नामवाले सात मुख्य कुल पर्वत हैं ॥ ११-१४ ॥ तथान्ये शतसाहस्रा भूधरा मध्यवासिनः । इसके मध्यमें अन्य लाखों पर्वत हैं जो अत्यन्त विस्तारोच्छ्रायिणो रम्या विपुलाः शुभसानवः ॥ १५ विस्तृत, उत्तुङ्ग (ऊँचे) रम्य एवं सुन्दर शिखरोंसे कोलाहलः स वैभ्राजो मन्दरो दर्दुराचलः । सुशोभित हैं। यहाँ कोलाहल, वैभ्राज, मन्दरगिरि, दर्दुर, वातंधमो वैद्युतश्च मैनाकः सरसस्तथा ॥ १६ वातंधम, वैद्युत, मैनाक, सरस, तुङ्गप्रस्थ, नागगिरि, तुङ्गप्रस्थो नागगिरिस्तथा गोवर्धनाचलः । गोवर्धन, उज्जायन (गिरिनार), पुष्पगिरि, अर्बुद (आबू), उज्जायनः पुष्यगिरिरर्बुदो रैवतस्तथा ॥ १७ रैवत, ऋष्यमूक, गोमन्त (गोवाका पर्वत), चित्रकूट, ऋष्यमूकः सगोमन्तश्चित्रकूटः कृतस्मरः । कृतस्मर, श्रीपर्वत, कोङ्कण तथा अन्य सैकड़ों पर्वत भी श्रीपर्वतः कोङ्कणश्च शतशोऽन्येऽपि पर्वताः ॥ १८ विराज रहे हैं ॥ १५-१८॥ तैर्विमिश्रा जनपदा म्लेच्छा आर्याश्च भागशः । उनसे संयुक्त आर्यों और म्लेच्छोंके विभागोंके तैः पीयन्ते सरिच्छ्रेष्ठा यास्ताः सम्यङ्गिशामय ॥ १९ अनुसार जनपद हैं। यहाँके निवासी जिन उत्तम नदियोंके सरस्वती पञ्चरूपा कालिन्दी सहिरण्वती । जल पीते हैं उनका वर्णन भलीभाँति सुनो। पाँच रूपकी शतद्रुश्चन्द्रिका नीला वितस्तैरावती कुहूः ॥ २० सरस्वती, कालिन्दी (यमुना), हिरण्वती, सतलज, चन्द्रिका, मधुरा देविका चैव उशीरा धातकी रसा । नीला, वितस्ता, ऐरावती, कुहू, मधुरा, देविका, उशीरा, गोमती धूतपापा च बाहुदा सदृषद्वती ॥ २१ धातकी, रसा, गोमती, धूतपापा, बाहुदा, दृषद्वती, निश्चीरा, निश्चीरा गण्डकी चित्रा कौशिकी च वधूसरा । गण्डकी, चित्रा, कौशिकी, वधूसरा, सरयू तथा लौहित्या — सरयूश्च सलौहित्या हिमवत्पादनिःसृताः ॥ २२ ये नदियाँ हिमालयकी तलहटीसे निकली हैं ॥ १९-२२ ॥ वेदस्मृतिर्वेदवती वृत्रघ्नी सिन्धुरेव च । पर्णाशा नन्दिनी चैव पावनी च मही तथा ॥ २३ वेदस्मृति, वेदवती, वृत्रघ्नी, सिन्धु, पर्णाशा, नन्दिनी,

६८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १३ पारा चर्मण्वती लूपी विदिशा वेणुमत्यपि । सिप्रा ह्यवन्ती च तथा पारियात्राश्रयाः स्मृताः ॥ २४ शोणो महानदश्चैव नर्मदा सुरसा कृपा । मन्दाकिनी दशार्णा च चित्रकूटोपवाहिका ॥ २५ चित्रोत्पला वै तमसा करमोदा पिशाचिका । तथान्या पिप्पलश्रोणी विपाशा वञ्जुलावती ॥ २६ सत्सन्तजा शुक्तिमती मञ्जिष्ठा कृत्तिमा वसुः । ऋक्षपादप्रसूता च तथान्या बालुवाहिनी ॥ २७ शिवा पयोष्णी निर्विन्ध्या तापी सनिषधावती । वेणा वैतरणी चैव सिनीबाहुः कुमुद्वती ॥ २८ तोया चैव महागौरी दुर्गन्धा वाशिला तथा । विन्ध्यपादप्रसूताश्च नद्यः पुण्यजलाः शुभाः ॥ २९ गोदावरी भीमरथी कृष्णा वेणा सरस्वती । तुङ्गभद्रा सुप्रयोगा बाह्या कावेरिरेव च ॥ ३० दुग्धोदा नलिनी रेवा वारिसेना कलस्वना । एतास्त्वपि महानद्यः सह्यपादविनिर्गताः ॥ ३१ कृतमाला ताम्रपर्णी वञ्जुला चोत्पलावती । सिनी चैव सुदामा च शुक्तिमत्प्रभवास्त्विमाः ॥ ३२ सर्वाः पुण्याः सरस्वत्यः पापप्रशमनास्तथा । जगतो मातरः सर्वाः सर्वाः सागरयोषितः ॥ ३३ अन्याः सहस्रशश्चात्र क्षुद्रनद्यो हि राक्षस । सदाकालवहाश्चान्याः प्रावृट्कालवहास्तथा । उद्ङ्मध्योद्भवा देशाः पिबन्ति स्वेच्छया शुभाः ॥ ३४ मत्स्याः कुसृष्टाः कुणिकुण्डलाश्च । पाञ्चालकाश्याः सह कोसलाभिः ॥ ३५ वृकाः शबरकौवीराः सधूलिङ्गा जनास्त्विमे । शकाश्चैव समशका मध्यदेश्या जनास्त्विमे ॥ ३६ वाहीका वाटधानाश्च आभीराः कालतोयकाः । अपरान्तास्तथा शूद्राः पह्लवाश्च सखेटकाः ॥ ३७ गान्धारा यवनाश्चैव सिन्धुसौवीरमद्रकाः । शातद्रवा लित्थाश्च पारावतसमूषकाः ॥ ३८ माठरोदकधाराश्च कैकेया दशमास्तथा । क्षत्रियाः प्रातिवैश्याश्च वैश्यशूद्रकुलानि च ॥ ३९ काम्बोजा दरदाश्चैव बर्बरा ह्यङ्गलौकिकाः । चीनाश्चैव तुषाराश्च बहुधा बाह्यतोदराः ॥ ४० आत्रेयाः सभरद्वाजाः प्रस्थलाश्च दशेरकाः । लम्पकास्तावका रामाः शूलिकास्तङ्गणैः सह ॥ ४१ पावनी, मही, पारा, चर्मण्वती, लूपी, विदिशा, वेणुमती, सिप्रा तथा अवन्ती - ये नदियाँ पारियात्र पर्वतसे निकली हुई हैं। महानद, शोण, नर्मदा, सुरसा, कृपा, मन्दाकिनी, दशार्णा, चित्रकूटा, अपवाहिका, चित्रोत्पला, तमसा, करमोदा, पिशाचिका, पिप्पलश्रोणी, विपाशा, वञ्जुलावती, सत्सन्तजा, शुक्तिमती, मञ्जिष्ठा, कृत्तिमा, वसु और बालुवाहिनी - ये नदियाँ तथा दूसरी जो बालुका बहानेवाली हैं, ऋक्षपर्वतकी तलहटीसे निकली हुई हैं ॥ २३-२७ ॥ शिवा, पयोष्णी (पैनगंगा), निर्विन्ध्या (कालीसिंध), तापी, निषधावती, वेणा, वैतरणी, सिनीबाहु, कुमुद्वती, तोया, महागौरी, दुर्गन्धा तथा वाशिला - ये पवित्र जलवाली कल्याणकारिणी नदियाँ विन्ध्यपर्वतसे निकली हुई हैं। गोदावरी, भीमरथी, कृष्णा, वेणा, सरस्वती, तुङ्गभद्रा, सुप्रयोगा, बाह्या, कावेरी, दुग्धोदा, नलिनी, रेवा (नर्मदा), वारिसेना तथा कलस्वना - ये महानदियाँ सह्यपर्वतके पाद (नीचे) - से निकलती हैं ॥ २८-३१ ॥ कृतमाला, ताम्रपर्णी, वञ्जुला, उत्पलावती, सिनी तथा सुदामा - ये नदियाँ शुक्तिमान् पर्वतसे निकली हुई हैं। ये सभी नदियाँ पवित्र, पापोंका प्रशमन करनेवाली, जगत्की माताएँ तथा सागरकी पत्नियाँ हैं। राक्षस ! इनके अतिरिक्त भारतमें अन्य हजारों छोटी नदियाँ भी बहती हैं। इनमें कुछ तो सदैव प्रवाहित होनेवाली हैं। उत्तर एवं मध्यके देशोंके निवासी इन पवित्र नदियोंके जलको स्वेच्छाया पान करते हैं। मत्स्य, कुसृष्ट, कुणि, कुण्डल, पाञ्चाल, काशी, कोसल, वृक, शबर, कौवीर, धूलिङ्ग, शक तथा मशक जातियोंके मनुष्य मध्यदेशमें रहते हैं ॥ ३२-३६ ॥ वाहीक, वाटधान, आभीर, कालतोयक, अपरान्त, शूद्र, पह्लव, खेटक, गान्धार, यवन, सिन्धु, सौवीर, मद्रक, शातद्रव, ललित्थ, पारावत, मूषक, माठर, उदकधार, कैकेय, दशम, क्षत्रिय, प्रातिवैश्य तथा वैश्य एवं शूद्रोंके कुल, काम्बोज, दरद, बर्बर, अङ्गलौकिक, चीन, तुषार, बहुधा, बाह्यतोदर, आत्रेय, भरद्वाज, प्रस्थल, दशेरक, लम्पक, तावक, राम, शूलिक, तङ्गण,

अध्याय १३] सुकेशिके प्रश्नके उत्तरमें ऋषियोंका जम्बू-द्वीपकी स्थिति और उनमें स्थित पर्वत तथा नदियोंका वर्णन ६९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
औरसाश्चालिभद्राश्च किरातानां च जातयः।<br>तामसाः क्रममासाश्च सुपार्श्वाः पुण्ड्रकास्तथा॥ ४२<br>कुलूताः कुहुका ऊर्णास्तूणीपादाः सकुक्कुटाः।<br>माण्डव्या मालवीयाश्च उत्तरापथवासिनः ॥ ४३औरस, अलिभद्र, किरातोंकी जातियाँ, तामस, क्रममास, सुपार्श्व, पुण्ड्रक, कुलूत, कुहुक, ऊर्ण, तूणीपाद, कुक्कुट, माण्डव्य एवं मालवीय — ये जातियाँ$^*$ उत्तर भारतमें निवास करती हैं॥ ३७—४३॥
अङ्गा वङ्गा मुद्गरवास्त्वन्तर्गिरिबहिर्गिराः।<br>तथा प्रवङ्गा वाङ्गेया मांसादा बलदन्तिकाः॥ ४४<br>ब्रह्मोत्तरा प्राविजया भार्गवाः केशवर्वराः।<br>प्राग्ज्योतिषाश्च शूद्राश्च विदेहास्ताम्रलिप्तकाः ॥ ४५<br>माला मगधगोनन्दाः प्राच्या जनपदास्त्विमे।<br>पुण्ड्राश्च केरलाश्चैव चौडाः कुल्याश्च राक्षस॥ ४६<br>जातुषा मूषिकादाश्च कुमारादा महाशकाः।<br>महाराष्ट्रा माहिषिकाः कालिङ्गाश्चैव सर्वशः ॥ ४७<br>आभीराः सह नैषीका आरण्याः शबराश्च ये।<br>वलिन्ध्या विन्ध्यमौलेया वैदर्भा दण्डकैः सह॥ ४८<br>पौरिकाः सौशिकाश्चैव अश्मका भोगवर्द्धनाः।<br>वैषिकाः कुन्दला आन्ध्रा उद्भिदा नलकारकाः।<br>दाक्षिणात्या जनपदास्त्विमे शालकटङ्कट ॥ ४९अङ्ग (भागलपुर), वंग एवं मुद्गरव (मुंगेर), अन्तर्गिरि, बहिर्गिरि, प्रवङ्ग, वाङ्गेय, मांसाद, बलदन्तिक, ब्रह्मोत्तर, प्राविजय, भार्गव, केशवरावर, प्राग्ज्योतिष, शूद्र, विदेह, ताम्रलिप्तक, माला, मगध एवं गोनन्द — ये पूर्वके जनपद हैं। हे राक्षस! शालकटंकट! पुण्ड्र, केरल, चौड, कुल्य, जातुष, मूषिकाद, कुमाराद, महाशक, महाराष्ट्र, माहिषिक, कालिङ्ग (उड़ीसा), आभीर, नैषीक, आरण्य, शबर, वलिन्ध्य, विन्ध्यमौलेय, वैदर्भ, दण्डक, पौरिक, सौशिक, अश्मक, भोगवर्द्धन, वैषिक, कुन्दल, अन्ध्र, उद्भिद एवं नलकारक — ये दक्षिणके जनपद हैं॥ ४४—४९॥
शूर्पारका कारिवना दुर्गास्तालीकटैः सह।<br>पुलीयाः ससिनीलाश्च तापसास्तामसास्तथा ॥ ५०<br>कारस्करास्तु रमिनो नासिक्यान्तरनर्मदाः।<br>भारकच्छा समाहेयाः सह सारस्वतैरपि ॥ ५१<br>वात्सेयाश्च सुराष्ट्राश्च आवन्त्याश्चार्बुदैः सह।<br>इत्येते पश्चिमाशाशां स्थिता जानपदा जनाः॥ ५२<br>कारूषाश्चैकलव्याश्च मेकलाश्चोत्कलैः सह।<br>उत्तमर्णा दशार्णाश्च भोजाः किंकवरैः सह॥ ५३<br>तोशलाः कोशलाश्चैव त्रैपुराश्चैल्लिकास्तथा।<br>तुरुसास्तुम्बराश्चैव वहनाः नैषधैः सह॥ ५४<br>अनूपास्तुण्डिकेराश्च वीतहोत्रास्त्ववन्तयः।<br>सुकेशे विन्ध्यमूलस्थास्त्विमे जनपदाः स्मृताः॥ ५५सुकेशि! शूर्पारक (बम्बईका क्षेत्र), कारिवन, दुर्ग, तालीकट, पुलीय, ससिनील, तापस, तामस, कारस्कर, रमी, नासिक्य, अन्तर, नर्मद, भारकच्छ, माहेय, सारस्वत, वात्सेय, सुराष्ट्र, आवन्त्य एवं अर्बुद — ये पश्चिम दिशामें स्थित जनपदोंके निवासी हैं। कारूष, एकलव्य, मेकल, उत्कल, उत्तमर्ण, दशार्ण, भोज, किंकवर, तोशल, कोशल, त्रैपुर, ऐल्लिक, तुरुस, तुम्बर, वहन, नैषध, अनूप, तुण्डिकेर, वीतहोत्र एवं अवन्ती — ये सभी जनपद विन्ध्याचलके मूलमें (उपत्यका — तराईमें) स्थित हैं॥ ५०—५५॥
अथो देशान् प्रवक्ष्यामः पर्वताश्रयिणस्तु ये।<br>निराहारा हंसमार्गाः कुपथास्तङ्गणाः खशाः॥ ५६<br>कुथप्रावरणाश्चैव ऊर्णाः पुण्याः सहूहूकाः।<br>त्रिगर्ताश्च किराताश्च तोमराः शिशिराद्रिकाः॥ ५७<br>इमे तवोक्ता विषयाः सुविस्तराद्<br>द्विपे कुमारे रजनीचरेश।<br>एतेषु देशेषु च देशधर्मान्<br>संकीर्त्यमानाशृणु तत्त्वतो हि॥ ५८अच्छा, अब हम पर्वताश्रित प्रदेशोंके नामोंका वर्णन करेंगे। उनके नाम इस प्रकार हैं — निराहार, हंसमार्ग, कुपथ, तंगण, खश, कुथप्रावरण, ऊर्ण, पुण्य, हूहूक, त्रिगर्त, किरात, तोमर एवं शिशिराद्रिक। निशाचर! तुमसे कुमारद्वीपके इन देशोंका विस्तारसे हमलोगों ने वर्णन किया। अब हम इन देशोंमें वर्तमान देश-धर्मोंका यथार्थतः वर्णन करेंगे, उसे सुनो॥ ५६—५८॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तेरहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १३॥


$^*$ मनुस्मृति (८।४१) में भी जाति-जनपदादि धर्म मान्य हैं। इन्हें विस्तारसे समझनेके लिये 'जातिभास्कर' आदि देखना चाहिये।

चौदहवाँ अध्याय

दशाङ्ग-धर्म, आश्रम-धर्म और सदाचार-स्वरूपका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br><br>अहिंसा सत्यमस्तेयं दानं क्षान्तिर्दमः शमः।<br>अकार्पण्यं च शौचं च तपश्च रजनीचर॥ १<br><br>दशाङ्गो राक्षसश्रेष्ठ धर्मोऽसौ सार्ववर्णिकः।<br>ब्राह्मणस्यापि विहिता चातुराश्रम्यकल्पना॥ २ऋषिगण बोले— राक्षसश्रेष्ठ! अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), दान, क्षमा, दम (इन्द्रिय-निग्रह), शम, अकार्पण्य, शौच एवं तप—धर्मके ये दसों अङ्ग सभी वर्णोंके लिये उपदिष्ट हैं; ब्राह्मणोंके लिये तो चार आश्रमोंका और भी विधान विहित किया गया है॥ १-२॥
सुकेशिरुवाच<br><br>विप्राणां चातुराश्रम्यं विस्तारान्मे तपोधनाः।<br>आचक्षध्वं न मे तृप्तिः शृण्वतः प्रतिपद्यते॥ ३सुकेशी बोला— तपोधनो! ब्राह्मणोंके लिये विहित चारों आश्रमोंके नियम आदिको आपलोग विस्तारसे कहें। मुझे उसे सुनते हुए तृप्ति नहीं हो रही है—मैं और भी सुनना चाहता हूँ॥ ३॥
ऋषय ऊचुः<br><br>कृतोपनयनः सम्यग् ब्रह्मचारी गुरौ वसेत्।<br>तत्र धर्मोऽस्य यस्तं च कथ्यमानं निशामय॥ ४<br><br>स्वाध्यायोऽथाग्निशुश्रूषा स्नानं भिक्षाटनं तथा।<br>गुरोर्निवेद्य तच्चाद्यमनुज्ञातेन सर्वदा॥ ५<br><br>गुरोः कर्माणि सोद्योगः सम्यक्प्रीत्युपपादनम्।<br>तेनाहूतः पठेच्चैव तत्परो नान्यमानसः॥ ६<br><br>एकं द्वौ सकलान् वापि वेदान् प्राप्य गुरोर्मुखात्।<br>अनुज्ञातो वरं दत्त्वा गुरवे दक्षिणां ततः॥ ७<br><br>गार्हस्थ्याश्रमकामस्तु गार्हस्थ्याश्रममावसेत्।<br>वानप्रस्थाश्रमं वापि चतुर्थं स्वेच्छयात्मनः॥ ८ऋषिगण बोले— सुकेशि! ब्रह्मचारी ब्राह्मण भलीभाँति उपनयन-संस्कार कराकर गुरुके गृहपर निवास करे। वहाँके जो कर्तव्य हैं, उन्हें बतलाया जा रहा है, तुम उन्हें सुनो। उनके कर्तव्य हैं—स्वाध्याय, दैनिक हवन, स्नान, भिक्षा माँगना और उसे गुरुको निवेदित करके तथा उनसे आज्ञा प्राप्त कर भोजन करना, गुरुके कार्य-हेतु उद्यत रहना, सम्यक् रूपसे गुरुमें भक्ति रखना, उनके बुलानेपर तत्पर एवं एकाग्रचित्त होकर पढ़ना (—ये ब्राह्मण ब्रह्मचारीके धर्म हैं)। गुरुके मुखसे एक, दो या सभी वेदोंका अध्ययन कर गुरुको धन तथा दक्षिणा दे करके उनसे आज्ञा प्राप्त कर गृहस्थाश्रममें जानेका इच्छुक (शिष्य) गृहस्थ आश्रममें प्रवेश करे अथवा अपनी इच्छाके अनुसार वानप्रस्थ या संन्यासका अवलम्बन करे॥ ४-८॥
तत्रैव वा गुरोर्गेहे द्विजो निष्ठामवाप्नुयात्।<br>गुरोरभावे तत्पुत्रे तच्छिष्ये तत्सुतं विना॥ ९<br><br>शुश्रूषन् निरभिमानो ब्रह्मचर्याश्रमं वसेत्।<br>एवं जयति मृत्युं स द्विजः शालकटङ्कट॥ १०अथवा ब्राह्मण ब्रह्मचारी वहीं गुरुके घरमें ब्रह्मचर्यकी निष्ठा प्राप्त करे अर्थात् जीवनपर्यन्त ब्रह्मचारी रहे। गुरुके अभावमें उनके पुत्र एवं पुत्र न हो तो उनके शिष्यके समीप निवास करे। राक्षस सुकेशि! अभिमानरहित तथा शुश्रूषा करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें रहे। इस प्रकार अनुष्ठान करनेवाला द्विज मृत्युको जीत लेता है। हे निशाचर!

१५- दैत्योंका धर्म एवं सदाचारका पालन, सुकेशीके नगरका उत्थान-पतन, वरुणा-असीकी महिमा, लोलार्क-प्रसंग

अध्याय १४ ]दशाङ्ग-धर्म, आश्रम-धर्म और सदाचार-स्वरूपका वर्णन७१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उपावृत्तस्ततस्तस्माद् गृहस्थाश्रमकाम्यया।<br>असमानर्षिकुलजां कन्यामुद्वहेद् निशाचर ॥ ११<br><br>स्वकर्मणा धनं लब्ध्वा पितृदेवातिथीनपि।<br>सम्यक् संप्रीणयेद् भक्त्या सदाचाररतो द्विजः ॥ १२वहाँकी अवधि समाप्त कर ब्रह्मचारी द्विज गृहस्थाश्रमकी कामनासे अपने गोत्रसे भिन्न गोत्रके ऋषिवाले कुलमें उत्पन्न कन्यासे विवाह करे। सदाचारमें रत द्विज अपने नियत कर्मद्वारा धनोपार्जनकर पितरों, देवों एवं अतिथियोंको अपनी भक्तिसे अच्छी तरह तृप्त करे ॥ ९—१२ ॥
सुकेशिरुवाच<br>सदाचारो निगदितो युष्माभिर्मम सुव्रताः।<br>लक्षणं श्रोतुमिच्छामि कथयध्वं तमद्य मे ॥ १३(ब्रह्मचारी ब्राह्मणके नियमोंको सुननेके बाद) सुकेशिने कहा— श्रेष्ठ व्रतवाले ऋषियो! आपलोगोंने मुझसे इसके पूर्व सदाचारका वर्णन किया है। सदाचारका लक्षण क्या है? अब मैं उसे सुनना चाहता हूँ। कृपया मुझसे अब उसका वर्णन करें ॥ १३ ॥
ऋषय ऊचुः<br>सदाचारो निगदितस्तव योऽस्माभिरादरात्।<br>लक्षणं तस्य वक्ष्यामस्तच्छृणुष्व निशाचर ॥ १४<br><br>गृहस्थेन सदा कार्यमाचारपरिपालनम्।<br>न ह्याचारविहीनस्य भद्रमत्र परत्र च ॥ १५<br><br>यज्ञदानतपांसीह पुरुषस्य न भूतये।<br>भवन्ति यः समुल्लङ्घ्य सदाचारं प्रवर्तते ॥ १६<br><br>दुराचारो हि पुरुषो नेह नामुत्र नन्दते।<br>कार्यो यत्नः सदाचारे आचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ १७ऋषियोंने कहा— राक्षस! हमलोगोंने तुमसे श्रद्धापूर्वक जिस सदाचारका वर्णन किया है, उसका (अब) लक्षण बतलाते हैं; तुम उसे सुनो। गृहस्थको आचारका सदा पालन करना चाहिये। आचारहीन व्यक्तिका इस लोक और परलोकमें कल्याण नहीं होता है। सदाचारका उल्लङ्घन कर लोक-व्यवहार तथा शास्त्र-व्यवहार करनेवाले पुरुषके यज्ञ, दान एवं तप कल्याणकर नहीं होते। दुराचारी पुरुष इस लोक तथा परलोकमें सुख नहीं पाता। अतः आचार-पालनमें सदा तत्पर रहना चाहिये। आचार दुर्लक्षणोंको नष्ट कर देता है ॥ १४—१७ ॥
तस्य स्वरूपं वक्ष्यामः सदाचारस्य राक्षस।<br>शृणुष्वैकमनास्तच्च यदि श्रेयोऽभिवाञ्छसि ॥ १८<br>धर्मोऽस्य मूलं धनमस्य शाखा<br>पुष्पं च कामः फलमस्य मोक्षः।<br>असौ सदाचारतरुः सुकेशिन्<br>संसेवितो येन स पुण्यभोक्ता ॥ १९<br>ब्राह्मे मुहूर्ते प्रथमं विबुध्ये-<br>दनुस्मरेद् देववरान् महर्षीन्।<br>प्राभातिकं मङ्गलमेव वाच्यं<br>यदुक्तवान् देवपतिस्त्रिनेत्रः ॥ २०राक्षस! हम उस (पृष्ट) सदाचारका स्वरूप कहते हैं। यदि तुम कल्याण चाहते हो तो एकाग्रचित्त होकर उसे सुनो। सुकेशिन्! सदाचारका मूल धर्म है, धन इसकी शाखा है, काम (मनोरथ) इसका पुष्प है एवं मोक्ष इसका फल है—ऐसे सदाचाररूपी वृक्षका जो सेवन करता है, वह पुण्यभोगी बन जाता है। मनुष्योंको ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर सर्वप्रथम श्रेष्ठ देवों एवं महर्षियोंका स्मरण करना चाहिये तथा देवाधिदेव महादेवद्वारा कथित प्रभातकालीन मङ्गलस्तोत्रका पाठ करना चाहिये ॥ १८—२० ॥
सुकेशिरुवाच<br>किं तदुक्तं प्रभातं शंकरेण महात्मना।<br>प्रभाते यत् पठन्मर्त्यो मुच्यते पापबन्धनात् ॥ २१सुकेशिने पूछा— ऋषियो! महादेव शंकरने कौन-सा 'सुप्रभात' कहा है कि जिसका प्रातःकाल पाठ करनेसे मनुष्य पाप-बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ २१ ॥
ऋषय ऊचुः<br>श्रूयतां राक्षसश्रेष्ठ सुप्रभातं हरोदितम्।<br>श्रुत्वा स्मृत्वा पठित्वा च सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २२ऋषिगण बोले— राक्षसश्रेष्ठ! महादेवजीद्वारा वर्णित 'सुप्रभात' स्तोत्रको सुनो। इसको सुनने, स्मरण करने और पढ़नेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है।
७२श्रीवामनपुराण[ अध्याय १४

| ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी<br>भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च।<br>गुरुश्च शुक्रः सह भानुजेन<br>कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ २३<br>भृगुर्वसिष्ठः क्रतुरङ्गिराश्च<br>मनुः पुलस्त्यः पुलहः सगौतमः।<br>रैभ्यो मरीचिश्प्यवनो ऋभुश्च<br>कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ २४<br>सनत्कुमारः सनकः सनन्दनः<br>सनातनोऽप्यासुरिपिङ्गलौ च।<br>सप्त स्वराः सप्त रसातलाश्च<br>कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ २५ | (स्तुति इस प्रकार है—) 'ब्रह्मा, विष्णु, शंकर ये देवता तथा सूर्य, चन्द्रमा, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनैश्चर ग्रह—ये सभी मेरे प्रातःकालको मङ्गलमय बनायें। भृगु, वसिष्ठ, क्रतु, अङ्गिरा, मनु, पुलस्त्य, पुलह, गौतम, रैभ्य, मरीचि, च्यवन तथा ऋभु—ये सभी (ऋषि) मेरे प्रातःकालको मङ्गलमय बनायें। सनत्कुमार, सनक, सनन्दन, सनातन, आसुरि, पिङ्गल, सातों स्वर एवं सातों रसातल—ये सभी मेरे प्रातःकालको मङ्गलमय बनायें'॥ २२–२५॥ | | पृथ्वी सगन्धा सरसास्तथापः<br>स्पर्शश्च वायुर्ज्वलनः सतेजाः।<br>नभः सशब्दं महता सहैव<br>यच्छन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ २६<br>सप्तार्णवाः सप्त कुलाचलाश्च<br>सप्तर्षयो द्वीपवराश्च सप्त।<br>भूरादि कृत्वा भुवनानि सप्त<br>ददन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ २७<br>इत्थं प्रभाते परमं पवित्रं<br>पठेत् स्मरेद्वा शृणुयाच्च भक्त्या।<br>दुःस्वप्ननाशोऽनघ सुप्रभातं<br>भवेच्च सत्यं भगवत्प्रसादात्॥ २८<br>ततः समुत्थाय विचिन्तयेत<br>धर्मं तथार्थं च विहाय शय्याम्।<br>उत्थाय पश्चाद्धरिरित्युदीर्य<br>गच्छेत् तदोत्सर्गविधिं हि कर्तुम्॥ २९ | 'गन्धगुणवाली पृथ्वी, रसगुणवाला जल, स्पर्शगुणवाली वायु, तेजोगुणवाली अग्नि, शब्दगुणवाला आकाश एवं महत्तत्त्व—ये सभी मेरे प्रातःकालको मङ्गलमय बनायें। सातों समुद्र, सातों कुलपर्वत, सप्तर्षि, सातों श्रेष्ठ द्वीप और भू आदि सातों लोक—ये सभी प्रभातकालमें मुझे मङ्गल प्रदान करें।' इस प्रकार प्रातःकालमें परम पवित्र सुप्रभात-स्तोत्रको भक्तिपूर्वक पढ़े, स्मरण करे अथवा सुने। निष्पाप! ऐसा करनेसे भगवान्की कृपासे निश्चय ही उसके दुःस्वप्नका नाश होता है तथा सुन्दर प्रभात होता है। उसके बाद उठकर धर्म तथा अर्थके विषयमें चिन्तन करे और शय्या त्याग करनेके बाद 'हरि'का नाम लेकर उत्सर्ग-विधि (शौच आदि) करनेके लिये जाय॥ २६–२९॥ | | न देवगोब्राह्मणवह्निमार्गे<br>न राजमार्गे न चतुष्पथे च।<br>कुर्यादधोत्सर्गमपीह गोष्ठे<br>पूर्वापरां चैव समाश्रितो गाम्॥ ३०<br>ततस्तु शौचार्थमुपाहरेन्मृदं<br>गुदे त्रयं पाणितले च सप्त।<br>तथोभयोः पञ्च चतुस्तथैकां<br>लिङ्गे तथैकां मृदमाहरेत॥ ३१<br>नान्तर्जलाद्राक्षस मूषिकस्थला-<br>च्छौचावशिष्टा शरणात् तथान्या। | मल-त्याग देवता, गौ, ब्राह्मण और अग्निके मार्ग, राजपथ (सड़क) और चौराहेपर, गोशालामें तथा पूर्व या पश्चिम दिशाकी ओर मुख करके न करे। मलत्यागके बाद फिर शुद्धिके लिये मिट्टी ग्रहण करे और मलद्वारमें तीन बार, बायें हाथमें सात बार तथा दोनों हाथोंमें दस बार एवं लिङ्गमें एक बार मिट्टी लगाये। राक्षस! सदाचार जाननेवाले मनुष्यको जलके भीतरसे, चूहेकी बिलसे, दूसरोंके शौचसे बची हुई एवं गृहसे मिट्टी नहीं लेनी |

| अध्याय १४ ] | दशाङ्ग-धर्म, आश्रम-धर्म और सदाचार-स्वरूपका वर्णन | ७३ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वल्मीकमृच्चापि हि शौचनाय<br>ग्राह्या सदाचारविदा नरेण ॥ ३२<br>उदङ्मुखः प्राङ्मुखो वापि विद्वान्<br>प्रक्षाल्य पादौ भुवि संनिविष्टः ।<br>समाचमेदद्भिर्फेनिालाभि-<br>रादौ परिमृज्य मुखं द्विरद्भिः ॥ ३३चाहिये। दीमककी बाँबीसे भी शुद्धिके लिये मिट्टी नहीं लेनी चाहिये। विद्वान् पुरुष पैर धोनेके पश्चात् उत्तर या पूर्वमुख बैठकर फेनरहित जलसे पहले मुखको दो बार धोये फिर धोनेके बाद आचमन करे ॥ ३०—३३ ॥
ततः स्पृशेत्खानि शिरः करेण<br>संध्यामुपासीत ततः क्रमेण ।<br>केशांस्तु संशोध्य च दन्तधावनं<br>कृत्वा तथा दर्पणदर्शनं च ॥ ३४<br>कृत्वा शिरःस्नानमथाङ्गिकं वा<br>संपूज्य तोयेन पितॄन् सदेवान् ।<br>होमं च कृत्वालभनं शुभानां<br>कृत्वा बहिर्निर्गमनं प्रशस्तम् ॥ ३५<br>दूर्वादधिसर्पिस्थोदकुम्भं<br>धेनुं सवत्सां वृषभं सुवर्णम् ।<br>मृद्गोमयं स्वस्तिकमक्षतानि<br>लाजामधु ब्राह्मणकन्यकां च ॥ ३६<br>श्वेतानि पुष्पाण्यथ शोभनानि<br>हुताशनं चन्दनमर्कबिम्बम् ।<br>अश्वत्थवृक्षं च समालभेत<br>ततस्तु कुर्यान्निजजातिधर्मम् ॥ ३७आचमन करनेके बाद अपनी इन्द्रियों तथा सिरको हाथसे स्पर्शकर क्रमशः केश-संशोधन, दन्तधावन एवं दर्पण-दर्शनकर संध्योपासन करे। शिरःस्नान (सिरसे पैरतक स्नान) अथवा अर्धस्नान कर पितरों एवं देवताओंका जलसे पूजन करनेके पश्चात् हवन एवं माङ्गलिक वस्तुओंका स्पर्श कर बाहर निकलना प्रशस्त होता है। दूर्वा, दधि, घृत, जलपूर्ण कलश, बछड़ेके साथ गाय, बैल, सुवर्ण, मिट्टी, गोबर, स्वस्तिक चिह्न (卐), अक्षत, लाजा, मधुका स्पर्श करे और ब्राह्मणकी कन्या एवं सूर्यबिम्बका दर्शन करे तथा सुन्दर श्वेतपुष्प, अग्नि, चन्दनका दर्शन कर अश्वत्थ (पीपल) वृक्षका स्पर्श करनेके बाद अपने जाति-धर्म (अपने वर्णके लिये नियतकर्म)-का पालन करे ॥ ३४—३७ ॥
देशानुशिष्टं कुलधर्ममग्र्यं<br>स्वगोत्रधर्मं न हि संत्यजेत ।<br>तेनार्थसिद्धिं समुपाचरेत<br>नासत्प्रलापं न च सत्यहीनम् ॥ ३८<br>न निष्ठुरं नागमशास्त्रहीनं<br>वाक्यं वदेत्साधुजनेन येन ।<br>निन्द्यो भवेन्नैव च धर्मभेदी<br>सङ्गं न चासत्सु नरेषु कुर्यात् ॥ ३९<br>संध्यासु वर्ज्यं सुरतं दिवा च<br>सर्वासु योनीषु पराबलासु ।<br>आगारशून्येषु महीतलेषु<br>रजस्वलास्वेव जलेषु वीर ॥ ४०<br>वृथाऽटनं वृथा दानं वृथा च पशुमारणम् ।<br>न कर्त्तव्यं गृहस्थेन वृथा दारपरिग्रहम् ॥ ४१देश-विहित धर्म, श्रेष्ठ कुलधर्म और गोत्रधर्मका त्याग नहीं करना चाहिये, उसीसे अर्थकी सिद्धि करनी चाहिये। असत्प्रलाप, सत्यरहित, निष्ठुर और वेद-आगमशास्त्रसे असंगत वाक्य कभी न कहे, जिससे साधुजनोंद्वारा निन्दित होना पड़े। किसीके धर्मको हानि न पहुँचाये एवं बुरे लोगोंका सङ्ग भी न करे। वीर! सन्ध्या एवं दिनके समय रति नहीं करनी चाहिये। सभी योनियोंकी परस्त्रियोंमें, गृहहीन पृथ्वीपर, रजस्वला स्त्रीमें तथा जलमें सुरतव्यापार वर्जित है। गृहस्थको व्यर्थ भ्रमण, व्यर्थ दान, व्यर्थ पशुवध तथा व्यर्थ दार-परिग्रह नहीं करना चाहिये ॥ ३८—४१ ॥
वृथाऽटनान्नित्यहानिर्वृथादानाद्धनक्षयः ।<br>वृथा पशुघ्नः प्राप्नोति पातकं नरकप्रदम् ॥ ४२व्यर्थ घूमनेसे नित्यकर्मकी हानि होती है तथा वृथा दानसे धनकी हानि होती है और वृथा पशुवध करनेवाला नरक प्राप्त करानेवाले पापको प्राप्त होता है। अवैध
७४श्रीवामनपुराण[ अध्याय १४ ]
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
संतत्या हानिरश्लाघ्या वर्णसंकरतो भयम्।<br>भेतव्यं च भवेल्लोके वृथादारपरिग्रहात् ॥ ४३<br>परस्वे परदारे च न कार्या बुद्धिरुत्तमैः।<br>परस्वं नरकायैव परदाराश्च मृत्यवे ॥ ४४<br>नेक्षेत् परस्त्रियं नग्नां न सम्भाषेत तस्करान्।<br>उदक्यादर्शनं स्पर्शं संभाषं च विवर्जयेत् ॥ ४५स्त्री-संग्रहसे सन्तानकी निन्दनीय हानि, वर्णसांकर्यका भय तथा लोकमें भी भय होता है। उत्तम व्यक्ति परधन तथा परस्त्रीमें बुद्धि न लगाये। परधन नरक देनेवाला और परस्त्री मृत्युका कारण होती है। परस्त्रीको नग्नावस्थामें न देखे, चोरोंसे बातचीत न करे एवं रजस्वला स्त्रीको न तो देखे, न उसका स्पर्श ही करे और न उससे बातचीत ही करे॥ ४२—४५॥
नैकासने तथा स्थेयं सोदर्या परजायया।<br>तथैव स्यान्न मातुश्च तथा स्वदुहितुस्त्वपि ॥ ४६<br>न च स्नायीत वै नग्नो न शयीत कदाचन।<br>दिग्वाससोऽपि न तथा परिभ्रमणमिष्यते।<br>भिन्नासनभाजनादीन् दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ४७<br>नन्दासु नाभ्यङ्गमुपाचरेत<br>क्षौरं च रिक्तासु जयासु मांसम्।<br>पूर्णासु योषित्परिवर्जयेत<br>भद्रासु सर्वाणि समाचरेत ॥ ४८<br>नाभ्यङ्गमर्के न च भूमिपुत्रे<br>क्षौरं च शुक्रे रविजे च मांसम्।<br>बुधेषु योषिन्न समाचरेत<br>शेषेषु सर्वाणि सदैव कुर्यात् ॥ ४९अपनी बहन तथा परस्त्रीके साथ एक आसनपर न बैठे। इसी प्रकार अपनी माता तथा कन्याके साथ भी एक आसनपर न बैठे। नग्न होकर स्नान और शयन न करे। वस्त्रहीन होकर इधर-उधर न घूमे, टूटे आसन और बर्तन आदिको अलग रख दे। नन्दा (प्रतिपद्, षष्ठी और एकादशी) तिथियोंमें तेलसे मालिश न करे, रिक्ता (चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी) तिथियोंमें क्षौर कर्म न करे (न कराये) तथा जया (तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी) तिथियोंमें फलका गूदा नहीं खाना चाहिये। पूर्णा (पञ्चमी, दशमी और पूर्णिमा) तिथियोंमें स्त्रीका सम्पर्क न करे तथा भद्रा (द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी) तिथियोंमें सभी कार्य करे। रविवार एवं मङ्गलवारको तेलकी मालिश, शुक्रवारको क्षौरकर्म नहीं कराना चाहिये (न करना चाहिये)। शनिवारको फलका गूदा न खाये तथा बुधवारको स्त्री वर्ज्य है। शेष दिनोंमें सभी कार्य सदैव कर्तव्य हैं॥ ४६—४९॥
चित्रासु हस्ते श्रवणे न तैलं<br>क्षौरं विशाखास्वभिजित्सु वर्ज्यम्।<br>मूले मृगे भाद्रपदास मांसं<br>योषिन्मघाकृत्तिकयोत्तरासु ॥ ५०<br>सदैव वर्ज्यं शयनमुदक्शिरा-<br>स्तथा प्रतीच्यां रजनीचरेश।<br>भुञ्जीत नैवेह च दक्षिणामुखो<br>न च प्रतीच्यामभिभोजनीयम् ॥ ५१<br>देवालयं चैत्यतरुं चतुष्पथं<br>विद्याधिकं चापि गुरुं प्रदक्षिणम्।<br>माल्यान्नपानं वसनानि यत्नतो<br>नान्यैर्धृतांश्चापि हि धारयेद् बुधः ॥ ५२<br>स्नायाच्छिरःस्नानतया च नित्यं<br>न कारणं चैव विना निशासु।<br>ग्रहोपरागे स्वजनापयाते<br>मुक्त्वा च जन्मर्क्षगते शशाङ्के ॥ ५३चित्रा, हस्त और श्रवण नक्षत्रोंमें तेल तथा विशाखा और अभिजित् नक्षत्रोंमें क्षौर-कार्य नहीं करना-कराना चाहिये। मूल, मृगशिरा, पूर्वाभाद्रपद और उत्तराभाद्रपदमें गूदा-भक्षण तथा मघा, कृत्तिका और तीनों उत्तरा (उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद)-में स्त्री-सहवास न करे। राक्षसराज! उत्तर एवं पश्चिमकी ओर सिर करके शयन नहीं करना चाहिये। दक्षिण एवं पश्चिममुख भोजन नहीं करना चाहिये। देवमन्दिर, चैत्य-वृक्ष, देवताके समान पूज्य पीपल आदिके वृक्ष, चौराहे, अपनेसे अधिक विद्वान् तथा गुरुकी प्रदक्षिणा करे। बुद्धिमान् व्यक्ति यत्नपूर्वक दूसरेके द्वारा व्यवहृत माला, अन्न और वस्त्रका व्यवहार न करे। नित्य सिरके ऊपरसे स्नान करे। ग्रहोपराग (ग्रहणके समय) और स्वजनकी मृत्यु तथा जन्म-नक्षत्रमें चन्द्रमाके रहनेके अतिरिक्त समयमें रात्रिमें बिना विशेष कारण स्नान नहीं करना चाहिये॥ ५०—५३॥

१६- देवताओंका शयन-तिथियों और उनके अशून्यशयन आदि व्रतों एवं शिव-पूजनका वर्णन

७६श्रीवामनपुराण[ अध्याय १४
श्लोकअर्थ
कर्मान्ताङ्गारशालासु स्तनंधयसुताः स्त्रियः।<br>वाग्विप्रुषो द्विजेन्द्राणां संतप्ताश्चाम्बुबिन्दवः॥ ६७कर्मशाला, अन्तर्गृह एवं अग्निशालामें दुधमुँहे बच्चोंको ली हुई स्त्रियाँ, सम्भाषण करते हुए विद्वान् ब्राह्मणोंके मुखके छींटे तथा उष्ण जलके बिन्दु पवित्र होते हैं।
भूमिर्विशुध्यते खातदाहमार्जनगोक्रमैः।<br>लेपादुल्लेखनात् सेकाद् वेश्मसंमार्जनार्चनात्॥ ६८पृथ्वीकी शुद्धि खोदने, जलाने, झाडू देने, गौओंके चलने, लीपने, खरोंचने तथा सींचनेसे होती है और गृहकी शुद्धि झाडू देने, जलके छिड़कने तथा पूजा आदिसे होती है।
केशकीटावपनेऽन्ने गोघ्राते मक्षिकान्विते।<br>मृदम्बुभस्मक्षाराणि प्रक्षेप्तव्यानि शुद्धये॥ ६९केश, कीट पड़े हुए और मक्खीके बैठ जानेपर तथा गायके द्वारा सूँघे जानेपर अन्नकी शुद्धिके लिये उसपर जल, भस्म, क्षार या मृत्तिका छिड़कनी चाहिये।
औदुम्बराणां चाम्लेन क्षारेण त्रपुसीसयोः।<br>भस्माम्बुभिश्च कांस्यानां शुद्धिः प्लावो द्रव्यस्य च॥ ७०ताम्रपात्रकी शुद्धि खटाईसे, जस्ते और शीशेकी क्षारके द्वारा, काँसेकी वस्तुएँ भस्म और जलके द्वारा तथा तरल पदार्थ कुछ अंशको बहा देनेसे शुद्ध हो जाते हैं¹॥ ६७–७०॥
अमेध्याक्तस्य मृत्तोयैर्गन्धापहरणेन च।<br>अन्येषामपि द्रव्याणां शुद्धिर्गन्धापहारतः॥ ७१अपवित्र वस्तुसे मिले पदार्थ जल और मिट्टीसे धोने तथा दुर्गन्ध दूर कर देनेसे शुद्ध होते हैं। अन्य (गन्धवाले) पदार्थोंकी शुद्धि भी गन्ध दूर करनेसे होती है।
मातुः प्रस्रवणे वत्सः शकुनिः फलपातने।<br>गर्दभो भारवाहित्वे श्वा मृगग्रहणे शुचिः॥ ७२माताके स्तनको प्रस्रुत कराने (पेन्हाने)-में बछड़ा, वृक्षसे फल गिरानेमें पक्षी, बोझा ढोनेमें गधा और शिकार पकड़नेमें कुत्ता शुद्ध (माना गया) है।
रथ्याकर्दमतोयानि नावः पथि तृणानि च।<br>मारुतेनैव शुद्ध्यन्ति पक्केष्टकचितानि च॥ ७३मार्गके कीचड़ और जल, नाव तथा रास्तेकी घास, तृण एवं पके हुए ईंटोंके समूह वायुके द्वारा ही शुद्ध हो जाते हैं।
शृतं द्रोणाढकस्याननममेध्याभिप्लुतं भवेत्।<br>अग्रमुद्धृत्य संत्याज्यं शेषस्य प्रोक्षणं स्मृतम्॥ ७४यदि एक द्रोण (ढाई सेरसे अधिक) पके अन्नके अपवित्र वस्तुसे सम्पर्क हो जाय तो उसके ऊपरका अंश निकाल कर फेंक देना एवं शेषपर जल छिड़क देना चाहिये। इससे उसकी शुद्धि हो जाती है।
उपवासं त्रिरात्रं वा दूषितान्नस्य भोजने।<br>अज्ञाते ज्ञातपूर्वे च नैव शुद्धिर्विधीयते॥ ७५अज्ञातरूपसे दूषित अन्न खा लेनेपर तीन रात्रितक उपवास करनेसे शुद्धि हो जानेका विधान है, किंतु जान-बूझकर दूषित अन्न खानेपर शुद्धि नहीं हो सकती॥ ७१–७५॥
उदक्याश्वाननग्नांश्च सूतिकान्त्यावसायिनः।<br>स्पृष्ट्वा स्नायीत शौचार्थं तथैव मृतहारिणः॥ ७६रजस्वला स्त्री, कुत्ता, नग्न (दिगम्बर साधु),² प्रसूता स्त्री, चाण्डाल और शववाहकोंका स्पर्श हो जानेपर अपवित्र हुए व्यक्तिको पवित्र होनेके लिये स्नान करना चाहिये।
सस्नेहमस्थि संस्पृश्य सवासाः स्नानमाचरेत्।<br>आचम्यैव तु निःस्नेहं गामलभ्यार्कमीक्ष्य च॥ ७७मज्जायुक्त हड्डीके छू जानेपर वस्त्रसहित स्नान करना चाहिये, किंतु सूखी हड्डीका स्पर्श होनेपर आचमन करने, गो-स्पर्श तथा सूर्यदर्शन करनेमात्रसे ही

१-द्रव्यशुद्धिका यह प्रकरण मनुस्मृति ५। ११०–१४६ तथा याज्ञवल्क्यस्मृति १। १८२–१९७ आदिमें भी प्रायः इसी भावका है।
२-पद्मपुराण आदिमें नग्न-धर्मविपाक प्रश्नोत्तर द्रष्टव्य है।

| अध्याय १४ ] | दशाङ्ग-धर्म, आश्रम-धर्म और सदाचार-स्वरूपका वर्णन | ७७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
न लङ्घयेत्पुरीषासृक्ष्ठीवनोद्वर्त्तनानि च।<br>गृहादुच्छिष्टविण्मूत्रे पादाम्भांसि क्षिपेद बहिः॥ ७८<br><br>पञ्चपिण्डाननुद्धृत्य न स्नायात् परवारिणि।<br>स्नायीत देवखातेषु सरोह्रदसरित्सु च॥ ७९शुद्धि हो जाती है। विष्ठा, रक्त, थूक एवं उबटनका उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। जूठे पदार्थ, विष्ठा, मूत्र एवं पैर धोनेके जलको घरसे बाहर फेंक देना चाहिये। दूसरेके द्वारा निर्मित बावली आदिमें मिट्टीके पाँच टुकड़ोंके निकाले बिना स्नान नहीं करना चाहिये। (मुख्यतः) देव-निर्मित झीलोंमें, ताल-तलैयों और नदियोंमें स्नान करना चाहिये॥ ७६-७९॥
नोद्यानादौ विकालेषु प्राज्ञस्तिष्ठेत् कदाचन।<br>नालपेज्जनविद्विष्टं वीरहीनां तथा स्त्रियम्॥ ८०बुद्धिमान् पुरुष बाग-बगीचोंमें असमयमें कभी न ठहरे। लोगोंसे द्वेष रखनेवाले व्यक्ति तथा पति-पुत्रसे रहित स्त्रीसे वार्तालाप नहीं करना चाहिये।
देवतापितृसच्छास्त्रयज्ञवेदादिनिन्दकैः ।<br>कृत्वा तु स्पर्शमालापं शुद्ध्येते कर्मावलोकनात्॥ ८१देवता, पितरों, भले शास्त्रों (पुराण, धर्मशास्त्र, रामायण आदि), यज्ञ एवं वेदादिके निन्दकोंका स्पर्श और उनके साथ वार्तालाप करनेपर मनुष्य अपवित्र हो जाता है, वह सूर्यदर्शन करनेपर शुद्ध होता है। उसकी शुद्धि भगवान् सूर्यके समक्ष उपस्थान करके अपने किये हुए स्पर्श और वार्तालाप कर्मके त्याग तथा पश्चात्ताप करनेसे होती है।
अभोज्याः सूतिकाषण्ढमार्जारारखुश्वकुक्कुटाः।<br>पतितापविद्धनग्राश्चाण्डालाधामश्च ये॥ ८२सूतिक, नपुंसक, बिलाव, चूहा, कुत्ते, मुर्गे, पतित, नग्न (विधर्मी) (इनके लक्षण आगे बतलाये जायेंगे) समाजसे बहिष्कृत और जो चाण्डाल आदि अधम प्राणी हैं उनके यहाँ भोजन नहीं करना चाहिये॥ ८०-८२॥
सुकेशिरुवाच<br>भवद्भिः कीर्तिताऽभोज्या य एते सूतिकादयः।<br>अमीषां श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतो लक्षणानि हि॥ ८३**सुकेशि बोला—**ऋषियो! आपलोगोंने जिन सूतिक आदिका अन्न अभक्ष्य कहा है, मैं उनके लक्षण विस्तारसे सुनना चाहता हूँ॥ ८३॥
ऋषय ऊचुः<br>ब्राह्मणी ब्राह्मणस्यैव याऽवरोधत्वमागता।<br>तावुभौ सूतिकेत्युक्तौ तयोरन्नं विगर्हितम्॥ ८४**ऋषियोंने कहा—**सुकेशि! अन्य ब्राह्मणके साथ ब्राह्मणीके व्यभिचरित होनेपर उन दोनोंको ही ‘सूतिक' कहा जाता है। उन दोनोंका अन्न निन्दित है।
न जुहोत्युचिते काले न स्नाति न ददाति च।<br>पितृदेवार्चनाद्धीनः स षण्ढः परगीयते॥ ८५उचित समयपर हवन, स्नान और दान न करनेवाला तथा पितरों एवं देवताओंकी पूजासे रहित व्यक्तिको ही यहाँ 'षण्ढ' या नपुंसक कहा गया है।
दम्भार्थं जपते यश्च तप्यते यजते तथा।<br>न परत्रार्थमुद्युक्तो स मार्जारः प्रकीर्तितः॥ ८६दम्भके लिये जप, तप और यज्ञ करनेवाले तथा परलोकार्थ उद्योग न करनेवाले व्यक्तिको यहाँ 'मार्जार' या 'बिलाव' कहा गया है।
विभवे सति नैवात्ति न ददाति जुहोति च।<br>तमाहुराखुं तस्यानं भुक्त्वा कृच्छ्रेण शुद्ध्यति ॥ ८७ऐश्वर्य रहते हुए भोग, दान एवं हवन न करनेवालेको 'आखु' (चूहा) कहते हैं। उसका अन्न खानेपर मनुष्य कृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्ध होता है॥ ८४-८७॥

| ७८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १४ | | :--- | :--- |

Sanskrit ShlokasHindi Translation
यः परेषां हि मर्माणि निकृन्तन्निव भाषते।<br>नित्यं परगुणद्वेषो स श्वान इति कथ्यते॥ ८८<br><br>सभागतानां यः सभ्यः पक्षपातं समाश्रयेत्।<br>तमाहुः कुक्कुटं देवास्तस्याप्यन्नं विगर्हितम्॥ ८९<br><br>स्वधर्मं यः समुत्सृज्य परधर्मं समाश्रयेत्।<br>अनापदि स विद्वद्भिः पतितः परिकीर्त्यते॥ ९०<br><br>देवत्यागी पितृत्यागी गुरुभक्त्यरदस्तथा।<br>गोब्राह्मणस्त्रीवधकृदपविद्धः स कीर्त्यते॥ ९१दूसरोंका मर्म भेदन करते हुए बातचीत करनेवाले तथा दूसरेके गुणोंसे द्वेष करनेवालेको ‘श्वान’ या ‘कुत्ता’ कहा गया है। सभामें आगत व्यक्तियोंमें जो सभ्य व्यक्ति पक्षपात करता है, उसे देवताओंने ‘कुक्कुट’ (मुर्गा) कहा है; उसका भी अन्न निन्दित है। विपत्तिकालके अतिरिक्त अन्य समयमें अपना धर्म छोड़कर दूसरेका धर्म ग्रहण करनेवालेको विद्वानोंने ‘पतित’ कहा है। देवत्यागी, पितृत्यागी, गुरुभक्तिसे विमुख तथा गो, ब्राह्मण एवं स्त्रीकी हत्या करनेवालेको ‘अपविद्ध’ कहा जाता है॥ ८८—९१ ॥
येषां कुले न वेदोऽस्ति न शास्त्रं नैव च व्रतम्।<br>ते नग्नाः कीर्तिताः सद्भिस्तेषामन्नं विगर्हितम्॥ ९२<br><br>आशार्तानामदाता च दातुश्च प्रतिषेधकः।<br>शरणागतं यस्त्यजति स चाण्डालोऽधमो नरः॥ ९३<br><br>यो बान्धवैः परित्यक्तः साधुभिर्ब्राह्मणैरपि।<br>कुण्डाशीयश्च तस्यान्नं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्॥ ९४<br><br>यो नित्यकर्मणो हानिं कुर्यान्नैमित्तिकस्य च।<br>भुक्तवान्नं तस्य शुद्ध्येत त्रिरात्रोपोषितो नरः॥ ९५जिनके कुलमें वेद, शास्त्र एवं व्रत नहीं हैं, उन्हें सज्जन लोग ‘नग्न’ कहते हैं। उनका अन्न निन्दित है। आशा रखनेवालोंको न देनेवाला, दाताको मना करनेवाला तथा शरणागतका परित्याग करनेवाला अधम मनुष्य ‘चाण्डाल’ कहा जाता है। बान्धवों, साधुओं एवं ब्राह्मणोंसे त्यागा गया तथा कुण्ड (पतिके जीवित रहनेपर परपुरुषसे उत्पन्न पुत्र)-के यहाँ अन्न खानेवालेको चान्द्रायण व्रत करना चाहिये। नित्य और नैमित्तिक कर्म न करनेवाले व्यक्तिका अन्न खानेपर मनुष्य तीन राततक उपवास करनेसे शुद्ध होता है॥ ९२—९५ ॥
गणकस्य निषादस्य गणिकाभिषजोस्तथा।<br>कदर्यस्यापि शुद्ध्येत त्रिरात्रोपोषितो नरः॥ ९६<br><br>नित्यस्य कर्मणो हानिः केवलं मृतजन्मसु।<br>न तु नैमित्तिकोच्छेदः कर्तव्यो हि कथंचन॥ ९७<br><br>जाते पुत्रे पितुः स्नानं सचैलस्य विधीयते।<br>मृते च सर्वबन्धूनामित्याह भगवान् भृगुः॥ ९८<br><br>प्रेताय सलिलं देयं बहिर्दग्ध्वा तु गोत्रजैः।<br>प्रथमेऽह्नि चतुर्थे वा सप्तमे वाऽस्थिसंचयम्॥ ९९गणक (ज्योतिषी), निषाद (मल्लाह), वेश्या, वैद्य तथा कृपणका अन्न खानेपर भी मनुष्य तीन दिन उपवास करनेपर शुद्ध होता है। घरमें जन्म या मृत्यु होनेपर नित्यकर्म रुक जाते हैं, किंतु नैमित्तिक कर्म कभी बंद नहीं करना चाहिये। भगवान् भृगुने कहा है कि पुत्र उत्पन्न होनेपर पिताके लिये एवं मरणमें सभी बन्धुओंके लिये वस्त्रके साथ स्नान करना चाहिये। ग्रामके बाहर शवदाह करना चाहिये। शवदाह करनेके बाद सगोत्रलोग प्रेतके उद्देश्यसे जलदान (तिलाञ्जलि) करें तथा पहले दिन या चौथे अथवा सातवें दिन अस्थि-चयन करें॥ ९६—९९ ॥
ऊर्ध्वं संचयनात्तेषामङ्गस्पर्शो विधीयते।<br>सोदकैस्तु क्रिया कार्या संशुद्धैस्तु सपिण्डजैः॥ १००अस्थि-चयनके बाद अङ्ग-स्पर्शका विधान है।<br><br>शुद्ध होकर सोदकों (चौदह पीढ़ीके अन्तर्गतके लोगों)<br><br>एवं सपिण्डजों (सात पीढ़ीके अंदरके लोगों)-को<br><br>और्ध्वदैहिक क्रिया (मरनेके बाद की जानेवाली विहित

अध्याय १४ ] दशाङ्ग-धर्म, आश्रम-धर्म और सदाचार-स्वरूपका वर्णन ७९


विषोद्वन्धनशस्त्राम्बुवह्निपातमृतेषु च।<br>बाले प्रव्राजि संन्यासे देशान्तरमृते तथा॥ १०१<br><br>सद्यः शौचं भवेद्वीर तच्चाप्युक्तं चतुर्विधम्।<br>गर्भस्रावे तदेवोक्तं पूर्णकालेन चेतरे॥ १०२<br><br>ब्राह्मणानामहोरात्रं क्षत्रियाणां दिनत्रयम्।<br>षड्रात्रं चैव वैश्यानां शूद्राणां द्वादशाहिकम्॥ १०३क्रिया) करनी चाहिये। हे वीर! विष, बन्धन, शस्त्र, जल, अग्नि और गिरनेसे मृत्युके होनेपर तथा बालक, परिव्राजक, संन्यासीकी एवं किसी व्यक्तिकी दूर देशमें मृत्यु होनेपर तत्काल शुद्धि हो जाती है। वह शुद्धि भी चार प्रकारकी कही गयी है। गर्भस्रावमें भी शीघ्र ही शुद्धि होती है। अन्य अशौच पूरे समयपर ही दूर होते हैं। (वह सद्यः शौच) ब्राह्मणोंका एक अहोरात्रका, क्षत्रियोंका तीन दिनोंका, वैश्योंका छः दिनोंका एवं शूद्रोंका बारह दिनोंका होता है॥ १००—१०३॥
दशद्वादशमासार्द्धमाससंख्यैर्दिनैश्च तैः।<br>स्वाः स्वाः कर्मक्रियाः कुर्युः सर्वे वर्णा यथाक्रमम्॥ १०४<br><br>प्रेतमुद्दिश्य कर्तव्यमेकोद्दिष्टं विधानतः।<br>सपिण्डीकरणं कार्यं प्रेते आवत्सरान्तरे॥ १०५<br><br>ततः पितृत्वमापन्ने दर्शपूर्णादिभिः शुभैः।<br>प्रीणनं तस्य कर्त्तव्यं यथा श्रुतिनिदर्शनात्॥ १०६<br><br>पितुरर्थं समुद्दिश्य भूमिदानादिकं स्वयम्।<br>कुर्यात्तेनास्य सुप्रीताः पितरो यान्ति राक्षस॥ १०७सभी वर्णोंके लोग (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) क्रमशः दस, बारह, पंद्रह दिन एवं एक मासके अन्तरपर अपनी-अपनी क्रियाएँ करें। प्रेतके उद्देश्यसे विधिके अनुसार एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिये। मरनेके एक वर्ष बीत जानेपर मनुष्यको सपिण्डीकरण श्राद्ध करना चाहिये। उसके बाद प्रेतके पितर हो जानेपर अमावास्या और पूर्णिमा तिथिके दिन वेदविहित विधिसे उनका तर्पण करना चाहिये। राक्षस! पिताके उद्देश्यसे स्वयं भूमिदान आदि करे, जिससे पितृगण इसके ऊपर प्रसन्न हो जायँ॥ १०४-१०७॥
यद् यदिष्टतमं किंचिद् यच्चास्य दयितं गृहे।<br>त्तत्तद् गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता॥ १०८<br><br>अध्येतव्या त्रयी नित्यं भाव्यं च विदुषा सदा।<br>धर्मतो धनमाहार्यं यष्टव्यं चापि भक्तितः॥ १०९<br><br>यच्चापि कुर्वतो नात्मा जुगुप्सामेति राक्षस।<br>तत् कर्त्तव्यमशङ्केन यन्न गोप्यं महाजने॥ ११०<br><br>एवमाचरतो लोके पुरुषस्य गृहे सतः।<br>धर्मार्थकामसम्प्राप्तिं परत्रेह च शोभनम्॥ १११व्यक्तिकी जीवित-अवस्था में घरमें जो-जो पदार्थ उसको अत्यन्त अभिलषित एवं प्रिय रहा हो, उसकी अक्षयताकी कामना करते हुए गुणवान् पात्रको दान देना चाहिये। सदा त्रयी अर्थात् ऋक्, यजुः और सामवेदका अध्ययन करना चाहिये, विद्वान् बनना चाहिये, धर्मपूर्वक धनार्जन एवं यथाशक्ति यज्ञ करना चाहिये। राक्षस! मनुष्यको जिस कार्यके करनेसे कर्त्ताकी आत्मा निन्दित न हो एवं जो कार्य बड़े लोगोंसे छिपाने योग्य न हो ऐसा कार्य निःशङ्क (आसक्तिरहित) होकर करना चाहिये। इस प्रकारके आचरण करनेवाले पुरुषके गृहस्थ होनेपर भी उसे धर्म, अर्थ एवं कामकी प्राप्ति होती है तथा वह व्यक्ति इस लोक और परलोकमें कल्याणका भागी होता है॥ १०८—१११॥
एष तूद्देशतः प्रोक्तो गृहस्थाश्रम उत्तमः।<br>वानप्रस्थाश्रमं धर्मं प्रवक्ष्यामोऽवधार्यताम्॥ ११२ऋषियोंने सुकेशिसे कहा— सुकेशि! अबतक हमने संक्षेपसे उत्तम गृहस्थाश्रमका वर्णन किया है। अब हम वानप्रस्थ-आश्रमके धर्मका वर्णन करेंगे, उसे

१७- देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत-विधान, विष्णु-पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग

८० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १४


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अपत्यसंततिं दृष्ट्वा प्राज्ञो देहस्य चानतिम्।<br>वानप्रस्थाश्रमं गच्छेद्रात्मनः शुद्धिकारणम्॥ ११३<br><br>तत्रारण्योपभोगैश्च तपोभिश्चात्मकर्षणम्।<br>भूमौ शय्या ब्रह्मचर्यं पितृदेवातिथिक्रिया॥ ११४<br><br>होमस्त्रिषवणं स्नानं जटावल्कलधारणम्।<br>वन्यस्नेहनिषेवित्वं वानप्रस्थविधिस्त्वयम्॥ ११५ध्यानपूर्वक सुनो। बुद्धिमान् व्यक्ति पुत्रकी संतान (पौत्र) और अपने शरीरकी गिरती अवस्था देखकर अपने आत्माकी शुद्धिके लिये वानप्रस्थ-आश्रमको ग्रहण करे। वहाँ अरण्यमें उत्पन्न मूल-फल आदिसे अपना जीवन-यापन करते हुए तपद्वारा शरीर-शोषण करे। इस आश्रममें भूमिपर शयन, ब्रह्मचर्यका पालन एवं पितर, देवता तथा अतिथियोंकी पूजा करे। हवन, तीनों काल—प्रातः, मध्याह्न, सन्ध्याकाल—स्नान, जटा और वल्कलका धारण तथा वन्य फलोंसे निकाले रसका सेवन करे। यही वानप्रस्थ-आश्रमकी विधि है॥ ११२—११५॥
सर्वसङ्गपरित्यागो ब्रह्मचर्यममानिता।<br>जितेन्द्रियत्वमावासे नैकस्मिन् वसतिश्चिरम्॥ ११६<br><br>अनारम्भस्तथाहारो भैक्षान्नं नातिकोपिता।<br>आत्मज्ञानावबोधेच्छा तथा चात्मावबोधनम्॥ ११७<br><br>चतुर्थे त्वाश्रमे धर्मा अस्माभिस्ते प्रकीर्तिताः।<br>वर्णधर्माणि चान्यानि निशामय निशाचर॥ ११८<br><br>गार्हस्थ्यं ब्रह्मचर्यं च वानप्रस्थं त्रयाश्रमाः।<br>क्षत्रियस्यापि कथिता ये चाचारा द्विजस्य हि॥ ११९[चतुर्थ आश्रम (संन्यास)-के धर्म ये हैं—]<br>सभी प्रकारकी आसक्तियोंका त्याग, ब्रह्मचर्य, अहंकारका अभाव, जितेन्द्रियता, एक स्थानपर अधिक समयतक न रहना, उद्योगका अभाव, भिक्षान्न-भोजन, क्रोधका त्याग, आत्मज्ञानकी इच्छा तथा आत्मज्ञान। निशाचर! हमने तुमसे चतुर्थ-आश्रम (संन्यास)-के इन धर्मोंका वर्णन किया। अब अन्य वर्ण-धर्मोंको सुनो। क्षत्रियोंके लिये भी गार्हस्थ्य, ब्रह्मचर्य एवं वानप्रस्थ—इन तीन आश्रमों एवं ब्राह्मणोंके लिये विहित आचारोंका विधान है॥ ११६—११९॥
वैखानसत्वं गार्हस्थ्यमाश्रमद्वितयं विशः।<br>गार्हस्थ्यमुत्तमं त्वेकं शूद्रस्य क्षणदाचर॥ १२०<br><br>स्वानि वर्णाश्रमोक्तानि धर्माणीह न हापयेत्।<br>यो हापयति तस्यासौ परिकुप्यति भास्करः॥ १२१<br><br>कुपितः कुलनाशाय ईश्वरो रोगवृद्धये।<br>भानुर्वै यतते तस्य नरस्य क्षणदाचर॥ १२२<br><br>तस्मात् स्वधर्मं न हि संत्यजेत<br>न हापयेच्चापि हि नात्मवंशम्।<br>यः संत्यजेच्चापि निजं हि धर्मं<br>तस्मै प्रकुप्येत दिवाकरस्तु॥ १२३राक्षस! वैश्यजातिके लिये गार्हस्थ्य एवं वानप्रस्थ—इन दो आश्रमोंका विधान है तथा शूद्रके लिये एकमात्र उत्तम गृहस्थ-आश्रमका ही नियम है। अपने वर्ण और आश्रमके लिये विहित धर्मोंका इस लोकमें त्याग नहीं करना चाहिये। जो इनका त्याग करता है, उसपर सूर्य भगवान् क्रुद्ध होते हैं। निशाचर! भगवान् भास्कर क्रुद्ध होकर उस मनुष्यकी रोगवृद्धि एवं उसके कुलका नाश करनेके लिये प्रयत्न करते हैं। अतः मनुष्य स्वधर्मका न तो त्याग करे और न अपने वंशकी हानि होने दे। जो मनुष्य अपने धर्मका त्याग करता है, उसपर भगवान् सूर्य क्रोध करते हैं॥ १२०—१२३॥
पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्तो मुनिभिः सुकेशी<br>प्रणम्य तान् ब्रह्मनिधीन् महर्षीन्।<br>जगाम चोत्पत्य पुरं स्वकीयं<br>मुहुर्मुहुर्धर्ममवेक्षमाणः॥ १२४पुलस्त्यजी बोले— मुनियोंके ऐसा कहनेके बाद सुकेशी उन ब्रह्मज्ञानी महर्षियोंको बारम्बार प्रणामकर धर्मका चिन्तन करते हुए उड़कर अपने पुरको चला गया॥ १२४॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौदहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १४॥

अध्याय १५ ] दैत्योंका धर्म एवं सदाचारका पालन, सुकेशीके नगरका उत्थान-पतन एवं लोलार्क-प्रसंग ८१


पन्द्रहवाँ अध्याय

दैत्योंका धर्म एवं सदाचारका पालन, सुकेशीके नगरका उत्थान-पतन, वरुणा-असीकी महिमा, लोलार्क-प्रसंग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुलस्त्य उवाच<br>ततः सुकेशिर्देवर्षे गत्वा स्वपुरमुत्तमम्।<br>समाहूयाब्रवीत् सर्वान् राक्षसान् धार्मिकं वचः॥ १<br><br>अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियसंयमः।<br>दानं दया च क्षान्तिश्च ब्रह्मचर्यममानिता॥ २<br><br>शुभा सत्या च मधुरा वाङ् नित्यं सत्क्रियारतिः।<br>सदाचारनिषेवित्वं परलोकप्रदायकाः॥ ३<br><br>इत्यूचुर्मुनयो मह्यं धर्ममाद्यं पुरातनम्।<br>सोहमाज्ञापये सर्वान् क्रियतामविकल्पतः॥ ४पुलस्त्यजी बोले— देवर्षे! उसके बाद अपने उत्तम नगरमें जाकर सुकेशीने सभी राक्षसोंको बुलाकर उनसे धर्मकी बात बतलायी। (सुकेशीने कहा—) अहिंसा, सत्य, चोरीका सर्वथा त्याग, पवित्रता, इन्द्रियसंयम, दान, दया, क्षमा, ब्रह्मचर्य, अहंकारका न करना, प्रिय, सत्य और मधुर वाणी बोलना, सदा सत्कार्योंमें अनुराग रखना एवं सदाचारका पालन करना—ये सब धर्म परलोकमें सुख देनेवाले हैं। मुनियोंने इस प्रकारके आदिकालके पुरातन धर्मको मुझे बतलाया है। मैं तुमलोगोंको आज्ञा देता हूँ कि तुमलोग बिना किसी हिचकके इन सभी धर्मोंका आचरण करो॥ १–४॥
पुलस्त्य उवाच<br>ततः सुकेशिवचनात् सर्व एव निशाचराः।<br>त्रयोदशाङ्गं ते धर्मं चक्रुर्मुदितमानसाः॥ ५<br><br>ततः प्रवृद्धिं सुतरामगच्छन्त निशाचराः।<br>पुत्रपौत्रार्थसंयुक्ताः सदाचारसमन्विताः॥ ६<br><br>तज्ज्योतिस्तेजसस्तेषां राक्षसानां महात्मनाम्।<br>गन्तुं नाशनुवन् सूर्यो नक्षत्राणि न चन्द्रमाः॥ ७<br><br>ततस्त्रिभुवने ब्रह्मन् निशाचरपुरोऽभवत्।<br>दिवा चन्द्रस्य सदृशः क्षणदायां च सूर्यवत्॥ ८पुलस्त्यजीने कहा— उसके बाद सुकेशीके वचनसे सभी राक्षस प्रसन्न-चित्त होकर (अहिंसा आदि) तेरह अङ्गवाले धर्मका आचरण करने लगे। इससे राक्षसोंकी सभी प्रकारकी अच्छी उन्नति हुई। वे पुत्र-पौत्र तथा अर्थ-धर्म-सदाचार आदिसे सम्पन्न हो गये। उन महान् राक्षसोंके तेजके सामने सूर्य, नक्षत्र और चन्द्रमाकी गति और कान्ति क्षीण-सी दीखने लगी। ब्रह्मन्! उसके बाद निशाचरोंकी नगरी तीनों लोकोंमें दिनमें चन्द्रमाके समान और रातमें सूर्यके समान चमकने लगी॥ ५–८॥
न ज्ञायते गतिर्व्योम्नि भास्करस्य ततोऽम्बरे।<br>शशाङ्कमिति तेजस्वादमन्यन्त पुरोत्तमम्॥ ९<br><br>स्वं विकासं विमुञ्चन्ति निशामिति व्यचिन्तयन्।<br>कमलाकरेषु कमला मित्रमित्यवगम्य हि।<br>रात्रौ विकसिता ब्रह्मन् विभूतिं दातुमीप्सवः॥ १०<br><br>कौशिका रात्रिसमयं बुद्ध्वा निरगमन् किल।<br>तान् वायसास्तदा ज्ञात्वा दिवा निघ्नन्ति कौशिकान्॥ ११<br><br>स्नातकास्त्वापगास्वेव स्नानजप्यपरायणाः।<br>आकण्ठमग्नास्तिष्ठन्ति रात्रौ ज्ञात्वाऽथ वासरम्॥ १२(फलतः) अब आकाशमें सूर्यकी गति (चलने)-का पता नहीं लगता था। लोग उस श्रेष्ठ नगरको नगरके तेजके कारण आकाशमें चन्द्रमा समझने लग गये। ब्रह्मन्! सरोवरके कमल दिनको रात्रि समझकर विकसित नहीं होते थे। पर वे रात्रिमें सुकेशीके पुरको सूर्य समझकर विभूति प्रदान करनेकी इच्छासे विकसित होने लगे। इसी प्रकार उल्लू भी दिनको रात समझकर बाहर निकल आये और कौए दिनमें आये जानकर उन उल्लुओंको मारने लगे। स्नान करनेवाले लोग भी रात्रिको दिन समझकर गलेतक खुले बदन होकर स्नान करने लगे एवं जप करते हुए जलमें खड़े रहे॥ ९–१२॥

८२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १५ न व्ययुज्यन्त चक्राश्च तदा वै पुरदर्शने। उस समय सुकेशीके नगरके (सूर्यवत्) दर्शन मन्यमानास्तु दिवसमिदमुच्चैर्बुवन्ति च ॥ १३ होनेसे चकवा-चकई रात्रिको ही दिन मानकर परस्पर नूनं कान्ताविहीनेन केनचिच्चक्रपत्तिणा । अलग नहीं होते थे। वे उच्चस्वरसे कहते — निश्चय ही किसी पलीसे विहीन चक्रवाक पक्षीने एकान्तमें नदीतटपर उत्सृष्टं जीवितं शून्ये फूत्कृत्य सरितस्तटे ॥ १४ फूत्कार करके जीवन त्याग दिया है। इसीसे दयार्द्र सूर्य ततोऽनुकम्पयाविष्टो विवस्वांस्तीव्ररश्मिभिः । अपनी तेज किरणोंसे जगत्‌को तपाते हुए किसी प्रकार संतापयञ्जगत् सर्वं नास्तमेति कथंचन ॥ १५ अस्त नहीं हो रहे हैं। दूसरे कहते हैं — 'निश्चय ही कोई अन्ये वदन्ति चक्राह्वो नूनं कश्चिन् मृतो भवेत्। चक्रवाक मर गया है और पतिके शोकमें उसकी दुः‌खिनी तत्कान्तया तपस्तप्तं भर्तृशोकार्त्तया बत ॥ १६ कान्ताने भारी तप किया है। इसीलिये निश्चय ही उसकी आराधितस्तु भगवांस्तपसा वै दिवाकरः। तपस्यासे प्रसन्न हुए एवं चन्द्रमाको जीत लेनेवाले तेनासौ शशिनिर्जैता नास्तमेति रविर्ध्रुवम् ॥ १७ भगवान् सूर्य अस्त नहीं हो रहे हैं' ॥ १३–१७ ॥ यज्विनो होमशालासु सह ऋत्विग्भिरध्वरे। महामुने ! उन दिनों यज्ञशालाओंमें ऋत्विजोंके प्रावर्त्तयन्त कर्माणि रात्रावपि महामुने ॥ १८ साथ यजमानलोग रात्रिमें भी यज्ञकर्म करनेमें लगे रहते थे। विष्णुके भक्तलोग भक्तिपूर्वक सदा विष्णुकी पूजा महाभागवताः पूजां विष्णोः कुर्वन्ति भक्तितः । करते रहते एवं दूसरे लोग सूर्य, चन्द्र, ब्रह्मा और रवौ शशिनि चैवान्ये ब्रह्मणोऽन्ये हरस्य च ॥ १९ शिवकी आराधनामें लगे रहते थे। कामी लोग यह मानने कामिनश्चाप्यमन्यन्त साधु चन्द्रमसा कृतम्। लगे कि चन्द्रमाने रात्रिको निरन्तरके लिये अपनी यदिदं रजनी रम्या कृता सततकौमुदी ॥ २० ज्योत्स्नामयी बना दिया, अच्छा हुआ ॥ १८–२० ॥ अन्ये ब्रुवैल्लोकगुरुरस्माभिश्चक्रभृद् वशी। दूसरे लोग कहने लगे कि हमलोगोंने श्रावण निर्व्याजेन महागन्धैरर्चितः कुसुमैः शुभैः ॥ २१ आदि चार महीनोंमें शुद्धभावसे अति सुगन्धित पवित्र पुष्पोंद्वारा महालक्ष्मीके साथ सुदर्शनचक्रको धारण सह लक्ष्म्या महायोगी नभस्यादिचतुर्ष्वपि। करनेवाले भगवान् विष्णुकी पूजा की है। इसी अवधिमें अशून्यशयना नाम द्वितीया सर्वकामदा ॥ २२ सर्वकामदा अशून्यशयना द्वितीया तिथि होती है। उसीसे तेनासौ भगवान् प्रीतः प्रादाच्छयनमुत्तमम्। प्रसन्न होकर भगवान्‌ने अशून्य तथा महाभोगोंसे परिपूर्ण अशून्यं च महाभोगैरनस्तमितशेखरम् ॥ २३ उत्तम शयन प्रदान किया है। दूसरे कहते कि देवी रोहिणीने चन्द्रमाका क्षय देखकर निश्चय ही रुद्रकी अन्येऽब्रुवन् ध्रुवं देव्या रोहिण्या शशिनः क्षयम्। आराधना करनेकी अभिलाषासे परम पवित्र अक्षय दृष्ट्वा तप्तं तपो घोरं रुद्राराधनकाम्यया ॥ २४ अष्टमी तिथिमें वेदोक्त विधिसे कठिन तपस्या की है, पुण्यायामक्षयाष्टम्यां वेदोक्तविधिना स्वयम्। जिससे सन्तुष्ट होकर भगवान् शंकरने उसे अपनी तुष्टेन शंभुना दत्तं वरं चास्यै यदृच्छया ॥ २५ इच्छासे वर दिया है ॥ २१–२५ ॥ अन्येऽब्रुवन् चन्द्रमसा ध्रुवमाराधितो हरिः। दूसरे लोग कहते — चन्द्रमाने निश्चय ही अखण्ड- व्रतेनेह त्वखण्डेन तेनाखण्डः शशी दिवि ॥ २६ व्रतका आचरण करके भगवान् हरिको आराधित किया है। उससे आकाशमें चन्द्रमा अखण्डरूपसे प्रकाशित हो रहा है। दूसरोंने कहा — चन्द्रमाने अत्यधिक तेजवाले अन्ये ब्रुवञ्छशाङ्केन ध्रुवं रक्षा कृतात्मनः। पदद्वयं समभ्यर्च्य विष्णोरमिततेजसः ॥ २७ श्रीविष्णुके चरणयुगलकी विधिवत् पूजा करके अपनी