वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
पृष्ठ 80, कुल 489 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 80
चौदहवाँ अध्याय
दशाङ्ग-धर्म, आश्रम-धर्म और सदाचार-स्वरूपका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br><br>अहिंसा सत्यमस्तेयं दानं क्षान्तिर्दमः शमः।<br>अकार्पण्यं च शौचं च तपश्च रजनीचर॥ १<br><br>दशाङ्गो राक्षसश्रेष्ठ धर्मोऽसौ सार्ववर्णिकः।<br>ब्राह्मणस्यापि विहिता चातुराश्रम्यकल्पना॥ २ | ऋषिगण बोले— राक्षसश्रेष्ठ! अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), दान, क्षमा, दम (इन्द्रिय-निग्रह), शम, अकार्पण्य, शौच एवं तप—धर्मके ये दसों अङ्ग सभी वर्णोंके लिये उपदिष्ट हैं; ब्राह्मणोंके लिये तो चार आश्रमोंका और भी विधान विहित किया गया है॥ १-२॥ |
| सुकेशिरुवाच<br><br>विप्राणां चातुराश्रम्यं विस्तारान्मे तपोधनाः।<br>आचक्षध्वं न मे तृप्तिः शृण्वतः प्रतिपद्यते॥ ३ | सुकेशी बोला— तपोधनो! ब्राह्मणोंके लिये विहित चारों आश्रमोंके नियम आदिको आपलोग विस्तारसे कहें। मुझे उसे सुनते हुए तृप्ति नहीं हो रही है—मैं और भी सुनना चाहता हूँ॥ ३॥ |
| ऋषय ऊचुः<br><br>कृतोपनयनः सम्यग् ब्रह्मचारी गुरौ वसेत्।<br>तत्र धर्मोऽस्य यस्तं च कथ्यमानं निशामय॥ ४<br><br>स्वाध्यायोऽथाग्निशुश्रूषा स्नानं भिक्षाटनं तथा।<br>गुरोर्निवेद्य तच्चाद्यमनुज्ञातेन सर्वदा॥ ५<br><br>गुरोः कर्माणि सोद्योगः सम्यक्प्रीत्युपपादनम्।<br>तेनाहूतः पठेच्चैव तत्परो नान्यमानसः॥ ६<br><br>एकं द्वौ सकलान् वापि वेदान् प्राप्य गुरोर्मुखात्।<br>अनुज्ञातो वरं दत्त्वा गुरवे दक्षिणां ततः॥ ७<br><br>गार्हस्थ्याश्रमकामस्तु गार्हस्थ्याश्रममावसेत्।<br>वानप्रस्थाश्रमं वापि चतुर्थं स्वेच्छयात्मनः॥ ८ | ऋषिगण बोले— सुकेशि! ब्रह्मचारी ब्राह्मण भलीभाँति उपनयन-संस्कार कराकर गुरुके गृहपर निवास करे। वहाँके जो कर्तव्य हैं, उन्हें बतलाया जा रहा है, तुम उन्हें सुनो। उनके कर्तव्य हैं—स्वाध्याय, दैनिक हवन, स्नान, भिक्षा माँगना और उसे गुरुको निवेदित करके तथा उनसे आज्ञा प्राप्त कर भोजन करना, गुरुके कार्य-हेतु उद्यत रहना, सम्यक् रूपसे गुरुमें भक्ति रखना, उनके बुलानेपर तत्पर एवं एकाग्रचित्त होकर पढ़ना (—ये ब्राह्मण ब्रह्मचारीके धर्म हैं)। गुरुके मुखसे एक, दो या सभी वेदोंका अध्ययन कर गुरुको धन तथा दक्षिणा दे करके उनसे आज्ञा प्राप्त कर गृहस्थाश्रममें जानेका इच्छुक (शिष्य) गृहस्थ आश्रममें प्रवेश करे अथवा अपनी इच्छाके अनुसार वानप्रस्थ या संन्यासका अवलम्बन करे॥ ४-८॥ |
| तत्रैव वा गुरोर्गेहे द्विजो निष्ठामवाप्नुयात्।<br>गुरोरभावे तत्पुत्रे तच्छिष्ये तत्सुतं विना॥ ९<br><br>शुश्रूषन् निरभिमानो ब्रह्मचर्याश्रमं वसेत्।<br>एवं जयति मृत्युं स द्विजः शालकटङ्कट॥ १० | अथवा ब्राह्मण ब्रह्मचारी वहीं गुरुके घरमें ब्रह्मचर्यकी निष्ठा प्राप्त करे अर्थात् जीवनपर्यन्त ब्रह्मचारी रहे। गुरुके अभावमें उनके पुत्र एवं पुत्र न हो तो उनके शिष्यके समीप निवास करे। राक्षस सुकेशि! अभिमानरहित तथा शुश्रूषा करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें रहे। इस प्रकार अनुष्ठान करनेवाला द्विज मृत्युको जीत लेता है। हे निशाचर! |